
संजय कुमार सिंह
आज के अखबारों में सुप्रीम कोर्ट की दो खबरें प्रमुखता से हैं लीड और सेकेंड लीड। इंडियन एक्सप्रेस में ईवीएम लीड है और आरक्षण के लिए धर्म परिवर्तन सेकेंड लीड। नवोदय टाइम्स में ईवीएम की खबर, चुनावों में बैलट पेपर की वापसी नहीं शीर्षक से है जिसकी पठनीयता बहुत कम है। हालांकि, उपशीर्षक में बताया गया है कि सुप्रीम अदालत ने कहा है, आप हारते हैं तो ईवीएम से छेड़छाड़ होती है, जीतते हैं तो नहीं। मुझे लगता है कि यह टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट के स्तर की नहीं है। सुप्रीम कोर्ट को सिर्फ आदेश देना होता है, कारण बताने की जरूरत नहीं है और सफाई देने की तो बिल्कुल नहीं। न्याय मांगने आने वाले हड़काना तो गलत भी है। चुनाव जीतने पर चुप रह जाना बहुत ही सामान्य और आम मानवीय व्यवहार है। अदालत ने कहा है और जब वह खबर के रूप में छपा है तो उस तथ्य की चर्चा तथ्य के रूप में होगी और सुप्रीम कोर्ट की अवमानना का मामला आम आदमी को इस तथ्य पर चर्चा से भी रोकेगा। कम से कम डरायेगा और इसपर स्वतंत्र चर्चा नहीं हो पायेगी। इसलिए मुझे लगता है कि सुप्रीम कोर्ट को किसी भी मामले में तथ्यों को इस ढंग से नहीं रखना चाहिये वह उसका फैसला लगे। संभव है, ऐसे नहीं भी कहा हो पर खबर जैसे छपी है उसमें यही लग रहा है। उदाहरण के लिए अमर उजाला का शीर्षक है, चुनाव हारें तो ईवीएम में छेड़छाड़, जीतें तो सब ठीक।
अमर उजाला का उपशीर्षक है, सुप्रीम कोर्ट ने मतपत्र से चुनाव कराने की याचिका खारिज की। इंडियन एक्सप्रेस का उपशीर्षक हिन्दी में कुछ इस तरह होगा, (सुप्रीम कोर्ट ने) पूछा कि भारत को बाकी दुनिया से अलग क्यों नहीं होना चाहिये। यह बात सर्वोच्च अदालत ने तब कही जब याचिकाकर्ता ने बताया कि ज्यादातर लोकतंत्र में कागज का उपयोग होता है। मुझे लगता है कि अगर यह बात स्वीकार की जा रही है कि ज्यादातर लोकतंत्र में मतपत्रों से चुनाव होता है तो भारत को अलग क्यों होना चाहिये? अलग होने की कोशिश या सिद्धांत में कोई बुराई नहीं है लेकिन ईवीएम से संबंधित शिकायतों को अनसुना करके भारत को अलग क्यों होना चाहिये? सत्ता पर कब्जा बनाये रखने की राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की कोशिशों की कामयाबी के लिए या भारत को हिन्दू राष्ट्र घोषित करने की भाजपाइयों की इच्छा की पूर्ति के लिए? तथ्य यह है कि ईवीएम कांग्रेस के जमाने में आया था और तकनीकी रूप से इसे किसी भी उम्मीदवार के फायदे के लिए सेट किया जा सकता है लेकिन अधिकारी ऐसा नहीं करने देंगे और करेंगे तो उनके खिलाफ कार्रवाई के प्रावधान हैं इसलिए ऐसा नहीं होगा – का आश्वासन है। इसके बावजूद भाजपा सत्ता में आने से पहले ईवीएम का विरोध करती थी अब नहीं करती है।
दूसरी ओर, आज ही इंडियन एक्सप्रेस में छपी खबर का उप शीर्षक है, (कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन) खरगे ने बैलट पेपर की मांग की, शरद पवार ने भी इसका समर्थन किया। आप जानते हैं कि खरगे का गठबंधन अगर महाराष्ट्र में सरकार बनाने में कामयाब नहीं हुआ तो झारखंड में अपना कब्जा बरकार रखा है और इस लिहाज से उन्हें ईवीएम के खिलाफ नहीं बोलना चाहिये पर वे बोल रहे हैं और यह इंडियन एक्सप्रेस में हाईलाइट किया गया है पर जहां नहीं किया गया है वहां पाठकों को गलत संदेश जायेगा। अमर उजाला ने तो यह भी लिखा है कि (चंद्रबाबू) नायडू हारे तब ईवीएम में छेड़छाड़ का आरोप लगाया। खबर के अनुसार, आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू और पूर्व

मुख्यमंत्री जगन रेड्डी अलग अलग दावा कर चुके हैं कि ईवीएम से छेड़छाड़ संभव है। खबर के अनुसार सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा कि नायडू हारे तो उन्होंने कहा कि ईवीएम से छेड़छाड़ हुई और इस बार जब जगनमोहन हारे तब उन्होंने ऐसा आरोप लगाया। यहां यह उल्लेखनीय है कि तकनीक केउपयोग और समय के साथ चलने का काम कांग्रेस सरकार ने भाजपा के मुकाबले बहुत ज्यादा किया है। ईवीएम कांग्रेस राज में आया था और तब भाजपा ने इसका विरोध किया था।
भाजपा के राज्यसभा सदस्य रहे सुब्रमण्यम स्वामी की एक किताब है, “इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन्स : अनकांस्टीट्यूशनल एंड टैम्परेबल” (असंवैधानिक और छेड़छाड़ योग्य)। ईवीएम पर एक और पुस्तक भाजपा नेता, जीवीएल नरसिम्ह राव की है, “डेमोक्रेसी ऐट रिस्क! कैन वी ट्रस्ट आवर इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन्स?” (लोकतंत्र खतरे में! क्या हम अपनी इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन पर भरोसा कर सकते हैं?)। ऐसे में भाजपा के बारे में कहा जा सकता है कि वह सत्ता में नहीं थी तो ईवीएम का विरोध किया था और अब सत्ता में है तो उसका बचाव कर रही है। यही हाल चंद्रबाबू नायडू का है। जीवीएल नरसिम्हन की किताब में उनका संदेश है। और इससे साफ है कि वे ईवीएम के खिलाफ हैं और भाजपा के साथ हैं। भले ही यह साथ यूं ही नहीं हो और उनके खिलाफ ईडी का मामला है और शायद इसीलिए वे केंद्र की भाजपा सरकार का समर्थन करने के लिए मजबूर हैं। पर वह सब अलग मामला है और ऐसी राजनीति में सुप्रीम कोर्ट का अपना महत्व है और जजों की टिप्पणी आरएसएस के प्रचारक जैसी या भाजपा के संरक्षक जैसी नहीं होनी चाहिये। ऐसी टिप्पणी चुनाव आयोग की भी नहीं होनी चाहिये लेकिन ईवीएम के बचाव में राजीव कुमार ने अपना स्तर तो गिराया ही है चुनाव आयोग की पवित्रता भी खत्म कर दी है।
तकनीकी तौर पर ईवीएम को आवश्यकतानुसार नतीजा देने के लिए सेट किया जा सकता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि किसी मतदान केंद्र में शत प्रतिशत वोट एक्स को पड़ेंगे तो भी वाई को जीता घोषित कर दिया जायेगा। मोटे तौर पर इसके नतीजे सही न हों यह संभव है। और सिर्फ इतने के लिए इसका उपयोग नहीं किया जाना चाहिये। गड़बड़ी की संभावनाओं के कारण ही वीवीपैट लगाने का आदेश सुप्रीम कोर्ट ने दिया और यह दिखाया जा चुका है कि पर्ची तो ठीक नजर आये पर वोट किसी और को जाये। ऐसे में यह सर्वविदित है ईवीएम सेट करने वाले करोड़ों मांगते हैं। यह जीवीएल नरसिम्हन की किताब में भी है। सरकार का बचाव शुरू से यही है कि वह निगरानी और सुरक्षा में रहता है। इसलिये छेड़छाड़ संभव नहीं है। मेरे ख्याल से इसे साजिशन हैक करना कहा जाता है जो ईवीएम के मामले में वाकई मुश्किल है। हालांकि, 25 रुपये के खुदरा मूल्य वाला चिप लगाकर वह भी आसान हो जायेगा पर और अलग मुद्दा है। ईवीएम को 2011 में ही सेट करके दिखा दिया गया – वह वीडियो आज भी इंटरनेट पर है। उस समय कांग्रेस की सरकार थी और ईवीएम हैक करके दिखाने वाले पर चोरी का इल्जाम लगाकर कांग्रेस सरकार ने जेल भेज दिया था। चंद्रबाबू नायडू ने संबंधित इंजीनियर के साथ चुनाव आयोग से मिलना चाहा तो उन्हें ईवीएम चोर कहकर मिलने से इनकार कर दिया गया था। भाजपा राज में ईवीएम को हैक करके दिखाने की चुनौती जरूर दी गई पर ईवीएम को छूना, खोलना मना था।
इसलिए अब हैक करने का जो वीडियो है उनके ईवीएम को केंचुआ अपना नहीं मानता है पर बचाव में तर्क यही है कि वे सुरक्षा में रहते हैं। खबरों के अनुसार, इस बार भी हैकरों ने पेशकश तो की ही थी। इन सबसे ईवीएम की साख खराब होती है। उसे ठीक रखने का काम केंचुआ और सरकार का ही है, नागरिकों का नहीं। फिर भी पेशकश से लगता है कि हैक करने वाले सुरक्षा में लगाये गये अधिकारियों से मिलीभगत करके ही ऐसा करते होंगे। यह भ्रष्टाचार का भी मामला है। अगर ऐसा कोई भ्रष्टाचार होता है या हो सकता है तो उसे रोकना भी सरकार और केंचुआ का काम है। कायदे से सरकार को इसकी (गुप्त) जांच करानी चाहिये और जनहित में उसका नतीजा सार्वजनिक करना चाहिये। इससे ऐसा होता होगा तो उसे रोकने में मदद मिलेगी हालांकि नहीं हो पाने का मतलब यह नहीं होगा कि हैक नहीं हो सकता है। उसके लिए खुली चुनौती देनी होगी जो नहीं दी गई है। बातें बड़ी-बड़ी होती रही हैं।

जीवीएल नरसिम्हन की किताब में चंद्रबाबू नायडू का संदेश
इसके बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने कहा है तो उसे प्रमुखता मिलनी ही थी। हिन्दुस्तान टाइम्स में यह खबर सेकेंड लीड है। ऊपर मैंने लिखा कि ईवीएम का विरोध करने वाले चंद्रबाबू नायडू भाजपा का सरकार का समर्थन कर रहे हैं और भले ही पहले भी भाजपा के साथ थे इसलिए अभी भी साथ हों लेकिन उनके खिलाफ ईडी का मामला भी तो है और इसलिए चुनाव जीतने पर उसका विरोध नहीं करने का मतलब यह भी है कि वे निजी कारणों से या ईडी के कारणों से भाजपा का विरोध नहीं कर सकते हैं और करना होगा तो वे ईवीएम या भाजपा का विरोध क्यों करें, सरकार से समर्थन भर वापस लेना है। ऐसे में ईवीएम का विरोध चुनाव हारने वाले ही नहीं कर रहे हैं दूसरे भी कर रहे हैं और जो नहीं कर रहे हैं वह इसलिए कि सत्ता में हैं। ऐसी स्थिति में कांग्रेस अगर ईवीएम का विरोध कर रही है तो उसकी तारीफ करनी पड़ेगी कि एक राजनीतिक दल के रूप में वह भाजपा की तरह बेशर्म नहीं है और अपने ही लाये ईवीएम का विरोध करने का दम रखती है।
यही नहीं, समाजवादी पार्टी के नेता और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने लोकसभा चुनाव के संदर्भ में ही कहा था, “मैं कल भी ईवीएम पर भरोसा नहीं करता था, आज भी नहीं करता। अगर मैं उत्तर प्रदेश में सभी 80 सीटें जीत भी जाऊं, तब भी मैं ईवीएम पर भरोसा नहीं करूंगा। यह हमेशा एक मुद्दा रहेगा।” उन्होंने कहा, “हम (श्री यादव की समाजवादी पार्टी) इस पर अड़े रहेंगे… अगर हम ईवीएम से जीत भी गए तो भी हम इसे हटा देंगे।” ऐसे में सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने जो कहा है उसे महत्व देकर और उसका प्रचार करके मीडिया विपक्षी दलों की साख तो खराब कर ही रहा है व्यवस्था की संदिग्ध निष्पक्षता को और संदिग्ध बनाने का काम किया है। टाइम्स ऑफ इंडिया ने ईवीएम पर सुप्रीम कोर्ट की खबर को तो डबल कॉलम की सामान्य खबर के रूप में छापा है पर प्रधानमंत्री के स्वप्रचार को लीड बनाकर उनकी सेवा की है। शीर्षक है, प्रधानमंत्री ने कहा (जो अब सेवक होना भूल गये हैं, उसकी बात भी नहीं करते) लोकतंत्र के दूसरे स्तंभों के क्षेत्र में कभी अतिक्रमण नहीं किया। अगर प्रधानमंत्री का यह दावा इतना ही मजबूत है तो मीडिया को चाहिये था कि इसपर चर्चा करता और उनके दावे को मजबूती देने के साथ प्रचारित करता। टेलीविजन पर चर्चा के लिए यह अच्छा मुद्दा है। मैं टेलीविजन नहीं देखता इसलिए मुझे पता लगने में देर लगेगी आपको शाम में ही पता चल जायेगा कि चर्चा हुई तो क्या और नहीं हुई तो क्यों?
दि एशियन एज में आज दोनों ही खबरें नहीं हैं। लीड संविधान दिवस पर राष्ट्रपति ने जो कहा वह है और अब संविधान तथा संविधान दिवस को क्यों महत्व दिया जा रहा है समझना मुश्किल नहीं है। इस मौके पर प्रधानमंत्री ने जो कहा उसकी सत्यता का पता इस बात से भी चलता है कि उनका बनाया चुनाव आयोग कितना स्वतंत्र है या कितनी स्वतंत्रता व निष्पक्षता से काम कर रहा है। द हिन्दू में भी संविधान दिवस पर राष्ट्रपति का भाषण लीड है। एक हैं तो सेफ हैं के प्रचार के बाद द हिन्दू का शीर्षक है, संविधान की भावना की रक्षा के लिए मिलकर काम करें। अब कांग्रेस और भाजपा तो मिलकर काम करने से रहे और अगर संघ परिवार के एक रहने से संविधान के सेफ रहने की गारंटी हो तो अच्छा चुनाव प्रचार है। गनीमत है कि संविधान दिवस चुनाव प्रचार के दिनों में नहीं पड़ा है। ईवीएम की खबर अंदर होने की सूचना यहां पहले पन्ने पर है। शीर्षक है, जब आप हारते हैं तो ईवीएम से छेड़छाड़ होती है नहीं हारे तो ठीक होता है। इस बिना पर सुप्रीम कोर्ट ने मतपत्रों से चुनाव कराने की मांग खारिज कर दी। मतपेटियों से चुनाव कराने के लिए भाजपा नेताओं का बयान रहता है कि तब मतपेटियां लूट ली जाती थीं। पर अब ईवीएम वोट के अंडे देता है। हर चुनाव में वह हजारों में होता है। इन्ही से भाजपा जीतती है लेकिन इसकी चर्चा नहीं होती है। मुझे लगता है कि यह सामान्य मानवीय गुण है कि जीतना वाला विरोध न करे। हालांकि जीतने का मतलब यह नहीं है कि छेड़छाड़ नहीं हुई या ईवीएम ने वोटों का अंडा नहीं दिया। रोडरोलर और बुलडोजर समर्थन होगा तो वोट बढ़ने के बावजूद भाजपा हार सकती है और संभव है कि जीतने वाले को तब शिकायत नहीं हो। हरियाणा चुनाव में आरोप लगा था कि ईवीएम बदल दिये गये और यह बिल्कुल अंतिम समय में भी किया जा सकता है। तभी उसकी बैट्री पूरी रहेगी और ऐसी मशीन में भाजपा को वोट दूसरी मशीनों के मुकाबले ज्यादा होगी। चुनाव आयोग ने इस खास शिकायत को कई जवाब नहीं दिया है।
द टेलीग्राफ में दोनों खबरें तो नहीं ही हैं संविधान दिवस पर राष्ट्रपति का बयान भी नहीं है। अनीता जोशुआ की बाईलाइन वाले खबर के अनुसार इस मौके पर सरकार और विपक्ष एक एक मंच पर जुटे लेकिन भाजपा ने बाद में राहुल गांधी को मुद्दा बना दिया और आरोप लगाया कि राहुल गांधी राष्ट्रपति का अपमान करते हैं। कांग्रेस ने भाजपा पर आरोप लगाया कि वह संविधान का मौखिक सम्मान कर रही है और इसके खोखला बना रही है। मत पत्रों से चुनाव कराने की मांग करने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में जो हुआ उसे देलीग्राफ ने अंदर छापने की सूचना पहले पन्ने पर दी है। इसका शीर्षक है, बैलट पत्र से चुनाव कराने पर एससी। 10 लाइन की खबर में वह भी है जिसे लोगों ने लीड और शीर्षक बनाया है।


