संजय कुमार सिंह
आज जब जहरीले कफ सिरप से 19 बच्चों की मौत की खबर है तब दि एशियन एज की लीड का शीर्षक प्रधानमंत्री के हवाले से इस प्रकार है, राजद ने बिहार और इसकी शिक्षा को बर्बाद कर दिया। राजग ने इसकी प्रगति का नेतृत्व किया। इंडियन एक्सप्रेस में यह खबर सेकेंड लीड है। शीर्षक है, युवाओं के लिए स्कीम शुरू करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा, कांग्रेस राजद ने बिहार में शिक्षा को चौपट कर दिया। बात इतनी ही नहीं है, बिहार में चुनाव जीतने के लिए चली जा रही चालों में 37 साल पहले स्वर्ग सिधार चुके कर्पूरी ठाकुर के जननायक के खिताब की चौकीदारी भी चल रही है। यह अलग बात है कि उनकी याद लोकसभा चुनाव से पहले आई थी और भारत रत्न से उनके समर्थकों का दिल जीता जा चुका है। कहने की जरूरत नहीं है कि नीतिश कुमार 20 साल से मुख्यमंत्री हैं और ज्यादातर समय भाजपा के समर्थन से रहे हैं। 2015 के विधानसभा चुनाव से पहले 1,25,000 करोड़ का पैकेज कर देने की नाटकीय घोषणा के बाद उसकी कोई खबर नहीं है। हालत ऐसी हो गई है कि जुमलों और गारंटी के बाद वोट के लिए 75 लाख महिलाओं को 10 हजार का एडवांस पेमेंट किया गया है। तमाम लालच दिए जा रहे हैं और 20 साल से सत्ता से दूर राजद की आलोचना की जा रही है। यह नहीं बता रहे हैं कि भाजपा शासन में उन्होंने या नीतिश कुमार ने बिहार को क्या दिया है या बिहार के लिए क्या किया है। स्कूली बच्चों से राजद सरकार के कार्यकाल की बात करने का मतलब हुआ, उनका उस समय जन्म भी नहीं हुआ था। अब के युवाओं के लिए कौशल विकास का योजना का जो हाल है उससे अलग, कौशल दीक्षांत समारोह को संबोधित किया।
दि एशियन एज के अनुसार, राहुल गांधी को जन नायक कहे जाने का मजाक उड़ाया और कहा कि बिहार के लोगों को सतर्क रहना चाहिए ताकि इस सम्मान को चुराया न जा सके। वे बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और पास विदाउट इंग्लीश वाले कर्पूरी ठाकुर को याद करके बता रहे थे कि उन्हें जननायक कहा जाता था। यहां उल्लेखनीय है कि कर्पूरी ठाकुर का निधन फरवरी 1988 में हो गया था और 2024 के चुनाव से पहले मृत्यु के 36 साल बाद भारत रत्न दिया गया था। कर्पूरी ठाकुर के निधन के इतने समय बाद अगर किसी को जननायक कहा जा रहा है तो मोदी के अनुसार यह सम्मान चुराना है। मृत्यु के इतने समय बाद भारत रत्न देना उनका सम्मान है और वोट खरीदने के लिए दिल जीतने का हिस्सा। दूसरी ओर, जननायक की जगह तो खाली ही है, चोरी कहां हो रही है – यह मैं नहीं समझ पाया। कफ सिरप कोल्ड्रिफ (नवोदय टाइम्स) से 13 बच्चों की मौत के बाद कुछ राज्यों में इसपर प्रतिबंध और 19 दवाओं की जांच शुरू होने के बावजूद कई अखबारों की खबरों और शीर्षक में इसका नाम नहीं है। द टेलीग्राफ का शीर्षक है, मौतों के बाद फैक्ट्री में जांच। अमर उजाला में खबर तो लीड हैलेकिन शीर्षक है, बिक्री पर रोक। दवा का नाम शीर्षक में नहीं है। टाइम्स ऑफ इंडिया का शीर्षक है, मरने वाले बच्चों की संख्या 11 हुई तो मध्य प्रदेश में प्रतिबंध। जहरीले कफ सिरप का खबर की प्रस्तुति और शीर्षक के मामले में देशबन्धु ने निराश किया है। दवाई का जहर होना पर्याप्त गंभीर मामला है लेकिन मुझे लगता है कि इसकी प्रस्तुति आज अखबारों में वैसे नहीं है जैसे होनी चाहिए थी। सिर्फ केरल में बैन का शीर्षक है जबकि खबर बताती है कि शुरुआत छिन्दवाड़ा से हुई थी और मध्यप्रदेश में भी प्रतिबंध है। हिन्दुस्तान टाइम्स का शीर्षक है, जांच में जहरीला रसायन मिलने के बाद राज्यों ने कफ सिरप पर प्रतिबंध लगाया।
द हिन्दू में आज करुर हादसे की खबर पहले पन्ने पर चार कॉलम में है। करुर हादसे की पहली खबर दिल्ली के हिन्दी अखबारों में भी पहले पन्ने पर प्रमुखता से छपी थी। तभी मैंने लिखा था कि यह असामान्य है लेकिन खबर आज भी पहले पन्ने पर छपी है। अमृतकाल में कई खबरों को ज्यादा तूल दिया जाता है और कई को सीधे दबा और कुचल दिया जाता है। अमृतकाल में इसे हेडलाइन मैनेजमेंट कहा जाता है। 27 सितंबर 2025 को तमिलनाडु के करूर जिले में विजय नामक अभिनेता‑राजनीतिज्ञ की रैली के दौरान मची भगदड़ में 41 लोगों की मौत हुई। कई दर्जन लोग घायल हुए हैं। राज्य सरकार ने रिटायर जज की अध्यक्षता में जांच आयोग गठित कर दिया है। विपक्षी दलों (विशेषकर एआईएडीएमके और बीजेपी यानी भाजपा) ने कहा कि जांच सिर्फ नौटंकी है। सीबीआई जांच की मांग की गई है। टीवीके पार्टी और विजय ने घटना को राजनीतिक साजिश बताया है जबकि सरकार ने प्रशासनिक एवं सुरक्षा लापरवाही को वजह बताया। सोशल मीडिया और राजनीतिक डिबेट में आरोप‑प्रत्यारोप तेज हुए, खासकर यह कि जिम्मेदारी किसकी है — आयोजकों, पुलिस या राज्य सरकार की। भाजपा सत्ता में नहीं है। उसे इस विवाद से नुकसान नहीं होना है और ऑपरेशन सिन्दूर की तरह सदाबहार रहे तो जब जरूरत होगी इसका राजनीतिक लाभ उठाया जा सकेगा। इसलिए मुझे लग रहा है कि वह लाशों पर राजनीति कर रही है। खासकर सीबीआई जांच की मांग। आप जानते हैं कि सीबीआई केंद्र सरकार के नियंत्रण में है। इसलिए हेडलाइन मैनेजमेंट चलता लग रहा है। संक्षिप्त क्रोनोलॉजी इस प्रकार है – 27 सितंबर 2025 शाम — रैली के दौरान भगदड़; कई लोग मृत व घायल। तुरंत बाद अस्पतालों में भर्ती, राहत कार्य शुरू; मुख्यमंत्री और अन्य अधिकारी घटनास्थल पहुंचे। अगले दिन — राज्य सरकार ने मुआवजा घोषित किया (मृतकों के लिए ₹10 लाख, घायल के लिए ~ ₹1 लाख)। एफआईआर दर्ज हो चुकी है। आयोग की जांच जारी है। अतिरिक्त मुकदमे दायर हुए हैं मीडिया व सार्वजनिक विमर्श में मामला गर्म है।
कोर्ट ने आईपीएस अधिकारी असरा गर्ग को एसआईटी प्रमुख नियुक्त किया है। अदालत ने यह स्पष्ट किया है कि सीबीआई जांच की मांग नहीं मानी गई है क्योंकि राज्य पुलिस की जांच अभी प्रारंभिक अवस्था में है और कोर्ट ने एसआईटी को अधिक उचित माध्यम माना है। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिए हैं कि राजनीतिक रैलियों के आयोजन से संबंधित स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसिड्योर (एसओपी) तैयार किए जाएँ। न्यायाधीश ने संबंधित राजनीतिक दल (टीवीके) और आयोजकों की भूमिका पर तीखा हमला किया है, यह आरोप लगाते हुए कि वे घटना के बाद मौके से चले गए और पीड़ितों की मदद नहीं की। मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने जनता को भरोसा दिलाया है कि इस एसआईटी जांच से सम्पूर्ण सत्य सामने आएगा और प्रत्येक स्तर पर जिम्मेदारी तय की जाएगी। उल्लेखनीय है कि कर्नाटक में मतदाता सूची से नाम हटाने की कोशिश की जांच राज्य की सीआईडी कर रही थी और केंद्रीय चुनाव आयोग ने 18 महीने में 18 चिट्ठियों के जवाब नहीं दिये, प्रेस कांफ्रेंस के बाद भी नहीं दिए तो एसआईटी का गठन किया गया है। यह अदालत के आदेश पर जांच कर रही है और रिटायर जज की अध्यक्षता में जांच आयोग भी है। फिर भी इस समय सीबीआई जांच की मांग का कोई औचित्य नहीं है। आपको याद होगा कि पश्चिम बंगाल में डॉक्टर की हत्या के मामले में केंद्र सरकार ने सीबीआई जांच करवाई थी और कुछ नया नहीं मिला। खबरों के अनुसार करुर हादसे में विपक्षी पार्टियाँ और जनता के एक वर्ग का कहना है कि राज्य सरकार और पुलिस की निष्पक्षता संदिग्ध है। इसलिए केंद्रीय जांच एजेंसी (सीबीआई) से जांच कराई जानी चाहिए। यह अलग बात है कि सीबीआई केंद्र सरकार की एजंसी है और इसकी निष्पक्षता भी संदिग्ध है। खासकर आधी रात की कार्रवाई में सीबीआई डायरेक्टर बदलने से बाद से।
करुर हादसे को प्रचार या महत्व देने के कारण या देने के लिए मृतकों के परिवारों को पर्याप्त मुआवजा और आगे की सहायता की मांग की जा रही है। टीवीके नेता विजय से कहा जा रहा है कि वे नैतिक जिम्मेदारी स्वीकारें, माफी माँगें और पीड़ितों के प्रति संवेदनशीलता दिखाएँ। प्रभावित बच्चों और परिवारों के लिए परामर्श, मानसिक स्वास्थ्य सहायता की मांग भी हो रही है। जांच में पारदर्शिता और सार्वजनिक समीक्षा की मांग के तहत जनता को रिपोर्ट, प्रगति और तथ्य सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराने की भी मांग है। वैसे तो यह सब सामान्य मांग है। सरकार को इसका ख्याल रखना चाहिए। पहले ऐसी खबरें सुनने पढ़ने में भी आती थीं लेकिन इस बार मामला अलग है। कारण यह भी हो सकता है कि राज्य में चुनाव होने हैं और भाजपा जोर लगा रही हो। सारे लक्षण उसी के हैं और इसे स्पष्ट करने के लिए मैं गुजरात के मोरबी हादसे को याद करूंगा और बताऊंगा कि तब क्या हुआ था और किसकी क्या जांच हुई और किसके खिलाफ क्या कार्रवाई हुई। हादसे का समय चाहे जो हो, गुजरात में भाजपा की सरकार है। इसलिए वहां केंद्र सरकार का रुख बिल्कुल अलग था। चैट जीपीटी ने भी इसकी पुष्टि की है। खबरों के अनुसार, 30 अक्टूबर 2022 को मोरबी के माच्छू नदी पर बना झूला पुल गिरा। इस घटना में 135 लोग मारे गए और सैकड़ों घायल हुए। पुल को मरम्मत के बाद जनता के लिए दोबारा खोला गया था। पुल के केबल जंग लगे हुए थे और बांधने वाले बेल्ट ढीले या कमज़ोर साबित हुए। पुल संचालन व रख-रखाव का जिम्मा एक निजी कंपनी को दिया गया था। आम आरोप था कि उसने आवश्यक विशेषज्ञ तकनीकी मापदंडों का पालन नहीं किया।
राज्य सरकार ने घटना के कारणों की जाँच के लिए 5 सदस्यीय कमेटी बनाई थी। एफआईआर दर्ज हुई थी। 9 लोगों को गिरफ्तार बताया गया, इनमें कंपनी के प्रबंधक, टिकट क्लर्क, सुरक्षा गार्ड आदि शामिल थे। गुजरात सरकार ने मोरबी नगरपालिका को भंग करने की कार्रवाई भी की, यह दावा करते हुए कि नगर पालिका ने अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाई। जब घटना हुई, राज्य सरकार और भाजपा प्रशासन ने इसे “दुर्घटना” या “दुर्भाग्य” बताने की कोशिश की। तब नही कहा गया कि यह ऐक्ट ऑफ गॉड नहीं ऐक्ट ऑफ फ्रॉड था। आलोचनाओं के दबाव में निष्पक्ष जांच की बात स्वीकार की। मोरबी में भाजपा की सरकार थी जहाँ स्वयं राज्य सरकार एवं सत्ता पक्ष पर आरोप लगे कि उन्होंने जवाबदेही टालने की कोशिश की। तमिलनाडु के करुर हादसे में डीएमके की सरकार है। भाजपा प्रमुख प्रतिद्वंद्वी और विपक्ष ने सीबीआई जांच की मांग की है, जबकि हाईकोर्ट ने एसआईटी जांच का निर्देश दिया। मोरबी में राज्य सरकार ने अपनी ही समिति बनाई और म्युनिसिपैलिटी को भंग करने की कार्रवाई की और सबको मोरबी का अनिल मसीह बना दिया। करुर में कानूनी हस्तक्षेप (हाईकोर्ट का आदेश) है, और एसआईटी के माध्यम से एक निष्पक्ष व स्वतंत्र जांच की अपेक्षा की जा रही है। मोरबी में जनता, विपक्ष, पीड़ितों ने हिसाब माँगा, लेकिन आरोप था कि राज्य सरकार संरक्षण दे रही है। करुर में लोग चाहते हैं कि जांच पूरी पारदर्शी हो, दोषियों को सजा मिले, और सीबीआई तक पहुंच हो। मोरबी में ऐसा नहीं था। भाजपा सरकार पर आरोप था कि अपनी ही जिम्मेदारियों को टालने और निजी कंपनियों को बचाने की नीति अपनाई।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। चैट जीपीटी का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।
लेखक संजय कुमार सिंह से संपर्क [email protected] के ज़रिए किया जा सकता है।


