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आज के अखबार : अजीत पवार की ‘जब्त’ संपत्ति के ‘मुक्त’ होने की ‘खुशी’ और राजनीति दिख नहीं रही है!  

संजय कुमार सिंह

अजीत पवार की मदद से महाराष्ट्र में देवेन्द्र फडणविस की सरकार बनी और आयकर विभाग ने 2021 में जब्त की गई उनकी करीब 1000 करोड़ रुपये की संपत्ति को तीन साल बाद मुक्त कर दिया है। यह संयोग हो या प्रयोग, भाजपा की राजनीति का बेशर्म चेहरा है और बेशर्म अखबारों ने इसे छिपाने-ढंकने की पूरी कोशिश की है। आज यह खबर कहीं प्रमुखता से छपी नहीं दिखी है। इस खबर में जो राज या राजनीति (हो सकती) है उसका इशारा तो पहले पन्ने पर नहीं ही है। आज यह खबर अंग्रेजी के मेरे अखबारों में पहले पन्ने से पूरी तरह गायब है। हिन्दी के दो अखबारों में सिर्फ एक, अमर उजाला में पहले पन्ने पर है। आज की दूसरी बड़ी खबर, ‘महाविकास अघाड़ी ने शपथ ग्रहण का बहिष्कार किया’ है। यह खबर भी आज पहले पन्ने पर वैसे नहीं है जैसे होनी चाहिये थी। लेकिन समाजवादी पार्टी एमवीए से अलग हो गई या हो सकती है या बाबरी मस्जिद विवाद पर महाराष्ट्र विकास अघाड़ी में फूट है यह खबर लगभग सभी अखबारों में प्रमुखता से है। द हिन्दू में जगह नहीं है फिर भी विज्ञापन के ऊपर थोड़ी सी जगह में तीन कॉलम में। इंडियन एक्सप्रेस में यह खबर दो कॉलम में है। शीर्षक हिन्दी में कुछ इस तरह होगा, बाबरी मस्जिद गिराने पर उद्धव के सहायक की पोस्ट को लेकर एमवीए की दरार बढ़ी। अमर उजाला में भी सपा की खबर अजीत पवार क खबर से बड़ी है।

जनसत्ता की आज की सेकेंड लीड शपथ ग्रहण के बहिष्कार की खबर है और फ्लैग शीर्षक में इसका कारण ईवीएम के दुरुपयोग का आरोप है। आप समझ सकते हैं कि महाराष्ट्र में भाजपा की राजनीति यह रही कि अजीत पवार पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया। कितना सही, कितना गलत अथवा सही या गलत, मुद्दा ही नहीं है। इस बिना पर अजीत पवार को अपने साथ फोड़ लिया। पैसे (वाले) हैं तो काम आना ही था। पकड़ मजबूत करने के लिए संपत्ति जब्त कर ली और जब काम हो गया तो संपत्ति मुक्त हो गई। अजीत पवार ने मजबूरी में साथ दिया या स्वेच्छा से – यह सवाल ही नहीं है क्योंकि विकल्प कहां था। साथ नहीं देते तो 1000 करोड़ छोड़ देते? छोड़े भी देते तो भ्रष्ट होने का दाग लगा रहता पक्का होता। भाजपा का समर्थन कर रहे नेताओं और दलों में कितने इस मजबूरी में उसके साथ हैं इसका अनुमान लगाया जा सकता है। दूसरी ओर, अजीत पवार पर अब ना दाग है ना माल गया।

यह भाजपा की राजनीति है। ‘जनता’ समझे या नहीं – हर कोई समझ रहा है भले अखबार नहीं बताते हैं। दूसरी ओर, अगर जनता समझती भी हो तो यही कर सकती है कि वोट न दे। पर उसके लिए ईवीएम है। आप समझते हैं भाजपा ऐसे जीतती है, वैसे जीतती है पर ईवीएम से जीत रही हो तो कुछ नहीं हो रहा है और यह वैसे ही है कि अजीत पवार जैसों को ब्लैकमेल करके जीत रही है। ठीक है कि अजीत पवार को एतराज नहीं हो तो मामला नहीं बनता है लेकिन खबर तो है ही और मीडिया क्यों साथ दे रहा है? बात इतनी ही नहीं है। जो पत्रकार निष्पक्ष है या जिनपर निष्पक्ष दिखने का दबाव है वे कहेंगे की भाजपा अपनी रणनीति से जीतती है। विपक्ष ये नहीं करता, वो नहीं करता। विपक्ष जो नहीं करता है वह दिखाई देता है पर प्रचार यह किया जाता है कि फलां जी भाजपा के चाणक्य हैं उसके साथ आरएसएस का संगठन है उनसे बेहतर चुनावी बंदोबस्त तो कोई कर ही नहीं सकता है जो बंदोबस्त होता है वह ईवीएम हो, ब्लैकमेल हो, वसूली हो तो बताया ही नहीं जाता है। 

यही नहीं, राहुल गांधी पर आरोप लगाने के फेर में भाजपा नेताओं ने अमेरिका को भी लपेट लिया और अमेरिका ने इसे निराशाजनक कहा है। अब यह खबर आज संभवतः मजबूरी में ही, पहले पन्ने पर है। हालांकि नहीं छपती तो अमेरिका क्या कर लेता है। टाइम्स ऑफ इंडिया में इस खबर का शीर्षक ही है, अमेरिका ने भाजपा के आरोप का जवाब दिया कि वह भारत के खिलाफ काम कर रहा है। हिन्दुस्तान टाइम्स में विपक्ष के बहिष्कार की खबर है लेकिन ईवीएम का मामला शीर्षक में नहीं है। अंग्रेजी अखबारों में यह बात शीर्षक में दि एशियन एज ने लिखी है। निष्पक्ष पत्रकार कहते हैं कि कांग्रेस को इसके खिलाफ सड़क पर उतरना चाहिये। मुझे लगता है कि चुनाव लड़ने वाला चुनाव लड़ेगा या चुनाव आयोग से सेटिंग करेगा और यह वैसे ही है कि अदालत से  न्याय मांगने वाला न्याय मांगेगा या न्याय करना सिखायेगा? भाजपा शासन में बहुत सी समझ ही नहीं सिद्धांत और परिभाषाएं भी बदल दी गई हैं और इसकी शुरुआत प्रधानमंत्री की विदेश यात्रा में पत्रकारों को साथ नहीं ले जाने से हुई थी। समर्थकों ने इसका बचाव किया था अब उसका सच पता चला तो वह मुद्दा ही नहीं है।

नवोदय टाइम्स में पहले पन्ने पर एक खबर है – प्रधानमंत्री ने कहा कि 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने के लिए काम करें। ठीक है कि प्रधानमंत्री ने कहा है तो पहले पन्ने पर छप सकती है। लेकिन ये वही प्रधानमंत्री हैं जो विदेश में रखा काला धन वापस लाने वाले थे शायद 100 दिन में, सपनों का भारत बनाने वाले थे 50 दिन में। वह सब नहीं हुआ। अब वे इसका नाम भी नहीं लेते हैं पर क्या खबर बनाने वालों के दिमाग में यह सवाल नहीं आता है कि सपनों के भारत में क्या होना था? और जब वह 50 दिन में हो सकता था तो अब 2047 की बात क्यों होने लगी? जो कार्यशैली और प्रचार है उससे लगता है कि ईवीएम से चुनाव जीतते रहेंगे, करना कुछ है नहीं और कर कुछ सकते नहीं हैंय़ हिन्दुत्व की भलाई की उम्मीद में जो दंगे करवा रहे हैं उनका साथ मिलता रहा तो 2047 तक आम लोगों को उलझाये रखने का इंतजाम कर लिया जाये। भाजपा की यह राजनीति हो सकती है। जनता को इसे पसंद और ना पसंद करना था। इस आधार पर आगे उसका सत्ता में रहना तय होना था लेकिन ईवीएम पर आरोपों के बाद और अखबारों के इस तरह प्रचारक बनने के बाद सब उलट-पलट हो गया है।  

स्थिति यह है कि जो कांग्रेस को भ्रष्ट कहकर सत्ता में आया था एक कांग्रेसी को भ्रष्ट साबित नहीं कर पाया है, जिसके खिलाफ मुकदमे चलाये हैं वो सब विरोधी और विपक्षी हैं, कोई साबित होना तो छोड़िये कितना दमदार था वह भी पता चल गया है। पार्टी सरकार में अपने दम पर नहीं भ्रष्ट और भ्रष्टाचार के आरोपियों के दम पर है और सत्ता में आने से पहले अगर भ्रष्टाचार के साथ महंगाई मुद्दा थी तो दोनों अब आसमान छू रहे हैं। किसी को मतलब नहीं है। जहां तक हिन्दुओं की भलाई की बात है पहले संकट जिन कारणों से हो अब पुलिस से सुरक्षा नहीं है। दिल्ली में कानून व्यवस्था क स्थिति पर अरविन्द केजरीवाल का बड़ा आरोप है। जवाबी राजनीति में उनके विधायक पर मकोका का मामला बनाया गया है लेकिन आज खबर है कि स्कूटर सवार व्यवसायी को दिन दहाड़े गोली मार दी गई। जाहिर है मामला सिर्फ पैसे वालों का नहीं है।

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