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आज के अखबार : नया भारत परमाणु धमकी से नहीं डरता – चौथी बार कहा गया है फिर भी पहले पन्ने पर

समझ नहीं आया कि अगर यह हेडलाइन मैनेजमेंट है तो दाल गल नहीं रही है या आज ही नहीं गली? 17 सितंबर के अखबार जन्म दिन के बधाई विज्ञापनों से भरे थे आज खबर होनी ही थी फिर भी हेडलाइन मैनेजमेंट की यह कोशिश हाइड्रोजन बम से बचने के लिए तो नहीं हो सकती है। राहुल गांधी ने सुबह-सुबह प्रेस कांफ्रेंस की घोषणा करके ससपेंस पैदा करने की कोशिश की। देर भी की और   बस केंचुआ बम छोड़ा। यह अलग से कहा कि हाइड्रोजन बम नहीं है। वह अलग से आयेगा। कुल मिलाकर, जब यह साफ होता जा रहा है कि संस्थाएं अपना काम नहीं कर रही हैं तो भी सरकार और उसके समर्थकों के माथे पर सिकन तक नहीं है।    

संजय कुमार सिंह

आज के अखबारों में प्रधानमंत्री का एक बयान चर्चा के काबिल है। अमर उजाला में यह लीड के उपशीर्षक का भाग है। नवोदय टाइम्स में तीन कॉलम की खबर का शीर्षक। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा है, नया भारत परमाणु धमकी से नहीं डरता है। इसकी बात करने से पहले यह बता दूं कि कई बार ऐसी अटपटी चीजों पर चर्चा जरूरी होती है और इसका आसान तरीका होता है कि खबर को प्रमुखता से छाप दो ताकि सबको दिखे और खटके। इसलिए, इस खबर को पहले पन्ने पर और तीन कॉलम में छापना पत्रकारिता की दृष्टि से सही हो सकता है और मेरी शिकायत उससे नहीं है। एक पुरानी खबर के अनुसार ट्रक का टायर फटने की आवाज से नरेन्द्र मोदी डर गये थे। उस समय  मुख्यमंत्री थे इसलिये मामला सार्वजनिक हुआ और खबर बनी। ऐसे प्रधानमंत्री का यह कहना कि वे परमाणु धमकी से नहीं डरते – हेडलाइन मैनेजमेंट के अलावा कुछ और नहीं हो सकता है। लेकिन वह मेरा विषय नहीं है। यहां मैं खबरों की बात करता हूं लेकिन आज प्रधानमंत्री के इस बयान की बात करनी है। मेरा मानना है कि यह और ऐसे बयान हेडलाइन मैनेजमेंट के लिए ही दिये जाते हैं और प्रधानमंत्री यह बात पहले भी कह चुके हैं। इसलिये मैं यह देखना चाहता था कि दूसरी बार कहने पर इसे कितनी प्रमुखता मिली है। मैंने पता किया कि आज दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर में यह शीर्षक पहले पन्ने पर है या नहीं। हिन्दी के मेरे तीसरे अखबार, देशबन्धु में पहले पन्ने पर नहीं है। यह दिलचस्प है कि दैनिक जागरण में तो यह लीड के उपशीर्षक की तरह है लेकिन दैनिक भास्कर में नहीं है। अलग से खबर सिर्फ नवोदय टाइम्स में है।

अंग्रेजी अखबारों में यह इंडियन एक्सप्रेस में टॉप पर छपी दो कॉलम की खबर का शीर्षक है। इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपना 75वां जन्मदिन मध्य प्रदेश में मनाया और कहा, नया भारत परमाणु खतरों से नहीं डरता है, पाकिस्तान को घुटनों पर ले आया। हिन्दुस्तान टाइम्स में पहले पन्ने पर तीन कॉलम का ऐसा ही एक शीर्षक है, (ऑपरेशन) सिन्दूर के बाद आतंकी रो रहे हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रधानमंत्री के जन्म दिन की खबर तो है लेकिन शीर्षक या उपशीर्षक में परमाणु धमकी की खबर नहीं है। अखबार में आज पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने पर भी विज्ञापन है और पहले पन्ने पर आधा विज्ञापन। ऐसे में ऑपरेशन सिन्दूर की सफलता बताने वाली खबर अंदर होने की सूचना तो है लेकिन भारत परमाणु धमकी से नहीं डरता है – जैसी खबर या सूचना नहीं है। तथ्य यह है कि युद्ध से न सिर्फ सैनिकों और नागरिकों को भारी नुकसान होता देश की धन संपदा का भी बड़ा हिस्सा बेकार जाता है जबकि एक बड़ा हिस्सा बेकार फंसा रहता है। ऐसे में परमाणु धमकी या युद्ध से डर नहीं लगता सुनकर अचानक युद्ध विराम और ट्रम्प का दावा, उसपर कुछ नहीं कहना याद आता है। फिर भी, पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार ने अब जब खुद स्वीकार किया है कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान युद्धविराम का प्रस्ताव अमेरिका के माध्यम से आया था, लेकिन भारत सहमत नहीं हुआ तो एंकर-एंकरानियां इसका प्रचार कर रहे हैं। विरोधियों से इसपर प्रतिक्रिया मांगा जा रहा है। यह नये भारत की पत्रकारिता है।    

कहने की जरूरत नहीं है कि नया भारत परमाणु धमकियों से नहीं डर रहा है तो यह नहीं बताया गया है कि क्यों नहीं डर रहा है। मुझे तो यह भी नहीं समझ में आ रहा है कि प्रधानमंत्री के ऐसा कहने का क्या मतलब निकाला जाये। संभव है, वे अपनी बात कर रहे हों और इसका मतलब यह हो सकता है कि वे परमाणु धमकी से नहीं डरते हैं। जो होना होगा, होगा। मेरी दिलचस्पी यह जानने में नहीं है कि प्रधानमंत्री परमाणु धमकी से क्यों नहीं डरते हैं। लेकिन अगर वे भारत के नहीं डरने की बात कर रहे हैं तो मैं यह जानना चाहूंगा कि उन्होंने या उनके नेतृत्व में भारत ने ऐसा क्या किया है कि भारत अब (मोदी के शब्दों में नया भारत) परमाणु धमकी से नहीं डरता है। चूंकि प्रधानमंत्री ने ऐसा पहले भी कहा है और कारण तब भी नहीं बताया था तो यह समझना मुश्किल है कि वे किस आधार पर ऐसा कह रहे हैं। लेकिन यह तो समझ में आ ही रहा है कि हेडलाइन मैनेजमेंट के लिये है। यह अलग बात है कि आप इसे किसी एआई से भी समझ सकते हैं लेकिन अखबार परमाणु धमकी से नहीं डरने का कारण बताने की बजाय प्रधानमंत्री के वोट बटोरू या प्रचारक वाले बयान को दोबारा (असल में चौथी बार) भी पहले पन्ने पर छाप दे रहे हैं। एआई से मुझे यह बयान पहले भी तीन बार दिये जाने के ये उद्धरण तो मिल ही रहे हैं। जाहिर है कि यह बात उन्होंने 2019 के बाद इस साल मई में ऑपरेशन सिन्दूर के समय और फिर 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस के भाषण में कहने के बाद अब कम से कम चौथी बार कही है। इसलिये अखबारों में वैसे नहीं छपी है जैसे हेडलाइन मैनेजमेंट होता है लेकिन जिन्हें छापना होता है उन्होंने छापा ही है।

क्रम संख्यातारीख / घटनाकहाँ / किस अवसर परक्या कहा गया
121 अप्रैल 2019   चुनावी सभा, राजस्थान के बाड़मेर‑चित्तौड़गढ़ क्षेत्र मेंकहा था कि पाकिस्तान के “न्यूक्लियर बटन” की धमकियों से भारत डरना बंद कर चुका है; “हमनें परमाणु बटन बचाकर दिवाली के लिए नहीं रखा है।”
212‑13 मई 2025‘ऑपरेशन सिंदूर’ के समय, भाषण, आदमपुर एयरबेस और बाद मेंकहा था, कि भारत आतंकवाद के मामलों में भविष्य में किसी प्रकार की परमाणु ब्लैकमेल को बर्दाश्त नहीं करेगा।
315 अगस्त 2025स्वतंत्रता दिवस, लाल किला“नई दिल्ली में कहा कि भारत परमाणु धमकियों को सहन नहीं करेगा”
417 सितम्बर 2025धार (मध्यप्रदेश), जन्मदिन की जनसभा में         उन्होंने कहा कि “नया भारत” परमाणु धमकियों से नहीं डरता। साथ ही “घर में घुसकर मारता है।”

इस खबर को देखते हुए मुझे आज एक और खबर दिखी जिसपर चर्चा होनी चाहिये। मामला किसानों से संबंधित है और खबर उसपर सुप्रीम कोर्ट के रुख से है। सुप्रीम कोर्ट के बारे में मैंने कल लिखा था कि उसके फैसलों से लग रहा है कि वह और देश की मौजूदा व्यवस्था कुत्तों के मामले में तो संवेदनशील है लेकिन दंगे के नाम पर फंसाये गये मुसलमानों के मामले में स्थिति बिल्कुल अलग है। ठीक है कि पराली जलाने से प्रदूषण होता है और नहीं जलाना चाहिये लेकिन किसानों के पास क्या विकल्प है और क्या पराली जलाना रोकने से प्रदूषण रुक जायेगा। यही नहीं, मजबूरी में दूसरा व्यवहार्य विकल्प नहीं होने से किसान पराली जला रहे हैं तो उन्हें गिरफ्तार करना क्या समस्या का हल है? लेकिन मामला सुप्रीम कोर्ट में हो तो अदालत भी क्या करे और अदालत अगर किसानों को पराली जलाने के लिए गिरफ्तार होने की बात करे लेकिन दंगे में मुसलमानों को फंसाने वालों के खिलाफ कोई खबर नहीं हो तो अखबार क्या करें? कल मैंने बताया था कि इंडियन एक्सप्रेस की एक खबर के अनुसार अदालत ने पुलिस की इस कार्रवाई को रेखांकित किया है जाहिर है ऐसा करने वालों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिये। सरकार और व्यवस्था का काम है कि ऐसा नहीं होना सुनिश्चित करे। लेकिन खबरों में यह चिन्ता का विषय नहीं दिखाई देता है।

उल्टे प्रधानमंत्री का वोट बटोरू या हेडलाइन मैनेजमेंट वाला शीर्षक भी इंडियन एक्सप्रेस में प्रमुखता से जगह पा जाता है। मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति और फिर बिहार एसआईआर मामले में सुप्रीम कोर्ट की निगरानी के बावजूद ‘फेट एकम्पली’ की स्थिति होना अपने आप में गंभीर मुद्दा है। आज राहुल गांधी ने अपनी प्रेस कांफ्रेंस में साबित कर दिया कि मुख्य चुनाव आयुक्त वोट चोरों का साथ दे रहे हैं। उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त से कहा है कि अलंद की मतदाता सूची से नाम हटाने के मामलों की जांच कर रही कर्नाटक सीआईडी को आवश्यक जानकारी हफ्ते भर के अंदर दी जाये। उन्होंने कहा कि सीआईडी के 18 बार मांगने पर भी चुनाव आयोग ने जवाब नहीं दिया है जो एक जवाब दिया है उससे कोई उद्देश्य पूरा नहीं होता। ऐसी स्थिति में जाहिर है कि मुख्य चुनाव आयुक्त निष्पक्ष नहीं हैं, उनकी नियक्ति प्रधानमंत्री ने की है और इसके खिलाफ मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। यही नहीं, बिहार एसआईआर से संबंधित तमाम शिकायतों और चुनाव आयोग के बड़बोलेपन के बावजूद कार्रवाई नहीं हुई और अगली तारीख सात अक्तूबर है जब एसआईआर को रद्द करने से भी मतदाताओं का हित नहीं सधेगा भले इससे भाजपा को हो सकने वाला लाभ कुछ कम हो। जो भी हो, यह अलग मामला है पर बताता है कि सुप्रीम कोर्ट लोकतंत्र, सरकार और सत्ता पर कब्जा, क्रोनी पूंजीवाद जैसे गंभीर मामलों में तो ‘फेट एकम्पली’ की स्थिति होने देता है लेकिन किसानों के मामले में जो कहा है वह देशबन्धु के अनुसार, सिर्फ जुर्माना लगाने से काम नहीं चलेगा और यह भी कि, पराली जलाने वालों को गिरफ्तार क्यों नहीं करते हो।

दि एशियन एज में यह खबर चार कॉलम के शीर्षक, पराली जलाने के लिए कोई गिरफ्तारी क्यों नहीं के साथ है। यह खबर और शीर्षक लगभग सभी अखबारों में पहले पन्ने पर है। इंडियन एक्सप्रेस में भी इस खबर का शीर्षक है, कुछ (किसानों) को जेल भेजने से सही संदेश जायेगा। एक्सप्रेस के फ्लैग शीर्षक से पता चलता है कि सुनवाई प्रदूषण बोर्ड में रिक्तियों पर हो रही थी। अखबार ने लिखा नहीं है लेकिन सामान्य मान्यता है और भड़ास4मीडिया का अनुभव भी यही है कि एक बार जेल हो आने से जेल का डर खत्म हो जाता है। संपादक यशवंत सिंह तो जेल से लौटकर जानेमन जेल – किताब लिख चुके हैं। मैंने इस किताब की पांच प्रतियां मंगाई थी और आज ढूंढ़ रहा था तो एक नहीं मिली। ऐसे में मुख्य न्यायाधीश अगर यह समझते हैं कि किसानों को जेल भेजने से स्थिति सुधरेगी तो मुझे ऐसा नहीं लगता है और आमतौर पर अखबारों ने उन्हें बताया भी नहीं है। अकेले द हिन्दू ने शीर्षक में लिखा है कि केंद्र सरकार के अनुसार किसानों को जेल भेजना व्यवहार्य नहीं है। इस तरह वोट चोरी में जो जेल जा सकते हैं उन्हें चुनाव आयोग बचा रहा है और चुनाव आयोग जिसके लिए काम कर रहा है उसकी व्यवस्था में सुप्रीम कोर्ट कुत्तों, वनतारा जैसी व्यवस्था और अर्नब गोस्वामियों का तो हितैषी लगता है लेकिन पुलिस द्वारा फंसाये मुस्लिम युवाओं के मामले में तारीख पर तारीख देता दिखता है।  

सरकार की बात करें तो बहुत सारे काम नहीं हो रहे हैं। जो हो रहे हैं वो चुनाव जीतने की कोशिश में। मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति में गड़बड़ी पर कोई कार्रवाई नहीं हुई और सरकार समर्थक एसआईआर तमाम शिकायतों और विरोध के बावजूद लगभग अपनी तरह से पूरा हो जायेगा और 7 अक्तूबर को अगली तारीख है। तब इस पर रोक लगने से भी जनता का कोई भला नहीं होने वाला है। ज्यादा से ज्यादा यह हो सकता है कि पहले से तैयार मतदाता सूची पर मतदान कराया जा सके। लेकिन यह भी संभव है कि वह पहले से तैयार करके इसीलिये रखा गया हो और एसआईआर पर विवाद इसीलिए चलता रहा हो ताकि रद्द भी हो तो एक मतदाता सूची पहले से तैयार है। रिपोर्टर्स कलेक्टिव की एक रिपोर्ट बता चुकी है कि लोकसभा चुनाव के बाद विधानसभा चुनाव के लिए बिहार की मतदाता पहले से ही तैयार है। इधर चुनाव आयोग ने एसआईआर के नाम पर न सिर्फ मनमानी की है सुप्रीम कोर्ट से भी कहा है कि उसके कामों में हस्तक्षेप न करे और एसआईआर कब कहां करना है वह खुद तय कर सकता है। आज राहुल गांधी ने प्रेस कांफ्रेंस कर आरोप लगाया तथा यह पहले भी छप चुका है और मतदाता सूची में गड़बड़ी की जांच कर रहे एसआईटी को चुनाव आयोग सहयोग नहीं कर रहा है और जांच के मांगी गई जानकारी कोई दो साल में 18 बार मांगने पर भी नहीं दी गई है।    

सरकार के मुखिया जब परमाणु धमकी से नहीं डरने की बात कर रहे हैं तब द टेलीग्राफ ने खबर छापी है कि देश की रक्षा क्षमताओं में कई मोर्चों पर खामी है। इसके साथ अखबार ने मध्य प्रदेश के धार की रैली की एक फोटो छापी है जिसका कैप्शन है,दे टेलीग्राफ ने धार की रैली की कल की फोटो छापी है जिसमें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तीर धनुष लिये हुए हैं। मैं पहले लिख चुका हूं कि इसी रैली में प्रधानमंत्री ने कहा कि नया भारत परमाणु धमकियों से नहीं डरता है। पढ़कर मेरे दिमाग में यही सवाल आया था कि परमाणु बम के प्रभाव को क्या गोबर की किसी शक्ति से रोका जा सकता है। तीर धनुष से भी नहीं रोका जा सकता है और जैसा मैंने शुरू में कहा है, प्रधानमंत्री यह नहीं बताते हैं कि भारत ने ऐसी कौन सी नई क्षमता विकसित की है कि वह परमाणु धमकी से नहीं डरता है। हालांकि सवाल यह भी है कि धमकी देता कौन है और अगर वह पाकिस्तान है तो 2014 में तबके प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को कारगिल के बावजूद शपथग्रहण में आमंत्रित किया गया था और बिना बुलाये पहुंच जाने वाली दोस्ती थी। अब यह हालत क्यों और कैसे हुई उसपर भी अखबारों में सन्नाटा है। दूसरी ओर, द टेलीग्राफ की खबर के अनुसार प्रधानमंत्री ने सोशल मीडिया के वीडियो के आधार पर कहा है कि ऑपरेशन सिन्दूर कामयाब रहा और आतंकी रो रहा था। रक्षा क्षमताओं में कमी की इमरान अहमद सिद्दीकी की खबर इस प्रकार है , “कोलकाता में इस सप्ताह आयोजित संयुक्त कमांडर सम्मेलन के बाद रक्षा क्षेत्र के दिग्गजों ने कहा है कि भारत की सैन्य तैयारियाँ कई मोर्चों पर सुरक्षा खतरों और महत्वपूर्ण उपकरणों की कमी से जूझ रही हैं, इससे देश के सामने कई चुनौतियाँ हैं।

भारत कई मोर्चों पर लगातार जटिल सुरक्षा परिस्थितियों का सामना कर रहा है। पाकिस्तान अपनी छद्म युद्ध और सीमा पार आतंकवादी गतिविधियाँ जारी रखे हुए है, जबकि चीन के साथ विवादित सीमाओं पर तनाव बना हुआ है। बांग्लादेश में हाल ही में हुए सत्ता परिवर्तन ने भारत विरोधी भावना और ढाका तथा इस्लामाबाद के बीच घनिष्ठ संबंधों के साथ एक नया आयाम जोड़ दिया है। एक पूर्व लेफ्टिनेंट जनरल ने चेतावनी दी, “भारत के लिए अब कई मोर्चों पर खतरे एक वास्तविकता हैं।” चुनौतियों का यह संगम ऐसे समय में हो रहा है जब देश की रक्षा क्षमताओं में चिंताजनक कमियाँ दिखाई दे रही हैं। सैन्य दिग्गजों ने इस बात पर ज़ोर दिया है कि भारत को आधुनिक युद्ध के लिए खुद को तैयार करने और पड़ोस में उभरते खतरों से निपटने के लिए इन ज़रूरी मुद्दों का समाधान प्रभावी ढंग से करने की ज़रूरत है। भारत की रक्षा तैयारियों को मज़बूत करने की हड़बड़ी से यह बात साफ़ ज़ाहिर होती है कि सरकार भी इसी दिशा में सोच रही है। रक्षा मंत्री और कई अन्य वरिष्ठ सरकारी व सैन्य अधिकारियों ने ज़ोर देकर कहा है कि देश युद्ध जैसी किसी भी उभरती स्थिति के लिए तैयार है और शांति में अपने विश्वास से विचलित नहीं हो रहा है। बुधवार को समाप्त हुए तीन दिवसीय संयुक्त कमांडरों के सम्मेलन में, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने अशांत वैश्विक व्यवस्था, क्षेत्रीय अस्थिरता और उभरते सुरक्षा परिदृश्य से देश की रक्षा के लिए सर्वोत्तम रक्षा तैयारियों का आह्वान किया।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। चैट जीपीटी का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

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