संजय कुमार सिंह
सुप्रीम कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश पर जूता फेंकना या फेंकने की कोशिश करना उन्हें घायल या जख्मी करने के लिए नहीं किया गया होगा। फेंकने वाला कोई ऐरा-गैरा होता तो बात अलग हो सकती थी लेकिन वह वकील है, ‘बच्चा’ नहीं है और 71 साल का है। मामला निजी भी नहीं है। वकील ने नारा लगाया सनातन का अपमान नहीं सहेगा हिन्दुस्तान। जाहिर है, मामला मुख्य न्यायाधीश पर ही नहीं, संविधान पर हमले का भी है। आज इसकी खबर वैसे नहीं है जैसे होनी चाहिए थी। खबर के और भी कई पहलू हैं वो भी होने चाहिए थे लेकिन वैसा कुछ भी नहीं है। साफ है कि यह खबर भी हेडलाइन मैनेजमेंट के काम ही आई। सुबह हमला हुआ, खबर बनी और शाम को बिहार में चुनाव की घोषणा हो गई। इस तथ्य के बावजूद कि सुप्रीम कोर्ट में एसआईआर पर सुनवाई चल रही थी। आज उसकी तारीख थी। इस तरह देश में जो चल रहा है वह सब तो है ही लेकिन खबरें खास ही छपती हैं और अगर हमला नहीं हुआ होता तो शायद खबर यह होती कि सुप्रीम कोर्ट में तारीख है और चुनाव की घोषणा हो गई। खबर यह भी हो सकती थी कि इसकी आशंका पहले से जताई जा रहे थी और सुप्रीम कोर्ट में अगर मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति के मामले में फेट एकम्पली की स्थिति हुई तो अब एसआईआर के मामले में भी हो गई। लेकिन सीजेआई पर हमले की खबर के बाद यह सब गौण हो गया और जाहिर है इसकी खबरें रह गईं। लेकिन सीजेआई पर हमले की खबर तो ठीक से छपती। पर वह भी नहीं छपी और यह वैसे ही है जैसे फेट एकम्पली के दो मामलों में हुआ था या नहीं हुआ था।
मुख्य न्यायाधीश पर जूता फेंकने वाले सनातन के कैसे प्रतिनिधि हैं, किसने बनाया आदि तमाम मुद्दे हैं। इसमें सबसे महत्वपूर्ण यह लगता है कि सनातन अपने अपमान का बदला ऐसा लेता है या उसका अपमान इतनी आसानी से हो जाता है और ये सब तमाम मुद्दे हैं जिनपर आज चर्चा होनी चाहिए थी। ऐसे मौकों पर विशेष संपादकीय लिखने का रिवाज होता था लेकिन वह सब खत्म हो चला है और यह पत्रकारिता का अपमान है तो क्या कोई पत्रकार किसी संपादक पर या संबंधित मंत्री पर या किसी मालिक पर जूता उछाल दे? संविधान में, व्यवस्था में सबका काम बंटा हुआ है और मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है। न्यायपालिका भी एक स्तंभ है और जूता फेंकने की घटना उसपर हमला है। दूसरे स्तंभ ने पहले स्तंभ पर या एक ने दूसरे स्तंभ पर हमले की खबर छाप कर पल्ला झाड़ लिया है। यह अलग बात है कि मीडिया पर हमले होते रहे हैं, उसे डराया धमकाया जाता रहा है और बांधकर या कुचलकर मरनासन्न कर दिया गया है। इसमें उसे दूसरे स्तंभ से शिकायत हो सकती है लेकिन इसके लिए वह अपना काम नहीं करे तो यह भी खबर है और मैं वही खबर दे रहा हूं। मैं चाहता था और उम्मीद करता था कि मीडिया भी कम से कम इस घटना की रिपोर्ट कायदे से करता लेकिन हेडलाइन मैनेजमेंट के जमाने में यह खबर भी हेडलाइन मैनेजमेंट के काम ही आई। या उसी तरह उपयोग में लाई गई है। मेरे नौ में से किसी भी एक अखबार ने विशेष संपादकीय लिखा होता और बताया होता कि प्रधानमंत्री ने इसपर अपनी प्रतिक्रिया एक्स पर कितने बजे दी तो मैं समझता कि काम हो रहा है। लेकिन यह खबर पहले पन्ने पर तो नहीं है।
मुझे लगता है कि मुख्य न्यायाधीश पर हमले का मामला अपने आप में जितना महत्वपूर्ण और गंभीर है वह तो है ही, सनातन के अपमान के लिए किया गया है तो सनातनियों को भी सोचना चाहिए और बताना चाहिए कि वे ऐसे अपमान या हमले के जवाब से संतुष्ट हैं कि नहीं या हमलावर के साथ हैं कि नहीं। पूरा मामला लोगों को बहकाने, बरगलाने और गलत समझाने का है। इसमें अखबारों की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती थी लेकिन वे भी दर्शक बने खड़े हैं। मुझे लगता है कि स्थितियां ऐसी हो गई हैं कि भाजपा पर प्रतिबंध की मांग की जाए या लगाई जाए। पर वह अलग मुद्दा है और आज उसपर भी चर्चा हो सकती थी। लेकिन वह भी नहीं है। विरोध का असंवैधानिक और हिंसक तरीका किसी भी तरह से समर्थन करने लायक नहीं है। लेकिन क्या समाज इसका विरोध कर रहा है, इससे अलग है। जो भी स्थिति हो, खबर होगी, लोग जानना चाहते होंगे। लेकिन संपादक और रिपोर्टर क्या कर रहे हैं। मुख्य न्यायाधीश पर जूता फेंकने वाले ने तो सनातन का भी अपमान किया है। लेकिन इसे मैं सनातनियों पर छोड़ता हूं। मैं नागरिक हूं, सनातनी होने का दावा नहीं करता। नागरिकों को ऐसे खानों में बांटे जाने की जरूरत नहीं समझता और इसलिए यह अलग मुद्दा है। मैं यहां खबरों, उसकी प्रस्तुति और संपादकीय विवेक की बात करता हूं और वही करूंगा। जारी…
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बिहार में चुनाव की घोषणा के साथ वह भी नहीं बताया जो एआई चैट जीपीटी बता रहा है।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। चैट जीपीटी का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


