
संजय कुमार सिंह
कोलकाता में रात की ड्यूटी पर तैनात एक महिला डॉक्टर से बलात्कार और उसकी हत्या की घटना पर राजनीति की कोशिश पहले दिन से शुरू हो गई थी। मुझे शुरू में ही समझ में आ गया था कि भाजपा को अपनी इस राजनीति का लाभ भले मिल जाये उसकी पोल जरूर खुल जायेगी। यही हो रहा है। कल मैंने बताया था कि द टेलीग्राफ की खबर के अनुसार जो मार्च छात्रों का बताया जा रहा था वह असल में आरएसएस के लोगों ने आयोजित किया था। मार्च के दौरान हिंसा और पुलिस के संयम की कहानी के साथ मैंने बताया था कि भाजपा ने फिर भी ‘बंद’ का आयोजन किया था। आज कोलकाता का बंद भी बड़ी खबर है। अमर उजाला में लीड है। शीर्षक है, बंगाल बंद में भारी बवाल, भाजपा नेता पर फायरिंग, बम फेंके, कई हिरासत में। उपशीर्षक में तीन बातें हैं। इनमें एक है, सरकार ने कहा बंद को जनता का समर्थन नहीं मिला। अमर उजाला में राष्ट्रपति की चिन्ता वाला बयान पांच कॉलम में है। उसपर आने से पहले बता दूं कि कोलकाता के द टेलीग्राफ में दोनों खबरें पहले पन्ने पर नहीं है।
द टेलीग्राफ की मानें तो कल का बंद वहां के बाजार-व्यापार के लिए नुकसानदेह था क्योंकि दुर्गापूजा से पहले का यह समय वहां कारोबार का होता है। ऐसे में स्थानीय लोगों का कहना है कि असुरों ने हमला बोल दिया है। जो भी हो, यह तो तय ही है कि नारी सुरक्षा के मुद्दे को राजनीतिक ताकत ने अगवा कर लिया है। झिनुक मजूमदार की बाईलाइन वाली खबर के अनुसार, महिला अधिकारों के लिए सामाजिक जागरूकता के प्रयासों पर राजनीतिक विरोध के पौरुष प्रदर्शन ने सड़कों पर कब्जा जमा लिया है। आप जानते हैं कि कोलकाता में यह कांड 9 अगस्त की रात हुआ था और वहां के लोगों ने 14 अगस्त की आधी रात न्याय के लिये मार्च निकाला था और द टेलीग्राफ ने इसे प्रमुखता से प्रकाशित किया था। आज की खबर उस दिन जो कहा गया था उसपर आधारित है। और जिसने पढ़ा होगा उसे पता होगा कि उसके दो हफ्ते बाद जब देश की सबसे काबिल एजेंसी को जांच में कुछ खास या नया नहीं मिला तो अब यह कहने का कोई मतलब नहीं है कि बहुत हुआ।
जो होना था उसे एक पुलिस वाले ने अंजाम दिया, इसके खिलाफ आईएमए ने हड़ताल कर दी और जांच राज्य पुलिस से लेकर सीबीआई को सौंप दी गई। सुप्रीम कोर्ट ने भी स्वतः संज्ञान लिया और ऐसे में लगता नहीं है कि कोई कसर रह गया है। दूसरी ओर, अन्य मामलों में जो डबल इंजन वाले राज्यों के हैं, किसी प्रगति की सूचना तो छोड़िये, उत्सुकता भी नहीं है। कोलकाता मामले की जांच तो पुलिस ने शुरू कर ही दी थी और अभियुक्त को 12 घंटे के अंदर पकड़ लिया गया था। मुख्यमंत्री जनता के साथ प्रदर्शन करके मांग कर चुकी हैं कि हत्यारों को फांसी दी जाये। मामला जब सीबीआई के पास है तो वे यही कर सकती थीं। अब राष्ट्रपति के बयान के बाद ममता बनर्जी ने कहा है, यौन अपराध के खिलाफ राज्य सरकार सख्त कानून बनायेगी। यह खबर भी द टेलीग्राफ में पहले पन्ने पर है लेकिन अमर उजाला में यह भी नहीं है। द टेलीग्राफ में पहले पन्ने पर राष्ट्रपति का बयान भी नहीं है।
राष्ट्रपति का बयान आज इंडियन एक्सप्रेस में लीड है। इस खबर का फ्लैग शीर्षक है, “बलात्कार के लिये मौत का सजा का कानून लाउंगी : ममता”। मुख्य शीर्षक है, राष्ट्रपति ने कलकता, महिला सुरक्षा का मुद्दा उठाते हुए कहा, बहुत हुआ। इंट्रो है, महिला को कम समझने वाली मानसिक स्थिति का मुकाबला कीजिये। देश के लिये नाराज होना स्वाभाविक है, मैं भी वैसे ही नाराज हूं। कहने की जरूरत नहीं है कि राष्ट्रपति का यह बयान वारदात के 20 दिन बाद तब आया है जब मामले की जांच राज्य पुलिस से लेकर देश की सर्वश्रेष्ठ एजेंसी को दी जा चुकी है। वह अपना काम कर रही है और कुछ नया या खास नहीं ढूंढ़ पाई ह। सुप्रीम कोर्ट स्वतः संज्ञान लेकर आवश्यक कार्रवाई कर चुकी है। यह खबर आज नवोदय टाइम्स में भी लीड है। इसके साथ ममता बनर्जी की चेतावनी भी है – बंगाल जलाया तो यूपी-दिल्ली जलेंगे। यह खबर इंडियन एकसप्रेस में दो कॉलम में है जबकि कल के बंद के दौरान क्या हुआ यह खबर नहीं है।
हेडलाइन मैनेजमेंट को महत्व देते हुए इंडियन एक्सप्रेस ने जन धन खातों पर प्रधानमंत्री की एक टिप्पणी के आधार पर दो कॉलम की खबर छापी है। यह टिप्पणी एक्स पर है। इस खबर का शीर्षक है, प्रधानमंत्री ने कहा, जन धन से बैंकों में 53 करोड़ खाते खुले हैं। इस खबर का उपशीर्षक है, जो पोस्ट में भी है, कांग्रेस ने गरीबों के नाम पर बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया पर उन्हें बैंकों तक पहुंच कभी नहीं दिलाई। यहां सवाल है कि इससे खाता धारकों को क्या लाभ हुआ। हाल में खबर छपी थी कि न्यूनतम बैलेंस नहीं रखने वालों से बैंकों ने पिछले पांच साल में 8,495 करोड़ रुपये का जुर्माना वसूला है। पंजाब नेशनल बैंक सबसे आगे है। इसने 1538 करोड़ रुपये का जुर्माना ऐंठा। ऐसे में सवाल है कि जनधन खातों से यह जुर्माना नहीं भी वसूला गया तो बैंकों ने कौन सा अहसान किया और जिन गरीबों से वसूला गया उनकी कीमत पर जनधन खाते चल रहे हैं तो सरकार या बैंक क्या कर रहे हैं? यही नहीं, जनधन खाता धारकों के बीमा की भी योजना थी पर उसका हिसाब सरकार या बैंको ने कभी नहीं दिया है।
यह ट्वीट कल के कोलकाता बंद और राष्ट्रपति के बयान के साथ हेडलाइन मैनेजमेंट के लिए है कि नहीं यह तो नहीं बताया जायेगा पर काम उसी का कर रहा है। प्रचार बंद से न मिले तो राष्ट्रपति के बयान से मिले और उससे भी नहीं तो कांग्रेस की आलोचना और अपनी प्रशंसा से मिले। जहां तक राष्ट्रपति के बयान की बात है, अमर उजाला की खबर के अनुसार, राष्ट्रपति ने कहा कि ‘वह घटना से निराश और भयभीत हैं।’ अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए राष्ट्रपति ने महिला अपराधों पर रोक का आह्वान किया और कहा कि ‘अब बहुत हो गया, अब समय आ गया है कि भारत महिलाओं के खिलाफ अपराधों की ‘विकृति’ के प्रति जाग जाए और उस मानसिकता का मुकाबला करे जो महिलाओं को ‘कम शक्तिशाली, कम सक्षम, कम बुद्धिमान’ के रूप में देखती है।’
इससे पहले पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने कहा था – देश में अब भी डरे हुए हैं मुसलमान। इस पर एक प्रतिक्रिया थी, हामिद अंसारी के पूरे ख़ानदान का इतिहास ग़द्दारी से भरा पड़ा है! हामिद अंसारी विवाद : अंसारी का ‘डर’, भारत के ख़िलाफ़ ज़हर? (न्यूज18 इंडिया)। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने हामिद अंसारी पर विपक्ष की ओर झुकाव रखने का आरोप लगाया था। हामिद अंसारी सांप्रदायिकता के नये एम्बैस़़डर बन गये हैं – प्रो. राकेश सिन्हा, ट्वीटर पर। यह पहली बार नहीं जब बीजेपी और पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी आमने-सामने – नभाटा। राजनीतिक प्रचार के लिए लोग देते हैं बयान – वेंकैया नायडू। कहने की जरूरत नहीं है कि उपराष्ट्रपति के बयान के बाद प्रधानमंत्री ने जो कहा था वैसा वे मानते हैं और अब राष्ट्रपति ने जो कहा है वह क्यों कहा होगा। संभव है उन्हें पुरानी बातें मालूम न हों पर उन्हें यह तो पता ही होगा कि इसके क्या मायने हो सकते हैं। जो भी हो, यह मानना पड़ेगा कि राष्ट्रपति भयभीत हैं।
आइये, अब देखें कि खबरें कैसे छपी हैं। कोलकाता बंद की खबर आज द हिन्दू और हिन्दुस्तान टाइम्स के अलावा अमर उजाला लीड है जबकि राष्ट्रपति के भयभीत होने की खबर इंडियन एक्सप्रेस और नवोदय टाइम्स में लीड है। टाइम्स ऑफ इंडिया में 12 औद्योगिक क्षेत्र स्थापित किये जाने की खबर है। इसके अनुसार सबसे बड़ा औद्योगिक क्षेत्र महाराष्ट्र में स्थापित होगा जहां विधानसभा चुनाव होने हैं और घोषणा का समय करीब है। टाइम्स ऑफ इंडिया में राष्ट्रपति की खबर दो कॉलम में है। द हिन्दू में दोनों खबरें क्रम से लीड और सेकेंड लीड हैं। यह दिलचस्प है कि कोलकाता की खबर वहां के टेलीग्राफ के मुकाबले दिल्ली के अखबारों में ज्यादा प्रमुखता से छपी है। अखबार पढ़ने से समझ में आता है कि वहां का समाज हमारे समाज से अलग है। वहां घटना सीसीटीवी के दायरे में होने के बाद भी शक है कि अपराधी एक से ज्यादा थे। इसके लिए तर्क, कुतर्क और झूठ सब है। यहां पेड़ पर लटकी लाशों को आत्महत्या कह दिया जाता है और अकेले परिवार वाले कह रहे हैं कि संतुष्ट तो करो कि पेड़ पर लटक कर लड़कियां आत्म हत्या कैसे कर सकती हैं और अगर कर सकती हैं तो बाकी सवालों के क्या जवाब हैं।
कहने की जरूरत नहीं है कि मामला आत्महत्या का भी हो तो उसका कारण होना चाहिये और किसी संतोषजनक कारण के बिना यह कैसे माना जा सकता है कि इसका कारण ब्लैकमेल या कुछ और नहीं है। हिन्दी पट्टी में पुलिस और सरकार के आगे किसी की नहीं चलती और यह संभव नहीं है कि राष्ट्रपति को पता नहीं हो। उत्तर प्रदेश में दो लड़कियों के शव मिलने की खबर अमर उजाला में पहले पन्ने पर नहीं है लेकिन हिन्दुस्तान टाइम्स में है। इस खबर के बीच में लखनऊ डेटलाइन से बरेली की खबर है। इसके अनुसार नौवीं की एक छात्रा के साथ उसके दो सहपाठियों ने बलात्कार किया तो अगले दिन उसने आग लगाकर आत्म हत्या कर ली। पर अमर उजाला ने पहले पन्ने पर राष्ट्रपति की चिट्ठी छापी है।
इसमें हाईलाइट किया हुआ अंश है, समाज को खुद के अंदर झांकना होगा और मुश्किल सवाल पूछने होंगे। हमसे कहां गलती हुई इन गलतियों को दूर करने के लिए हम क्या कर सकते हैं। इन सवालों का जवाब ढूंढ़े बिना, आधी आबादी उतनी आजादी से नहीं जी पायेगी जितनी आजादी से बाकी आधी आबादी जीती है। मुझे लगता है कि इन सवालों के जवाब मुश्किल नहीं हैं, सबको मालूम हैं। गलती हमने मंदिर बनाने वाली सरकार चुनकर की है और अब उसकी कीमत चुका रहे हैं। हालत ऐसी हो गई है कि पहले उपराष्ट्रपति ने कहा कि, देश में अब भी डरे हुए हैं मुसलमान तो प्रधानमंत्री ने राजनीति की अब राष्ट्रपति राजनीति कर रही हैं या उनसे करवाया जा रहा है। आदर्श स्थिति में प्रधानमंत्री को कहना चाहिये कि आप निष्पक्ष रहिये, भयभीत मत होइये।
न्यूज एजेंसी पीटीआई को लिखे लेख में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने कहा, ‘इतिहास का सामना करने से डरने वाले समाज भूलने की सामूहिक बीमारी का सहारा लेते हैं; अब समय आ गया है कि भारत इतिहास का सामना करे। महिला अपराधों पर राष्ट्रपति ने कहा कि ‘हमें इस विकृति से व्यापक तरीके से निपटना चाहिए ताकि इसे शुरू में ही रोका जा सके। जो लोग इस तरह के विचार रखते हैं, वे महिलाओं को एक वस्तु के रूप में देखते है। अपनी बेटियों के प्रति यह हमारा दायित्व है कि हम उनके भय से मुक्ति पाने के मार्ग में आने वाली बाधाओं को दूर करें।’ कहने की जरूरत नहीं है कि ऐसे लोग भाजपा में सबसे ज्यादा हैं। राष्ट्रपति ने कहा कि ‘कोई भी सभ्य समाज बेटियों और बहनों के खिलाफ इस तरह के अत्याचार की इजाजत नहीं दे सकता। देश को इस पर गुस्सा जाहिर करना ही चाहिए और मैं भी इससे गुस्से में हूं।’ राष्ट्रपति ने ‘महिला सुरक्षा: बस बहुत हुआ’ शीर्षक से लिखे लेख में पहली बार कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज की घटना पर अपने विचार रखे। इस मुद्दे पर पश्चिम बंगाल समेत देशभर में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। घटना को लेकर मंगलवार को पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच तीखी झड़प हुई और आज बंगाल बंद का आयोजन किया जा रहा है। इसपर स्थानीय अखबार की प्रतिक्रिया आप ऊपर पढ़ चुके हैं।


