
संजय कुमार सिंह
आज के मेरे अखबारों में हिन्दुस्तान टाइम्स में पहले पन्ने पर सिंगल कॉलम की एक छोटी सी खबर छपी है, बीजू जनता दल ने चुनाव आयोग से शिकायत की है कि 2024 के लोकसभा और विधानसभा उपचुनावों के नतीजों से पता चलता है कि मतदान की शैली में विसंगतियां हैं। ऐसी शिकायतें और भी राज्यों से आई हैं और यह शिकायत पहले की शिकायतों की पुष्टि करती है। लेकिन पहले की खबरों की तरह इसे भी अखबारों ने महत्व नहीं दिया है और हिन्दुस्तान टाइम्स में ही मुझे यह खबर सिंगल कॉलम में दिखी। सरसरी तौर पर मुझे यह खबर किसी और अखबार में पहले पन्ने पर नहीं दिखी। सिंगल कॉलम में भी नहीं। कहने की जरूरत नहीं है कि जब ईवीएम के खिलाफ और चुनाव आयोग पर पक्षपात के आरोप हैं तो इस शिकायत का मतलब है। खासकर तब जब चुनाव आयोग के बचाव में सरकार ने कानून बनाये हैं और ईवीएम का विरोध करने वाली पार्टी जबसे सत्ता में आई है, हर बार चुनाव जीत जा रही है और शिकायतों का अंबार लग रहा है। कइयों का कोई जवाब नहीं है जो है वह संतोषजनक नहीं है। फिर भी कोई सुनवाई नहीं है, सब चल रहा है। दूसरी ओर, उमर अब्दुल्ला ने ईवीएम पर राहुल गांधी से जो कहा उसे जितनी प्रमुखती मिली उसे देखिये। अगले दिन लगभग वैसी ही बात अभिषेक बनर्जी ने कही और इस तरह माहौल बनाया गया कि ईवीएम मुद्दा ही नहीं है। फिर सरकार ने कानून बदल दिया। उसे भी अखबारों में महत्व नहीं मिला। और अब यह शिकायत।
खबर के अनुसार बीजू जनता दल ने दावा किया है कि मतदान के दौरान सरकारी अधिकारियों द्वारा भरे गये फॉर्म 17सी और फॉर्म 20 में गंभीर विसंगतियां पाई गई थीं। यही नहीं, विधानसभा क्षेत्रों और साथ के 21 संसदीय क्षेत्रों में पड़े मतों की संख्या में भी अनियमितताएं पाई गईं। मुझे लगता है कि हिन्दुस्तान टाइम्स की खबर का जो हिस्सा पहले पन्ने पर है वही पर्याप्त गंभीर है और ऐसा नहीं है कि दूसरे अखबारों के लिए यह पहले पन्ने लायक नहीं थी। जो ऐसी खबरें छापते रहते हैं उनकी बात तो समझ में आती है लेकिन जो सरकार के डर से सरकार विरोधी खबरें नहीं छापतें हैं उन्हें ऐसी खबरों को महत्व देने या पहले पन्ने पर रखने में क्यों डर लगता है जो दूसरे अखबारों में या अंदर के पन्नों पर छपनी ही हैं। यही हेडलाइन मैनेजमेंट है और अखबारों के जरिये यह दिखाने की कोशिश चल रही है कि सब गुडी-गुडी है। चुनाव में बेईमानी अनैतिक तो है ही भारतीय कानून के अनुसार गंभीर अपराध भी। लाभार्थी का कोई विरोध नहीं करना अपराध में शामिल होना है। फिर भी सब चल रहा है तो हिन्दुत्व की राजनीति के लिए। अगर इस राजनीति का असर मीडिया के लोगों में इतना ज्यादा है तो आम, कम पढ़े लिखे लोगों में कितना होगा और इस तरह की खबरों को महत्व नहीं देकर मीडिया ऐसी राजनीति को बढ़ावा दे रहा है जो किसी के हित में नहीं है।
आम तौर पर सरकार की कमजोर और खराब स्थिति का वर्णन अखबारों में नहीं किया जाता है। खबरें नहीं छपतीं इसलिए सरकार से सवाल भी नहीं किया जाता है और सरकार जो मर्जी कर रही है। बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री को जरूरत के समय शरण देना तो ठीक हो सकता है पर उन्हें इतने समय तक रखे रहना, आगे के लिए कोई निर्णय नहीं लेना और इसकी सूचना नहीं देना सरकार की कमजोर स्थिति या मनमानी का परिचायक है। खासकर तब जब आरोप लगाया जाता है कि बांग्लादेश से घुसपैठ हो रही है। ऐसे में आज शेख हसीना को वापस भेजने की बांग्लादेश की मांग तो सभी अखबारों में है पर भारत सरकार क्या कर रही है, क्या कहा या क्या करेगी यह कायदे से नहीं है। इस खबर के साथ यह लिखना कि भारत ने बांग्लादेश की मांग के मद्देनजर अभी तक कोई जवाब नहीं दिया है या उसकी प्रतिक्रिया मालूम नहीं है से लगता कि भारत सरकार इस मामले में कमजोर स्थिति में है – इसलिए वह भी नहीं लिखा गया है और बांगलादेश ने मांग की तो आज खबर है वरना अखबार यह नहीं बता रहे थे कि सरकार ने अपनी ओर से इस मामले में क्या निर्णय किया है या कोई निर्णय नहीं किया है।
दि एशियन एज ने तो इस खबर को ना लीड बनाया है ना सेकेंड लीड। पहले पन्ने पर तीन कॉलम की इस खबर का फ्लैग शीर्षक है, भारत ने औपचारिक राजनयिक नोट प्राप्त होने की पुष्टि की। टाइम्स ऑफ इंडिया ने लिखा है कि दिल्ली इस आग्रह पर शीघ्र कार्रवाई करेगा ऐसी कोई संभावना नहीं है। द टेलीग्राफ का फ्लैग शीर्षक है, वैश्विक छवि और युनूस के होने का लाभ दांव पर है। अकेले नवोदय टाइम्स ने लिखा है, भारत का टिप्पणी से इनकार। वैसे तो यह भारत को मजबूत स्थिति में बताता है लेकिन लोग समझते हैं। फिर भी, अमर उजाला ने सिर्फ बांग्लादेश से आई सूचना दी है। इसके साथ छपी खबर से बताया है कि हसीना व कई पूर्व मंत्रियों, सलाहकारों के खिलाफ जारी हो चुका है गिरफ्तारी वारंट। एक और खबर का शीर्षक है, बांग्लादेश की मांग पर तत्काल जवाब नहीं देगा भारत। दि इंडियन एक्सप्रेस में शेख हसीना की खबर छह कॉलम में है। इसके साथ बताया गया है कि विदेश मंत्रालय ने ढाका से डिप्लोमैटिक नोट प्राप्त होने की पुष्टि की (और कहा) इस समय कोई टिप्पणी नहीं।
जहां तक चुनाव आयोग से बीजद की शिकायत का सवाल है, द प्रिंट डॉट इन में छपी भाषा की खबर के अनुसार, बीजद नेता सस्मित पात्रा से पूछा गया कि क्या बीजद उन अन्य विपक्षी दलों में शामिल होगा जो इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) को लेकर चिंता व्यक्त कर रहे हैं? इसपर उन्होंने कहा कि उनकी शिकायत का उद्देश्य राजनीतिक लाभ प्राप्त करना नहीं है। पात्रा ने कहा, ‘यह शिकायत दलगत राजनीति और विपक्ष बनाम सत्तारूढ़ पार्टी से ऊपर है…।’ बीजद ने निर्वाचन आयोग को दिए ज्ञापन में दावा किया कि पीठासीन अधिकारियों द्वारा भरे गए फॉर्म 17-सी और निर्वाचन अधिकारियों द्वारा भरे गए फॉर्म-20 के बीच गंभीर विसंगतियां पाई गई हैं। पार्टी ने यह भी दावा किया कि विधानसभा क्षेत्रों और 21 संसदीय क्षेत्रों में डाले गए मतों की संख्या में विसंगतियां पाई गईं।
पार्टी ने कहा कि ढेंकानाल में 4,056 मतों से लेकर कंधमाल में 3,521 मतों और बलांगीर में 2701 मतों तक का अंतर था। बीजद ने दावा किया, ‘ओडिशा चुनाव के इतिहास में और शायद देश में भी यह पहली बार हुआ है कि मतदान के दिन मतदान समाप्ति के समय बताए गए मतदान प्रतिशत और दो दिन बाद निर्वाचन आयोग द्वारा मतदान समाप्ति के बाद बताए गए अंतिम मतदान प्रतिशत में 15 से 30 प्रतिशत तक का अंतर देखा गया।’ पूर्व सांसद और बीजद नेता अमर पटनायक ने संवाददाताओं को बताया कि उनके ज्ञापन का उद्देश्य देश में चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता में सुधार लाना है। पटनायक ने कहा, ‘हम ये असमानताएं निर्वाचन आयोग के सामने लाकर यह बताना चाहते हैं कि इस देश के लोग और हमारे ओडिशा राज्य के नागरिक निर्वाचन आयोग पर स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने पर अत्यधिक विश्वास रखते हैं।’ यह पूछे जाने पर कि क्या बीजद को लगता है कि इन विसंगतियों के लिए ईवीएम जिम्मेदार है पटनायक ने कहा, ‘ये अंतर या तो मशीन की त्रुटि से उत्पन्न हो सकते हैं, या मानवीय त्रुटि से या प्रक्रिया त्रुटि से, या दोनों के संयोजन से, या सभी के संयोजन से।’
बच्चों की शिक्षा में भी प्रयोग
आज के अखबारों में एक और दिलचस्प व महत्वपूर्ण खबर है, सरकार ने कक्षा 5 और 8 में बच्चों को नहीं रोकने की अपनी ‘नई’ नीति को खत्म कर दिया। वैसे तो यह खबर है और खबर की ही तरह छपी है पर सरकार की खोखली नीतियों और कुछ नया या अपने मन की करने की इच्छा और उसके हश्र का जबरदस्त नमूना है। नरेन्द्र मोदी को किसी ने समझा दिया था कि नोटबंदी करने से क्रांति हो जायेगी। उन्होंने बिना सोचे समझे नोटबंदी कर दी। अपनी पीठ खुद थपथपाई और कहा कि इंदिरा गांधी ने हिम्मत नहीं की मैंने कर दिखाया आदि आदि। बाद में दुनिया ने देखा कि इंदिरा गांधी ने क्यों नहीं किया था या यह फैसला किसी तैयारी के बिना, कुछ सोचे-समझे बगैर लिया गया था जिससे देश और देशवासियों को भारी नुकसान हुआ। कई लोगों की जान गई। यही नहीं, उसी समय देखा गया था कि सरकार की कोई तैयारी नहीं थी और रोज नियम बदलना आम था। इसके आठ साल से ज्यादा हो गये और सरकार ने कोई सीख नहीं ली है।
शिक्षा और उसमें भी स्कूली बच्चों की शिक्षा एक गंभीर क्षेत्र है। इस सरकार के पास विशेषज्ञों और जानकारों की कितनी कमी है वह किसी से छिपा नहीं है। नरेन्द्र मोदी हर क्षेत्र के उस्ताद बनना भले चाहें, मानवीय तौर पर संभव नहीं है। इसलिए वे अंग्रेजी के जैक ऑफ ऑल, मास्टर ऑफ नन ही हो सकते हैं और इच्छा उनकी चाहे जो हो, प्रधानमंत्री होने के नाते वे सभी मंत्रियों को ज्ञान भी दे सकते हैं लेकिन उनके मंत्रियों की योग्यता और परिचय किसी से छिपी नहीं है। ऐसे में पांचवीं और आठवीं के बच्चों की शिक्षा के साथ इस प्रयोग का कोई मतलब नहीं था और कर ही दिया था तो उसपर अड़े रहते। पर इस सरकार में ऐसा कुछ नहीं है और कोई पूछने वाला नहीं है कि जब खारिज ही कर देना था तो ऐसी नीति बनाई क्यों थी। शिक्षा के क्षेत्र में इस सरकार ने जो बदलाव (प्रयोग) किये हैं वह किसी से छिपा नहीं है। यूटर्न लेने या नफा – नुसकान पर कोई रिपोर्ट नहीं है और किसी को कोई मतलब नहीं है। स्कूली बच्चे तो आंदोलन करने से रहे मीडिया को कोई मतलब नहीं है। सरकार की मनमानी के प्रति मीडिया का यह रुख निराशाजनक है।
आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग में प्रवेश की सीमा बढ़ी
आज छपी एक खबर है, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग में प्रवेश की सीमा बढ़ी। इससे लगता है कि आर्थिक रूप से कमजोर होने के लिए अब पांच लाख की कमाई जरूरी है और इससे कम कमाई हुई तो आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग में नहीं रखा जायेगा। जाहिर है, इसका मतलब यह नहीं होगा कि वे संपन्न वर्ग में रखे जाएंगे। संभव है ऐसे लोगों को अब मुफ्त राशन वाले वर्ग में रखा जाये पर अच को सच की तरह बताने की बजार आज जो खबर छपी है उससे लगता है कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग की अब तरक्की हो गई है और उसे वर्ग में लोगों की कमाई बढ़ गई है। यह एक साधारण सा मामला है और मामूली सरकार निर्णय। निश्चत रूप से यह पहले पन्ने पर तीन कॉलम की खबर नहीं है। नवोदय टाइम्स में भी यह खबर तीन कॉलम में छपी है। पर हिन्दुस्तान टाइम्स तो छपी ही है और भी जगह छपी है।


