विनय मौर्या
क्या बात, क्या बात, क्या बात….यही है सबका साथ, सबका विकास। विचार करिये मामूली से कर्ज में आम आदमी की कुर्की और नीलामी की नौबत आ जाती है। बैंक वाले घर-दुकान तक नहीं छोड़ते। मगर जब मामला हजारों करोड़ के कर्ज का हो और कर्जदार बड़ा आदमी हो तो कहानी ही बदल जाती है।
सुभाष चंद्रा के मामले में लेनदारों का दावा करीब 22,006 करोड़ रुपये का है, लेकिन मंजूर योजना में भुगतान महज 6.5 करोड़ रुपये का है। यानी करीब 99.97 प्रतिशत कर्ज का सफाया और लेनदारों को वापस मिला सिर्फ लगभग 0.03 प्रतिशत।
अब जरा भारतीय जीवन बीमा निगम आवास वित्त का मामला देखिए। उसका दावा करीब 1,322 करोड़ रुपये का बताया गया, जबकि उसे मिलने वाले हैं लगभग 38 लाख रुपये। यानी हजारों करोड़ के दावे के सामने कुछ लाख की वापसी।
कुछ बैंकों और वित्तीय संस्थानों ने इस योजना का विरोध भी किया, मगर कर्जदाताओं के 80.81 प्रतिशत मत के समर्थन के बाद राष्ट्रीय कंपनी विधि अधिकरण ने योजना को मंजूरी दे दी। अधिकरण ने कहा कि वह कर्जदाताओं की व्यावसायिक समझ के स्थान पर अपना फैसला नहीं रख सकता।
अब सवाल सिर्फ इतना है कि 22 हजार करोड़ रुपये से अधिक के दावे के सामने महज 6.5 करोड़ रुपये में मामला कैसे निपट गया और इस 99.97 प्रतिशत की कटौती का असली बोझ आखिर कौन उठाएगा।
आम आदमी कुछ लाख रुपये का कर्ज लेता है। एक-दो किस्त चूकी नहीं कि नोटिस, कुर्की, नीलामी और घर उजड़ने तक की नौबत आ जाती है। और यहां….
22,006 करोड़ रुपये का दावा और भुगतान सिर्फ 6.5 करोड़ रुपये। क्या बात है साहब….!
आम जनता महंगाई, बढ़ते टैक्स और कर्ज में डूबती जा रही है और सरकार तथा व्यवस्था बड़े कर्जदारों के लिए राहत के रास्ते निकाल रही है। तभी तो मैं कहता हूं, यह सरकार आम आदमी की नहीं, पूंजीपतियों की सरकार है।
आम आदमी के लिए कर्ज मतलब कुर्की और नीलामी और बड़े आदमी के लिए हजारों करोड़ का कर्ज मतलब भारी भरकम छूट।घाटा किसका हुआ, बैंकों का।
बैंकों का पैसा किसका है, जनता का।
यानी नुकसान जनता का और राहत बड़े कर्जदार को। जनता को हिन्नु खतरे में बताकर ध’रम की बूटी ध’रम जातीयों को आपस में लड़ाकर साहेब पूंजीपतियों को राहत दे रहे हैं। और फिर भी कई लोग पूछते हैं कि आखिर आम आदमी सरकार से नाराज क्यों है।
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