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ऑनलाइन ठगी का नया तरीका है- “माइक्रो-प्राइसिंग फ्रॉड”

Collage of various kitchen gadgets (bread maker, grain mill, grinder, tortilla maker, and pastry equipment) with a bold red 'Fake' banner across the center.

राजीव सिंह-

ऑनलाइन ठगी का नया और बड़ा जाल…

ऑनलाइन बिजनेस के जरिये आम लोगों को ठगने के आसान और सुरक्षित रास्ते निकाल लिए गए हैं। डिजिटल अरेस्ट और ओटीपी पूछने से इतर, अब ठग ई-कॉमर्स और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के जरिए आमजन को ठग रहे हैं। इस ठगी की शिकायतें निगरानी एजेंसियों या पुलिस तक कम पहुंच पाती हैं। वैसे भी अपने देश में ठगी को तभी गंभीरता से लिया जाता है जब पानी सर से गुजरने लगे। इन अपराधों की निगरानी के लिये केंद्रीय एजेंसियां हैं, लेकिन उनका काम जागरूकता अभियान तक सीमित है।

सोशल मीडिया पर भ्रामक और फर्जी विज्ञापन दिखाकर उन उत्पादों को बेचा जाता है जो असल में हैं ही नहीं या बेहद घटिया हैं। एआई के जरिये ऐसे उत्पादों के फोटो और वीडियो ठग तैयार करते हैं, जिनकी आम लोगों को जरूरत होती है। फिर इनके विज्ञापनों को सोशल मीडिया पर सुनियोजित तरीके से दिखाया जाता है। महज 700-800 रुपये में ऐसी जादुई मशीनें दिखाई जाती हैं जो तुरंत आटा पीसने, तेल निकालने या मिनटों में रोटी-पराठा-डोसा बनाने का दावा करती हैं।

तीन-चार सौ रुपये में ऐसे शेवर या ट्रिमर दिखाए जाते हैं, जिसके सामने ब्रांडेड 4-6 हजार रुपये के उत्पाद भी फीके लगें। आमजन एआई से बने इन विज्ञापनों की प्रामाणिकता को पहचान नहीं पाता और इनके जाल में फंस जाता है।

इन ठगों ने आम लोगों के मनोविज्ञान को गहराई से समझा है। ठगों ने जानबूझकर उत्पादों की कीमत महज 299 से 999 रुपये रखी है। इसे माइक्रो-प्राइसिंग फ्रॉड का नाम दिया गया है। ठगी की रकम बहुत छोटी महज 400-500 रुपये है, तो शिकार व्यक्ति कानूनी झंझटों, पुलिस के चक्कर काटने या मजाक उड़ने के डर से मन मसोसकर रह जाता है। इसी ‘शांत पीड़ित’ मानसिकता की वजह से ठग सफल हो जाते हैं। ये ठग उन लोगों को भी निशाना बनाते हैं जो अपनी सीमित जमापूंजी से कोई नया व्यापार शुरू करना चाहते हैं।

ठग ऑनलाइन विज्ञापनों में डोसा, बिस्कुट बनाने वाली मशीनें, स्मॉल स्केल प्रिंटिंग व पैकेजिंग मशीनें आदि दिखाते हैं। आमतौर पर ऐसी मशीनें बाजार में हैं, जिनसे यह सब हो जाता है। लेकिन इन मशीनों की कीमत 50 हजार से लेकर लाखों में होती है।

ठग एआई-से बने विज्ञापनों में ऐसी फर्जी मशीनें दिखाकर महज कुछ सौ या हजार रुपये में बेचते हैं। नए बिजनेस की चाह में इस झांसे में आकर लोग लुट जाते हैं। भरोसे के लिए इन फर्जी वेबसाइटों पर बकायदा पेशेवर ई-कॉमर्स पोर्टल जैसा इंटरफेस तैयार किया जाता है। इनमें कस्टमर केयर फोन नंबर, मेल आईडी और कैश ऑन डिलीवरी (सीओडी) व सात दिन में वापसी का विकल्प होता है। आम आदमी सोचता है कि सीओडी हैं, तो धोखा नहीं होगा। फिर पसंद नहीं आया तो वापस कर देंगे। ठगी की पूरी चेन ऐसे बनती है-ठगों की शेल कंपनी-कूरियर कंपनियों के जरिये यूपीआई या कैश में ग्राहक से कलेक्शन-फिर डिजिटल पेमेंट सर्वर के जरिये शेल कंपनी को पैसे ट्रांसफर और अंत में म्यूल अकाउंट्स (दूसरों के नाम पर किराए के खाते) से कैश की निकासी।

जब पार्सल डिलीवरी लेकर पैसे दे दिए जाते है, तब पैकेट खोलने पर पता चलता है कि अंदर डमी मशीनें, कबाड़, या प्लास्टिक के खिलौने जैसे उत्पाद है। वेबसाइट पर दिए गए कस्टमर केयर नंबर ‘आउट ऑफ सर्विस’ रहते हैं और ईमेल पर कोई जवाब नहीं मिलता। इन अपराधों की निगरानी और नियंत्रण का जिम्मा भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (आई4सी) का है। एनपीसीआई (नेशनल पेमेंट कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया) की नजर में भी यह रहता है। लेकिन ठग शेल कंपनियों के नाम पर खाते खोलते हैं।

कूरियर कंपनियों से प्राप्त सीओडी की राशि जैसे ही इनके खातों में आती है, एनपीसीआई के सर्वर ट्रैकिंग से बचने के लिए उस पैसे को तुरंत दर्जनों ‘म्यूल अकाउंट्स’ में अलग-अलग ट्रांसफर कर दिया जाता है और आखिर में एटीएम से निकाल लिया जाता है।

जब तक जांच एजेंसियां किसी विशिष्ट नोडल अकाउंट को फ्रीज करने की प्रक्रिया पूरी करती हैं, तब तक ठग डिजिटल फुटप्रिंट मिटाकर नई वेबसाइट के साथ सक्रिय हो चुके होते हैं। सवाल यहां यह है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों पर ऐसे विज्ञापनों को निगरानी एजेंसियां प्रतिबंधित क्यों नहीं करा पा रही हैं। ऑनलाइन विज्ञापनदाताओं की सख्त वित्तीय जांच (केवाईसी) करके भी इसे रोका जा सकता है। बैंक प्रभावी भूमिका निभा सकते हैं, लेकिन आपसे ठगी हो रही हैं, इससे उन्हें क्या मतलब।

ऐसे में इस अदृश्य ठगी से बचने के लिए नागरिकों को स्वयं सजग बनना होगा। खुद विचार करना चाहिए कि जो मशीन बाजार में 15 से 50 हजार रुपये में बेची जा रही है, कोई अज्ञात विक्रेता महज हजार, दो हजार रुपये में कैसे दे सकता है? अत्यधिक छूट या कम कीमत ही धोखाधड़ी का सबसे पहला संकेत है। जरूरत इससे सजग रहने की है। निगरानी एजेंसियां आपकी मदद के लिये आएंगी, इस भुलावे में न रहें।

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