प्रशांत टंडन-
ये आदमी कहां है?

एसवाई कुरैशी, ओपी रावत, अशोक लवासा चुनाव आयोग से रिटायर होने के बाद एक सम्मानजनक और एक्टिव लाइफ जी रहे हैं, इनकी गिनती देश के बड़े पब्लिक इंटेलेक्चुअल्स में होती है. इनके लेख छपते हैं, सेमिनारों या लेक्चर्स में बुलाया जाता है, मीडिया इनके इंटरव्यू लेता है, किताबें लिख रहे हैं.
इन्होंने चुनाव आयोग में रहते हुये संविधान के प्रति अपना कर्तव्य निभाया.
लेकिन राजीव कुमार कहां है? इसके बारे में अफवाहें उड़ती हैं कि माल्टा भाग गया. चुनाव आयोग से पहले वित्त सचिव भी रहा है. इससे कोई आर्टिकल तक नहीं लिखवा रहा है. क्यों?
कहीं छुप पर रह रहा है. किसी सेमिनार या पब्लिक इवेंट में नहीं आ सकता. रिटायरमेंट के बाद किसी पब्लिक प्लेस में नहीं देखा गया.
सरकार ने भी इसे इस लायक नहीं समझा कि गवर्नर ही बना देते. कारण क्या है इस गुमनामी के जीवन का: क्या इसे जनता के गुस्से का डर हैं?
राजीव कुमार ने चुनाव आयोग को सरकार के सामने सरेंडर करा दिया. आयोग में रहते हुए ये खुद भी बीजेपी के नेता की तरह बर्ताव करता था, विपक्षी पार्टियों से मिलता नहीं था, उनकी सुनता नहीं था, चिट्ठियों का जवाब भी बदतमीज़ी के साथ देता था. मल्लिकार्जुन खड़गे जी को इसका जवाब असभ्य भाषा में था.
प्रेस कॉन्फ्रेंस में मुद्दों पर बात करने की जगह सस्ती शायरी सुनाता था. लोकसभा, महाराष्ट्र और हरियाणा चुनाव इसने पक्षपातपूर्ण कराये, मोदी से मॉडल कोड लागू नहीं करा पाया और विपक्षी पार्टियों को धौंस में लेने की कोशिश की.
इन सब पापों की वजह से आज इसमें इतना नैतिक साहस नहीं है कि सम्मानजनक रिटायर्ड जीवन जी सके.
जहां चाहे आ जा सके, किसी इवेंट में चीफ गेस्ट बन सके, कोई किताब, लेख लिखे, कहीं इसे भाषण देने के लिये बुलाया जाय. सोशल मीडिया से भी गायब है और अपने कर्मों से तिरस्कृत जीवन जीने को मजबूर है.
यही हाल ज्ञानेश गुप्ता का होगा. भविष्य की सरकारें राजीव कुमार और ज्ञानेश गुप्ता भले ही नरम हो जायें लेकिन जनता का दबाव इन्हें जेल भेजने का रहेगा.
इन दोनों ने चुनाव आयोग में रहते हुये भारत के संवैधानिक लोकतंत्र को बड़ा नुकसान किया है.


