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सुख-दुख

नहीं रहे बुंदेलखंड की आंचलिक पत्रकारिता के पुरोधा व वरिष्ठ पत्रकार राजेंद्र अध्वर्यु

डॉ नरेंद्र अरजरिया-

बुंदेलखंड की आंचलिक पत्रकारिता के पुरोधा, वरिष्ठ पत्रकार और इतिहास के जीवंत दस्तावेज दादा राजेंद्र अध्वर्यु अब हमारे बीच नहीं रहे। शुक्रवार सुबह लगभग 4:30 बजे 82 वर्ष की आयु में उन्होंने अंतिम सांस ली। शुक्रवार शाम पांच बजे मुक्तिधाम में उन्हें अश्रुपूरित नेत्रों से अंतिम विदाई दी गई। उनके निधन से न केवल टीकमगढ़, बल्कि पूरे बुंदेलखंड के पत्रकारिता जगत ने अपना एक मार्गदर्शक, संरक्षक और इतिहास पुरुष खो दिया है।

Older man in beige kurta and vest, barefoot, walking on a red carpet along a marble corridor with arches.
वरिष्ठ पत्रकार राजेंद्र अध्वर्यु

दादा राजेंद्र अध्वर्यु उन विरले व्यक्तित्वों में थे, जिन्होंने पत्रकारिता के बदलते दौर को बहुत करीब से देखा और जिया। कागज और कलम से शुरू हुआ उनका सफर कंप्यूटर और डिजिटल पत्रकारिता तक पहुंचा, लेकिन उनकी मूल पहचान हमेशा जनसरोकारों से जुड़ी आंचलिक पत्रकारिता ही रही। उनके लिए पत्रकारिता केवल समाचारों का संकलन नहीं, बल्कि समाज और इतिहास के प्रति एक नैतिक दायित्व थी।

टीकमगढ़ की पत्रकारिता का यदि कोई चलता-फिरता इतिहास था, तो वह स्वयं दादा थे। स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर वर्तमान तक की सामाजिक, राजनीतिक और पत्रकारिता से जुड़ी अनेक महत्वपूर्ण जानकारियां उनके पास सुरक्षित थीं। दुर्लभ दस्तावेजों का उनका संग्रह शोधकर्ताओं और युवा पत्रकारों के लिए अमूल्य धरोहर था।

वर्ष 2002 से मुझे भी उनका स्नेह, मार्गदर्शन और आशीर्वाद प्राप्त होता रहा। वर्ष 2014 में शोध कार्य के दौरान उन्होंने आंचलिक पत्रकारिता और टीकमगढ़ के इतिहास से जुड़ी अनेक महत्वपूर्ण जानकारियां उपलब्ध कराईं, जो शायद किसी अन्य के पास नहीं थीं। उनका ज्ञान, उनकी स्मरण शक्ति और नई पीढ़ी को प्रेरित करने का स्वभाव उन्हें विशिष्ट बनाता था।

वर्ष 2013 में मेरे पूज्य पिता की स्मृति में निर्मित स्मृति द्वार के लोकार्पण समारोह में दादा मुख्य अतिथि के रूप में मेरी जन्मभूमि पधारे थे। स्मृति द्वार को देखकर वे अत्यंत प्रसन्न हुए और हजारों लोगों की उपस्थिति में उन्होंने कहा था— “पुत्र, आप जैसा हो।” उनके ये शब्द आज भी मेरे जीवन की सबसे बड़ी पूंजी हैं।

दादा हमेशा जिंदादिल रहे। पत्रकारों की हर समस्या में वे सबसे पहले खड़े दिखाई देते थे। उनका घर, उनका अनुभव और उनका स्नेह सभी के लिए खुला रहता था। उनके जाने से केवल एक वरिष्ठ पत्रकार का निधन नहीं हुआ है, बल्कि आंचलिक पत्रकारिता के इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय भी समाप्त हो गया है।

जब उन्हें अंतिम विदाई दी गई, तब उनकी स्मृतियां, उनके संस्कार और पत्रकारिता के प्रति उनका समर्पण हर उस व्यक्ति की आंखों को नम कर गया, जिसने कभी उनके सान्निध्य का सुख पाया है।

नम आंखों से विनम्र श्रद्धांजलि…

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