निशीथ जोशी-
माफिया का मर्डर हुवा, मीडिया उसको महिमा मंडित करने के लिए मौजूद है। जब बाली का वध राम में पेड़ के पीछे छिप कर किया था तो वह प्रकरण कैसे आम जन तक पहुंचाने का माध्यम बनाया गया था। उस काल में नारद मुनि मीडिया की भूमिका में थे। उनका नेटवर्क इतना बड़ा था कि सारे ब्रह्मांड में सूचना पहुंच जाती थी। उसी रूप में जैसे वे पहुंचाना चाहते थे। तंत्र तो रावण का भी था जो अपने तर्क और रणनीति विशेष से सूचना पहुंचता था।
उस काल में नारद पत्रकार की भूमिका निभाते हुए भय का वातावरण पैदा करने वालों का ऐसा चित्रण करते थे कि उनका जनता पर प्रभाव और आतंक अधिक प्रभावी ढंग से दिख जाता था। तो अभी के मीडिया ने भी वही तो किया। अतीक, मुख्तार अंसारी आदि आदि जैसों के आतंक का प्रचार प्रसार कुछ ऐसा किया कि उनकी दहशत आम जन मानस तक व्याप्त हो गई। बाली रहे हों या कालनेमी। फिर मारीच सहित तमाम राक्षस रूप धारण करने में एक्सपर्ट थे। तो यहां भी पत्रकार का रूप धारण करने वाले थे और हत्या कर दी।
अब सवाल यह उठता है कि आज का मीडिया नारद की भूमिका में है या फिर उसके विपरीत। यह उस पर भी जनता समझ जाती थी और आज भी समझ रही है। हां, नारद वृत्ति वाले पेशे में जो काली भेड़ों का प्रवेश हुआ है उस समय भी उनका उपचार किया जा सकता था क्या अब भी किया जा सकेगा। क्या काली भेड़ों को छांट कर अलग किया जा सकता है।
केंद्र सरकार गाइड लाइन तैयार करे। साफ कर दे कि जिन लोगों ने पत्रकारिता को ही अपने पेशे के रुप में अपनाया है उनके अतिरिक्त किसी को भी कोई भी राज्य सरकार मान्यता प्रदान नहीं कर सकती है। इससे खोमचे वाले, फाइनेंस का धंधा कैसे वाले, अपराधी, केंद्र और तमाम राज्य सरकारों के प्रचार प्रसार के लिए खर्च किए जाने वाले धन का उपयोग वहीं होगा जहां होना चाहिए। सूचना तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार भी समूल नष्ट किया जा सकेगा। साथ ही जिस तरह की घटना अतीक अहमद और अशरफ के साथ हुई है वैसा किसी और के साथ नहीं होने के लिए एक सिस्टम लागू किया जा सकेगा।
एक एस ओ पी जो पत्रकारों की सुरक्षा के प्रबंध खड़ी की जाने की सूचना आ रही है उसका पुख्ता प्रबंध किया जा सकेगा। इस एस ओ पी के लिए पहले सुझाव मांग लिए जाएं। सूचना तंत्र के विस्फोट के इस युग में मीडिया में ऐसे लोगों की भीड़ उमड़ आई है जो भ्रष्ट तंत्र को सबसे अधिक भाते हैं। यदि जांच हो जाए तो पूरे सूचना विभाग के तंत्र में व्याप्त भ्रष्ट तंत्र और उनके साथ जुड़े लोगों के चेहरों से भी आवरण उतर जाएगा।
साथ ही मीडिया माफिया और मर्डर मिस्ट्री भी सुलझ सके साथ ही पुनः इसके जैसे हालत पैदा होने का खतरा भी नहीं पैदा हो सके। क्योंकि लोकतंत्र में जनता के बीच राजनेताओं , शासन, सरकार, सरकारी कर्मियों यहां तक कि कभी कभी न्याय विदों को जाना ही होता है, मीडिया के साथ भी संपर्क बनना ही पड़ता है। इसलिए मीडिया की सफाई अभियान चलाया जाना प्राथमिकता होनी चाहिए। फिर यही मीडिया असली प्रहरी की तरह काम कर सकेगा।।


