यशवंत सिंह-
संसार में बहुत रार है। लेकिन मुझे कोई झगड़ा नज़र नहीं आता। किसलिए झगड़ना? जब कुछ बरस बाद छोड़ कर जाना ही है। कुछ बरस तो छोड़िए, अगले पल का पता नहीं। पाँच छह फुट की काया जमीं पर लुढ़की मिलेगी। और जो ज़िंदा होंगे वो तुम्हें तुम्हारी मान्यताओं के अनुरूप आग या पानी या जमीन के हवाले करने की जल्दी में होंगे। मेरी निगाह शायद गड़बड़ हो गई है या सत्य देख चुकी है। मुझे हर वक्त हर चीज में मृत्यु नज़र आता है। मुझे धरती फुल स्पीड में ब्रह्मांड में दौड़ लगाती हुई दिखती है। मुझे लाखों साल से धरती पर जीवन की आवाजाही की एक सतत परंपरा चलती हुई नज़र आती है। हमारे पहले हमारे बाद। एक क्रम है। मुझे चीजें बड़े फ़लक में दिखती हैं। तो वर्तमान में कुछ ऐसा नहीं समझ आता जिसके लिए परेशान या दुखी हुआ जाये। साक्षी भाव का सतत अभ्यास एक दिन आपको वहाँ ले जाता है जहाँ से देखने पर संसार एक लय में रोता गाता हँसता हुआ चलता दिखता है लेकिन आप इस यात्रा में कहीं नहीं होते, सिर्फ़ द्रष्टा होते हैं। आपकी कामनायें ज्ञान सागर में तिरोहित हो चुकी होती हैं।

इन दिनों मैं ख़ुद को जबरन इस संसार में रोके हुए हूँ। जबरन मतलब जबरन। मैं पक चुका हूँ। मेरा समय आ चुका है प्रस्थान का। लेकिन रोके हुए हूँ। बस निश्चित कर रहा हूँ कि मुझे इस संसार से क्या तनिक भी मोह नहीं है, क्या मुझे सच में कुछ नहीं चाहिए? आदमी पैसा सेक्स भोजन पद प्रतिष्ठा परिवार सुरक्षा आदि यही सब उत्तम रूप से चाहता है। क्या मेरी इनमें कहीं तनिक रुचि, तनिक लगाव शेष है? जवाब है – हाँ! कहीं कहीं अभी फँसा हूँ। उस फँसने को एंजॉय कर रहा हूँ। मुझे पता है ये फाँस एक दिन फुस्स हो जाएगा। एंजॉय करते करते। मैंने सब भोगा है, चरम पर जाकर। हर भोग में थोड़ा या ज़्यादा द्रष्टा भाव ख़ुद में ज़िंदा रखा जो भोगों को इवैल्यूएट करता। बताता कि इस भोग के ओर छोर क्या हैं, इस आनंद के दुख सुख क्या हैं।
जागते रहो, देखते रहो और सोचते रहो!
प्रेम करो या युद्ध, अनुभव विश्लेषित करते रहो!
एक दिन सब छोटे बच्चों का खेल नज़र आयेगा, जैसा मिर्ज़ा ग़ालिब साहब लिखते हैं-
“बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल है दुनिया मिरे आगे,
होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मिरे आगे।”
भावार्थ: दुनिया मुझे बच्चों का खेल लगती है, बहुत तुच्छ, अस्थायी और नादानियों से भरी हुई। हर दिन और हर रात, इस दुनिया का कोई नया तमाशा, नया खेल मेरे सामने चलता रहता है। ग़ालिब कहना चाहते हैं कि उन्हें जीवन की अस्थिरता और नश्वरता का इतना बोध हो गया है कि दुनिया की हलचलें भी अब केवल एक खेल या नाटक जैसी लगती हैं।
परम संत कबीर कह गए हैं –
सब जग सूता नींद भरि, संत न आवै नींद।
काल खड़ा सिर ऊपरै, ज्यौं तौरणि आया बींद॥
भावार्थ: कबीर कहते हैं कि यह संसार अज्ञान और मोह-माया की गहरी नींद में सोया हुआ है। लोग सांसारिक भोग, धन, मान-सम्मान में इतने उलझे हैं कि उन्हें जीवन की सच्चाई, मृत्यु और आत्मज्ञान, का होश नहीं है। लेकिन संत (ज्ञानी व्यक्ति) सोता नहीं है, यानी वह हमेशा सजग रहता है, उसे जीवन की अस्थिरता और समय की कीमत का बोध है। कबीर आगे कहते हैं, मृत्यु (काल) सिर पर खड़ी है, जैसे विवाह के मंडप में दूल्हा आ गया हो, यानी अब समय शेष नहीं रहा, जीवन का अंत किसी भी क्षण हो सकता है। इसलिए जागो! आत्मा की सच्चाई पहचानो, वरना यह जीवन व्यर्थ चला जाएगा।
सुबह जब नींद खुलती है तो सोचता हूँ कि अरे यार ये नींद क्यों खुल गई। नींद सात आठ घंटे सोने के बाद ही खुलती है। लेकिन नींद खुलने के बाद सोचता हूँ जाग कर करूँगा क्या। दिन भर डिप्रेशन ही होता है। मैं कौन हूँ, क्यों हूँ, कब तक हूँ, फिर कहाँ जाऊँगा, कहाँ से आया हूँ! ये सब सोचने से जो वक़्त बचता है उसमें वॉक करता हूँ। सोसाइटी के साथियों के साथ कुछ मूर्खतापूर्ण और कुछ अश्लील बातें सुनता करता हूँ। कई कई बार तो नहाने जैसा फालतू काम स्किप कर देता हूँ जब तक बीवी न हड़काये।

आज सुबह उठ गया था आठ बजे लेकिन साढ़े दस बजे तक पड़ा रहा। तरह तरह के नाटक और भाव भंगिमाओं को जीते। कभी विपश्यना करने लगता हूँ सोते सोते तो कभी सांस रोकने छोड़ने का काम। मेरे जितना ख़ाली आदमी कोई न होगा। चाचाजी की डेथ के बाद तेरह दिन कर्मकांड को देखने समझने और नाते रिश्तेदारों से मिलने जुलने में बीत गया। गांव में रात को खुले छत पर सोता। इस सोने में भी उत्तेजना रहती थी। आसमान निहारते। ओस की बूँदों को महसूसते। नेचुरल एसी वाला फील देता। अब नोएडा आ गया तो फिर से सब बोरिंग शुरू। किसी किस्म की कोई इच्छा ही नहीं होती। फिलहाल टाइमपास के लिए इस भाई की दुकान पर हूँ। शेविंग और हेड मसाज में कुछ वक्त कटेगा। क्या दुनिया में मेरे जैसा निखट्टू प्राणी कोई दूसरा है?

ज़िंदगी का सबसे एक्टिव दिन!
आज मैंने अपनी ज़िंदगी का सर्वाधिक एक्सरसाइज़ किया, 14,000 स्टेप्स वॉक और छह डबल्स बैडमिंटन मैच। शरीर थका हुआ है, लेकिन मन संतुष्ट है, पसीना बहाने और खुद को एक नए लाइफ़स्टाइल में ढालने की ख़ुशी अलग ही है।
चार दिन पहले लगातार तीन दिन बियर पीकर खुद को टेस्ट किया, यह देखने के लिए कि क्या अब गैस, एसिडिटी और H. pylori से पूरी तरह मुक्त हूँ या नहीं। रिपोर्ट ठीक रही।
अब फिर से मदिरा छोड़ दी है, इस बार मजबूरी में नहीं, बल्कि चेतन निर्णय के रूप में।
अब ये सफर है एक नई, सधी हुई फिफ्टी-प्लस लाइफ़स्टाइल की ओर।
इक अंदाजे बयां ही रंग बदल देता है
वरना दुनिया में कोई बात नई बात नहीं
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हौसले फतह की बुनियाद हुआ करते हैं
कांपते हाथ से तलवार उठाया नहीं जाता….

The desire to be loved is the last illusion. Give it up and you will be free. ~ Margaret Atwood
“प्यार पाने की इच्छा अंतिम चाहना है। इसे छोड़ दो — और तुम मुक्त हो जाओगे।”
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मार्गरेट एटवुड का यह वाक्य गहरे दार्शनिक अर्थ रखता है। मनुष्य के जीवन में प्रेम की चाह सबसे सूक्ष्म और गहरी लालसाओं में से एक है। जब कोई व्यक्ति यह चाहता है कि दूसरे उससे प्रेम करें, तो वह अपनी स्वतंत्रता किसी और की स्वीकृति पर टिका देता है।
एटवुड कहती हैं कि यह ‘प्यार पाने की इच्छा’ भी एक भ्रम (illusion) है, क्योंकि यह बाहर से आने वाली चीज़ पर निर्भर करती है — जबकि सच्ची स्वतंत्रता भीतर से आती है।
जब व्यक्ति प्रेम पाने की आस छोड़ देता है और स्वयं को पूर्ण रूप में स्वीकार करता है, तभी वह वास्तव में स्वतंत्र (free) हो पाता है।
यह संदेश आत्मनिर्भरता, आत्मस्वीकृति और आंतरिक शांति की ओर संकेत करता है — जहाँ मनुष्य दूसरों के प्रेम या मान्यता का मोहताज नहीं रह जाता।
मार्गरेट एटवुड (Margaret Atwood) कनाडा की प्रसिद्ध उपन्यासकार, कवयित्री, आलोचक और पर्यावरण कार्यकर्ता हैं। उनका जन्म 18 नवंबर 1939 को ओटावा (कनाडा) में हुआ था। वे अपने गहरे सामाजिक, नारीवादी और दार्शनिक विचारों के लिए जानी जाती हैं। उनकी प्रसिद्ध रचनाओं में The Handmaid’s Tale, Oryx and Crake, The Testaments आदि शामिल हैं।
एटवुड के लेखन में मनुष्य की स्वतंत्रता, पहचान, प्रेम, सत्ता और समाज के बीच के संबंधों का गहन विश्लेषण मिलता है।
अजीब समय है ये। रोजगार के नाम पर एक बड़ी आबादी को बारह घंटे की नौकरी और दस बारह हज़ार रुपये मंथली तनख़्वाह। ये शख़्स मिठास रेस्टोरेंट में कस्टमर्स की जूठी प्लेट्स उठाता है। मैंने इसके चेहरे को गौर से देखा। कोई भाव नहीं।
मैं शाम को वॉक करते हुए अक्सर मिठास में रुक जाता हूँ और दोस्तों संग कुछ खाता पीता हूँ। वहाँ काम करने वालों को ऑब्जर्व करता रहता हूँ। सबके चेहरे भावहीन।


इसी तरह सिक्योरिटी गार्ड्स की नौकरी।
इन लोगों को कुछ सोचने का वक्त भी नहीं मिलता होगा। रोबोट की तरह सिर्फ़ नौकरी और फिर ख़ुद को रिचार्ज करने के लिए भोजन व नींद।
शहरों में अब वन और टू बीएचके बनना बंद हो चुका है। लोअर मिडिल क्लास के पास पैसा नहीं है। मिडिल क्लास का बड़ा हिस्सा लोअर मिडिल क्लास में कन्वर्ट हो चुका है।
मुफ्त राशन पर पल रही आबादी को अब सपने पालने की इजाजत नहीं है। उनकी आँखें पत्थर की हो चुकी हैं।
मैं चाहता हूँ दुनिया की अच्छाइयाँ देखूँ लेकिन ये भावहीन सपाट चेहरे बेचैन करते हैं।
मैं इश्क़ भी लिखना चाहूँ
तो इंक़लाब लिखा जाता है!
भड़ास एडिटर यशवंत सिंह की कुछ एफबी पोस्ट्स का कलेक्शन.


