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‘सेक्यूलर’ सिविल कोड के बहाने सांप्रदायिक तनाव बनाये रखने की कोशिश को समझना और बताना

संजय कुमार सिंह

आज के सभी अखबारों में प्रधानमंत्री का लाल किले से 11वां भाषण लीड है। दिलचस्प यह है कि अब तक के सबसे लंबे और 98 मिनट चले भाषण में एक ही बात मुझे अखरी और वही आज सभी अखबारों की लीड है। सेक्यूलर सिविल कोड की बात और जरूरत का संबंध संविधान बदलने की मंशा से है। लोकसभा के पिछले चुनाव में संविधान बदलने के मुद्दे पर भाजपा की जो फजीहत हुई उसके बाद प्रधानमंत्री ने सांप्रदायिक मुद्दे पर अपनी आक्रामकता बनाये रखने के लिये इसका जिक्र किया है और संभव है इसी कारण अखबारों ने इसे सबसे ज्यादा महत्व दिया हो। आज के कुछ शीर्षक इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया देने वाले हैं। कुल मिलाकर, कल के भाषण से साफ हो गया कि भाजपा या संघ परिवार के पास कुछ नया तो नहीं ही है पुराना भी जो खत्म हो गया या पिट गया उसी को चलाते रहने की मजबूरी है। अभी तक आप समझ चुकें होंगे कि भाजपा के हिन्दू मुसलमान के मुकाबले कांग्रेस इंडिया गठबंधन का जातिवार जनगणना और संविधान (यानी आरक्षण) की सुरक्षा का मुद्दा बहुत मजबूत और सरकार को परेशान करने वाला है।

प्रधानमंत्री के भाषण के तुरंत बाद एक यू ट्यूबर मित्र ने कहा कि उनके भाषण में ये खास बातें हैं, आज रात इसी पर चर्चा करेंगे। मुझे लगा इसी बहाने उनका भाषण सुन लिया जाये। मैंने आज तक उनका भाषण नहीं सुना है और जो वीडियो देखा है वह सिर्फ चर्चित क्लिप होते हैं। ऐसे में भाषण सुनना मुश्किल काम था। नहा-धोकर जब देखने बैठा तो पता चला डेढ़ घंटे का है। सुनना शुरू किया तो 15 मिनट बाद नीन्द आने लगी और बाद की कोशिशों में पांच मिनट से ज्यादा नहीं देख पाया। ऐसे में उन्होंने बातें तो बहुत कीं पर सेक्यूलर वाला मुद्दा तो शुरू में ही था, बाद में क्या हुआ यह पता ही नहीं चला, शायद चले भी नहीं। जो भी हो, प्रधानमंत्री का पूरा भाषण बहुत ही उबाऊ, नीरस और उपयोगी सूचना हीन था। 2047 तक की उनकी योजनाएं हवा-हवाई और बेमतलब लगीं। कहने की जरूरत नहीं है कि उन्होंने काम की बात नहीं के बराबर की और 10 साल में क्या किया बताने की जगह यही बताते रहे कि आगे क्या करेंगे। भाषण में कुछ खास नहीं था और सेक्यूलर सिविल कोड क्यों महत्वपूर्ण है उसे समझने की कोशिश करते हैं। अकेले टाइम्स ऑफ इंडिया ने एक देश एक चुनाव को भी महत्व दिया है लेकिन सबको पता है कि भाजपा ही कई चरणों में चुनाव चाहती है और जहां भाजपा नहीं होती है वहां चुनाव के चरण कम होते हैं।

1. इंडियन एक्सप्रेस

“प्रधानमंत्री का यूसीसी पिच : सेक्यूलर सिविल कोड का समय आ गया है, 75 साल सांप्रादियक के साथ रह लिया।

2. टाइम्स ऑफ इंडिया

प्रधानमंत्री की दुधारी सेक्यूलर सिविल कोड, एक देश एक चुनाव का समय आ गया है।

3. हिन्दुस्तान टाइम्स

नरेन्द्र मोदी ने एक नये ‘सेक्यूलर’ सिविल कोड की जरूरत बताई। बैनर शीर्षक है और इसके साथ इन दिनों भाजपा के सबसे प्रिय विषय, महिला के खिलाफ अपराध के मामले में भी कहा जो इसमें दो कॉलम की खबर है।

4. द हिन्दू

स्वतंत्रता दिवस के अपने भाषण में प्रधानमंत्री ने सेक्यूलर सिविल कोड की अपील की।

5. द टेलीग्राफ

स्वतंत्रता दिवस पर मोदी का प्रण : ‘सेक्यूलर’ सिविल कोड  

6. नवोदय टाइम्स

सेक्यूलर सिविल कोड समय की मांग : मोदी

7. हिन्दुस्तान

धर्मनिरपेक्ष नागरिक संहिता जरूरी

8. जनसत्ता

धर्म निरपेक्ष नागरिक संहिता देश की मांग, मौजूदा संहिता सांप्रदायिक

9. नवभारत टाइम्स

सिविल कोड पर पीएम की किलेबंदी 

10. अमर उजाला

आज नहीं आया है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का स्वतंत्रता दिवस पर दिया गया भाषण औसतन 82 मिनट का है। यह भारत के इतिहास में किसी भी अन्य प्रधान मंत्री की तुलना में अधिक लंबा है। 2024 से पहले उनका सबसे लंबा स्वतंत्रता दिवस का भाषण 2016 में, 96 मिनट का था। उनका सबसे छोटा भाषण 2017 में था जब उन्होंने लगभग 56 मिनट तक भाषण दिया था। 78वें स्वतंत्रता दिवस पर पीएम मोदी तीसरी बार के प्रधानमंत्री थे। मोदी का पहला स्वतंत्रता दिवस भाषण 2014 में दिया गया था, जो 65 मिनट तक चला था। 2015 में उनका भाषण करीब 88 मिनट तक चला था। पीएम के रूप में यह पीएम मोदी का 11वां और तीसरे कार्यकाल के लिए कार्यभार संभालने के बाद उनका पहला संबोधन था। 2018 में पीएम मोदी ने लाल किले की प्राचीर से 83 मिनट तक संबोधित किया था। इसके बाद, 2019 में, उन्होंने लगभग 92 मिनट तक बात की, जो उनकी अब तक की दूसरी सबसे लंबी बात थी। 2020 में पीएम मोदी का स्वतंत्रता दिवस संबोधन 90 मिनट तक चला।

जाहिर है, लंबा भाषण देने की कोई मजबूरी उनके सामने नहीं थी। और 98 मिनट बोले तो 100 या 101 क्यों नहीं कर दिया यह भी समझना मुश्किल है। 99 मिनट बोलते तो लोग इधर-उधर जोड़ सकते थे पर वह भी नहीं किया। जो भी हो, चूंकि मैंने भाषण सुना है और अखबारों में उसका विवरण कम है तो कुछ मैं बता देते हूं इससे आप समझ सकेंगे कि भाजपा या संघ परिवार के पास वोट बटोरू समझे जाने वाले कुछ ही मुद्दे हैं। 10 साल के शासन में सब आजमाये जा चुके। देश को फायदा हुआ कि नहीं और हुआ तो क्या यह अब  मुद्दा नहीं और मुद्दा है कि चुनाव जीतने के लिए अब क्या बोला और किया जाये। नोटबंदी से लेकर अनुच्छेद 370 हटाने तक के काम हो चुके हैं। फायदा हुआ नहीं पर जनता को एतराज भी नहीं है। इसलिए उन्हें कोई दिक्कत नहीं है पर हिन्दुत्व के मुकाबले जाति की राजनीति के आ जाने से संविधान बदलने और भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाने का मुद्दा फंस गया था लेकिन अब चूंकि कुछ नया है नहीं, कुछ किया है नहीं इसलिये बोलते क्या और जो बोला है उसे भी सुन कर समझ लीजिये।

प्रधानमंत्री के भाषण की शुरुआत स्किल डेवलपमेंट से हुई और बताया गया कि इससे उनका कांफिडेंस बढ़ेगा। मुझे यकीन नहीं है और इसपर मैं पहले लिख चुका हूं। उन्होंने कहा कि स्किल डेवलपमंट के बाद देश के युवा ग्लोबल जॉब मार्केट में अपनी दमक बनायेगे। पर मुद्दा यह है कि अभी ही इसमें कौन सी कमी है। और भारतीय शिल्प व कौशल सीखकर विदेश में किस काम में दमक बनायेंगे। दमक पहले ही कम नहीं है और कई भारतीय दुनिया भर की कंपनियों और ब्रांड में पहले से बड़े पदों पर है। इससे बेहतर अब और क्या होगा तथा इस सरकार के 10 साल के शासन में क्या हुआ इसका कोई जिक्र उन्होंने नहीं किया। वे सिर्फ मुद्दे गिनाते गये और ऐसे गिनाया जैसे अपना ज्ञान बता रहे हों या मुद्दों के अपने ज्ञान से किसी को प्रभावित करने की कोशिश में हों। प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि चंद्रयान की सफलता के बाद विज्ञान में दिलचस्पी बढ़ी है। मुझे याद आया कि 70 के दशक में जब मैं स्कूल में पढ़ता था तो एक प्रतियोगिता में थुम्बा रॉकेट लांचिग स्टेशन का मॉडल बनाकर ले गया था। प्रधानमंत्री ने दावा किया कि बजट में एक लाख करोड़ रुपये रिसर्च और रेनोवेशन पर देने का निर्णय किया है।

मेडिकल एजुकेशन की सीटें बढ़ाने का दावा भी किया जो आज इंडियन एक्सप्रेस के फ्लैग शीर्षक में है। पर उन्होंने नीट की परीक्षा में धांधली और परीक्षा कराने वाली एजेंसी की अक्षमता पर कुछ नहीं कहा। नई सीटों की चर्चा तो हुई पर एनटीए, नीट, प्रश्नपत्र लीक होने की चर्चा बिल्कुल नहीं हुई (बाद में कुछ कहा हो तो नहीं कह सकता)। एक लाइन में उन्होंने राष्ट्रीय पोषण मिशन की भी चर्चा की। कृषि व्यवस्था पर ज्ञान थोड़ा लंबा था पर एमएसपी की बात नहीं हुई। किसान आंदोलन और उन्हें दिल्ली में घुसने से रोकने के ऐतिहासिक उपाय भी उनकी चर्चा में नहीं थे पर उन्होंने प्राकृतिक खेती का जिक्र जरूर किया और कहा कि इसके लिए बड़ा प्रावधान किया है। यही नहीं, बताया कि हमारा देश ऑरगेनिक फूड का बास्केट कैसे बने इसके लिए काम चल रहा है और किसानों को एमएसपी चाहे न मिले गांवों में टॉप क्लास इंटरनेट कनेक्टिविटी मिलेगी। यही नहीं, वीमेन लेड (यानी महिला नेतृत्व वाले विकास मॉडल) पर काम करने की बात की लेकिन ममता बनर्जी से सत्ता छीनने के लिए नाक रगड़नी पड़ रही है इसे स्वीकार नहीं किया। थोड़ी ऐक्टिंग के साथ उन्होंने कहा, लाल किले से पीड़ा व्यक्त करना चाहता हूं। महिला के खिलाफ अपराध के प्रति आक्रोश को मैं महसूस कर रहा हूं। उन्होंने सुझाव दिया कि महिला के विरुद्ध अपराध के लिए सजा हो तो उसकी व्यापक चर्चा हो। उनकी सरकार ने बलात्कारियों की सजा माफ कर दी थी यह बताने की जरूरत नहीं समझी। आसाराम नहीं पर राम रहीम का फर्लो पर होना तो आम हैं।

प्रधानमंत्री ने अक्षय उर्जा के विशाल लक्ष्य की बात की और कहा – कल्पना कर सकते हैं कि कितना बड़ा लक्ष्य है। इसकी बात करता हूं तो दुनिया के लोग मेरी तरफ देखते हैं। उन्होंने रेलवे को दुर्घटना मुक्त नहीं, उत्सर्जन मुक्त बनाने का दावा किया और बताया कि ऐसे कार्यों के कारण देश में ग्रीन जॉब की बड़ी संभावना है। जी-20 के आयोजन की याद दिलाते हुए उन्होंने कहा कि भारत में बड़े से बड़े कार्यक्रम करने की ताकत है। और इसे आगे बढ़ाते हुए उन्होंने बताया कि 2036 का ओलंपिक भारत में हो, इसकी तैयारी कर रहे हैं। वैसे तो मैंने पूरा भाषण नहीं सुना पर जितना सुना उतने में देश और देशवासियों के भले के लिए क्या करेंगे, रोजगार बढ़ाने की योजना, संभावना आदि पर कोई बात नहीं हुई। क्यो हो गया और क्या करना है जैसी मन की बात करते रहे और इसमें यह भी कहा कि कुछ लोग होते हैं जो भारत का भला सोच नहीं सकते। मुट्ठी भर लोगों में विकृति पल रही है। (और वे रोक नहीं पा रहे हैं) उन्होंने एक दिलचस्प दावा यह भी किया कि जब 40 करोड़ लोग आजादी ले सकते हैं तो 140 करोड़ समृद्ध भारत बना ही सकते हैं। इसके लिए नागरिकों को संकल्प लेकर चलना होगा और संसाधनों के लिए जूझने की नौबत हो तब भी (ताली थाली बजाते) आगे बढ़ना होगा।

प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में बताया कि देश भर के नागरिकों ने उन्हें 2047 के लिए अनमोल सुझाव दिये हैं। उन्होंने कइयों के सुझाव बताये और बाकायदा बोर किया। उपलब्धियों के नाम पर उन्होंने एयरस्ट्राइक को याद किया और कहा कि वायुसेना ऐसा करती है तो देश के जवानों का सीना गर्व से तन जाता है। हालांकि, हम बुद्ध के देश हैं, युद्ध नहीं चाहते हैं और बड़े रिफॉर्म जमीन पर उतारने के लिए काम कर रहे है। उन्होंने यह भी कहा कि उनकी प्रतिबद्धता पिंक पेपर के एडिटोरियल के लिए नहीं है। किसी मजबूरी में नहीं है, देश को मजबूती देने के लिए है। राजनीतिक मजबूरी के कारण भी नहीं है। यह सब बताने में काफी समय लिया और कहा कि उस पर काम करने में काफी समय लगेगा। मुझे सबसे मजेदार लगा, बैंकिग क्षेत्र का उदाहरण। बताया कि भारतीय बैंकों को मजबूत बनाया है। उद्योग-व्यापार बैंक से लाभ ले रहे हैं। रेहड़ी पटरी वालों के लिए भी बैंक फायदेमंद हैं। मैं समझ नहीं पाया कि इसमें नया क्या है और बैंक मजबूत हुए हैं तो कई बंद क्यों हो गये और लोग जो पैसे लेकर विदेश भाग गये उससे बैंक कैसे मजबूत हुए और बैंक मजबूत हुए तो न्यूनतम बैलेंस न रखने वालों से करोड़ों का जुर्माना क्यों वसूला है और पहले अगर खाता ऑपरेट नहीं करो तो खाता लगभग बंद हो जाता था. अब ऐसे खातों में बैंक हर तिमाही ब्याज देता है और अपने शुल्क काटता है (न्यूनतम बैलेंस मेनटेन करने पर)। यह बैक के मजबूत होने की निशानी है या कमजोर होने की, राम जानें।   यूनिफॉर्म सिविल कोड से प्रधानमंत्री क्या चाहते हैं वह मुझे समझ में नहीं आया। जो भी अखबार मैंने पढ़े उनमें जो भी लिखा है उससे भी आगे की कोई बात नहीं समझ आती है। हम जानते हैं कि देश में संविधान के अनुसार हर व्यक्ति अपने धर्म का पालन कर सकता है, कर रहा है। हिन्दू विवाह कर रहे हैं, मुसलमान निकाह कर रहे हैं। हिन्दुओं की पत्नी से नहीं पटी, ससुराल कमजोर हुआ या पत्नी ने भाव ही नहीं दिया तो अलग हो गये कोई जिम्मेदारी नहीं कोई शर्म नहीं। मुकदमा चला हार गये तो मुआवजा, भरण-पोषण भत्ता दिया नहीं तो छिपे-दुबके रहे। मुसलमानों में तलाक के नियम हैं, शर्तें हैं अगर कोई तीन तलाक देता है तो बाकी शर्ते भी मानता है और अमूमन मामला धार्मिक तरीके से निपटाया जाता है। कुछ लोग कानून की शरण में आते है तो कानून के अनुसार फैसला होता है. सरकार समझती है कि सामाजिक जरूरत कुछ और है तो वैसी कार्रवाई करती है। अदालत के फैसले सामाजिक जरूरतों के अनुसार भी होते रहे हैं। ऐसे में सिविल कोड को प्रधानमंत्री सांप्रदायिक कह रहे हैं तो सेक्यूलर सिविल कोड का मतलब यह नहीं होगा कि इनमें से किसी एक को बाध्यकारी बना दिया जाये। और किसी एक को बनाया गया तो वह हिन्दुओं वाला ही होगा। प्रधानमंत्री चाहेंगे कि इसे सेक्यूलर यूनिफॉर्म सिवल कोड कहा जाये पर सबने मिलकर सबके लिए एक सिविल कोड तय नहीं किया और किसी एक को दूसरे पर थोप दिया तो वह सेक्यूलर नहीं होगा, उस धर्म का ही रहेगा। प्रधानमंत्री ने अपने भाषण से इस मुद्दे को उलझाने का काम किया है। अखबारों में इस पर शांति हैं।

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