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आज के अखबार : तीसरी बार के प्रधान ने कहा, एक हैं तो सेफ हैं; अंग्रेजी में अकेले इंडियन एक्सप्रेस का शीर्षक

संजय कुमार सिंह

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का ‘एक हैं तो सेफ हैं’ कहना मुझे बहुत ही हल्का लगा। वैसे तो मैं उन्हें कभी भी गंभीर नहीं मानता था लेकिन तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने के बाद लग रहा है कि वे बहुत हल्के और कमजोर हैं। ‘एक हैं तो सेफ हैं’ में ‘मैं हूं ना’ का आश्वासन बिल्कुल नहीं है। इसलिए यह मुझे अपनी कमजोरी स्वीकार करने जैसा लगता है। 10 साल के उनके शासन के बाद कहा जा सकता है कि 56 ईंची सीना और लाल आंखें सिर्फ दिखाने की बात है। चुनाव प्रचार के लिहाज से भी किसी का ऐसा कहना ठीक नहीं है। यह किसी गिरोह या समूह का मुखिया कहे तो बात समझ में आती है कि सभी सदस्य मेरे नेतृत्व में एक रहोगे तो सुरक्षित हो, तुम्हारा ख्याल मैं रखूंगा या तुम्हारा साथ रहना ही मेरी ताकत है। पर यही बात एक प्रधानमंत्री कह रहा है तो लगता है कि वह चुनाव जीतने के लिए साथ मांग रहा है जबकि उसका काम है कि वह अलग, अकेले खड़े विरोधी की भी सुरक्षा सुनिस्चित करे। इसके लिए उसके नियंत्रण में पुलिस और दूसरी एजेंसियां हैं। कानून व्यवस्था की स्थिति संभालना सरकार का काम है। अगर कानून व्यवस्था की स्थिति ठीक होगी तो लोग अकेले कहीं भी आ-जा सकेंगे उन्हें भेड़ की तरह समूह में चलने की जरूरत ही नहीं होगी।

प्रधानमंत्री अगर देश के आम नागरिकों से कह रहे हैं कि एक हैं तो सेफ हैं यानी सुरक्षा चाहिये तो एकजुट रहो, अपनी सुरक्षा स्वयं करो और पुलिस प्रशासन या मुझपर भरोसा नहीं रखो। गिरोह के नेता और प्रधानमंत्री में यही फर्क है। गिरोह में सिर्फ हां में हां मिलाने वाले होते हैं (बागी अपवाद होते हैं) और स्वार्थ में या डर से नेता का नेतृत्व स्वीकार करते हैं। प्रधानमंत्री उनके भी नेता है जो उनके साथ नहीं हैं, उनसे सहमत नहीं हैं, उनके विरोधी हैं और मजबूरी में भी हों तो उनके नेतृत्व में हैं। उन्हें लोकतांत्रिक तरीके से नेता चुना गया है और संभव है बहुत लोगों के नेता वे उनकी अनिच्छा के बावजूद बने हों। अच्छे प्रधानमंत्री का काम है कि उन्हें भी प्रभावित करें, अपने साथ मिलायें। पर अच्छे कामों से, आश्वासनों से। ‘एक हैं तो सेफ हैं कहकर आप बाकी लोगों को धमका रहे हैं कि जो आपके साथ नहीं है वह सुरक्षित नहीं है। उसकी सुरक्षा के लिए आप जिम्मेदार नहीं है और कोई दहंग मुंह पर मूत दे तो मत बोलना। वोट लेने के लिए ऐसा लालच देना अनैतिक भी है। चुनाव आयोग को इसे देखना चाहिये पर वह मेरा मुद्दा नहीं है। 

मेरा मुद्दा यह है कि प्रधानमंत्री ने जो कहा है वह तथ्यात्मक रूप से भी गलत है। आज ही प्रभात खबर के पटना संस्करण की लीड है, छठ के दौरान डूबने से पूरे बिहार में 61 लोगों की जान गई। मुझे लगता है कि छठ करने वाले सभी लोग तो एक हैं ही पर सेफ कहां थे? 24 घंटे से कम में 61 लोग एक अकेले बिहार में मर गये। एक काम करते हुए, एक रहते हुए। क्या इनके एक होने का कोई दूसरा तरीका हो सकता है जिसमें ये 61 लोग नहीं मरते? बिहार की नीतिश सरकार नरेन्द्र मोदी के साथ है और इतनी सेफ नहीं है कि अपने नागरिकों की रक्षा नहीं कर पाने की बदनामी से बच जाये। आज जब सभी अखबारों में अमुवि पर मुख्य न्यायाधीश का अंतिम फैसला लीड है तो बिहार के अखबार को अलग होना पड़ा। यह एक हैं तो सेफ हैं के नये घोषित सिद्धांत से भी अलग है और जाहिर है फैसला विवेक से लिया गया है। इसलिए मुद्दा यह है कि किसके साथ रहना है यह फैसला विवेक से लेना चाहिये और अगर एक ही रहना है तो कोई समान शिक्षा वाले के साथ रहे या समान पेशे वाले के साथ या समान जाति वाले – यह बहुत मुश्किल सवाल है और चुनाव पूर्व दी जाने वाली राजनीतिक सलाह में इसका हल नहीं है।   

छठ करने वाले बिहार के सभी लोग तो साथ हैं ही। एक ही जगह छठ करते यह संभव नहीं है, जो बाहर थे और नहीं गये या जा सके वे बच गये या सेफ हैं। तो एक रहने से सेफ हैं या अलग रहने से? सच तो यह है कि जो एक थे वही सेफ नहीं थे उन्हीं में से 61 मरे। सब छठ कर रहे थे इसलिए कई तरह से एक थे, आस्था के लिहाज से भी। बिहार जैसे राज्य में 61 लोगों की मौत मायने रखती है। छठ बिहार का ही पर्व है और मरने के लिए तो नहीं ही किया जाता है। इतने सारे लोग करते हैं, सब लगभग एक साथ, एक तरह से एक समय करते हैं और कई साल से एक हैं। सबको पता है कि फलानी तारीख को छठ है, लोग नदी तालाब के पास इकट्ठे होंगे, सब इकट्ठे थे भी लेकिन 61 लोग मर गये। क्या फायदा हुआ – एक रहने का। कहने की जरूरत नहीं है कि मौतें सुरक्षा के उपाय नहीं होने, सुरक्षा का ख्याल नहीं करने और ऐसे ही कारणों से हुई होंगी जो एक रहने से अलग है और एक रहना सेफ होने की गारंटी नहीं है। संयोग यह कि दोनों बातें लगभग एक साथ हुई हैं। 

आइये, पहले समझ लें कि प्रधानमंत्री ने क्या कहा है और किस संदर्भ में कहा है। धुले से भाषा की खबर के अनुसार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने शुक्रवार को कांग्रेस पर एक जाति को दूसरी जाति से लड़ाने का आरोप लगाया और लोगों को एकजुट रहने के लिए आगाह करते हुए कहा कि वे ‘‘एक हैं तो सेफ (सुरक्षित) हैं।’’ खबर के अनुसार, महाराष्ट्र में 20 नवंबर को होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए अपनी पहली रैली में मोदी ने कहा, ‘‘वे नहीं चाहते कि एससी, एसटी और ओबीसी प्रगति करें और उन्हें उचित मान्यता मिले… याद रखें, एक हैं तो सेफ हैं।’’ उन्होंने आगे कहा, ‘‘नेहरू के समय से ही कांग्रेस और उनके परिवार ने आरक्षण का विरोध किया और अब उनकी चौथी पीढ़ी के युवराज जाति विभाजन के लिए काम कर रहे हैं।’’ मोदी ने कांग्रेस नेतृत्व वाले ‘इंडिया’ गठबंधन पर जम्मू-कश्मीर से भारत का संविधान हटाने का प्रयास करने का आरोप लगाया और साथ ही जोर देकर कहा कि दुनिया की कोई ताकत वहां अनुच्छेद 370 को बहाल नहीं कर सकती।  कहने की जरूरत नहीं है कि प्रधानमंत्री राजनीतिक भाषण दे रहे थे और यह उनकी राजनीति है तो लोगों को बताया जाना चाहिये कि घटिया और फूहड़ है और यह वैसे ही है जैसे हिन्दू मुसलमान की राजनीति करते आये हैं। राजनीति की बात यह है कि हिन्दुओं की राजनीति खुलकर करते हैं लेकिन हित कुछ पैसे वाले हिन्दुओं का ही साधते हैं।

आरक्षण के पक्ष में अब चाहे जो बोलें पिछला इतिहास छिपा हुआ नहीं है। ऐसे में कांग्रेस और राहुल गांधी जब खुलकर जाति की बात करने लगे हैं (या राजनीति करने लगे हैं) तो बुरा लग रहा है और अपनी राजनीति पिटती हुई लग रही है। ऐसे में घबराहट और परेशानी साफ है। अपनी तारीफ से ज्यादा कांग्रेस की आलोचना करते हैं और उसमें बहुत कुछ झूठा। वह भी तब जब कांग्रेस (और गांधी परिवार) वर्षों से सत्ता में नहीं है। इसलिए हिन्दू-मुसलिम की राजनीति पिटती दिखी तब कटेंगे तो बंटेंगे आया। यह ज्यादा डरावना है और दोनों के लिए है। आप जानते हैं कि भाजपा में अटल, मोदी और योगी के हिन्दुत्व के तीन स्तर स्पष्ट हो गये हैं तो मोदी को योगी से कुछ अलग देना था और वह कटेंगे तो बंटेंगा का अलग रूप या स्तर है। सही है या गलत – इसपर मैं कुछ राय दूं उससे बेहतर होगा यह बताना कि अखबारों में यह कितना और कैसे छपा है। यह खबर है कि प्रधानमंत्री ने महाराष्ट्र चुनाव के लिए प्रचार शुरू किया और जो भी कहा वह पहले पन्ने पर नहीं है या जो प्रमुख (अथवा नया) डायलॉग दिया उसे दिल्ली के अखबारों में पहले पन्ने पर जगह नहीं मिली। यह चुनाव प्रचार में प्रधानमंत्री के जरूरत से ज्यादा शामिल होने के कारण भी हुआ हो सकता है पर वह अलग मुद्दा है।   

अमर उजाला में यह पहले पन्ने पर शीर्षक में नहीं है। नवोदय टाइम्स में तीन कॉलम का बॉटम है। मेरे अंग्रेजी अखबारों में यह सिर्फ इंडियन एक्सप्रेस में  शीर्षक में है। हिन्दुस्तान टाइम्स में खबर तो सेकेंड लीड है और खबर में सलाह भी है लेकिन वह शीर्षक में नहीं है ना ही इसे हाईलाइट किया गया है। आजकल अखबार जिस तरह से सरकार का समर्थन कर रहे हैं उसमें इसे प्रमुखता से नहीं छापने का मतलब यही लगाया जाना चाहिये कि यह प्रधानमंत्री के स्तर का नहीं है और अखबारों ने उनके हित में इसे उनके हवाले से नहीं छापा है। अखबारों को लगा हो कि अब ज्यादा हो रहा है। संभव है, मेरा अनुमान गलत हो तथा कारण कुछ और हो पर मेरे लिये इसका शीर्षक में नहीं होना आश्चर्यजनक है। टाइम्स ऑफ इंडिया ने तो पूरी खबर को सिंगल कॉलम में निपटा दिया है और बताया है कि एक हैं …के साथ प्रधानमंत्री ने महाराष्ट्र में चुनाव अभियान शुरू किया। प्रधानमंत्री की फोटो के साथ यह खबर तीन लाइन के शीर्षक के साथ कुल 14 लाइन की है। इससे बताया गया है कि ऐसी एक खबर अंदर है। दि एशियन एज का मामला और दिलचस्प है। यहां यह खबर तो लीड है पर शीर्षक या किसी तरह से हाईलाइट किये जाने की बात तो छोड़िये पहले पन्ने की खबर में भी एक हैं तो सेफ हैं का जिक्र नहीं है। द हिन्दू और द टेलीग्राफ में यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है।  

दि एशियन एज की खबर में कांग्रेस और विपक्ष के लिए ‘झूठ की दुकान’ का हवाला कई बार आया है लेकिन एक हैं तो सेफ हैं, ढूंढ़ने पर भी नहीं मिला। मुख्य शीर्षक है, “कांग्रेस झूठ की दुकान चलाती है जातियों को बांटने की कोशिश करती है : मोदी”। फ्लैग शीर्षक है, रिश्वत पर भाजपा की झूठ का खुलासा करने के लिए कांग्रेस ने अपने सभी मुख्यमंत्रियों को मुंबई बुलाया। आप जानते हैं कि नरेन्द्र मोदी कांग्रेस पर झूठे आरोप लगाकर ही 2014 में प्रधानमंत्री बने थे। कांग्रेस के खिलाफ भ्रष्टाचार का कोई मामला साबित हुआ होता तो प्रधानमंत्री अब इतना हल्का आरोप क्यों लगाते। लेकिन वे इसकी हिमाकत कर पा रहे हैं तो सिर्फ इसलिए कि मीडिया उनका सच नहीं बताता। स्विस बैंक में रखे करोड़ों रुपये और उनके यहां आ जाने पर सबको 15 लाख मिलने जैसे झूठ उन्हीं ने बोले थे जिसे बाद में अमित शाह ने जुमला करार दिया था। पर लोगों को 15 लाख नहीं मिले तो नहीं मिले, विदेश में रखा काला धन वहीं क्यों छोड़ दिया? नोटबंदी से कालाधन खत्म होना था, डॉलर का भाव गिर रहा है तो जवाब देना होगा जैसे दुष्प्रचार अब नहीं होते हैं पर कांग्रेस को भाजपा के दुष्प्रचार से लड़ना पड़ रहा है और यह नरेन्द्र मोदी की राजनीति के स्तर के कारण है या वे राजनीति को इस स्तर पर ले आये हैं। 

दूसरी ओर, ना खाउंगा ना खाने दूंगा जैसा भ्रष्टाचार मुक्त शासन देने का वादा था, 100 दिन में विदेश में रखा काला  धन वापस आना था, 50 दिन में सपनों का भारत बनना था और चौराहे पर आना तथा झोला लेकर चल देना जैसा आश्वासन था फिर भी ना तो ब्रजभूषण सिंह का कुछ बिगड़ा ना माधवी पुरी बुच के खिलाफ कार्रवाई हो पा रही है, डिजिटल चोरी, लूट औऱ स्कैम के तो क्या कहने। दिलचस्प यह है कि इनके शिकार आईएएस और पत्रकार भी हो जा रहे हैं। अपनी जिम्मेदारी के रूप में प्रधानमंत्री आम लोगों, गरीबों और कम पढ़े लिखे लोगों को सतर्क रहने की सलाह देकर येन-केन प्रकारेण अगला चुनाव जीतने में लग जा रहे हैं। उसमें वोटर को एक हैं तो सेफ हैं जैसे आश्वासन दिये जा रहे हैं। चुनाव आयोग कितना निष्पक्ष है यह तो सदस्यों के चुनाव से ही पता है अपने काम से भी उसे निष्पक्ष दिखने की जरूरत नहीं लगती है और राहुल गांधी ने लेख लिखकर बताया कि ईस्ट इंडिया कंपनी की तरह सभी संवैधानिक संस्थाओं पर कब्जा करके सत्ता में बने रहने की कोशिश हो रही है तो मामला रजवाड़ों की निन्दा की ओर मोड़ दिया गया और एक हैं तो सेफ हैं के नारे के साथ रजवाड़ों के प्रतिनिधियों को रजवाड़ों की राजनीति में लगा दिया गया है।

राहुल गांधी ने जो लिखा वह कितना सही है या सरकार को कितना परेशान करने वाला है इसका पता इस बात से लगता है कि सरकारी नौकरी पर रख लिये गये पत्रकार को भी इसमें रजवाड़े ही दिखे वो ब्रांड नाम नहीं याद आये जिनकी तारीफ की गई है। या वह विषय मुद्दा नहीं लगा जिसपर लेख लिखा गया है। जहां तक प्रधानमंत्री की बात है उन्होंने कहा है, कांग्रेस ने धर्म पर राजनीति की जिसके कारण भारत का विभाजन हुआ और अब पार्टी जाति की राजनीति कर रही है। उन्होंने उत्तरी महाराष्ट्र के इस जिले में कहा कि देश के खिलाफ इससे बड़ी कोई साजिश नहीं हो सकती। पर सवाल यह है कि पिछड़ी जाति के लोगों को सामान्य स्तर पर लाने की जरूरत है कि नहीं? अगर मुफ्त के राशन से लोगों का काम चल रहा है और प्रधानमंत्री बने रहने के अलावा कुछ करने की जरूरत ही नहीं है तो विपक्ष जो भी करे उसे देश के खिलाफ साजिश कहा जा सकता है लेकिन झूठ बोलकर, हिन्दू मुसलिम करके सत्ता पर कब्जा करने और फिर संवैधानिक संस्थाओं में अपने लोगों को भर कर देश के तथाकथित विकास का क्या लाभ अगर आप उसके दम पर चुनाव नहीं जीत सकते हैं। आप लोगों की सुरक्षा की गारंटी नहीं दे सकते हैं और कहते हैं कि सेफ रहने के लिए एक रहिये और एक रहकर भी 24 घंटे से कम में 61 लोग मर जाते हैं। अखबारों के लिये यह मुद्दा नहीं है।

दिलचस्प यह है कि लोगों को इसकी जानकारी और समझ भी है। अनिल मसीह जैसे अधिकारी हैं, उनके खिलाफ कार्रवाई नहीं होती है और उन्हें संरक्षण देने वाला विपक्ष पर देश के खिलाफ साजिश का आरोप लगाने की हिमाकत करता है। नागरिकों की सुरक्षा की जिम्मेदारी सरकार की है और उसके तंत्र ऐसे होने चाहिये कि कोई अकेला भी कहीं भी यानी जगंल में भी सुरक्षित रहे और जहां सुरक्षा नहीं हो वहां मनुष्य या नागरिक के लिए जाना संभव न हो। यह व्यवस्था भी सरकार को ही करनी है। नरेन्द्र मोदी 10 साल से सत्ता में हैं पर आरोप लगाते हैं कि बांग्लादेश की सीमा से घुसपैठिये आ जाते हैं और पाकिस्तान सीमा से आतंकवादी आते हैं। चुनाव के समय घुसकर मारूंगा और बाद में एक हैं तो सेफ हैं – करते हैं। यह उनकी ओर से देश सेवा है।

देश सेवा कायदे से की गई होती तो यह कहने की जरूरत नहीं होती कि एक हैं तो सेफ हैं। तब यह होता कि कोई गरीब, कमजोर अकेले भी मिल जाता तो कोई दंबग उसके मुंह पर नहीं मूत पाता  और मूत ही देता तो उसके खिलाफ ऐसी कार्रवाई होती जो बुलडोजर न्याया से भी सख्त कही जाती।  ताकि यह भरोसा रहे कि अब कोई और किसी के मुंह पर नहीं मूतेगा। पर प्रधानमंत्री अगर कह रहे हैं कि एक हैं तो सेफ हैं से लग रहा है कि अकेले रहने वाले पर मूता जा सकता है। प्रधानमंत्री ने कहा कि कांग्रेस और उसके सहयोगियों को ‘पाकिस्तान के एजेंडे’ को बढ़ावा नहीं देना चाहिए और अलगाववादियों की भाषा नहीं बोलनी चाहिए। मोदी ने कहा कि जब तक उन्हें लोगों का आशीर्वाद प्राप्त है, तब तक विपक्ष का एजेंडा सफल नहीं होगा। वो तो ठीक है लेकिन मणिपुर और कश्मीर में क्या होगा – वह भी तो बताइये। मेरी राय में किसी प्रधानमंत्री का ऐसा कहना अपनी कमजोरी स्वीकार करना है। बेशक यह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के बंटेंगे तो कटेंगे का बेहतर रूप है पर प्रधानमंत्री के कहने से इसका मतलब बदल जाता है। योगी आदित्यनाथ ने ऐसा क्यों कहा और उसपर चुनाव आयोग को कार्रवाई करनी चाहिये थी, नहीं किया तो वह मेरी चर्चा का मुद्दा नहीं है।

ऐसे प्रधानमंत्री ने एक और बात कही है, दुनिया की कोई भी ताकत 370 वापस नहीं करा सकती। यही नहीं, गृह मंत्री अमित शाह ने कहा (अमर उजाला) है, पवार साहब, चार पीढ़ियां भी 370 वापस नहीं ला पायेंगी। प्रधानमंत्री ने यह भी कहा है कि कांग्रेस और उसके साथ पाकिस्तानी एजेंडे को बढ़ावा देना बंद करें। आप जानते हैं कि जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने के पांच साल बाद चुनाव हुए हैं। भाजपा उसमें बुरी तरह हार गई है और अब विधानसभा ने प्रस्ताव पास किया है तो प्रधानंमंत्री ऐसे बोल रहे हैं। इसमें मामला भाषा का है और तथ्यों के बारे में तो हम सब जानते हैं। राहुल गांधी के संविधान की प्रति लेकर घूमने का राजनीतिक असर सबको पता है लेकिन प्रधानमंत्री ने कहा है, भड़काने के लिए संवाधिन के नाम पर कोरी किताबें। कहने की जरूरत नहीं है कि यह प्रधानमंत्री की भाषा का मामला ज्यादा है, चुनाव प्रचार का कम।

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