संजय कुमार सिंह
आज द टेलीग्राफ में बिहार एसआईआर से संबंधित सुप्रीम कोर्ट के आदेश की एक महत्वपूर्ण खबर है। यह आज मेरे किसी और अखबार में पहले पन्ने पर नहीं है। मुझे लगता है कि वोट चोरी का मामला पर्याप्त गंभीर है और गलत ढंग से सत्ता में बैठी सरकार तथा उसके नियंत्रण में चल रही व्यवस्था न सिर्फ खतरनाक है, हर किसी की चिन्ता का विषय होना चाहिए। इसमें पक्ष-विपक्ष या समर्थन-विरोध मुद्दा नहीं है। मुद्दा है सत्ता पर अवैध कब्जा और यह एक मिनट के लिए भी हो तो गलत और आपत्तिजनक है। इसकी चिन्ता सब को होनी चाहिए और हर किसी को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि निर्वाचित सरकार वास्तव में जनता की चुनी हुई है और बेईमानी से सत्ता नहीं हथियाई गई है। संभव है कि यह आरोप या आशंका बिल्कुल गलत हो लेकिन आधार पर्याप्त हैं और जो हैं वो इतने कमजोर नहीं हैं। इसमें यह महत्वपूर्ण है कि हमारी अदालतें एक ही मामले में, बहुत कम अंतराल पर दो तरह के फैसले दे चुकी हैं और जज (बीएच लोया) की संदिग्ध मौत की जांच की जरूरत नहीं समझी गई। एक जज के आपत्तिजनक भाषण पर कार्रवाई नहीं हुई और दूसरे के घर में पैसे होने की शिकायत पर इतनी गंभीरता बरती गई कि उपराष्ट्रपति तक की नौकरी जाती रही। जैसे गई और जो सब हुआ उसपर और किसी को तो छोड़िए, खुद पूर्व उपराष्ट्रपति भी अभी तक नहीं बोल पाए हैं। ऐसे में यह समझना कि सब कुछ सामान्य है, खुद को धोखे में रखना है और आज ज्यादातर अखबार ऐसा बताने दिखाने की कोशिश कर रहे हैं। इसमें यह शामिल है कि अदालत ने ऐसा कहा और ऐसा किया इसलिए सब ठीक है जबकि बहुत साफ है कि अदालतें भी दबाव में हैं और यह मुख्य न्यायाधीश पर जूता फेंकने से ही नहीं, उसके बाद की कई घटनाओं से भी स्पष्ट है।
हालत ऐसी है कि हमले पर मुख्य न्यायाधीश ने जो कहा वह आज हिन्दुस्तान टाइम्स में जितनी प्रमुखता से है उतनी प्रमुखता से किसी और अखबार में नहीं है। इसमें लिखा है कि केंद्रीय मंत्री राम दास अठावले ने मांग की है कि हमलावर अधिवक्ता के खिलाफ अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया जाए। विपक्ष ने इस मुद्दे पर सरकार पर निष्क्रियता का आरोप लगाया है। मुख्य न्यायाधीश की यह टिप्पणी उस समय आई जब वे 16 मई के उस फैसले को वापस लेने की मांग करने वाली एक समीक्षा याचिका पर सुनवाई कर रहे थे। इसमें 2017 और 2021 की दो सरकारी अधिसूचनाओं को रद्द कर दिया गया था। इनमें विकास परियोजनाओं को बिना पूर्व पर्यावरणीय मंजूरी के काम शुरू करने की अनुमति दी गई थी। जाहिर है, यह मामला भी पर्याप्त महत्वपूर्ण है लेकिन आज पहले पन्ने की खबरों में एक खबर है, भारत 4,159 करोड़ की ब्रिटिश मिसाइलें खरीदेगा और दोनों देश अपना आपसी कारोबार दूना करेंगे। यह खबर अमर उजाला के साथ अलग शीर्षक से हिन्दुस्तान टाइम्स की भी लीड है। द हिन्दू में भी यह खबर लीड है और शीर्षक में राशि रुपये की जगह ब्रिटिश पाउंड में 350 मिलियन लिखी है। दि एशियन एज में भी यह खबर लीड है। यहां शीर्षक है, भारत और ब्रिटेन स्वाभाविक सहयोगी हैं प्रधानमंत्री, (ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर) स्टार्मर ने व्यापार, रक्षा संबंधों की तारीफ की। बेशक यह सब किया गया है तो खबर है लेकिन संपादकों को समझना होगा कि ऐसी खबरें बनाई और गढ़ी जा रही हैं ताकि जनहित की खबरें रह जाएं, पिछड़ जाएं या अंदर के पन्ने पर चली जाए।
इंडियन एक्सप्रेस की आज की लीड है, इजराइल और हमास ट्रम्प की गाजा शांति योजना के पहले चरण पर सहमत हुए है। इसके तहत युद्धविराम होगा बंदियों और कैदियों को रिहा किया जाएगा। इसके साथ बताया गया है कि प्रधानमंत्री ने ट्रम्प और नेतन्याहू से बात की और इसे ऐतिहासिक कहा। टाइम्स ऑफ इंडिया का शीर्षक मोदी को महान बताने वाला है। ट्रम्प ने कहा ‘माई फ्रेंड’ से बात की। अखबार ने बताया है कि यह व्यापार मुद्दों पर मतभेद कम होने का संकेत है। यहां यह याद रखना होगा कि बिहार चुनाव के मद्देनजर मोदी को महान बनाना अखबारों का असाइनमेंट हो सकता है। हालांकि यह संयोग है कि मोदी जी ने ब्रिटेन के प्रधानमंत्री से मुलाकात और रक्षा सौदे की खबर दी तो ट्रम्प को भी मित्र से बात करने की याद आई। वास्तविक मामला जो हो, अखबारों की प्रस्तुति तो हम देख ही रहे हैं। आज की खबर यह भी है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चित जहरीली भारतीय दवा कोलड्रिफ की निर्माता कंपनी, श्रीसन फार्मा के मालिक रंगनाथन को गिरफ्तार कर लिया गया है। यह खबर नवोदय टाइम्स में तीन कॉलम में और द हिन्दू में सिंगल कॉलम में है। द टेलीग्राफ में भी यह खबर पहले पन्ने पर सिंगल कॉलम में है। उल्लेखनीय है कि भारत में बनी, विदेशों में बिकने वाली इस दवा कोलड्रिफ से उज्बेकिस्तान में बच्चों की मौत पिछले दिसंबर-जनवरी में हुई थी। इसके बाद भी भारत बेपरवाह रहा। भारत में जब मामले आए तो इसे दबाने, छिपाने और स्वीकार नहीं करने की कोशिश हुई। कार्रवाई के नाम पर दवा लिखने वाले एक डॉक्टर को गिरफ्तार कर लिया गया। भारत के औषधि महानियंत्रक की किसी कार्रवाई की कोई खबर नहीं आई। नौ अक्तूबर को मैंने ढूंढ़ने की कोशिश की तो पता चला कि सात को उनके सक्रिय होने या दिखने की पहली खबर छपी थी। इस तरह महीनों बाद भारत में 20 बच्चों की मौत पर भी सरकार और विभाग तो सोते ही रहे। अखबारों के लिए भी यह खबर नहीं थी और आज जब पहली कार्रवाई की खबर है तो सिंगल कॉलम में निपट गई। हालांकि, सरकार को चंदा देने वाली दवा कंपनियां अगर जहर नहीं बनाएंगी तो चंदा पूजा करवाने के लिए तो नहीं ही देंगी। गिरफ्तारी में देर करके ही उसकी कीमत चुकाई जा सकती है। औषधि महानियंत्रक जैसे अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई नहीं होना या उनका देर से <क्रिय होना बताता है कि इसमें उनकी भूमिका है ही नहीं।
इसके बावजूद अखबारों की लीड आत्मनिर्भरता और स्वदेशी के प्रचार के बाद 4159 करोड़ के रक्षा सौदे की खबर है – तो समझ सकते हैं कि प्रेस की स्वतंत्रता का स्तर कितना अच्छा है। समझने वाली बात यह भी है कि अंग्रेजी अखबारों की खबर और शीर्षक से जो सूचना मिलती है वह भले वास्तविकता लगती है और होगी भी लेकिन अमर उजाला का शीर्षक ऐसा है कि पढ़ते ही सवाल उठता है, आत्म निर्भरता और स्वदेशी का क्या हुआ? आप जानते हैं कि अभी हाल में अमेरिकी टैरिफ और निर्यात की मुश्किलों से जुड़ी खबरों को छिपाने के लिए प्रधानमंत्री अचानक स्वदेशी की बात करने लगे और आत्मनिर्भर होने का ख्याल बताने लगे। समस्या यह है कि तब भी अखबार राजा का बाजा बजा रहे थे। यह पत्रकारिता नहीं है। सामान्य तो नहीं ही है। सामान्य यह होता कि कोई प्रधानमंत्री से पूछता और पूछने का मौका नहीं देते हैं तो शीर्षक लगाता कि आत्म निर्भरता और स्वदेशी का क्या हुआ? ऐसा नहीं होता है और इसका कारण सीबीआई, ईडी का डर हो सकता है और यह पाठकों, नागरिकों के साथ संपादकों को भी समझना होगा। ऐसा नहीं है कि समझना मुश्किल है लेकिन डर से या हिन्दुत्व के लिए ऐसा किया जा रहा है और खास बात है करने वाला वह है जो सत्ता की ताकत अवैध ढंग से पाए या कब्जाए बैठा हो सकता है। (जारी)
दूसरा पार्ट पढ़ें – भावनाएं सिर्फ अपनी नहीं, दूसरों की भी आहत होती हैं, स्पष्टीकरण के बावजूद ‘आहत’ रहना जबरदस्ती है
लिंक – https://www.bhadas4media.com/bhawnayen-sirf-aapkee-nahee-aahat-hoti-hain/

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। चैट जीपीटी का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


