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आज के अखबार : TOI के कॉलम लेखक के बंगाल में मंत्री बनने के बहाने उनकी विपरीत यात्रा की चर्चा

Newspaper front-page headline about Swapan Dasgupta getting finance in Bengal and health with an oncologist.

संजय कुमार सिंह

राज्यसभा चुनाव के लिए कांग्रेस उम्मीदवार का पर्चा खारिज कर दिए जाने और भाजपा समर्थित उम्मीदवार को समय दिए जाने का मामला पर्याप्त गंभीर है। कांग्रेस ने इसे वोट चोरी, चुनाव चोरी के बाद सीट चोरी कहा है। एक तरफ तो अनिल मसीह जैसे अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई है और मुख्य चुनाव आयुक्त के लिए विशेष कवच प्रावधान किया गया है और बीच में चुनाव अधिकारी मनमानी कर रहे हैं। इसमें जन प्रतिनिधियों से नहीं मिलना, सम्मानजनक व्यवहार नहीं करना शामिल है। इस लिहाज से आज नामांकन, पर्चा खारिज होने और जिनके स्वीकार किए जाने की खबर महत्वपूर्ण है और पहले पन्ने पर होनी चाहिए थी। देशबन्धु की लीड का शीर्षक है, नटराजन का नामांकन रद्द करना गैर कानूनी : कांग्रेस। दैनिक भास्कर में लीड तो सरकारी प्रचार और कांग्रेस पर मोदी का आरोप ही है लेकिन कांग्रेस का पक्ष भी है जो इस प्रकार है, कांग्रेस ने कहा- लोकतंत्र की हत्या हो रही है। इसमें कहा गया है – कांग्रेस ने पीएम पर तीखा हमला किया। पार्टी ने कहा कि मोदी ने भले स्वघोषित, संदिग्ध तरीके से गढ़ा माइलस्टोन पार किया हो, लेकिन वह भारत के गले का बोझ हैं। वे लोकतंत्र की हत्या के गवाह बने हुए हैं। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने कहा कि जवाहरलाल नेहरू 15 अगस्त 1947 को प्रधानमंत्री बने। उनके साथ मजबूत कैबिनेट थी। 1947-52 में 560 रियासतों का शांतिपूर्ण विलय हुआ। संविधान बना। जमींदारी खत्म हुई। एससी-एसटी आरक्षण लागू हुआ। अब संस्थान कमजोर किए जा रहे हैं। आज की खबरों से पत्रकारिता को कमजोर करना दिखाई दे रहा है। इसका पता इस बात से भी चलता है कि आज अमर उजाला की लीड का शीर्षक है, कांग्रेस ने अपनी नाकामियों का कलंक हिंदुओं पर मढ़ा सरकार की नीयत सही हो, तो विकास भी तेज : मोदी”। इसके साथ प्रचार की और भी खबरें हैं लेकिन कांग्रेस का पक्ष नहीं है।

दूसरी ओर, दैनिक भास्कर में मीडिया सरकार के मीडिया विरोध से जुड़ी एक और खबर है। यह  दूसरे कई अखबारों में पहले पन्ने पर इतनी प्रमुखता से नहीं है। खबर दिल्ली हाईकोर्ट के एक फैसले की है। इसके अनुसार, न्यूज पोर्टल और संस्थापक-संपादक के खिलाफ केस खत्म। खबर के अनुसार, न्यूजक्लिक पर ईडी की कार्रवाई रद्द कर दी गई है। हाई कोर्ट ने कहा कि यह पत्रकारिता पर शक्तियों का दुरुपयोग है। आप जानते हैं कि संस्थान में विदेशी निवेश की जांच शुरू हुई थी। इसका जो बुरा परिणाम हो सकता था वह हो चुका है और खबर वह भी नहीं है। भले आज की न हो पर पहले भी नहीं दिखी। दूसरी ओर, इस चक्कर में संस्थान के कई सदस्यों के घरों पर छापा मारा गया था और उनके उपकरण जब्त हुए थे। संस्थान के संस्थापक संपादक को जेल भी हुई थी। इसलिए यह खबर आज वैसे भी पहले पन्ने पर होनी चाहिए थी लेकिन हर जगह हेडलाइन मैनेजमेंट की खबरें हैं। नवोदय टाइम्स की लीड का शीर्षक है, देश को कांग्रेस के कुचक्र से बचाया। बॉटम है, मंत्रिमंडल ने की मोदी की सराहना, सात संकल्प पारित। अंग्रेजी अखबार भी इससे अछूते नहीं हैं। दि एशियन एज की लीड का शीर्षक है, मोदी ने विकसित भारत के लक्ष्य, एनडीए सरकार का एजंडा तय किया; कांग्रेस की निन्दा की। द टेलीग्राफ में बंगाल की खबरों के अलावा ट्रम्प का मामला है। अंग्रेजी अखबारों में न्यूजक्लिक का मामला सिर्फ इंडियन एक्सप्रेस में पहले पन्ने पर प्रमुखता से है।

टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड भी सरकारी प्रचार और रिकार्ड बनाने की खबर है लेकिन अपने कॉलम लेखक के बंगाल में मंत्री बनने या राज्यसभा से विधानसभा की उल्टी यात्रा के बारे में छोटी सी खबर ही पहले पन्ने पर है बाकी अंदर। द हिन्दू की लीड का शीर्षक है, अमेरिका और ईरान के बीच हमले और जवाबी हमले के दौरान ट्रंप ने कहा कि ‘बेहद ज़ोरदार हमले’ जारी रहेंगे। खबर के अनुसार, होर्मुज़ जलडमरूमध्य के ऊपर एक सैन्य हेलीकॉप्टर गिराए जाने के बाद अमेरिका ने हवाई हमले शुरू किए, ईरान ने जवाबी कार्रवाई की और अमेरिकी ठिकानों पर हमले किए; ईरान के प्रवक्ता ग़ालिबाफ़ ने कहा कि किसी भी आक्रामक कार्रवाई का तुरंत जवाब दिया जाएगा। पहले पन्ने पर छपी एक फोटो का कैप्शन इस प्रकार है, बुधवार को लेबनान के सिडोन में इज़राइली हवाई हमले के बाद आग की लपटों में घिरी गाड़ियां। 8 अप्रैल से इलाके में लागू संघर्ष-विराम (सीज़फ़ायर) के दौरान लेबनान में इज़राइल के हमलों के कारण पहली बार दबाव पड़ा है। नवोदय टाइम्स में लगभग इसी खबर का शीर्षक है, खाड़ी क्षेत्र में अमरीकी सैन्य ठिकानों पर ईरानी हमले। एक खबर अमरीकी ड्रोन गिराने की भी है। पत्रकारिता की इस खराब हालत और भारतीय जनता पार्टी की घटिया राजनीति के कारण खबरों के साथ चल रहे मजाक को रोकना बहुत जरूरी है। लेकिन हिन्दुस्तान टाइम्स की लीड ईरान को ट्रम्प की धमकी है और इसका भारत से बहुत लेना-देना नहीं है लेकिन भारत और पत्रकारिता के लिहाज से जरूरी खबरें पहले पन्ने पर नहीं हैं। यह सब तब जब आज ही, खबर है कि राज्यसभा सदस्य भाजपाई पत्रकार स्वपन दासगुप्ता बंगाल की शुवेन्दू सरकार में मंत्री हो गए हैं।

गंगोत्री से गंगासागर तक पांव पसारने के लिए नरेन्द्र मोदी और भाजपाई इकोसिस्टम ने जो सब किया वह ताजा है और फिर से याद दिलाने की जरूरत नहीं है। इसमें यह तथ्य भी है कि बंगाल जीतकर भाजपा ने एक ऐसे आयातित नेता को पश्चिम बंगाल का मुख्यमंत्री बनाया है जो रिश्वत लेते वीडियो पर कैद हुए थे। प्रधानमंत्री उनके विरोधी होते थे तो उनके खिलाफ जनसभाओं में बोले भी चुके हैं। इससे पहले असम में भी ऐसा ही किया जा चुका है। इसलिए भ्रष्टाचार दूर करने का नरेन्द्र मोदी का प्रचार नंगा हो चुका है और पत्रकारिता अगर दमदार हो रही होती तो देश, राजनीति या पत्रकारिता की यह हालत नहीं होती। सब कुछ खुला है फिर भी, जो भी कुछ कर सकता है वह नरेन्द्र मोदी की भाषा बोलता कोई परजीवी होता है। ऐसे में एक पत्रकार को मिले भाजपाई ईनाम की चर्चा जरूरी है। खबरों के अनुसार, पत्रकार और राजनीतिक टीकाकार स्वपन दासगुप्ता को 2016 में राज्यसभा के लिए राष्ट्रपति ने मनोनीत किया था। उनका नामांकन मुख्यतः पत्रकारिता / साहित्य और सार्वजनिक जीवन में योगदान के आधार पर माना गया था। आप जानते हैं कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 80 के तहत राष्ट्रपति राज्यसभा में 12 सदस्यों को नामित कर सकते हैं। ये सदस्य साहित्य, विज्ञान, कला और समाज सेवा जैसे क्षेत्रों में विशेष ज्ञान या व्यावहारिक अनुभव रखने वाले व्यक्तियों में से चुने जाते हैं। स्वपन दासगुप्ता का पहला नामित कार्यकाल 25 अप्रैल 2016 से शुरू हुआ। भाजपा ने उन्हें 2021 का विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए मैदान में उतार दिया तो इसका विरोध हुआ कि विशेष श्रेणी में नामित हस्ती भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ रहा है। तब उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। पर वे चुनाव हार गए और भाजपा की सेवा के बदले उसी वर्ष उन्हें दोबारा उसी खाली जगह के लिए फिर नामित कर दिया गया। परंपरा रही है (थी) कि इस श्रेणी में राजनीतिज्ञों को नहीं, विशेष योग्यता वालों को नामित किया जाता है। स्वपन गुप्ता पहले और अकेले व्यक्ति होंगे जो राज्यसभा के मनोनीत सदस्य से विधानसभा में मंत्री बने। नवजोत सिंह सिद्धू ऐसे दूसरे उदाहरण हैं लेकिन राज्य में मंत्री बनने के लिए उन्होंने पार्टी बदली थी। उनका मनोनयय भाजपाई होने के कारण ही हुआ था और वे कांग्रेस में चले गए थे। कायदे से, घोषित प्रचारक का मनोनयन होना भी नहीं चाहिए था – लेकिन वह अलग मुद्दा है।  

हेमा मालिनी को पहली बार राज्यसभा में “कला” क्षेत्र में विशेष योगदान के लिए राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत किया गया था। उनका पहला कार्यकाल 2003 से 2009 तक था। बाद में वे भाजपाई हो गईं। 2011 में फिर राज्यसभा पहुँचीं, लेकिन इस बार निर्वाचित सदस्य के रूप में। उन्हें कर्नाटक से भाजपा समर्थित उम्मीदवार के रूप में चुना गया था और वे एक उपचुनाव के जरिए सदन में पहुँची थीं। राज्यसभा में उनका यह कार्यकाल 2012 तक रहा। 2014 से वे मथुरा से भाजपा की लोकसभा सदस्य हैं। 2003 में हेमा मालिनी के साथ मनोनीत दूसरे सदस्यों के नाम हैं – बिमल जालान, के कस्तूरीरंगन, दारा सिंह, चंदन मित्रा और विद्यानिवास मिश्र। उल्लेखनीय है कि उस समय केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी और यह उनका तीसरा व पूर्ण कार्यकाल था जो 13 अक्तूबर 1999 से 22 मई 2004 तक चला था। राज्य सभा के लिए यह नामांकन अप्रैल 2003 में किए गए थे। कला, खेल और पत्रकारिता के क्षेत्र में नामित कुछ सदस्यों का भाजपा या एनडीए से वैचारिक निकटता का अहसास सार्वजनिक था। लेकिन संवैधानिक रूप से राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत सदस्यों के लिए किसी राजनीतिक दल से निकटता निषिद्ध नहीं है; शर्त यह है कि उन्हें साहित्य, विज्ञान, कला या समाज सेवा जैसे क्षेत्रों में विशेष ज्ञान या अनुभव वाला माना जाए। बाद में इस श्रेणी में रंजन गोगोई और फिर उज्ज्वल निकम भी मनोनीत हुए। इस श्रेणी में पत्रकारों को मनोनीत करने की बात की जाए तो स्वपन दासगुप्ता ऐसे पत्रकार हैं जो इसके जरिए राजनीति में लांच हुए। पत्रकारिता से राजनीति में आकर सेवा के बदले मनोनीत होने का मेवा पाने वाले पत्रकारों में हरिवंश नारायण सिंह का नाम सबसे नया है। वे चुनाव जीतकर राज्यसभा के सदस्य बने और उनकी पार्टी की दशा-दिशा जो रही वे राज्यसभा के होकर रह गए। अब वे मनोनीत सदस्य हैं। कहने की जरूरत नहीं है कि भाजपा के इन समर्थकों या लाभार्थियों के राज्यसभा की सदस्यता जितनी आसान रही उतनी कांग्रेस की मीनाक्षी नटराजन के लिए नहीं रही और साफ तौर पर उनका नामांकन खारिज किया जाना अनुचित है।

एक भक्त मित्र ने सोशल मीडिया पर लिखा है, चुनाव आयोग विधानसभा, लोकसभा और राज्यसभा चुनाव के दौरान एक रिटर्निंग ऑफ़िसर नियुक्त करता है, असेंबली चुनाव में रिटर्निंग ऑफ़िसर एसडीएम स्तर का अधिकारी होगा तो लोकसभा में यह डीएम स्तर का अधिकारी होगा और राज्यसभा चुनाव में वो सेक्रेटरी विधानसभा (पीसीएस अधिकारी) होता है। इन रिटर्निंग अधिकारियों के पास जन प्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत तमाम अधिकार और शक्तियां निहित होती है, इनके पास पूर्ण अधिकार है और ये अपने विवेक का इस्तेमाल करते हुए नामांकन को स्वीकार या खारिज कर सकते है। चुनाव प्रक्रिया के दौरान इन रिटर्निंग अधिकारियों के पास क्वासी जुडिसियल ऑफिसर कि पावर्स होती है। अब इन्होंने किसी प्रत्याशी का नामांकन खारिज किया या स्वीकार किया दोनों ही स्थिति में इनका निर्णय अंतिम है और राज्य चुनाव आयोग या केंद्रीय चुनाव आयोग के पास कोई अधिकार नहीं है कि वो यहां दखल दें। ख़ुद ज्ञानेश कुमार यदि चाहे तब भी कुछ नहीं कर सकते। प्रत्याशी के पास सिर्फ हाईकोर्ट में चुनाव याचिका दाखिल करने का विकल्प शेष बचता है। यहाँ भी वो रिटर्निंग अधिकारी को वादी नहीं बना सकता उसके ऊपर किसी भी सिविल या क्रिमिनल कोर्ट में कोई कार्यवाही नहीं हो सकती क्यूँकि इसको इम्युनिटी हासिल है। इसलिए भले उसने बेईमानी कि हो या साज़िश की हो या ग़लत निर्णय लिया हो कुछ भी किया हो अपनी चुनावी ड्यूटी के लिए उसको किसी भी कोर्ट में आप उसके ऊपर कोई कार्यवाही या केस नहीं कर सकते है। इससे समझा जा सकता है कि अनिल मसीह के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं हुई। हालांकि, सरकारी कार्य करते हुए किसी अधिकारी पर भी सामान्यतया कार्रवाई नहीं हो सकती है और यह ऊपर वाले अधिकारी को देना होता है। मुख्य चुनाव आयुक्त के लिए भाजपा सरकार ने खास व्यवस्था की है जो चर्चा में था। पर वह सब अलग विषय है। चुनावी लोकतंत्र से मजाक ईवीएम के जरिए शुरू हुआ था। कारण हे जो हो, काफी समय तक कहा जाता रहा कि ईवीएम चुनाव अधिकारियों के नियंत्रण और देख-रेख में रहता है इसलिए इससे छेड़छाड़ नहीं की जा सकती है। तकनीकी रूप से यह संभव है – अब सबको पता है तब भी। चुनाव अधिकारी जिस ढंग से भाजपा के समर्थन में काम करते रहे हैं उससे समझ में आता है कि भाजपा ईवीएम की इतनी समर्थक क्यों हैं। पर यह अलग मुद्दा है। इस बारे में ज्यादा जानना चाहें तो मेरी किताब, ईवीएम वाशिंग मशीन में धुली – देख सकते हैं।  

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

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