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सियासत

मोदीजी के पास भारत की इज्जत बचाने और सनकी ट्रंप से निपटने के अब बस दो रास्ते हैं- बिछ जाओ या भिड़ जाओ!

जब टिकटॉक बंद होने से भारत में गृह युद्ध नहीं हुआ, तो फेसबुक या यूट्यूब बंद होने से भी नहीं होगा!

सुभाष सिंह सुमन-

जब आपके पास US की तमाम नामी कंपनियों का सबसे बड़ा बाजार है, बॉन्ड डंप करके US की दुखती रग सहला सकते हैं, फिर दोहाय सरकार टाइप से बिछने की जरूरत क्या है?

मिंट की एक खबर है. भारत सरकार ट्रंप टैरिफ के जवाब में जो तैयारी कर रही है, इसके बारे में. तैयारी क्या है, यह मनोरंजक है. भारत ट्रंप चचा को बताना चाहता है कि हम सिर्फ टैरिफ के लिए बदनाम हैं. वास्तव में अमेरिका से जो सामान ज्यादा आते हैं, उनपर टैरिफ 5% से कम है. इससे पहले बजट से अबतक दो किस्तों में कई अमेरिकी सामानों पर भारत टैरिफ कम कर चुका है. आगे की योजना और बिछ जाने की है. ये कौन सा मास्टरकार्ड है, मेरी समझ से परे है.

आप अमेरिका से तेल और गैस खरीदने का वादा करके आए हैं. इसमें फंस जाएंगी सरकारी कंपनियां, क्योंकि रिलायंस या नायरा जैसी प्राइवेट रिफाइनरी तो महंगा तेल खरीदने से रहीं. अमेरिकी कच्चा तेल (WTI) अब ब्रेंट से बहुत सस्ता रह नहीं गया है. US से भारत लाने में उससे ज्यादा खर्चा आ जाता है. तो मोदीजी के मास्टरस्ट्रोक की कीमत चुकाएंगी सरकारी कंपनियां.

F-35 सिरदर्द है. भारत खुद इसे खरीदने के पक्ष में नहीं है. ट्रंप चचा जबरदस्ती चिपकाना चाह रहे हैं. अभी तक जिस हिसाब से मास्टरस्ट्रोक खेले जा रहे हैं, अगर भारत ये भी खरीदने का सौदा फाइनल कर ले तो हैरानी नहीं होगी.

सबसे बड़ी गलती तो हुई कि आनन-फानन में US जाना नहीं चाहिए था. इतना तो बिना गए ही निहुर सकते थे. दूसरी गलती हुई कि धमकी के कारण टैरिफ कम नहीं करना चाहिए था. ये सब करके सिर्फ सामने वाले को अपर हैंड दिया जा रहा है और नेगोशिएट करने की अपनी क्षमता को कम किया जा रहा है.

अभी भारत को सबसे बड़ा डर शायद इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग को लेकर लग रहा है कि US से तनातनी होने पर नुकसान हो जाएगा. खासकर एप्पल के मामले में. तथ्य देखें तो नुकसान जरूर होगा, लेकिन इतना नहीं कि अर्थव्यवस्था को बुखार लग जाए. आईफोन के मामले में तो अभी भी मुख्य रूप से असेंबलिंग हो रही है. सामान सब चीन से ही बनकर आ रहा है अब भी. अब सोचिए चीन पर निर्भरता कम करने का काम खुलकर 8 साल पहले शुरू हुआ था, लेकिन अभी तक कितना कम हुआ है, यह आईफोन के उदाहरण से साफ है. मस्क भाई टेस्ला भी सबसे ज्यादा चीन में ही बना रहे हैं. दूसरा डर चीन का हो सकता है, कि अमेरिका साथ नहीं रहा तो दिक्कत हो जाएगी, लेकिन मुझे नहीं लगता चीन और भारत जैसे देश कभी आमने-सामने युद्ध करेंगे अब.

भारत को अभी की स्थिति में चीन के उदाहरण से ही सीखना चाहिए. चीन में फेसबुक, गूगल, माइक्रोसॉफ्ट नहीं है, इससे चीन की अर्थव्यवस्था पर क्या फर्क पड़ गया है? उल्टे फायदा ही हुआ है. सबके स्थानीय विकल्प बन गए हैं. यहां भी सरकार को थोड़ा सख्त होना चाहिए. भारत तो शास्त्री जी के समय में भी ऐसे नहीं निहुरा था, जब वास्तव में भारत भूखा-नंगा था. अभी तो हर लिहाज से बहुत बेहतर स्थिति है.

(मुझे ऐसी स्थितियों में एक बड़ा दिलचस्प ख्याल आता है. क्या ही मजेदार होता अगर भारत और चीन एक-दूसरे पर भरोसा करते और उसी तरह साथ खड़े हो जाते, जैसे यूरोप द्वितीय विश्व युद्ध के बाद हुआ था. सिर्फ भारत और चीन साथ हो जाएं तो अमेरिकी अर्थव्यवस्था की पूरी बैंड बजाई जा सकती है. लेकिन यह आदर्शवादी ख्याल है. नेहरूजी इस ख्याल के चक्कर में अपनी उम्र कुछ कम कर चुके हैं.)


ये अमेरिका की सबसे कमजोर नस है. कर्ज. पूरा कर्ज है करीब 30 ट्रिलियन डॉलर, जिसमें अन्य देशों का 8 से 9 ट्रिलियन है. सबसे ज्यादा जापान के पास है 1.1 ट्रिलियन. चीन के पास 750 बिलियन डॉलर है. भारत वाला डेटा इस ग्राफ में है. यह कर्ज बॉन्ड के रूप में होता है. अमेरिकी सरकार बॉन्ड बेचकर पैसे जुटाती है. अन्य देश इसे खरीदकर रखते हैं. इससे एक तरफ नियमित ब्याज की कमाई होती है. दूसरी तरफ अधिक उछलने पर सामने वाले की नस दबाने का मौका मिलता है. भारत के पास बहुत ज्यादा तो नहीं है, लेकिन इतना है कि कुछ समय के लिए बाजार को बिगाड़ दिया जाए.


इस मामले में भारत का अपर हैंड है कि आप सबसे बड़ा बाजार दे रहे हैं. ज्यादातर अमेरिकी कंपनियों के लिए चीन के दरवाजे बंद हैं. फिर भारत अकेला 1.5 अरब मुंह और 1.5 अरब जोड़ी हाथों वाला बाजार बचता है. इसके लिए तबियत से मोल-तोल किया जा सकता है. और जब टिकटॉक बंद होने से भारत में गृह युद्ध नहीं हुआ, तो फेसबुक या यूट्यूब बंद होने से भी नहीं होगा.

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