
संजय कुमार सिंह
द हिन्दू ने दिल्ली और महाराष्ट्र में मतदाताओं की संख्या में वृद्धि के आंकड़े दिये हैं जो हाल की वृद्धि को सामान्य बताते हैं पर यह किसी को मालूम क्यों नहीं था? प्रचारकों ने बताया क्यों नहीं? गोदी मीडिया को पता कैसे नहीं चला और उसने बचाव में यह खबर अभी तक क्यों नहीं दी? चुनाव आयोग के अभी तक के रुख, सुप्रीम कोर्ट के ताजा आदेश और द हिन्दू की यह खबर बताती है कि मामला जितना गंभीर लगता है उससे भी गंभीर हो सकता है और इसके भागीदारों की संख्या बहुत ज्यादा हो सकती है।
आज की सबसे बड़ी खबर तो यही है कि प्रधानमंत्री विदेश यात्रा पर हैं और मणिपुर से लेकर दिल्ली तक मुख्यमंत्रियों का चयन नहीं हुआ है। नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की जो कार्यशैली है उसे देखते हुए नहीं लगता है कि प्रधानमंत्री के वापस आने से पहले इसपर कोई फैसला होगा। लेकिन अखबारों में ऐसा कुछ नहीं है। ना ऐसी कोई खबर, ना अटकल। फैसला तो नहीं ही हुआ है। यह भी खबर शर्माते-सकुचाते हुए छापी गई है या पहले पन्ने पर नहीं है। आज के अखबारों की दूसरी बड़ी खबर चुनाव आयोग को सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश है कि ईवीएम डाटा को डिलीट या रीलोड नहीं किया जाये। आप जानते हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने दूसरे और तीसरे स्थान पर रहे उम्मीदवारों की शिकायत पर ईवीएम की जांच कराने का आदेश दिया था। चुनाव आयोग ने इसके लिए चालीस हजार रुपये से ज्यादा की फीस रखी फिर भी जांच नहीं हुई। इसके मुकाबले आरटीआई की फीस सिर्फ दस रुपये पर ध्यान दिया जाना चाहिये। इसके बावजूद, पहले तो समय रहते इसका एसओपी नहीं बना और बाद में उम्मीदवार को पता चला कि पुराना डाटा डिलीट किया चुका था। इस आलोक में नये आदेश की गंभीरता आप समझ सकते हैं। दूसरी तरफ लोकसभा चुनाव के बाद विधानसभा चुनाव में मतदाताओं की संख्या में भारी वृद्धि का आरोप है। ऐसा महाराष्ट्र के बाद दिल्ली में भी हुआ। इससे संबंधित खबरें भी आ रही हैं और इससे मतदान-मतगणना या चुनाव में हेरीफेरी की आशंका मजबूत होती है। इस लिहाज से यह खबर जितनी महत्वपूर्ण है पर उस हिसाब से छपी नहीं है।
दिलचस्प यह भी है कि आज द हिन्दू में छपी एक खबर के अनुसार महाराष्ट्र में लोकसभा चुनाव के बाद विधासनभा चुनाव में मतदाताओं की संख्या में भारी वृद्धि असामान्य नहीं है। द हिन्दू ने चेन्नई डेटलाइन से बाईलाइन वाली अपनी एक एक्सक्लूसिव खबर में बताया है कि ऐसा 2004, 2009, 2014, 2019 में भी हुआ था। खबर के अनुसार दिल्ली के पुराने डाटा से भी ऐसी वृद्धि के संकेत मिलते हैं। कहने की जरूरत नहीं है मतदाता सूची में यह वृद्धि भले हर साल चुनाव से पहले हो रही हो लेकिन भाजपा पर ऐसा करने का आरोप है और अगर पहले से हो रहा है तो भाजपा पहले भी चुनाव लड़ती थी। इसलिए, अगर यह अभी तक किसी को पता नहीं था, इसे प्रकाश में नहीं लाया गया तो यह भी आसामान्य है और इससे इस बार की वृद्धि को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है क्योंकि भाजपा के वोटों में उतनी ही वृद्धि का आरोप है। जो भी हो, मामला इतना सरल नहीं है पर अब जब मामला फंसता लग रहा है तो एक असामान्य वृद्धि के संबंध में 2004 और 2009 के तथ्य अब उजागर किया जाना भी असामान्य है। भाजपा समर्थक प्रचारकों ने आरोप लगने पर चेक नहीं किया और अगर चेक किया फिर भी सार्वजनिक नहीं किया या पहले से होता रहा है पर किसी ने ध्यान नहीं दिया – यह सब गड़बड़ी का ही संकेत है और विस्तृत जांच के बिना न तो आरोपों से इनकार किया जा सकता है और ना उसकी पुष्टि हो सकती है। आमतौर पर अखबारों की खबरों से ऐसे मामलों की पुष्टि हो जाती रही है पर इस बार यह मामला इतने समय तक दबा रहा तो यह सामान्य नहीं है, लंबे समय से साजिश चल रही होने का मामला भी हो सकता है पर खबर का खुलासा वैसे नहीं है। जैसे प्रचारकों को करना चाहिये था या वे करते रहे हैं।
आज की तीसरी बड़ी खबर, अमेरिका से है। इंडियन एक्सप्रेस में यह दो कॉलम में छपी है जबकि द टेलीग्राफ में लीड है। खबर यह है कि अदाणी के खिलाफ कार्रवाई के लिए अमेरिका में जिस कानून का उपयोग किया गया था उसे ट्रम्प ने रोक दिया है। द टेलीग्राफ की खबर का उपशीर्षक है, मोदी के दौरे से पहले रिश्वत विरोधी कानून के ‘दुरुपयोग’ का आरोप। आप जानते हैं कि अमेरिका ने हाल में 104 अवैध प्रवासियों को हाथ, पैर और कमर में बेड़ियों में बांधकर सेना के मालवाहक विमान से भारत वापस भेजा है और तब विदेश मंत्री ने कहा था कि यह सामान्य है और अमेरिका ऐसा ही करता रहा है। आम आदमी के मामले में तो अमेरिका और भारत सरकार का यह रुख रहा और सरकार ने उसका बचाव किया। दूसरी ओर प्रधानमंत्री मोदी के अमेरिका पहुंचने से पहले ट्रम्प ने अदाणी के पक्ष में कार्रवाई कर दी है। आप इसे चाहे जैसे देखिये, भारत और भारत के लोगों के लिए तो यह बड़ी खबर है ही। पर आज द टेलीग्राफ को छोड़कर मेरे बाकी सात अखबारों में से से किसी में यह लीड नहीं है।
आज के मेरे अखबारों में इन तीनों खबरों को छोड़कर चौथी खबर लीड है, 1) “प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, आई सदी के लिए राइटिंग कोड है” (हिन्दुस्तान टाइम्स) 2) “एआई सबके लिए अच्छा है सुनिश्चित करने के लिए भारत सुविज्ञता साझा करने के लिए तैयार है : प्रधानमंत्री” (दि एशियन एज) 3) पेरिस बैठक में प्रधानमंत्री ने एआई के लिए वैश्विक स्तर पर ओपन सोर्स फ्रेमवर्क की वकालत की (टाइम्स ऑफ इंडिया) 4) एआई युग की शुरुआत हो चुकी है, विश्वास और पारदर्शिता के लिए एक वैश्विक ढांचे की जरूरत है : प्रधानमंत्री (इंडियन एक्सप्रेस)। 5) प्रौद्योगिकी से खत्म नहीं होती नौकरियां – (फ्लैग शीर्षक) वैश्विक एआई सम्मलेन में बोले प्रधानमंत्री मोदी (नवोदय टाइम्स) 6) इस सदी में मानवता का कोड लिख रही एआई, नई नौकरियां होंगी सृजित : मोदी। (अमर उजाला) 7) मणिपुर संकट चल रहा है क्योंकि भाजपा अपने विकल्प देख रही है (द हिन्दू)। द टेलीग्राफ के लीड की चर्चा पहले कर चुका हूं। जाहिर है द टेलीग्राफ के अलावा सिर्फ द हिन्दू ने भाजपा की कमजोरी या किंकर्तव्यविमूढ़ होने की खबर को लीड बनाया है। बाकी सभी अखबारों ने एआई की खबर को लीड बनाकर लीड की औपचारिका पूरी की है। एआई को आई कह चुके नरेन्द्र मोदी इसपर क्या बोलेंगे समझना मुश्किल नहीं है और जो कहा है वह भी कुछ खास नहीं है। यह अलग बात है कि भारत के प्रधानमंत्री हैं तो जो भी बोलेंगे वह खबर हो सकती है और उसे लीड बनाया जा सकता है। द हिन्दू की सेकेंड लीड है, “इतिहास दिखाता है कि टेक्नालॉजी से काम कम नहीं होता है : प्रधानमंत्री“। यह वैसे ही है कि ए प्लस बी होल स्क्वैयर में 2एबी एक्सट्रा आ जाता है। और प्रधानमंत्री कहते रहे हैं तो खबर बनती ही है। लेकिन तमाम खबरों में आप कौन सी खबर चुन रहे हैं वही आपकी या किसी की संपादकी है और निश्चित रूप से वह इसके लिये स्वतंत्र है। मैं सिर्फ अखबारों की संपादकीय नीति को रेखांकित करता हूं और चाहता हूं कि पाठक इसके प्रति जागरूक रहें।
इस क्रम में यह बताना जरूरी है कि आज के अखबारों में कश्मीर में सेना के एक कैप्टन और एक एनसीओ के मारे जाने की खबर है। खबरों के अनुसार, जम्मू-कश्मीर के अखनूर क्षेत्र में नियंत्रण रेखा के पास आईईडी विस्फोट की खबर है। इस धमाके में एक कैप्टन सहित दो सैन्यकर्मी बलिदान हो गए और एक अन्य जवान घायल हो गया। मंगलवार दोपहर करीब 3:30 बजे जम्मू जिले के खौर थाने के तहत केरी बट्टल क्षेत्र में यह ब्लास्ट हुआ। इस धमाके में तीन सैनिक घायल हो गए, जिन्हें सेना अस्पताल में भर्ती कराया गया था। इनमें से दो की इलाज के दौरान मौत हो गई, जबकि एक की हालत गंभीर बताई जा रही है। पहले ऐसी खबरें लीड ही बनती थीं। बहुत जरूरी दूसरी खबर हो तो ऐसी खबर को सेकेंड लीड बनाया जाता था। लेकिन भाजपा की सरकार घर में घुसकर मारने और आतंकवाद खत्म करने के दावे करती रही है और इसलिए खबर भी कम महत्वपूर्ण हो गई लगती है। आईईडी विस्फोट में कैप्टन के साथ दो लोगों के शहीद होने की खबर मैं शायद पहली बार सिंगल कॉलम में देख रहा हूं। यह अलग बात है कि अमर उजाला ने इसे टॉप पर सात कलम में छापा है।
आज एक और विशेष खबर है, वायुसेना प्रमुख ने कहा, ‘एचएएल पर भरोसा नहीं है‘। वैसे तो सरकारी अधिकारियों को सरकार की आलोचना करने रोका जाता है। मोदी सरकार ने इसके तमाम उपाय किये हैं। दो पूर्व सेना प्रमुखों की किताबें काफी समय से रुकी हैं और जाहिर है पुरानी हो जायेंगी तो महत्व खो देंगी। दूसरी ओर सरकार की तारीफ में लोग अपनी बात रखते रहे हैं और उनपर किसी कार्रवाई की खबर भी नहीं है। ऐसे में सरकारी कंपनी एचएएल की वायुसेना प्रमुख से सार्वजनिक आलोचना क्यों की और यह देश हित में कैसे हो सकता है मैं नहीं जानता। आज यह खबर हिन्दुस्तान टाइम्स में सेकेंड लीड है। दि एशियन एज में यह पांच कॉलम में छपी है। टाइम्स ऑफ इंडिया में भी दो कॉलम में है। मुझे लगता है कि वायुसेना के लिए विमान बनाने वाली सरकारी कंपनी से अव्वल तो किसी को शिकायत नहीं होनी चाहिये और सेना प्रमुख जैसी हस्ती को हो तो उन्हें संबंधित अधिकारियों-मंत्रियों से कहकर उसे ठीक कराना चाहिये ऐसा कुछ नहीं करना चाहिये जिससे कंपनी और उसके साथ देश की बदनामी हो। खबरों के अनुसार वायु सेना प्रमुख की नाराजगी के बाद एचएएल ने कहा है, सेना को जल्द मिलेगा लड़ाकू विमान तेजस। यहां मुद्दा यह है कि सरकार क्या कर रही है। संबंधित लोग आपस में बात क्यों नहीं कर रहे हैं। इतनी बड़ी खबर किसके हित में किसकी सूचना के लिए है।


