इंडिया टुडे समूह के डिजिटल प्लेटफार्म लल्लनटॉप के संपादक सौरभ द्विवेदी पर कुछ गंभीर टाइप के आरोप लगे हैं। एक राठौर साहब ने लंबी चौड़ी पोस्ट लिखकर सौरभ पर यह इल्जाम लगाए हैं। एक्स यूजर डॉ निमो यादव ने यह स्क्रीनशॉट शेयर करते हुए लिखा है- लल्लनटॉप के एक पूर्व कर्मचारी (पत्रकार) सुमेर सिंह राठौड़ ने सौरभ द्विवेदी पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने बताया कि कैसे वे लोगों को बुली करते थे और उनके आइडियाज़ चुराते थे।




पत्रकारिता की शुरूआत में लल्लनटॉप में काम करने की बड़ी इच्छा थी क्योंकि इनके न्यूजरूम का माहौल बड़ा कूल लगता था लेकिन जैसे-जैसे सौरभ द्विवेदी को समझना शुरू किया ये इच्छा जाती रही और जब इनके पुराने ट्वीट वायरल हुए तब तो ये पूरी तरह से समझ आ गए कि अच्छी बातों और किताबों के पीछे छुपा हुआ चेहरा कुछ और ही है।
इनके साथ काम करने वाले कई लोगों ने इनके बारे में बताया…तब मैं सोचता था कि ये लोग जब इतने परेशान हैं इन लोगों ने इतना सहा है तो खुद क्यों नहीं लिखते सौरभ के बारे में। अब पहली बार लल्लटॉप के शुरूआत में सौरभ के साथ काम करने वाले शानदार फोटोग्राफर और एक किताब के लेखक @SumerJaisalmer ने अपने मन की बात लिखी है जो इन्होंने झेला है वो लिखा है आपको पढ़ना चाहिए –
आप ढूंढ़ने कुछ और निकलते हैं और फिर किसी दूसरी ही दुनिया में घुसते चले जाते हैं। रात में नोट्स में कुछ पुराना लिखा ढूंढ़ते हुए ये दिख गया। जब लल्लनटॉप का इंस्टाग्राम पेज बनाया था। पढ़ते हुए दो हजार सोलह के वो तीन महीने आँखों के आगे तैर गए। उन दिनों को याद करके शरीर में अब भी एक सिहरन सी दौड़ जाती है। आखिर के दो महीने तो रोज कैलेंडर देखते हुए गुजरते थे कि एक दिन खत्म हुआ अब इतने दिन बचे हैं। दिल्ली आने और आईआईएमसी से पढ़ाई खत्म करने के बाद वो पहली नौकरी थी। जब आईआईएमसी में था तो लगता था इस शहर में कभी नौकरी नहीं करूंगा, बस पढ़ाई खत्म करके फिर ‘अपनी जगह’ लौट जाऊंगा। पर कुछ जगहें थीं जहाँ वे लोग लिखते थे जिनका लिखा पसंद था। जिनसे बात करके, जिन्हें पढ़कर सीखते थे। सोचा यहाँ अपने जैसे लोग काम करते हैं, अपने जैसी ही दुनिया होगी। रेगिस्तान में इतनी मृगमरीचिकाएँ देखीं पर शायद असल दुनिया में भी ऐसे छलावे होते हैं ये सोचा नहीं था।
जब शुरू-शुरू में लल्लनटॉप जॉइन किया तो एक अलग ही ऊर्जा थी। ये भी लिखना है वो भी लिखना है, ऐसे वीडियो बनाने हैं, ये नया करना है। पर सुबह की मीटिंग में जब आइडिया देने के बाद सम्पादक खिल्ली उड़ाते तो रोनी सी सूरत बन जाती। लगता मेरे में ही कोई कमी है। शायद ठीक से कहना नहीं आता। एक बार मैंने अपने गाँव को लेकर कोई स्टोरी आइडिया दिया। उस पर दो हजार चार या पाँच में इंडिया टुडे मेग्जीन में दो पेज की बड़ी स्टोरी भी छपी थी। मेरे स्टोरी आइडिया बताने के बाद जिस तरह से उस बात की और मेरे बोलने के तरीके का मजाक सौरभ द्विवेदी ने उड़ाया, बाहर निकलकर बहुत देर तक रोता रहा। फिर वहाँ दोस्तों ने समझाया की ये सब तो न्यूजरूम का नॉर्मल है। हमें हारना नहीं होता। इसी तरह की चीज़ों से लड़कर आगे बढ़ना होता है।
इस तरह की घटनाएँ दो-तीन बार हुई तो उसके बाद सारा उत्साह ही जाता रहा। कोशिश करता कि ऐसी शिफ्ट में काम करूं जिसमें उनसे सामना नहीं हो। जब नाइट शिफ्ट होती तो अच्छे से काम कर पाता। बहुत सारी ऐसी स्टोरीज उसी शिफ्ट में लिखी जो लोगों को बहुत पसंद आई। लोगों के फोन आए। एक टिंडर पर स्टोरी थी, एक दलितों को लेकर अपने गाँव के अनुभवों पर थी, कुछ और संस्मरण थे। जिसे लेकर गालियाँ भी पड़ी लोगों की और पढ़ने-लिखने वाले लोगों से तारीफ़ भी मिली। फिर हिम्मत बंधी।
एक दिन कहा गया कि सबको पाँच-सात आइडिया लेकर आने है अगली मीटिंग में। मैंने कुछ स्टोरी आइडियाज सोचे। अपने दोस्तों को दिखाया जो अलग-अलग जगहों पर खबरों की दुनिया में जाने-माने और स्थापित लोग थे। सबने उसमें सुझाव दिये। ठीक करके, छाँटकर मैं वो आइडियाज मीटिंग मे लेकर गया और एक के बाद एक उन आइडियाज को लेकर सबके सामने हँसी उड़ाई गई। फिर उन्हीं आइडियाज में से मेरे जाने के बाद वहाँ स्टोरी की गई।
एक बार कुछ ऐसा हुआ कि वहीं न्यूजरूम में सबके सामने ही रोने लग गया मैं। एक वरिष्ठ साथी थे वहाँ पर जिनका हम सब सम्मान करते थे वे हाथ पकड़कर बाहर ले गए और बहुत देर तक समझाया। एक बात उन्होंने कही कि भागना मत। जितना भी वक़्त है लड़-भिड़कर जैसे भी लगे पूरा कर लो यहाँ।
एक और बात याद आ रही है। इरफ़ान खान आए हुए थे नीचे आजतक के ऑफिस में। ये मेरे वहाँ जाने के एक ही महीने बाद की बात थी। नीचे के फ्लोर पर आजतक पर उनका इंटरव्यू था। उसके बाद उन्हें ऊपर लल्लनटॉप के ऑफिस आना था। उन्हीं दिनों फेसबुक का लाइव फीचर नया-नया आया था। मैंने कहा कि हम ऊपर आते हुए उनके साथ थोड़ा-सा फेसबुक लाइव करके दर्शकों को ये बताते हैं कि जल्द ही उनके साथ पूरी बातचीत भी आप सुनेंगे। वहाँ भी ऐसे बेइज्जत करने के लहजे से जवाब मिला की ये सब फालतू की चीज़ें हम नहीं करते। फिर वही फालतू की चीज़ वहाँ बाद में बहुत बड़ी चीज़ भी बनी।
मैं कभी समझ ही नहीं पाया कि मेरे साथ ऐसा क्यों होता था। मुझे लगता मेरी ही गलती है। मुझे ठीक से आता नहीं होगा। फिर धीरे-धीरे दिखने लगा कि और भी लोगों के साथ ऐसा हो रहा। बाथरूम में, दरवाज़ों के पीछे, सीढ़ियों पर और भी लोगों को रोते देखा। नये-नये आए लोगों के साथ ऐसे बर्ताव होता कि उनका पूरा भरोसा ही चुकने लगता।
आखिर के दो महीने इतने मुश्किल थे कि कई बार रात को लगता बाल्कनी से कूद ही जाएँ। एक चीज़ ख़राब होती है तो फिर हर चीज ही ख़राब होती जाती है। सारे पुराने ट्रॉमा उभरकर सिर पर सवार हो जाते हैं। अच्छा ये था कि उस जगह पर भी और बाहर कुछ अच्छे लोग थे साथ में जो बचा लेते थे। शायद इसीलिए बचे रह गए।
कई बार सोचा लिखूं फिर लगा क्या ही फर्क पड़ेगा लिखने से। दोस्त भी मना करते रहे कि लिखने से तुम ही बुरे बनोगे। पर अभी जब फिर से उन दिनों की याद आई और फिर इस बीच कितने लोगों से सुना जो मेरी ही तरह से परेशान होकर, उमर भर का ट्रॉमा लेकर वहाँ से निकले हैं तो लगा लिखना चाहिए। और किसी के लिए नहीं तो खुद के लिए ही सही।



