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भोजपुरी कमेंट्री के नाम पर फुल लंठई होने लगी है!

दीपांकर-
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पहले खेल की कमेन्ट्री लाइव मैच के दौरान दर्शकों के खेल ज्ञान में वृद्धि करने का काम करती थी. तमाम टेक्निकल चीजें और खेल की बारीकियों की समझ कमेन्ट्रेटर दर्शकों और श्रोताओं तक पहुंचाते थे. आनंद -आनंद में ही दर्शकों और श्रोताओं की खेल समझ बढ़ती रहती थी, तमाम आंकड़े पता चलते रहते थे. लेकिन अब मामला बदल गया है. अब फुल लंठई होने लगी है.

पहले रेडियो पर कमेन्ट्री करने वाले कुछ ऐसे शानदार कमेन्ट्रेटर होते थे जिनको सुनते हुए लोग मैदान की थ्री डी छाप दिमाग में बना लेते थे. कमेन्ट्रेटर आवाजों के जरिए दृश्य तक पहुंचा देते थे. लेकिन अब ऐसा लगता है कि लोकल मार्केट को भुनाने की चाह ने कमेंट्री के कौशल को बर्बाद करने की कसम खा रखी है. हर शाट पर “हौंक दिहिस, गज़ब मरले मर्दे, पेल के मारिस” इसके अलावा बोलने के लिए कुछ है ही नहीं.

इनको कमेन्ट्री करते हुए बीमर और बाउंसर का फर्क क्यों ही करना है. इनको नहीं मतलब लेग कटर और लेग स्पिन से. इनके लिए घूम गइली, घुस गइली, घूम के घुस गइली इतना ही पर्याप्त है, बहुत हुआ तो एक दो शेर शायरी आ जायेगी.

पूरा आर्केस्ट्रा वाला माहौल है, जिसको खेल खेलना है, तो खेल का क्या है वो ड्रीम इलेवन पर खेल लीजिए. रवि किशन ने बैट को लाठी बना दिया है.निरहुआ गेंद लगते ही जोर से सटल रहल,सटल रहल बोल रहा है.

कुछ दिन बाद ये लोग अंतरा सिंह को बिठा देंगे कमेंट्री पर फिर वो बल्ले में लगा देंगी 32 जीबी रैम और पिच खोदवा के कुआं करवा देंगी. फिर मेडेन ओवर की कमेंट्री होगी ” बैटमैन केतनो ठोकेला, तबो कुछो ना होखेला”.

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