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टेलीग्राफ ने आज बताया है, मुसलमानों के व्यवसाय पर आस्था का टैग क्यों ‘जरूरी’ है!

संजय कुमार सिंह

आज की सभी खबरों में सबसे महत्वपूर्ण है, कांवर यात्रा मार्ग पर खाने-पीने के सामान बेचने वालों और होटलों-ढाबों-रेस्त्रां के मामले में मुजफ्फरनगर पुलिस के आदेश पर प्रतिक्रिया। मुझे लगता है कि यह आदेश बेहद आपत्तिजनक है और उसका भरपूर विरोध होना चाहिये था। हुआ भी है पर खबरें वैसे नहीं हैं जैसे होनी चाहिये थी। हिन्दी के मेरे दोनों अखबारों, अमर उजाला और नवोदय टाइम्स में तो पहले पन्ने पर कुछ नहीं है। इंडियन एक्सप्रेस में प्रमुखता से छपी खबर के अनुसार सरकार के सहयोगियों, भाजपा के मुख्तार अब्बास नकवी ने आदेश पर सवाल उठाया और कहा कि इससे सामाजिक सद्भाव को नुकसान होगा। खबर के अनुसार पुलिस ने कहा है कि यह आदेश ‘स्वैच्छिक’ है और भाजपा ने कहा है कि इससे हिन्दुओं को समान अधिकार मिलता है। इंडियन एक्सप्रेस ने ही प्रमुखता से बताया है कि बैंगलोर के जीटी वर्ल्ड मॉल में धोती कुर्ता पहने किसान फकीरप्पा को घुसने नहीं  दिया तो कार्रवाई हुई और मॉल को बकाया संपत्ति कर मामले में सील कर दिया गया है।

धोती कुर्ता वाले किसान के सम्मान में

फकीरप्पा ने इसके लिए मीडिया का आभार जताया है। आप जानते हैं कि मीडिया चाहे और आम जनता का साथ दे तो क्या कुछ हो सकता है। आज इसका पता प्रशिक्षु आईएएस की मां की गिरफ्तारी की खबरों से भी लगता है। मामला उसके पिता के खिलाफ भी है और पुलिस से बचने के लिए वे गायब हो गये हैं। कहने की जरूरत नहीं है पूजा खेदकर के सारे मामले पुराने हैं। सोशल मीडिया पर निजी प्रशंसा से शुरू हुआ मामला बिगड़ा तो बिगड़ता चला गया और अब उन मामलों में कार्रवाई हो रही है जो बहुत पुराने हैं और एंटायर पॉलिटिकल साइंस की डिग्री की तरह ठंडे पड़ गये थे। दूसरी ओर, यह किसी से छिपा नहीं है कि भाजपा सरकार और उसके फैसलों के खिलाफ मीडिया का रुख ना तो ऐसा होता है और ना उसे जनहित में झुकने की जरूरत पड़ती है। आपको याद होगा कि कर्नाटक सरकार ने निजी क्षेत्र में स्थानीय लोगों के लिए आरक्षण का फैसला किया था पर भारी दबाव में उसे अपना फैसला वापस लेना पड़ा। उत्तर प्रदेश में ऐसा कुछ नहीं है। इन खबरों के बावजूद कि भाजपा के ही लोग उन्हें अस्थिर करने की कोशिश कर रहे हैं।

कांवर मार्ग और कांवर यात्रियों के लिए उत्तर प्रदेश पुलिस के आदेश की आलोचना हुई तो यह कहकर उसका बचाव किया गया है कि इससे उपवास रखने वाले हिन्दुओं के लिए यह संभव होता है कि वे शुद्ध शाकाहारी रेस्त्रां में खायें जहां उन्हें सात्विक भोजन परोसे जाने की संभावना ज्यादा हो। मुझे याद आता है कि दिल्ली के अच्छे-खासे बड़े और नामी रेस्त्रां भी नवरात्र में मांसाहारी भोजन नहीं परोसते हैं और प्रचार करते हैं कि वे नवरात्र में विशेष शाकाहारी खाना खिलायेंगे। यात्रा मार्ग पर अगर जरूरत होती और कांवरिये तलाशते होते तो ऐसा बिना सरकारी आदेश के हो चुका होता है। यह व्यापार व्यवसाय के नियमों के अनुसार अपने आप होता है। इसमें हलाल ब्रांड नाम शामिल है जिसपर उत्तर प्रदेश में प्रबंध है और इसकी अलग समस्या होगी पर बोले कौन? वहां तो हलाल प्रमाणन को आतंकवाद की फंडिंग से जोड़ दिया गया है। हिन्दुस्तान टाइम्स में पहले पन्ने की खबर का शीर्षक है, सहयोगी से दबाव के बाद उत्तर प्रदेश ने कहा, कांवर आदेश स्वैच्छिक है। खबर के अनुसार लोगों की नाराजगी, विपक्ष के एतराज और आलोचनाओं के बाद इस आदेश को हल्का किया गया है। खबर के अनुसार, एतराज करने वालों में भाजपा के सहयोगी भी हैं। जिसका कहना है कि किसी भी आदेश से सांप्रदायिक विभाजन बढ़ना नहीं चाहिये। 

सबका साथ पर खोखला विकास

मैंने कल यहां लिखा था कि ‘सबका साथ, सबका विकास’ नारे की पोल खोलने वाली कई खबरें हैं। इसके साथ ही मैंने यह भी लिखा था कि इसके बावजूद उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ को अस्थिर करने की कोशिशों की खबर थी। आज नवोदय टाइम्स में एक खबर है जिसके अनुसार, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने कहा है कि आत्म-विकास करते समय मनुष्य अतिमानव (सुपरमैन) बनना चाहता है। इसके बाद वह देवता और फिर भगवान बनना चाहता है और विश्वरूप की भी आकांक्षा रखता है लेकिन वहां से आगे भी कुछ है क्या, यह कोई नहीं जानता। आप मान सकते हैं कि यह नरेन्द्र मोदी के नॉन बायोलॉजिकल और परमात्मा ने भेजा है वाले बयान के संदर्भ में है। पर तथ्य यह भी है लोकप्रियता के लिए योगी और मोदी विरोधियों के पास भी अभी भी हिन्दुत्व का ही सहारा है। इसे साधने के लिए मुसलमानों पर हमला ही सबसे आसान है। सबके साथ वैसा ही विकास भी चल रहा है।

मोहन भागवत की इस खबर के साथ ही छपी एक खबर का शीर्षक है, असम में मुस्लिम विवाह और तलाक कानून रद्द। अगर मुस्लिम विवाह और तलाक कानून रद्द कर दिये जाएं तो उन्हें दूसरों को हिन्दू विवाह (या किसी और) नियमों के अनुसार ही शादी करने या तलाक देने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है। जब सबके लिए अलग नियम नहीं हो सकते हैं तो सबके लिए एक नियम या नए नियम की आवश्यकता भी होगी और उसपर भी काम होना चाहिये। कायदे से एक सर्वसम्मत नियम-कानून के बाद ही किसी एक विवाह और तलाक कानून को रद्द करना चाहिये। नये कानून के बिना पुराने कानून रद्द किये जाने से तो विवाह और तलाक रुक जायेंगे। पर इसकी परवाह किसे है। द टेलीग्राफ में लखनऊ डेटलाइन से पीयूष श्रीवास्तव की खबर का शीर्षक है, उत्तर प्रदेश में मुसलमानों के व्यवसाय पर आस्था का टैग जरूरी! खबर में कहा गया है, नाजी जर्मनी और जर्मन कब्जे वाले यूरोप में यहूदियों को द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान डेविड का पीला सितारा पहनने के लिए मजबूर किया गया था ताकि नरसंहार से पहले के वर्षों में जनता के सामने उनकी यहूदी पहचान प्रमुखता से प्रदर्शित रहे।

राज्य प्रायोजित कट्टरता

भाजपा शासित उत्तर प्रदेश में 2024 में दुकानदारों और विक्रेताओं से कहा गया है कि वे कांवर यात्रा मार्ग पर अपनी दुकानों और ठेलों के सामने स्पष्ट अक्षरों में अपना नाम प्रदर्शित करें। विपक्ष ने इसे मुस्लिम व्यापारियों को निशाना बनाने का प्रयास बताया है। कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा ने आदेश को “राज्य प्रायोजित कट्टरता” कहा है। मैंने कल यहां लिखा था, इन सबके बीच उत्तर प्रदेश में कांवड़ यात्रा की तैयारी चल रही है और इसके लिए मुजफ्फरनगर के एसएसपी ने आदेश दिया है कि यात्रा मार्ग में खाने-पीने की चीजें बेचने वाली दुकानों, ठेलों और रेस्त्रां आदि में उनके मालिकों या स्वत्वाधिकारी के नाम प्रदर्शित किया जाये। आज व्हाट्सऐप्प पर नई दुनिया की एक खबर का कतरन मिला, सलीम भाई चला रहे थे संगम ढाबा…. अब सलीम भोजनालाय। कहने की जरूरत नहीं है कि यह कल के आदेश का असर है और इसकी जरूरत के संबंध में अब चाहे जो कहा जाये तथ्य यह है कि इसी भारत में मांस बेचने वालों से नहीं पूछा जाता था कि हलाल बेचते हैं या झटका।

बाद में हालत यह हो गई विदेशी ब्रांडों को भी बताना पड़ता है कि वे हलाल या झटका में किसका उपयोग करते हैं। यही नहीं, स्कूल के हॉस्टल में इस बात पर विवाद हो चुका है कि हलाल मांस का प्रयोग किया जाता है तो बताकर करना चाहिये जबकि अभिभावकों ने ना इस बारे में पूछा ना जानने की जरूरत समझी। नई दुनिया की खबर पर एक मित्र की टिप्पणी है, “ऐसे कई भोजनालय, ठेले आदि पूरे भारत में चलते आ रहे हैं। अधिकांश मंदिरों के पास कई फूल, पूजा सामग्री बेचने वाले इसी तरह नाम बदलकर दशकों से लोगों को छल रहे हैं।” मेरा मानना है कि खाने-पीने की चीजें खरीदने या वहां बैठकर खाने के मामले में रेस्त्रां किसका है, मांस कहां से आता है, हलाल है या झटका और खरीदा गया फल बेचना वाला कौन था किस धर्म का था – यह सब देश में कभी मुद्दा ही नहीं रहा। इसमें छलना क्या है पता नहीं। और छलना तो तब होगा जब कोई झूठ बोले, गलत बयानी करे। अगर दुकानदार का धर्म मायरने रखाता होता तो पूछ जाता। मुझे याद नहीं है कि पहले पूछा जा था।

बहुत पुरानी बात है, मैं दिल्ली में नया आया था और एक मंगलवार को दिन में बकरे का मांस ढूंढ़ रहा था जो नहीं मिल रहा था। किसी से पूछा तो उसने बताया कि मंगल को लोग मांस नहीं खाते हैं इसलिए नहीं मिलेगा। मैंने पूछा मुझे खाना हो तो क्या करना होगा। उसने तपाक से कहा जामा मस्जिद चले जाइये और मैं चला गया। अभी भी मांसाहारी खाने का मेरा पसंदीदा रेस्त्रां जामा मस्जिद वाला करीम्स ही है। पर अब जो नये मुद्दे उठे हैं वो देखिये। कल की खबर के बाद आज के अखबारों में उसके खिलाफ खबरें हैं। लेकिन जो आपत्तजिनक है वह व्हाट्सऐप्प पर घूम रहा है। संगम ढाबा के सलीम भोजनालय होने से समाज को अगर नुकसान नहीं है तो लाभ क्या है? जिन्हें इससे मतलब था वो तो पहले भी पूछकर या पता करके वहां जाते या नहीं जाते। इसमें तो कोई रोक नहीं थी और ऐसा नहीं है कि यह जानकारी गोपनीय होती थी या पूछना मना था या कोई बताता नहीं था। सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करने की जरूरत जरूर संदेहास्पद है और द टेलीग्राफ का उदाहरण अपनी जगह महत्वपूर्ण है।

ऊपर की खबर के अलावा आज के अखबारों में तीन बड़ी खबरें हैं – 1. उत्तर प्रदेश में रेल दुर्घटना, तीन मरे, 33 घायल 2. सुप्रीम कोर्ट ने कहा, नीट-यूजी के नतीजे शहरवार व केंद्र वार जारी किये जाएं और 3. कुपवाड़ा में घुसपैठ की साजिश नाकाम, डोडा में दो जवान घायल। यही नहीं, छत्तीसगढ़ के बीजापुर में आईईडी विस्फोट से दो जवान शहीद हो गये हैं। यह खबर अमर उजाला में दो लाइन के शीर्षक और दोनों जवानों की फोटो के साथ कुल आठ लाइन में है। दो लाइन का शीर्षक और है। पर इसी अखबार में दो आतंकवादी ढेर दो कॉलम की खबर है और घायल जवान को एयरलिफ्ट करने की फोटो दो कॉलम में शहीद सैनिकों की फोटो से काफी बड़ी है। दोनों खबरें नवोदय टाइम्स में भी हैं यहां दो सैनिकों के शहीद होने की खबर दो आतंकियों के ढेर होने की खबर से छोटी तो है पर छिपाई हुई नहीं लग रही है। उधर, इंडियन एक्सप्रेस में एक खबर है जो बताती है कि असम पुलिस ने तीन आतंकियों को मारने का दावा किया और अगले दिन परिवार ने वीडियो पेश करके दावा किया कि मुठभेड़ फर्जी है। आप जानते हैं कि ऐसे मामले कितने आम हैं और पुलिस वालों को सजा की खबर शायद ही कभी पढ़ने को मिली हो।

इलेक्टोरल बांड वालों की सेवा

बेशक, पुलिस हिरासत में मौत के लिए संजीव भट्ट को सजा का मामला अपवाद है और उन्हें ना जमानत मिल रही है ना राहत जबकि बलात्कारियों और हत्यारों को भी राहत की खबरें मिली हैं। दूसरी ओर इस स्थिति में भी इमरजेंसी को बुरा बताया जा रहा है और यह काम लोकसभा अध्यक्ष से लेकर राष्ट्रपति तक कर चुकी हैं। वैसे में अखबारों से क्या उम्मीद की जाये और क्या मिल रहा है यह अलग चर्चा का विषय हो सकता है जिसपर चर्चा होगी नहीं। अमर उजाला में आज एक खबर का शीर्षक है, वाहन पर फास्टैग नहीं तो दोगुना टोल टैक्स। आप जानते हैं कि टोल टैक्स सरकार नहीं टोल सड़क बनाने वाली निजी कंपनियां वसूलती है। अब तो पार्किंग का पैसा भी फास्टैग से कट जाता है और खबर में लिखा है कि फास्टैग में पैसे नहीं होने से देरी होती है इसलिए नियम बना दिया गया कि फास्टैग में पैसे नहीं होंगे तो दोगुना टैक्स लगेगा। यह इलेक्टोरल बांड से चंदा देने वाली इंफ्रास्टक्चर कंपनियों के लिए सरकार की ओर से दोहरी सुविधा है और इसमें जनहित का ख्याल नहीं रखा गया है। टोल नाकों पर और भी कारणों से भीड़ होती है। उन्हें दूर करने के लिए सरकार ने क्या किया है और जनता को क्या सुविधा दी है यह सवाल अपनी जगह है।

मैंने कहीं पढ़ा था कि टोल टैक्स फास्टैग से अपने आप नहीं जा रहा है तो आपको रोका नहीं जा सकता है और किसी तकनीकी खराबी की ऐसी स्थिति में आपको टोल दिये बिना जाने की छूट है। पर यह खबर उतनी प्रमुखता से नहीं छपी और ना टोल नाकों पर प्रदर्शित है। नतीजा यह होता है कि पैसे लेने के लिए तो देरी होती है पर देरी से बचने के लिए कोई राहत नहीं है। ऐसे में दो बार पैसे लेने के भी उदाहरण हैं। हालांकि यह तभी हो पाता है जब गाड़ी कोई दूसरा चला रहा हो और फास्टैग से जुड़ा फोन मौके पर न हो। कुल मिलाकर, सरकार जनता के मुकाबले निजी टोल कंपनियों की सेवा में झुकी हुई है पर वह किसी के लिए मुद्दा ही नहीं है।

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