

सौमित्र रॉय –
अलविदा अतुल सुभाष! आप बेशक इस समाज और सड़ चुके सिस्टम से हारे, लेकिन मरने से पहले बहुत कुछ कह गए।
सुभाष की आत्महत्या दिखाती है कि सिक्के के सिर्फ एक पहलू से रिश्तों को तौलने वालों के सिक्के का खोटापन भी जांचना चाहिए।
साथ ही भ्रष्ट न्याय व्यवस्था, जिसने सुभाष को जान देने पर मजबूर किया।
प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों पर ये एक और निर्मम हत्या है। अलबत्ता, हमारा नंगा क़बीलाई समाज इसे खुदकुशी ही कहेगा।


विवेक कुमार-
नाम रीता कौशिक. काम- जौनपुर में प्रिंसिपल फैमिली कोर्ट जज. अतुल सुभाष नाम के व्यक्ति ने अपनी पत्नी और आपके ऊपर शोषण का और पैसे मांगने का दबाव वाला आरोप लगाने के बाद आत्महत्या कर ली, और अब सोशल मीडिया में लोग आपके ऊपर तरह तरह के आरोप लगा रहे हैं.
जब नौकरी को संविधान की सुरक्षा मिली हो तब गांधी जी और अम्बेडकर जी की फोटो के नीचे बैठ कर दस पांच लाख कमाने से देश की GDP थोड़ी गिर जाएगी. लोगों को न्याय मिले चाहे पंखे से लटक कर मर जाएं, इन सब से साहब को कोई फर्क नहीं पड़ता. आज रानी साहिबा ने अपने कारनामों से पूरे देश को विचलित कर दिया और खुद अपने कोर्ट रूम में बैठकर अदरक वाली चाय पी रही होंगी.

शुभम शुक्ला-
“अरे तुम अभी तक सुसाइड नहीं किए? मुझे लगा आज तुम्हारे सुसाइड की खबर आएगी। उस दिन जज को सुसाइड करोगे बोले थे तुम।”
“तुम्हारे मरने के बाद तुम्हारा बाप देगा पैसा! पति के मरने के बाद सब वाइफ का होता है। तेरे मरने के बाद तेरे माँ-बाप भी मरेंगे जल्दी। पूरे जिंदगी तेरा खानदान कोर्ट के चक्कर काटेगा!”
ये सब शब्द हैं निशा सिंहानिया के। इस महिला ने एक हंसते खेलते परिवार को उजाड़ दिया। अतुल सभाष को न्याय मिलना ही चाहिए।


जैकी यादव-
अतुल सुभाष की पत्नी को तुरंत ही गिरफ़्तार किया जाए जिससे कि यह बाहर रहकर सबूतों से छेड़छाड़ न कर सके और इस केस को CBI को सौंप दिया जाए जिससे कि इसमें जज और आरोपी महिला समेत इसके पूरे परिवार की करतूतों का भंडाफोड़ हो। इस केस में CBI जाँच बहुत ज़रूरी है।
राजेश साहू-
अतुल सुभाष जब तक जिंदा रहे किसी ने भी नहीं सुना। किसी ने नहीं समझा। एक के बाद एक कुल 9 केस दर्ज हो गए। पुलिस, कोर्ट, कचहरी हर जगह गए। निराशा हाथ लगी। मां बाप तक को बुरा भला कहा गया। लाखों रुपए कमाए, उसी पैसे को पत्नी को दिया। उसी पैसे से पत्नी अतुल को परेशान करती रही।
सबकुछ सही कर लेने के लिए आत्महत्या विकल्प नहीं है। लेकिन जीते जी अतुल को किसने सुना? कहां उन्हें राहत मिली? किससे कहते वो अपने मन के भार को? बताइए? नहीं है जवाब न? कई बार आदमी मारकर अपनी बात कहता है। अतुल ने इस सिस्टम तक अपनी बात मौत चुनकर पहुंचाई है। अब ज़रूरी है कि सिस्टम उनकी मौत को समझे। उन्हें न्याय दिलवाया। ताकि अतुल जैसे नाउम्मीदी के साए में घुट घुटकर जी रहे लोगों को उम्मीद की एक किरण नज़र आए।
प्रकरण से संबंधित खबर…
कल जब बेंगलुरु पुलिस अतुल के घर पहुंची तो शरीर फंदे से लटका मिला और दीवारों पर लिखा था- JUSTICE IS DUE!


