रवीश कुमार-
सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस से लेकर जस्टिस रिटायर हो जाते थे, पता नहीं चलता था। सुप्रीम कोर्ट के भीतर विदाई समारोह होता था और कानून के पत्रकार श्रद्धा में उसकी रिपोर्टिंग कर देते थे। पिछले दस सालों में भारत की न्यायपालिका को देखने का नज़रिया बदला है। श्रद्धा का पर्दा हटा कर चीफ़ जस्टिस के कार्यकाल को देखा जाने लगा है।
अदालतों की प्रक्रियाओं की समीक्षा रिपोर्टिंग डेस्क पर की जाने लगी है। रिपोर्टिंग की इस धारा का नायक बन कर उभरा है एक नौजवान पत्रकार सौरव दास। सौरव ने कम उम्र में ही क़ानून की रिपोर्टिंग की सारी बदबूदार इमारतें ध्वस्त कर दी हैं। यह लड़का आज अदालत के सामने अपनी कलम से अदालत बन गया है।

पत्रकारिता के हर छात्र को सौरव का लिखा हुआ पढ़ना चाहिए। सौरव की रिपोर्टिंग ने हिन्दी की बौद्धिक दरिद्रता के कारणों से भी पर्दा हटा दिया है। बहुत से चालाक लोग तरह-तरह के वैचारिक उपनिवेशिकरण के वशीकरणों पर सारा दोष डाल कर पोथी-पतरा बाँचना शुरू कर देते हैं। हिंदी के बड़े बड़े पत्रकार थके पुराने नेताओं का इंटरव्यू कर पत्रकारिता में होने का बहाना कर रहे हैं, सामने होने वाली चीजों को लिखने के बजाए जेपी- लोहिया, गांधी-अंबेडकर करने में लगे हैं। धर्म की व्याख्या कर रहे हैं। इनके नाम पर सौदा करने लगे हैं।
इस तरह से सबने अपना-अपना सुरक्षित ठिकाना खोज लिया है। महापुरुषवाद पुराना ठिकाना रहा है मगर अब तो यह क़िला बन गया है। सौरव जैसे पत्रकार इस महापुरुषवाद का प्रतिकार कर रहे हैं। राजनीति को धर्म के साथ साथ महापुरुषवाद से भी मुक्ति की तीव्र और शीघ्र ज़रूरत है। यह टाइम पास और पाला बदलने का हथियार बन गया है।
सौरव की पत्रकारिता बता रही है कि किसी भी क्षेत्र में समृद्धि आती है साहसिक कार्यों, साहसिक यात्राओं और रचनाओं से। इस युवक ने अदालतों की ढहती दीवारों का हाल सबके सामने रख दिया है। हमारे समय में हो रही चीजों को उन मानकों से देखा जा सकता है, जिनकी बुनियाद पर लोकतंत्र और उसकी संस्थाएं खड़ी हैं।
चीफ़ जस्टिस चंद्रचूड़ पर 44 पन्नों की रिपोर्ट लिख देना आसान नहीं है। एक न्यायाधीश के लंबे कार्यकाल का विश्लेषण भारत की पत्रकारिता में इतिहास बनाने वाला है। पढ़िएगा। बहुत से डरपोक और चालाक इसे शेयर करने से भी घबराएँगे। लेकिन कारवाँ ने इसे छाप कर एक नया मानक बना दिया है। कारवाँ को बधाई एक नई लाइन खींचने के लिए।
अजीत अंजुम-
वाक़ई सौरव दास ने कमाल की कवर स्टोरी लिखी है. सिर्फ़ सौरव की इस रिपोर्ट को पढ़ने के लिए मैंने कल Caravan का सालाना सब्सक्रिप्शन लिया. पूरे दिन बाक़ी काम छोड़कर 44 पन्ने की ये रिपोर्ट पढ़ गया.
जस्टिस चंद्रचूड़ के मिथकीय कैरेक्टर की कई ऐसी परतें सौरव ने उधेड़ी हैं, जो अनसुना सा था. ढका -छिपा था.
इस रिपोर्ट को पढ़कर पता चला कि सीजेआई की विदाई पर उनकी प्रोफ़ाइल लिखने के लिए सौरव ने सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के कई पूर्व जज, कई वकील और पचासों लोगों से बात की है.
ज़बरदस्त मेहनत के साथ एक रिसर्च पेपर तरह लिखी गई है ये रिपोर्ट. बीते कुछ सालों में जस्टिस चंद्रचूड़ की जो छवि हम सबने गढ़ी या गढ़ने की कोशिश की, उन छवियों के पीछे छिपी परतों को सौरव ने अपनी इस रिपोर्ट में तथ्य के साथ उधेड़ा है.
इतनी गहराई और इतनी रिसर्च के साथ इससे ज़्यादा कोई रिपोर्टर कभी लिख नहीं सकता.
हाँ, कल को कोई किताब लिख दे तो अलग बात है . बधाई सौरव दास….



नूर अहमद पठान
November 13, 2024 at 10:20 pm
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