ज्योति राज-
छात्रों के प्रदर्शन की कवरेज के दौरान Zee News के पत्रकार प्रिंस पर हुआ हमला बेहद निंदनीय हूँ।

प्रिंस को मैं वर्षों से जानती हूँ। वह उन पत्रकारों में से है जो AC स्टूडियो में नहीं, बल्कि ज़मीन पर हर मौसम और हर मुश्किल के बीच रिपोर्टिंग करते हैं। सच को लोगों तक पहुँचाने के लिए दिन-रात मेहनत करते हैं। किसी खबर से असहमति हो सकती है, लेकिन उसका जवाब किसी पत्रकार के साथ मारपीट नहीं हो सकता। लोकतंत्र में कैमरा और कलम को डराने की नहीं, सम्मान देने की ज़रूरत है।
प्रिंस के साथ हुई इस घटना की निष्पक्ष जांच हो पत्रकार सुरक्षित रहेंगे, तभी सच जनता तक पहुँचता रहेगा।
अजय तिवारी-
आज फील्ड में काम कर रहे ज्यातर TV पत्रकार और कैमरामैन इस बात पर सहमत हैं कि चैनल का असाइनमेंट डेस्क उन्हें अपनी Pre-Approved स्टोरी पर काम नही करने देता। चैनल के इनपुट एडिटर रोज पत्रकारों से अगले दिन का डे-प्लान मांगते हैं। सभी पत्रकार रिसर्च करके जनता और देश की बेहतरी की दिशा मे की जा सकने वाली हर संभव स्टोरीज़ का आईडिया देते हैं। इसी के आधार पर अगले दिन उन्हें महंगे ब्रॉडकास्ट इक्विपमेंट, कैमरामैन और शूट के लिए दफ्तर की गाड़ी एलॉट की जाती है। ये सबकुछ सम्पादक की नजर में होता है।
लेकिन इसके बाद शुरू होता है असली खेल, जिसके कारण कोई भी ENGU (Electronic News Gathering Unit) अपना काम पूरा करकर वापस नही लौट पाती।
आखिर फील्ड में स्टोरी कवर करने के लिए निकले पत्रकार कैसे दफ्तर में बैठे एक गुमनाम आदमी के निर्देशों पर एजेंडा इंटरव्यूज कलेक्ट करने लगते हैं? कैसे चैनल में बैठे 5 लोग मिलकर पूरे सम्पादकीय नीति को अपने निजी स्वार्थ के लिए गिरवी रख देते हैं?
और आपके चहेते पत्रकार कैसे होते हैं फेवेरेटिज़्म का शिकार। कैसे होता है पत्रकारों का शोषण और कैसे महिला पत्रकार को किया जाता है “मजबूर”
Sattelite कम्युनिकेशन, Editing/Graphics और अन्य टेक्क्निकल टीम की सैलरी काट कर कैसे “चहेते न्यूज़ एंकर्स” के खाते में डाल दिया जाता है।
जल्दी बताऊंगा।
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