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योगी की बायोपिक सेंसर बोर्ड के चंगुल से यूं हुई आज़ाद

भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व योगी आदित्यनाथ की महत्वाकांक्षाओं पर सतर्क नज़र रखे हुए है और ज़रूरत पड़ने पर उन्हें सीमाओं में बांधने से भी नहीं हिचकता!

केपी सिंह-

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर बनी बायोपिक ‘अजेय: द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ ए योगी’ आखिरकार बंबई हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बाद सेंसर बोर्ड के शिकंजे से मुक्त होकर रिलीज़ के लिए तैयार हो गई है। लंबे समय तक अटकी यह फिल्म सेंसर बोर्ड की आपत्तियों के कारण संकट में फंसी हुई थी। दिलचस्प है कि 2019 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर बनी बायोपिक ‘पीएम नरेंद्र मोदी’ को सेंसर बोर्ड ने इस तरह नहीं रोका था। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि जो दलीलें योगी की फिल्म रोकने में दी गईं, वे मोदी की फिल्म के मामले में क्यों भुला दी गईं।

इसी वजह से यह चर्चा भी तेज हो गई है कि योगी आदित्यनाथ की बढ़ती लोकप्रियता भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व को रास नहीं आ रही। इसे मोदी और योगी के बीच ‘इमेज बिल्डिंग प्रतियोगिता’ के तौर पर देखा जा रहा है।

मोदी सरकार और भाजपा के भीतर ब्रांडिंग की राजनीति नई नहीं है। 2019 में मोदी पर बनी बायोपिक चुनाव से ठीक पहले रिलीज़ होने वाली थी, लेकिन आचार संहिता के चलते चुनाव आयोग ने उसे रोका। बाद में फिल्म रिलीज़ हुई और उसने मोदी की छवि को और चमकाने का काम किया। स्वाभाविक था कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी अपनी ब्रांडिंग को लेकर उत्साहित हों। इसी क्रम में ‘अजेय’ की रूपरेखा तैयार की गई।

निर्माता रितु मैगी और निर्देशक रविंद्र गौतम की इस फिल्म में योगी आदित्यनाथ का किरदार अभिनेता अनंत जोशी ने निभाया है। पटकथा शांति गुप्ता की किताब ‘द मॉन्क हू बिकेम चीफ मिनिस्टर’ से प्रेरित है। फिल्म में योगी के व्यक्तित्व को असाधारण और अलौकिक रूप में प्रस्तुत किया गया है।

लेकिन जब इसे सेंसर बोर्ड के पास प्रमाणन के लिए भेजा गया तो वहां से लगातार अड़ंगे डाले जाने लगे। 5 जून 2025 को अर्जी दी गई थी, जिस पर 15 दिन के भीतर निर्णय होना चाहिए था। मगर एक महीने से ज्यादा समय तक बोर्ड ने मामला लटकाए रखा। यहां तक कि 7 जुलाई को तय की गई स्क्रीनिंग की तारीख भी अचानक रद्द कर दी गई। बाद में जब कारण पूछा गया तो बोर्ड ने कहा कि चूंकि यह फिल्म योगी आदित्यनाथ पर आधारित है, इसलिए उनकी अनुमति आवश्यक है। सवाल यह उठता है कि अगर यह तर्क सही है तो फिर प्रधानमंत्री पर बनी फिल्म के मामले में ऐसी शर्त क्यों नहीं लगाई गई?

निर्माताओं ने इसे मनमाना और अनुचित ठहराते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। अदालत ने खुद फिल्म देखकर दो दिन में निर्णय सुनाया और इसे पूरी तरह आपत्तिहीन मानते हुए रिलीज़ की अनुमति दे दी।

अब उम्मीद है कि जल्द ही यह बायोपिक विभिन्न माध्यमों पर दर्शकों तक पहुंचेगी। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह साफ कर दिया है कि भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व योगी आदित्यनाथ की महत्वाकांक्षाओं पर सतर्क नज़र रखे हुए है और ज़रूरत पड़ने पर उन्हें सीमाओं में बांधने से भी नहीं हिचकता।

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