उर्मिलेश-
वरिष्ठ पत्रकार और लेखक तड़ित कुमार नहीं रहे. उनके निधन की सूचना कल लेखक, प्रकाशक और सामाजिक कार्यकर्ता दिगम्बर जी की सोशल मीडिया पोस्ट से मिली. तड़ित जी के मित्र और सहकर्मी उन्हें ‘दादा’ कहकर संबोधित करते थे. मैं भी ‘दादा’ या ‘तड़ित दा’ ही कहता था. हालांकि हमारी-उनकी ज्यादा निकटता नहीं थी. मुलाकातें भी कुछेक बार की ही हैं! जहां तक याद है, उनसे हमारी पहली मुलाकात सन् 1984-85 के बीच की है.

1986 के अप्रैल महीने में नवभारत टाइम्स ज्वाइन करने से पहले मैंने दिल्ली में दो-ढाई साल प्रतिपक्ष, साप्ताहिक हिंदुस्तान, जनसत्ता जैसे प्रकाशनों में जमकर फ्रीलांसिंग की. मजबूरी थी. दिल्ली में गुजारा करने के लिए कोई और चारा नहीं था. JNU से बाहर हो चुका था. UGC की रिसर्च फैलोशिप बंद हो चुकी थी. फ्रीलांसिंग के उसी दौर में आनंद स्वरूप वर्मा और तड़ित कुमार की संपादक-जोड़ी ने कुछ महीनों तक लखनऊ से छपने वाले टैबलॉयड शान-ए-सहारा में मुझे खूब छापा. फिर कुछ महीने इस पत्र का दिल्ली स्थित रिटेनर या अंशकालिक संवाददाता भी रहा! जहां तक याद आ रहा है, हमसे पहले यह काम अभय कुमार दुबे कर रहे थे.
इस पत्र के लिए मैंने मिलिटेंसी-प्रभावित पंजाब में घूम घूम कर रिपोर्टिंग भी की. देश के गणमान्य और कुछ विवादास्पद लोगों के इंटरव्यू भी किये. कुछ समय बाद वह अखबार बंद हो गया. तड़ित दा से उसी दौर की कुछ मुलाकातें हैं. जहां तक याद आ रहा है, उनका पूरा नाम तड़ित कुमार चटर्जी था. लेकिन दादा ने सरनेम लिखना बहुत पहले ही छोड़ दिया था. दादा के पिता का परिवार मूल रूप से बंगाल के पूर्वी भाग से था, जो अब बांग्लादेश कहलाता है. उनके पिता रेलवे की नौकरी में गोरखपुर आये थे. दादा यहीं पढ़े-लिखे और पूरे ‘गोरखपुरी’ बन गये. वामपंथी रुझान के तड़ित कुमार कुछ जनपक्षी विद्वानों और जन संगठनों के भी संपर्क में आये, जिनसे उनकी सामाजिक-राजनीतिक चेतना का निर्माण हुआ!
उनके समकालीन पत्रकार-मित्र और तीन-तीन अखबारों में उनके सहकर्मी रहे आनंद स्वरूप वर्मा के मुताबिक दादा ने पत्रकारिता की शुरुआत गोरखपुर से प्रकाशित अखबार ‘हिंदी दैनिक’ से की थी. यह अखबार 1966 में शुरू हुआ था. इसमें बाल मुकुंद राही मुख्य उप संपादक थे. तड़ित कुमार के अलावा आनंद स्वरूप वर्मा और शिव मंगल सिद्धांतकर ने भी यहीं से अपनी पत्रकारीय पारी की शुरुआत की थी. राही जी बहुत प्रखर और तेजतर्रार पत्रकार थे. फारवर्ड ब्लॉक से सम्बद्ध होने के बावजूद वह 1967-68 के दौर में उभरे नक्सल आंदोलन से प्रभावित हुए. अखबार में उस आंदोलन पर कई खबरें और लेख आदि छापे. इससे नाराज होकर कुछ समय बाद अखबार के मालिक ने उसे बंद कर दिया.
तड़ित कुमार सहित गोरखपुर के इन सभी युवा पत्रकारों की जोशीली टीम को ‘पूर्वी टाइम्स’ में ठौर मिली. अखबार का प्रकाशन उस दौर के बड़े कांग्रेसी नेता (जो बाद में केंद्रीय मंत्री भी रहे) केशव देव मालवीय ने शुरू कराया था. बाल मुकुंद राही इसके संपादक थे. कुछ वर्ष बाद यह अखबार भी बंद हो गया. फिर गोरखपुर के इन युवा पत्रकारों की टीम बिखर गयी. आनंद स्वरूप वर्मा जैसे कुछ लोग दिल्ली आ गये और शेष लोग लखनऊ, बनारस या इलाहाबाद चले गये. तड़ित कुमार कलकत्ता चले गये. वहां भी वह कुछ वामपंथी प्रकाशनों से जुड़े रहे. कुछ समय बाद वह फिर यूपी लौटे. उसके बाद कई अखबारों में काम किया.
1983 में गोरखपुर के ही बंगाल-मूल के उभरते कारोबारी सुब्रत राय ने तड़ित कुमार से मशविरा करके ‘शान-ए-सहारा’ निकालने का प्लान बनाया तो तड़ित दा उसके संपादक बने. अखबार क्लिक नहीं कर रहा था तो तड़ित दा ने अपने पुराने गोरखपुरी दोस्त आनंद स्वरूप वर्मा को सह-संपादक के रूप में लखनऊ बुला लिया. तड़ित कुमार और आनंद स्वरूप वर्मा की संपादक-जोड़ी ने सबसे पहले अपनी टीम का विस्तार किया. कंटेंट और प्रोडक्शन क्वॉलिटी में भी सुधार किया. अखबार का नाम-‘शान-ए-सहारा’ बहुत वाहियात और अनाकर्षक था. सरकुलेशन और मार्केटिंग की टीम भी कारगर नहीं थी. लेकिन कंटेंट के बल पर लखनऊ से प्रकाशित यह नया टैबलॉयड सन् 1984-85 के बीच 35-40 हजार बिकने लगा.
सुब्रत राय का चिटफंड का कारोबार जैसे-जैसे बढने लगा वैसे-वैसे देश और प्रदेश के बड़े नेताओं से उनके रिश्ते भी बनने लगे. ऐसे में व्यापक तौर पर जनपक्षी किस्म का यह टैबलॉयड उनके लिए मुश्किलें पैदा करने लगा. फिर एक दिन इसके भी बंद होने का ऐलान हो गया. बाद के दिनों में तड़ित कुमार ने ‘भास्कर’ समूह में भी काम किया. वह ग्वालियर के संस्करण के प्रभारी संपादक रहे. किसी दौर में वह दैनिक ‘जागरण’ में भी रहे!
एक दौर में तड़ित कुमार कविताएं भी लिखते थे. दशकों पहले ‘शुरुआत’ नाम से धुर वामपंथी कवियों का एक संकलन छपा था, जिसकी भूमिका प्रख्यात लेखक हंसराज रहबर ने लिखी थी. उस संकलन में भी तड़ित कुमार की कविता शामिल की गई थी.
उन्होंने ‘तिलचट्टा’ नाम से एक उपन्यास भी लिखा. संभवतः यह इंद्रप्रस्थ प्रकाशन से 2010 में प्रकाशित हुआ था. उनकी एक और किताब ‘बिजूका’ छपी. इसी वर्ष जनवरी में मेघनाथ साहा की महत्वपूर्ण किताब का उनके द्वारा किया हिंदी अनुवाद भी छपा. ‘विज्ञान,सनातनी मिथक और सामाजिक विकास’ शीर्षक इस पुस्तक को गार्गी प्रकाशन ने छापा है..
दिवंगत तड़ित दा को सादर श्रद्धांजलि


