निशीथ जोशी-
तो क्या मीडिया ही अतीक और अशरफ की हत्या का कारण बना। अभी आज तक यह दावा कर रहा था कि उनके सवालों का जवाब दे रहा था अतीक। गुड्डू मुस्लिम के बारे में कुछ बता रहा था तभी गोलियों की गगड़ाहट के बीच दोनो को मार दिया गया।
इन दोनों का अंत वैसा ही हुआ जैसा ये दूसरों के साथ करते थे। सवाल यह है कि हत्यारे वहां तक पहुंचे कैसे ?

मीडिया कर्मी बन कर आए थे अतीक और अशरफ के हत्यारे। अब मीडिया की अति और हर जगह सुरक्षा कवच को भेद कर और सुरक्षा मानकों को तोड़ कर बाइट लेने का जो अंधा दौर शुरू किया गया है उसका कुपरिणाम सामने आ गया है।
जिस तरह से साबरमती जेल से लेकर अतीक अहमद और अशरफ की हत्या होने तक इलेक्ट्रोनिक।मीडिया उनके पीछे लगा रहा। एक होड़ सी लगी रही विभिन्न चैनलों में। उसने सुरक्षा कवच भेद दिए जाने के अवसर तो पैदा कर ही दिए थे।
बहुत ही शर्मनाक है यह पुलिस के लिए भी जिसके कस्टडी में हत्या कर दी गई। साथ ही मीडिया के लिए भी जिसके बाइट के चक्कर में हत्यारों को मौका मिला। यदि मीडिया को बाइट देने के लिए उन दोनों को नहीं रोका जाता तो संभवतः परुष्ठतितियां कुछ और हो सकती थीं।
देव गुप्ता-
एक माफिया के मर्डर उसका आतंक खत्म होने पर आप खुश हो सकते हैं, पर जिस तरह से हुआ ये कितना सही है। ये कोई गैंगवार नहीं हुआ है बल्कि पुलिस कस्टडी में हत्या हुआ है।
जिस अतीक से मीडिया वाले इतनी लंबी यात्रा करके ठीक से बाइट नहीं ले सके, उस अतीक से आज इतनी आसान बाइट हो रही थी। और मर्डर करने वाले निकल भी गए मीडिया के वेश में। समझ रहे हैं न क्या कह रहे हैं। दरअसल यहां कोई अतीक की बैटिंग के लिए नहीं लिख रहा, उनके लिए लिख रहा हूं जो कहते हैं कानून व्यवस्था बेहतर है। जीरो टॉलरेंस नीति है। जो हुआ ये तो जंगल राज ही है। और नीति जीरो टॉलरेंस है तो गिरा दीजिए इन हत्यारों का घर भी बुलडोजर से।
इस कानून व्यवस्था की धज्जियां उड़ाने वाले वारदात के बाद पुलिस पर कार्रवाई हो न हो, मीडिया पर नकेल कसने, किसी की बाइट लेने पर बेज्जत करने का नया उदाहरण भी सेट हो गया। जबकि सब समझ रहे हैं कि आज ये तीन मीडिया भेस वाले कैसे भीड़ में सेट हुए।
सिर्फ एक माफिया की हत्या कर उसका सफाया नहीं हुआ, बल्कि ये भी जानिए की एक नया माफिया गैंग जन्म ले लिया है। जेल में तो हाल ही में एक मर्डर हुआ। मुन्ना बजरंगी का हुआ था। तो आगे की स्क्रिप्ट में ये तीन शूटर जिन्होंने आज अतीक की हत्या की है, ये बाकी जेल में बंद अन्य की हत्या कर दें। तो कोई नई बात नहीं होगी। फिर जेल से इनका ख़ौफ कायम होगा। ये हो जाएंगे, गद्दी के नए गद्दी नशीन।
शिवम श्रीवास्तव-
आदरणीय MYogiAdityanath जी यही चलता रहेगा?? जंगलराज ही घोषित कर दीजिए ? अब न्यायालय बंद करवा दीजिए ।क्योंकि जनता को भी ये राजशाही पसंद आ रही है ? कुछ मौन हैं कुछ तालियां बजा रहे है कुछ सशंकित हैं कुछ असमंजस में लेकिन जब उनकी बारी आयेगी तब पता नही कोई सुनेगा या नहीं ? क्योंकि सत्ता पलटती है लेकिन सरकारी हत्याएं जारी रहती हैं । ये लगातार जो सरकारी हत्याएं हो रही हैं क्या ये अपराध को बढ़ावा देना नही है ? आज पुलिस कस्टडी में हत्या होना एक धब्बा है सत्ता पर भी और प्रशासन पर भी ।



