भड़ास4मीडिया की खबरें अब यूट्यूब पर भी मिलेंगी, करें चैनल को सब्सक्राइब

अगले कुछ दिनों में भड़ास4मीडिया की खबरें वीडियो फार्मेट में यूट्यूब पर भी मिला करेंगी. इसके पीछे तीन कारण हैं. अगर कोई बड़ी खबर है और उसे तुरंत शेयर करना है तो यूट्यूब के जरिए लाइव उसे ब्राडकास्ट कर दिया जाए. बाद में इत्मीनान से उसे भड़ास4मीडिया पर लिखा-पढ़ा जाए. दूसरा कारण है यूट्यूब के जरिए लाइव ब्राडकास्ट के एक बेहतरीन विकल्प का इस्तेमाल बढ़ाना ताकि इस माध्यम से उन खबरों को सामने लाया जाए जिसे आम तौर पर टीवी / चैनल वाले इग्नोर करते हैं.

तीसरा कारण है यूट्यूब एक मानेटाइज्ड प्लेटफार्म है जिसकी तकनीकी से लेकर सर्वर तक का सारा खर्च खुद यूट्यूब यानि गूगल वाले वहन करते हैं, सो इसमें निवेश लगभग शून्य है और चैनल के वीडियोज हिट होने पर बतौर पार्टनर भड़ास4मीडिया यहां से रेवेन्यूज जनरेट कर सकता है.

अगर आप यूट्यूब पर भड़ास4मीडिया के चैनल को सब्सक्राइव कर लेंगे तो लाइव ब्राडकास्ट होते ही या नया वीडियो अपलोड होते ही आपके पास नोटिफिकेशन आ जाएगा जिसके बाद आप तुरंत लाइव या ताजा अपलोड वीडियोज को वॉच कर सकेंगे. नीचे भड़ास4मीडिया के यूट्यूब चैनल का स्क्रीनशाट है. इस पर क्लिक करते ही आप यूट्यूब पर भड़ास4मीडिया के पेज पर पहुंच जाएंगे जहां टॉप में दाएं तरफ लाल रंग से चौकोर घेरे में सफेद रंग से लिखा SUBSCRIBE दिखेगा.

इस पर क्लिक करते ही आप चैनल सब्सक्राइव कर लेंगे. इसका प्रमाण होगा अब तक लाल दिख रहे सब्सक्राइव बटन का ग्रे रंग में तब्दील हो जाना. साथ ही इसके ठीक बगल में एक घंटा जैसा आइकन दिखेगा. इस घंटा पर भी क्लिक करना है यानि घंटा बजा देना है. इस पर क्लिक करने से आपको भड़ास के चैनल की गतिविधि का नोटिफिकेशन मिलने लगेगा.

 

 

उपर क्रम से चारों अवस्थाओं के स्क्रीनशाट हैं. सबसे पहले भड़ास4मीडिया के यूट्यूब चैनल का नार्मल टॉप लोगो है जहां दाहिने तरफ लाल रंग के चौकोर घेरे में सफेद रंग से SUBSCRIBE लिखा है. अगले स्क्रीनशाट में SUBSCRIBE को काले घेरे में इसलिए दिखाया गया है ताकि आप जान सकें कि आपको कहां क्लिक करके सब्सक्राइब करना है. सब्सक्राइब करते ही SUBSCRIBE का रंग लाल से ग्रे हो जाएगा. साथ ही इसके बगल में एक घंटा दिखने लगेगा. देखें तीसरे नंबर का स्क्रीनशाट. उपर आखिरी यानि चौथे स्क्रीनशाट में गोल घेरे में घंटे को दिखाया गया है जिस पर आपको क्लिक करना है.

ध्यान रखें, ये एक जरूरी काम है, जिसके जरिए आप अपने स्मार्टफोन से भड़ास के यूट्यूब चैनल से कनेक्ट रहेंगे और यूट्यूब पर भड़ास4मीडिया की हर एक गतिविधि से वाकिफ रहेंगे. संभव है, यूट्यूब पर भड़ास4मीडिया के चैनल से खबरों के प्रसारण का पहला प्रयोग आज या कल में शुरू कर दिया जाए.

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भाजपा यानि भ्रष्टाचारियों को बचाने और मीडिया पर अंकुश लगाने वाली पार्टी! (देखें वीडियो)

राजस्थान की भाजपा सरकार ने एक काला कानून बनाने की तैयारी कर ली है. इसक कानून के बन जाने के बाद भ्रष्टों के खिलाफ कोई खबर मीडिया वाले न लिख सकते हैं और न दिखा सकते हैं. महारानी वसुंधरा राजे फिलहाल लोकतंत्र को मध्ययुगीन राजशाही में तब्दील करने पर आमादा हैं. जितना विरोध कर सकते हैं कर लीजिए वरना कल को विरोध करने लायक हम सब बचेंगे ही नहीं क्योंकि देश बहुत तेजी से आपातकाल और तानाशाही की तरफ बढ़ रहा है. ज्यादातर बड़े मीडिया हाउसेज बिक चुके हैं. जो बचे हैं उनको धमका कर और पाबंदी लगाकर चुप कराया जा रहा है. राजस्थान सरकार का काला कानून पाबंदी लगाकर मीडिया को चुप कराने की साजिश का एक हिस्सा है.

भड़ास4मीडिया के संस्थापक और संपादक यशवंत एक वीडियो संदेश के जरिए समाज के सभी वर्गों से अपील कर रहे हैं कि इस काले कानून का जमकर विरोध किया जाना चाहिए ताकि राजस्थान सरकार इस अध्यादेश को वापस लेने पर मजबूर हो सके. अगर राजस्थान में यह कानून पास हो गया तो जल्द ही इसे केंद्र सरकार भी बनाने की तैयारी कर सकती है. राजस्थान की भाजपा सरकार के जरिए एक राज्य में इस कानून को बनवा कर एक तरह से टेस्ट किया जा रहा है कि इसका कितना और किस लेवल तक विरोध होता है. देखें वीडियो:

यशवंत ने इस बारे में फेसबुक पर जो कुछ लिखा है, वह यूं है :

Yashwant Singh : भाजपा वाले बहुते पतित हैं, कांग्रेसियों से भी ज्यादा. राजस्थान की भाजपा सरकार मुर्दाबाद. वसुंधरा राजे होश में आओ. मीडिया पर पाबंदी लगाने वाला कानून तुरंत वापस कराओ. आज से भाजपा का असली अर्थ जान जाइए. भाजपा यानि भ्रष्टाचारियों को बचाने और मीडिया पर अंकुश लगाने वाली पार्टी. आगे की कहानी मेरी जुबानी सुनिए। नीचे दिए वीडियो लिंक पर क्लिक करें :

https://www.youtube.com/watch?v=Wl0cAPpLPNw

इन्हें भी पढ़ें :

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आइए, सच्ची दिवाली मनाएं, मन के अंधेरे घटाएं

दिवाली में दिए ज़रूर जलाएं, लेकिन खुद के दिलो-दिमाग को भी रोशन करते जाएं. सहज बनें, सरल बनें, क्षमाशील रहें और नया कुछ न कुछ सीखते-पढ़ते रहें, हर चीज के प्रति संवेदनशील बनें, बने-बनाए खांचों से उबरने / परे देखने की कोशिश करें, हर रोज थोड़ा मौन थोड़ा एकांत और थोड़ा ध्यान जरूर जिएं.

आइए, सच्ची दिवाली मनाएं, मन के अंधेरे घटाएं.

आप सभी को दिवाली की बहुत-बहुत शुभकामनाएं.

मैं हर तरफ और हर किसी के लिए शांति-सुख-समृद्धि की कामना करता हूँ।

आभार

यशवन्त

फाउंडर, भड़ास4मीडिया डॉट कॉम

संपर्क : yashwant@bhadas4media.com

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मुझे भी यही लगता है कि भड़ास एक स्तरहीन पोर्टल है!

भड़ास के खिलाफ भड़ास निकालने वाले अभय को दिवाकर और अवनिन्द्र ने भी दिया जवाब, पढ़िए

भड़ास4मीडिया को शुरू से ही एक खुला, पारदर्शी और लोकतांत्रिक मंच बनाकर रखने की कोशिश की गई. यही कारण है कि जब जब भड़ास या इसके फाउंडर यशवंत के खिलाफ कुछ भी किसी ने लिखकर भेजा तो उसे पूरे सम्मान के साथ छापा गया. इसी क्रम में कल भड़ास के एक पाठक अभय सिंह का पत्र भड़ास पर प्रकाशित किया गया, साथ ही संपादक यशवंत द्वारा दिया गया क्रमवार जवाब भी… इसके पब्लिश होते ही दो प्रतिक्रियाएं भड़ास के पास मेल से आई हैं. बनारस से युवा पत्रकार अवनिंद्र और नोएडा से आईटी कंपनी के संचालक दिवाकर ने जो कुछ भेजा है, उसे नीचे प्रकाशित किया जा रहा है.

नोएडा से आईटी कंपनी के हेड दिवाकर प्रताप की चिट्ठी…

कल भड़ास के एक पाठक द्वारा यशवंत जी को भेजा गया एक पत्र पढ़ा जो भड़ास पर प्रकाशित हुआ. पाठक ने सवाल किया था कि ऐसा स्तरहीन पोर्टल चलाकर यशवंत क्या हासिल कर लेंगे.  मैं भी बहुत दिनों से यही सोच रहा था, बस यशवंत जी को बता नहीं पा रहा था. मुझे भी यही लगता है कि भड़ास एक स्तरहीन पोर्टल है. असल में यशवंत जी का काम ही सिरे से स्तरहीन है.

आज जब मीडिया में तमाम स्तर बन गए हैं, यशवंत उनसे कोसों दूर हैं. क्या हैं वो स्तर, बताता हूँ. पहली स्तरहीनता है चाटुकारिता की. अक्सर मीडिया संस्थान राजनीति के एक धड़े से सम्बद्ध होते हैं. जो नहीं होते वो चल नहीं पाते, या फिर अंततोगत्वा वो चाटुकारिता के स्तर पर आ ही जाते हैं.

मुझे लगता है यशवंत का काम चाटुकारिता वाले इस स्तर पर बिलकुल खरा नहीं उतरता. वो अक्सर चाटुकारों को गरियाते पाए जाते हैं. सच को सच की तरह प्रस्तुत करके उन्होंने स्थापित स्तरों के परे जाने की ही कोशिश हमेशा की है. इसलिए उनका काम बिलकुल भी स्तरीय नहीं है.

दूसरी स्तरहीनता है धन कमाने की. हमारे यहाँ मीडिया संस्थानों को उनकी पैसे कमाने की कुव्वत के हिसाब से रैंक किया जाता है. अब ये पैसा कल्पवृक्ष से तो आता नहीं, जाहिर है मीडिया संस्थानों के निहित स्वार्थों को पूरा करने के लिए गलत तरीके से कमाए गए पैसे ही होते हैं. भले ही बाद में उनको विज्ञापन की आय बताया जाए.

तो वो जो पैसा कामने का स्तर है, यशवंत उससे भी कोसों दूर हैं. कह सकते हैं कि एक बहुत बड़ी स्तरहीनता है.

तीसरा स्तर है समझौता करने वाला स्तर. अधिकतर पत्रकार और उनके संस्थान समझौता करके ही चलते हैं. किसी का स्टिंग विडियो आया तो उससे पैसा लेकर उसको दबा दिया जाता है. किसी की अन्दर की खबर प्रकाशित होती है तो कुछ समय बाद हटा दी जाती है. ये जो स्तर कायम हो गया है, उसकी आवश्यकता को यशवंत नहीं समझ पा रहे हैं. तो यहाँ भी वो स्तर वाली पत्रकारिता से बहुत दूर हैं.

चौथा स्तर है भीरूपन का स्तर. आज तमाम अपराधी हर तरह से मीडिया को दबाने का काम कर रहे हैं. ऐसे में अपनी मीडिया की दूकान को चलाने के लिए ये संस्थान पूँछ दबाकर अक्सर दुबके हुए पाए जाते हैं. यशवंत यहाँ भी दुबकने को राजी नहीं. जेल जा चुके हैं, हमला भी झेल चुके हैं. पर भीरु बनने को राजी नहीं. ये भी निरी स्तरहीनता ही है. शायद इन भीरूओं की तरह रहे तो अवश्य स्तरीय कहलायेंगे.

ऐसे और भी तमाम स्तर हैं जहाँ यशवंत फिट नहीं बैठते. उनको चाहिए कि वो इन स्थापित स्तरों के अनुसार जल्द से जल्द स्तरीय पत्रकारिता की शुरुआत करें. तब हम जैसे तमाम पाठक उनके काम को सराहेंगे. उम्मीद है जल्द ही वो इन सारे स्तरों पर पहले से अधिक फिट होंगे और अपने पाठकों का अधिक से अधिक प्यार हासिल करेंगे.

दिवाकर प्रताप सिंह
dsingh@qtriangle.in


बनारस से अवनिन्द्र कुमार सिंह का जवाब…

डियर यशवंत जी (जेल जिसकी जानेमन है), अभी-अभी व्हाट्सअप पर आप द्वारा भड़ास की खबरों को प्राप्त किया। रोजाना की तरह पहले सभी खबरों की हेडलाइन देखा। पहले मेरी नजर ‘जी न्यूज से रोहित सरदाना गए’ खबर पर टिकी, जिसके बाद अंत में ‘भड़ास के खिलाफ एक पाठक ने यूं निकाली अपनी भड़ास, ‘यशवंत जी, भड़ास का अंत आवश्यक हो गया है!’ नामक शीर्षक पर गई तो गाड़ी चलाते समय भी खुद को रोक नहीं पाया और लिंक पर क्लिक करके खबर खोला। पहले तो प्रिय अभय जी के पत्र को पढ़ा तो अचंभित रह गया फिर सोचा शायद अभय जी को यह मालूम न होगा कि किन परिस्थियों में भड़ास की शुरुआत हुई थी। मित्र आपके प्रश्नों के कुछ उत्तर आपको देने का प्रयास करता हूँ बाकी के खुद भड़ासी (यशवंत जी) ने दे दी है।

यशवंत जी जो अमर-उजाला और जागरण जैसे संस्थानों में नौकरी करने वाले वह पत्रकार थे जिसकी कलम जब सच्चाई न लिख पाती थी तो वह अपने अंदर का आक्रोश शांत नहीं कर पाते होंगे, शायद इसलिए भड़ास की शुरुआत हुई, जहा तक मैं जानता हूँ जीवन में प्रयोग करना यशवंत जी का रूटीन है। जहा तक बात मीडियाकर्मियों द्वारा यशवंत जी पर लात-घूसों से मारने का है आप उतने में ही घबरा गए मित्र। भड़ास के शुरु होने के बाद कई बड़े संस्थानों को पशीने छुटे थे अलबत्ता यशवंत जी को षड्यंत्र रचकर प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने जेल तक भेजा था, वहा भी यशवंत जी अल्हड़पन और मस्तमौला जीवन यापन करके जेल को ही ‘जानेमन’ बना लिए। जेल से छूटने के बाद जेलयात्रा का जो वृतांत ‘जानेमन जेल’ पुस्तक में लिखी उसे पढ़कर जेल नाम से भय समाप्त हो जाता है। भ्रष्ट और कारपोरेट मीडियाघराना कभी नहीं चाहता कि भड़ास सुचारु रुप से चले क्योंकि मिडियाघरानों के तहखाने की खबर, भ्रष्टाचार, यौनशोषण की बातें जनता तक पहुंचाने का कोई माध्यम न बचे।

मित्र अभय जी जिस भड़ास को आप स्तरहीन कह रहे है वह वास्तव में बाप है मीडिया का।कार्पोरेट और करप्ट मीडिया घरानों का। बात यादि अर्जित करने की है तो यशवंत जी को आर्थिक लाभ हुआ हो या नहीं मगर आत्मसंतुष्टि और लाखों पीड़ित मीडियाकर्मियों की दुआ अवश्य अर्जित हुई है।

रही बात ईमानदार और निष्पक्ष पत्रकारिता की मिसाल पेश करने की तोदिल्ली में बैठकर अकेले यशवंत जी यह काम नहीं कर सकते कारण स्पष्ट है मित्र जिस साथियों को वह जोड़ेंगे उन ईमानदार और निष्पक्ष पत्रकारों को अगले ही पल संस्थान बाहर का रास्ता दिखा देगा शायद आपको मालूम न हो कि कई मीडिया संस्थानों ने दफ्तर में भड़ास वेबसाइट को खोलने पर प्रतिबंध लगा रखा है।

मित्र आपने जो यशवंत जी से आशा कि है कि मीडिया में उनके जैसे साहसी, निडर पत्रकार की जरुरत है इसलिए भड़ास की जरुरत है। कारपोरेट मीडिया को आईना दिखाने चौथे स्तम्भ को उसकी अहमियत लगातार भड़ास बताता आया है और जो आपने भड़ास के शीघ्र त्याग की बात कही है वह होने से रहा क्योंकि जब-जब भड़ास से मदद की अपील की है तो चोरी-छिपे हजारों मीडियाकर्मियों ने देशभर से सहायता राशि भेजते होंगे क्योंकि उनका दर्द, अखबार मैनेजमेंट की तानाशाही और संपादक का तुगलकी फरमान का विरोध केवल भड़ास ही कर सकता है।

आप सबका बनारस का साथी

अवनिन्द्र कुमार सिंह
avanindrreporter@gmail.com


जिन सज्जन अभय सिंह ने भड़ास पर कल भड़ास निकाली थी, उनका एक और मेल आया है, वो इस प्रकार है…

यशवंत भैया
सादर प्रणाम

बेहद खुशी हुई कि आपने मेरी भड़ास का बड़ी बेबाकी से उत्तर दिया।पर हर प्रतिक्रिया पर तिलमिलाने की आदत से आज हर नेता,एंकर, पत्रकार पीड़ित है शायद सब्र का बांध अब टूट चुका है । मीडिया भी बिगबॉस का नकारात्मक शो बनकर रह गया है जहाँ प्रतिभागियों को लड़ा भिड़ाकर trp बटोरी जाती है। शायद स्वयं में बदलाव का ये सबसे सही समय है। मेरी आपसे बड़ी उम्मीद है और मेरा विश्वास है कि आप मेरा भरोसा नही तोड़ेंगे भड़ास से भी दूरगामी पहल करेंगे।

मैं आपके पोर्टल का अदना सा पाठक हूं ।न्यूज़,डिबेट देखने सुनने में मेरी गहरी रुचि है ।पत्रकारिता से मेरा दूर तक कोई वास्ता नहीं है ।बस दिल किया और आपको अपनी बात बता दी। पत्र में वर्तनी, वाक्यांश का दोष जरूर होगा क्योंकि अगर अंग्रेजी में टाइप करता तो शायद संवाद में कमी होती इसलिए मोबाइल पर जल्दी में हिंदी टाइप करना उचित समझा लेकिन मोबाइल पर हिंदी टाइप करना कितना कठिन है कि मेरी उंगलिया जवाब दे गई बेहतर होता कि मैं आपको हस्तलिखित पत्र स्कैन करके मेल कर देता।

मेरा आपसे यही सवाल था कि मीडिया के गुण दोषों में अपना समय बर्बाद करने की बजाय खुद एक बेहतर विकल्प बनने का प्रयास किया जाय। हम दूसरों को बदलने की कोशिश करने की बजाय खुद को ऐसा बनाये की लोग हमें देखकर अपनी गलतियों का आभास करें और उन्हें दूर करें।अगर आप किसी की भयंकर आलोचना करते है तो दो संभावनाये बनती हैं या तो आप सच्चे आलोचक हैं या ब्लैकमेलर।आज मीडिया ब्लैकमेलर की भूमिका में है जब उसके हित पूरे हो जाते है तो वे आलोचना बंद कर देते है।उदाहरण के तौर पर यूपी चुनाव में अखिलेश यादव ने लंबे समय तक ऐसा मीडिया मैनेज किया की जमीनी सच्चाई से दूर सारे पत्रकार लगातार गलत विश्लेषण कर रहे थे । चुनाव परिणाम के बाद अधिकांश पत्रकारों की राजनीतिक समझ पर खूब छीछालेदर हुई।आखिर क्या पत्रकारिता पर पेट भारी है।

मीडिया को ब्लैकमेलिंग का धंधा बनाकर अपना उल्लू सीधा करना आज आम है इसे बदलने की जरूरत है । ऐसा देखा जाता है कि जहाँ मीडिया के आर्थिक हित होते है वहाँ सही गलत का फर्क खत्म हो जाता है।

जब आप पर हमला हुआ तब मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ कि आपके भड़ास4मीडिया के अलावा कहीं भी इस बात की चर्चा तक नहीं हुई आप खुद ही अकेले लड़ते रहे।आखिर क्यों आप अकेले पड़ गए इसका आत्ममंथन आपको करना जरूरी है।

मुझे लगता है कि भविष्य में मीडिया में बड़ा बदलाव अत्यावश्यक है जिसकी आप एक बड़ी उम्मीद बन सकते है ।मैं एक पाठक हूँ अपनी राय रख सकता हूँ बाकी फैसला आपका है। भाषण में मेरा यकीन नही है हां पत्रकारिता के उभरते हनुमान को उनके बल, सामर्थ्य की की याद जरूर दिला सकता हूं।

शुरू से ही मीडिया के बदलते रंग रूप को देखकर गहरा संदेह होता है इसी को जानने के लिए भड़ास4मीडिया की मदद लेता रहा हूं।एक उम्मीद दिखती है लेकिन क्या ये सब पर्याप्त है। मेरी एक उम्मीद है कि भविष्य में ऐसा मीडिया हो जिसमे निष्पक्ष, ईमानदार लोग हो जो trp की होड़ से कोसो दूर हो। दिल्ली और हनीप्रीत के ड्रामे केअलावा देश के और भी हिस्सों की समस्याओं को सामने रखें।डिबेट में शांत संतुलित बहस हो। सत्ता के आगे रेंगने की बजाय उनसे सवाल पूछने का माद्दा हो।चैनल की विश्वसनीयता इतनी हो कि देश उस पर भरोसा करे लेकिन आज स्थिति बिल्कुल उलट है।इसमे बदलाव के वाहक आप बने यही ईश्वर से मेरी कामना है। बस एक उम्मीद से आपसे अपनी हाँफती उंगलियों को विराम देना चाहूंगा।

धन्यवाद

एक पाठक

अभय सिंह

abhays170@gmail.com


मूल मसला इसमें है…

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भड़ास पर भी लग गया ‘आनलाइन कटोरा’, आप भी कुछ डालें इसमें

Yashwant Singh : द वायर और न्यूज लांड्री जैसी कारपोरेट फंडित वेबसाइटों ने भी जनता से पैसा मांगने के लिए हर खबर के नीचेे एक कटोरा (बल्कि आनलाइन कटोरा कहना चाहिए) लगा रखा है, ”दे दो रे, सौ दो सौ तीन सौ चार सौ… जो सूझे वही दे दो क्योंकि हम लोग बड़ी किरांती कर रहे हैं.. आप जनता की खातिर…” टाइप वाला कटोरा…

कटोरा समझ रहे हैं न… चार-पांच चिल्लर उछालने से निकलती टन टन टन की आवाज के बीच दे दो रे बाबा.. भगवान भला करेगा… गाने वालों के हाथ में होता है ये..

तो द वायर और न्यूजलांड्री के आनलाइन कटोरों को देखने के बाद हमको भी लगा कि यार ये कटोरा तो भड़ास पर भी हर खबर के नीचे सटकर डटकर लगा होना चाहिए… सो फौरन अपने टेक गुरु Divakar Singh से संपर्क साधा. उनसे पूछा कि क्या यह कटोरा लगाने वाला काम आसानी से हो जाएगा? दिवाकर ने सदा की तरह कहा- आप टेंशन न लें सर, आपने कह दिया, समझो काम हो गया.

और, फाइनली कटोरा लग गया.

मजेदार ये कि कटोरा लगते ही दनादन पैसे भी गिरने लगे… अब तक साढ़े बारह हजार रुपये आ चुके हैं.. इसमें सबसे आनंद वाली चीज है कि सबसे पहले सौ रुपये उस एक लड़के ने भेजा जो पिछले काफी समय से नौकरी खोज रहा है… मैंने उसे फोन कर कहा, तूने क्यों भेजा बे… तो बोला- भइया चेक कर रहा था कि जा रहा है या नहीं… मैं बोला- तो रिफंड कर देता हूं… वो लगा हंसने.. आप भी गजबे करते हैं… चेक करने और रिफंड करने में कटोरा वाली कंपनी पांच दस रुपया काट कर कमा लगी… रहने दीजिए अपने पास…

एक बड़े आदमी नुमा मित्र ने पांच हजार रुपये इकट्ठा भेजा.. वो भी काफी समय से ठीकठाक रोजगार में नहीं हैं… मैंने कहा कि हे बड़े आदमी… माना कि आपको सौ दो सौ पांच सौ रुपये देने में शर्म लगती है सो आपने कटोरे में इंगित की गई अधिकतम राशि पर क्लिक मार कर भेज दिया लेकिन मुझे तो पता है न कि आप काफी समय से अपना बचा गड़ा माल ही निकाल कर खा रहे हैं तो फिर ये नेकी क्यों?

वो तर्क देते रहे लेकिन मैं सुना नहीं… उनका पैसा रिफंड करा दिया.. यानि उनके एकाउंट में वापस करा दिया…

मुझे तो आनंद केवल देने वालों के नाम पढ़ने में आ रहा है.. सारे नाम परिचित सुने से हैं… अच्छा लगता है जब सौ या दो सौ या पांच सौ या हजार रुपये रिसीव होने का मैसेज मेल से आता है उसमें किसी परिचित का नाम होता है, सेंडर के रूप में.. तब सच में लगता है कि लोग भड़ास को प्यार करते हैं…

और हां, अपने टेक गुरु दिवाकर जी ने भी हजार रुपये भेज दिए हैं… मतलब जिनको भड़ास से लेना चाहिए, इसका तकनीकी कामकाज देखने के वास्ते, वो भड़ास को दे रहे हैं… इनका भी रिफंड करूंगा… 🙂

लव यू आल… 🙂

सो, अब आप भी भड़ास4मीडिया डाट काम पर हर खबर के ठीक नीचे सौ, दो सौ, पांच सौ, हजार, दो हजार और पांच हजार रुपये डोनेशन देने के विकल्प को पाएंगे और उम्मीद करते हैं कि अपने सामर्थ्य भर जरूर मदद कर भड़ास4मीडिया जैसे पोर्टल को जिंदा रखने में मदद करेंगे.

भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.

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भड़ास के खिलाफ एक पाठक ने यूं निकाली अपनी भड़ास, ‘यशवंत जी, भड़ास का अंत आवश्यक हो गया है!’

यशवंत जी

भड़ास पर मेरी भी एक भड़ास है। ये भड़ास आपके पोर्टल से उत्पन्न हुई है। जब आप मीडिया के कुकृत्यों पर भड़ास निकालते हैं तो मीडिया के ही लोग आप पर लात घूसों की मुक्केबाजी करके भड़ास निकालने लगते हैं। आखिर ये सिलसिला कब तक चलेगा। जब NBA, एडिटर्स गिल्ड जैसी अनेक संस्थाएं मीडिया के कुकृत्यों पर लगाम लगाने में अक्षम हैं तो आप भड़ास जैसा स्तरहीन पोर्टल चलाकर क्या अर्जित कर रहे हैं?

बेहतर ये होता कि आप खुद गंभीर पहल करके मीडिया के अच्छे पत्रकारों का एक अलग समूह बनाते जिसमें ईमानदार-निष्पक्ष पत्रकारिता की मिसाल पेश की जाती जो देश के बिकाऊ मीडिया के लिए आईना होती। गंभीर आर्थिक संकटों से गुजरते मीडिया की मजबूरियों को भी समझना जरूरी होगा। साथ ही मीडिया के टीआरपी होड़ पर भी गौर करना जरूरी होगा।

भड़ास की बेशर्मी वाली भाषा न तो पाठकों को सुकून देती है ना ही आप को। हाल ही में आप पर लात घूसों से हमला हुआ पर इक्का दुक्का छोड़ कोई मीडिया आपके समर्थन में नही आया। मुझे लगता है कि मीडिया को आप जैसे साहसी निडर पत्रकार की जरूरत है जो निष्पक्ष, ईमानदार बेबाक पत्रकारिता से कारपोरेट मीडिया को आईना दिखा सके और उसे चौथे स्तम्भ की अहमियत बताये। यशवंत जी, आप भड़ास जैसे पोर्टल का शीघ्र त्याग करेंगे, यही मेरा आपसे निवेदन है।

एक पाठक

अभय सिंह

abhays170@gmail.com


अभय के उपरोक्त पत्र का भड़ास एडिटर यशवंत ने यूं दिया क्रमवार जवाब…

शुक्रिया अभय भाई, पत्र लिखने के लिए, और अपने दिल-मन में अटकी हुई भड़ास निकालने के लिए… आपने जो कुछ कहा है, उसे उद्धृत करते हुए सिलसिलेवार मैं अपना जवाब लिख रहा हूं…

-मीडिया के ही लोग आप पर लात घूसों की मुक्केबाजी करके भड़ास निकालते है। आखिर ये सिलसिला कब तक चलेगा?

(अरे भाई, पहली बार हमला हुआ है, वो भी पोलखोल खबर के कारण. यह तो भड़ास पोर्टल की सफलता है. क्या पत्रकार हमले, जेल और पुलिस के डर से पत्रकारिता करना बंद कर दें? और हां, आगे भी हमले होंगे, यह जानता हूं. आगे भी जेल जा सकता हूं, यह जानता हूं. तो, भय के कारण हम अपने कर्तव्य, अपने काम से विमुख हो जाएं, ये तो कोई तरीका न हुआ ब्रदर. सिलसिला चलते रहना चाहिए… मैं अपना काम करूंगा… वो अपना काम करें… वो कहानी पढ़ी है न आपने… साधु और बिच्छू वाली… साधु बार बार बिच्छू को बहते नदी से निकाल कर उसकी जान बचाने की कोशिश करे और बिच्छू बार-बार उसे डंक मार दे… दोनों अपना अपना काम कर रहे थे… साधु अपनी साधुता नहीं छोड़ रहा था और बिच्छु अपने डंक मारने के स्वभाव से मजबूर था… )

-जब NBA, एडिटर्स गिल्ड जैसी अनेक संस्थाएं मीडिया के कुकृत्यों पर लगाम लगाने में अक्षम है तो आप भड़ास जैसा स्तरहीन पोर्टल चलाकर क्या अर्जित कर रहे हैं?

(एनबीए, एडिटर्स गिल्ड जैसी अनेक मीडिया संस्थाएं मीडिया के कुकृत्यों पर लगाम लगाने के लिए नहीं बनी हैं बल्कि ये मीडिया के कारपोरेट मालिकों और मीडिया के करप्ट संपादकों की रक्षा के लिए कवच हैं… इन संस्थाओं के जरिए कारपोरेट मीडिया मालिक और उसके करप्ट संपादक देश की सरकारों से बारगेन करते हैं, चौथे स्तंभ का मुलम्मा ओढ़कर और ढेर सारी सुविधाएं हासिल करते हैं, ढेर सारे लाभ लेते हैं. ये संस्थाएं सच्चे पत्रकारों और सच्ची पत्रकारिता का साथ नहीं देतीं… जनहित की पत्रकारिता पर ये चुप्पी साधे रहते हैं… ये केवल कारपोरेट मीडिया हाउसेज की रक्षक संस्थाएं हैं इसलिए इनसे मीडिया के कुकृत्यों पर लगाम लगाने की उम्मीद करना ही बेमानी है. रही बात भड़ास के स्तरहीन होने की तो ये बात उन हजारों पत्रकारों से पूछिए जिनकी मजीठिया वेज बोर्ड की लड़ाई में भड़ास न सिर्फ एक मंच और अगुवा बना बल्कि सुप्रीम कोर्ट में लड़ाई लड़ने में बड़ा माध्यम बना. देश भर के हजारों पत्रकारों को एकजुट कर पाने के लिए भड़ास ही निमित्त बना हुआ है. शोषित पत्रकारों की आवाज को उठाने का एकमात्र मंच भड़ास बना हुआ है… सैकड़ों उदाहरण हैं पिछले दस साल के जब भड़ास ने साहस के साथ सच को उजागर कर आम मीडियाकर्मयिों की आवाज को बुलंद किया और कारपोरेट मीडिया के मुंह पर कालिख पोतकर नंगा किया. राडिया टेप कांड हो या नवीन जिंदल सुधीर चौधरी स्टिंग, ऐसे दर्जनों मामलों को भड़ास ही पब्लिश कर सका क्योंकि मीडिया से जुड़े ये घपले घोटाले उठाने के लिए कारपोरेट मीडिया वाले तैयार न थे.. चोर-चोर मौसेरे भाई के अंदाज में चुप्पी साधे थे… हो सकता है आपको भड़ास स्तरहीन लगता हो… मुंडे मुंडे मतिर्भिन्ना… जाके रही भावना जैसी, प्रभु मूर देखी तिन तैसी… दिन भर पोर्न और घटिया खबरें छपने वाले बड़े बड़े मीडिया हाउसों के पोर्टल आपको अच्छे लगते हैं और भड़ास स्तरहीन तो भई मुझे इस पर कुछ नहीं कहना…)

-बेहतर ये होता कि आप खुद गंभीर पहल करके मीडिया के अच्छे पत्रकारों का एक अलग समूह बनाते जिसमें ईमानदार निष्पक्ष पत्रकारिता की मिसाल पेश की जाती जो देश की बिकाऊ मीडिया के लिए आईना होती।

(-सब काम हमहीं कर लेंगे तो आप क्या करेंगे…. खाली भाषण देंगे भाई? …ज्यादा अच्छा होता कि मुझे चिट्ठी लिखने से पहले इस काम के लिए आप पहल शुरू कर देते… ये बीड़ा आप उठाते… वैसे भारत में ‘पर उपदेश कुशल बहुतुरे’ बहुत हैं… राय बहादुर बहुत सारे लोग हैं… गला फाड़ ढेर सारे लोग हैं.. भाषणबाज और बतोलेबाजों की कमी कहां अपन के देश में… उम्मीद करता हूं आप बतोलेबाज नहीं होंगे.. तो बताइएगा कि आपने क्या पहल की है और अब तक क्या किया है पत्रकारिता में…)

-भड़ास की बेशर्मी वाली भाषा न तो पाठक को सुकून देती है ना ही आप को।

(भाषा बहता हुआ जल है. इसे आम जन से जुड़ा हुआ यानि बोलचाल वाली सहज सरल होनी चाहिए… बाकी, आप अगर साहित्य थोड़ा-बहुत भी पढ़े होते (अपढ़ नहीं कहूंगा आपको क्योंकि आप लिख तो लेते हैं, हालांकि ढेर सारी वर्तनी और वाक्य विन्यास की त्रुटियां हैं, सो आपकी पढ़ाई-लिखाई के लेवल को स्तरहीन कह सकता हूं) तो आप भड़ास की भाषा पर आपत्ति न करते. काशीनाथ सिंह का एक उपन्यास है, बनारस पर, अस्सी घाट पर, इसे आप लेकर पढिएगा फिर जानिएगा भाषा चीज क्या होती है… वैसे, मैं जानना चाहूंगा कि आपको भड़ास की किस खबर का कौन सा शब्द बेशर्मी भर लगा जिसके आपका सुकून चैन छिन गया.. आप अगर उदाहरण यानि फैक्ट्स के साथ बात करते तो मैं शायद ठीक से जवाब दे पाता..)

-आप पर लात-घूसों से हमला हुआ पर इक्का-दुक्का छोड़ कोई मीडिया आपके समर्थन में नहीं आया।

(हम इस उम्मीद में काम नहीं करते मुश्किल वक्त आने पर आप या वो मेरे समर्थन में आएं.. मीडिया तो वैसे ही मेरे यानि भड़ास के खिलाफ रहता है क्योंकि उनकी पोल तो भड़ास ही खोलता है… दूसरे हम जिन आम मीडियाकर्मियों के मंच हैं, आवाज हैं, वो बेचारे अपनी जरूरतों-संघर्षों और मीडिया संस्थानों में अपनी नौकरियों को लेकर इतना बिजी हैं, परेशान हैं कि उनसे अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह मेरे लिए सड़क पर आकर मार्च करें. खबर लिखने के कारण, पोलखोल के कारण हमले होना कोई नई बात नहीं है… बहुत सारे पत्रकारों ने इसके लिए जान तक गंवाए हैं… पर पत्रकारिता बंद तो नहीं हुई… लोगों ने पत्रकार बनना बंद तो नहीं किया… आज भी बहुत सारे जोरदार पत्रकार हैं जो जान की बाजी लगाकर काम कर रहे हैं…. मैं जेल भी गया… इसी भड़ास के कारण… तब भी कौन पूरा देश उठ खड़ा हुआ था मेरे समर्थन में…. पर जेल से लौटकर भड़ास तो नहीं बंद किया… मैंने हमलावरों को माफ कर दिया.. उनके खिलाफ एफआईआर तक नहीं कराया… एक वकील मित्र के दबाव देने पर केवल लिखित कंप्लेन थाने में दे आया था ताकि सनद रहे. गीता में कहा गया है, काम किए जाइए, नतीजे की परवाह न कीजिए… भड़ास अब कुछ वैसा ही हो गया है मेरे लिए… बहुत सारे लोगों के साथ भीड़ नहीं दिखती लेकिन उनके पास अदृश्य ताकतें खड़ी होती हैं, कोस्मिक एनर्जी की लेयर्स उन्हें प्रोटेक्ट करती हैं… आंतरिक यात्रा की इन बातों को आप न समझ पाएंगे क्योंकि इतना कुछ समझ पाते तो आपकी चिट्ठी की लाइनें वाक्य शब्द कुछ और होते. वैसे, आपको लगता है कि मेरे पर हमले के बाद केवल इक्का-दुक्का लोग ही खड़े हुए… मैंने तो देखा, हजारों मैसेजेज, फोन काल्स, आर्टकिल्स आए मेरे पास… कुछ ऐसे लोग भी मिले जो हमलावरों को उन्हीं की भाषा में जवाब देने के लिए तत्पर थे… पर मुझे सड़क चलते मिले कुछ पागलों से उलझना न था, आगे बढ़ जाना था इसलिए जो कुछ हुआ उसे इगनोर किया, उन पागलों को माफ किया और अपने काम पर लग गया.)

-मेरी आपसे आशा है कि मीडिया को आप जैसे साहसी निडर पत्रकार की जरूरत जो निष्पक्ष, ईमानदार बेबाक पत्रकारिता से कारपोरेट मीडिया को आईना दिखा उस 4th स्तम्भ की अहमियत बताये। यशवंत जी आप भड़ास जैसे पोर्टल का शीघ्र त्याग करेंगे यही मेरा आपसे निवेदन है।

(एक तरफ मुझे आप साहसी निडर जाने क्या क्या बता रहे हैं और फिर भड़ास के त्याग के लिए भी कह रहे हैं.. ये कांट्राडिक्टरी स्टेटमेंट समझ नहीं पाया… खैर, चलिए, आपका कहना मान लेते हैं. लो अभी से त्याग दिया भड़ास… अब आगे बताइए. क्या किया जाए? क्या कोई आपके पास एक्शन प्लान है? या यूं ही भड़ास के खिलाफ भड़ास निकालने के लिए भड़ास निकाले हैं.. वैसे, भड़ास को बंद करने के लिए मैं भी अक्सर सोचता रहता हूं लेकिन उसकी वजह दूसरी है… अगले दस साल कुछ दूसरा काम यानि घुमक्कड़ी, आंतरिक यात्रा, अध्यात्म आदि को देना चाहता हूं… पर आप जिन कारणों से भड़ास मुझसे बंद कराना चाहते हैं, वो मेरी समझ से परे है)

आभार

यशवंत

yashwant@bhadas4media.com


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‘भडास4मीडिया’ के बाद ‘कैफे भड़ास’ शुरू, देखें यहां कैसे निकालते हैं ‘भड़ास’! (वीडियो)

Kunal Verma : सुना है आपने ‘कैफे भड़ास’ के बारे में? मुझे पता है आप लोगों में अधिकतर ने भड़ास का नाम सुना होगा। हां वही भड़ास जो फ्रस्ट्रेशन के नाम से हमारे मन के भीतर होता है। मीडिया के लिए चर्चित तब हुआ जब वरिष्ठ पत्रकार यशवंत सिंह ने मीडिया के लोगों को अपना फ्रस्ट्रेशन निकालने के लिए एक मंच प्रदान किया। इसे नाम दिया ‘भड़ास फॉर मीडिया’। तमाम झंझावतों को झेलते हुए भड़ास फॉर मीडिया आज भी हिंदी का सबसे लोकप्रिय साइट बना हुआ है। लोकप्रिय क्यों है, यह एक रिसर्च का विषय है। पर साधारण शब्दों में कहा जाए तो सभी के अंदर कुछ न कुछ भड़ास है जिसे वह पढ़कर, लिखकर, सुनकर, बोलकर निकाल लेना चाहता है। भड़ास ने वह प्लेटफॉर्म सभी को दिया।

अब जिस भड़ास की मैं बात आपको बताने जा रहा हूं उसके बारे में शायद आपने कभी नहीं सुना होगा। यह है ‘कैफे भड़ास’। इंदौर में इस कैफे का संचालन होता है। मैंने इस कैफे भड़ास के बारे में आज ही सुना है। बड़ा रोमांचक लगा इसीलिए आपसे इसकी बातें साझा कर रहा हूं। कल टीम इंडिया से बुरी तरह हारने के बाद आस्ट्रेलिया टीम के कुछ प्लेयर्स यहां पहुंचे थे। इन खिलाड़ियों ने बेसबॉल की बैट से टीवी, कंप्यूटर और अन्य सामनों को तोड़कर अपनी भड़ास निकाली।

यह भड़ास निकालने का अनोखा प्लेटफॉर्म हैं। यहां आप अपनी फ्रस्ट्रेशन निकालने के लिए खूब तोड़-फोड़ कर सकते हैं। आस्ट्रेलिया के डीन जोन्स और ब्रैड हॉग ने कहा है कि हार से हम फ्रस्टेड हो गए हैं। अब फ्रस्टेशन निकल गया है। अगले मैच में जीत के लिए हम तरोताजा हो चुके हैं। एक वीडियो भी है जिसे शेयर कर रहा हूं। आप भी इस कैफे भड़ास का मजा लें। देखें वीडियो…

‘आज समाज’ अखबार के संपादक कुनाल वर्मा की एफबी वॉल से.

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क्या ‘भड़ास टास्क फोर्स’ बनाने का वक्त आ गया है?

भड़ास संपादक यशवंत पर पत्रकार कहे जाने वाले दो हमलावरों भूपेंद्र नारायण भुप्पी और अनुराग त्रिपाठी ने प्रेस क्लब आफ इंडिया के गेट पर हमला किया था. उस हमले से उबरने के बाद यशवंत ने अपने भविष्य की योजनाओं को लेकर काफी कुछ खुलासा किया है. इसमें एक भड़ास टास्क फोर्स बनाने का प्रस्ताव भी शामिल है.

इस बाबत यशवंत ने फेसबुक पर जो लिखा है, वो इस प्रकार है…

यशवंत ने अपनी पूरी बात इस वीडियो में कही है…

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तंबाकू, गुटखा, सिगरेट, सुर्ती, पान खाने वाले इस वीडियो को जरूर देखें

भारत में तंबाकू का प्रचलन बहुत ज्यादा है. हर दूसरा शख्स किसी न किसी रूप में तंबाकू का सेवन करता मिल जाएगा. इस कारण से भारत में तंबाकू जनित रोगों के शिकार भी काफी मात्रा में होते हैं. आप अगर किसी भी रूप में तंबाकू लेते हैं, मसलन सिगरेट, गुटखा, पान, सुर्ती, जर्दा आदि तो आपको जरूर यह वीडियो देखना चाहिए. आपको यह वीडियो देखकर टेस्ट करना चाहिए कि आप कहीं मुंह के किसी रोग के शिकार तो नहीं होने जा रहे.

भड़ास4मीडिाय डाट काम के संपादक यशवंत सिंह खुद तंबाकू का सेवन करते रहे हैं लेकिन आजकल उन्होंने इससे तौबा कर लिया है. वह एक डाक्टर मित्र की सलाह पर रोजाना मुंह से संबंधित एक एक्सरसाइज करते हैं. साथ ही यह टेस्ट भी करते रहते हैं कि उनका मुंह नार्मल हुआ या नहीं. तंबाकू सेवन से आपका मुंह असामान्य हो चुका है या नहीं, इसे कैसे सामान्य किया जाए, यह जानने के लिए इस वीडियो को देखें…

https://www.youtube.com/watch?v=Q6v8Gq9x-aU

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भड़ास4मीडिया के भविष्य को लेकर यशवंत ने क्या लिया फैसला, जानें इस एफबी पोस्ट से

Yashwant Singh : ऐ भाई लोगों, कल हम पूरे 44 के हो जाएंगे. इलाहाबाद में हायर एजुकेशन की पढ़ाई के दौरान ओशो-मार्क्स के साथ-साथ अपन पामोलाजी-न्यूमरोलॉजी की किताब पर भी हाथ आजमाए थे. उस जमाने में हासिल ज्ञान से पता चलता है कि मेरा जन्मांक 8 और मूलांक 9 है. जन्मांक छब्बीस का छह और दो जोड़कर आठ बना इसलिए आठ हुआ. मूलांक तारीख, महीना और साल जोड़कर पता किया जाता है जो मेरा 9 होता है. इस बार जो 26 अगस्त सन 2017 है, इसका योग 8 बैठ रहा. 44 साल का होने के कारण चार प्लस चार यानि आठ हो रहा. मतलब जन्मांक और मूलांक दोनों आठ हो रहा है. ग़ज़ब संयोग या दुर्योग, जो कहिए, बैठ रहा है इस बार. वैसे, अपन तो कई साल पहले लिख चुके हैं कि बोनस लाइफ जी रहा हूं, इसलिए हर दिन जिंदाबाद. 🙂

अपने एक पत्रकार साथी मृदुल त्यागी, दैनिक जागरण मेरठ के जमाने में ज्योतिषीय ज्ञान-गणना के आधार पर राहु-केतु टाइप के दो खूंखार जीवों / ग्रहों-नक्षत्रों का मुझ पर भयंकर प्रकोप बताया-समझाया करते थे. तब मुझे मन ही मन लगता रहा कि जरूर ये मूलांक 9 वाला अंक राहु है और जन्मांक 8 वाला केतु. अंक ज्योतिष के हिसाब से 8 वाला अंक थोड़ा क्रिएटिव पर्सनाल्टी डेवलप करता है और 9 वाला दुस्साहसी / खाड़कू / दबंग टाइप का. जब दोनों साथ हों तो आदमी ‘एक तरफ उसका घर एक तरफ मयकदा’ मार्का द्वंद्व समेटे हुआ जीवन के हर क्षण को हाहाकारी टाइप से जीता है. अपन का भी कुछ कुछ ऐसा रहा है. 🙂

ऐसा लग रहा है कि राहु-केतु मेरा पिंड छोड़ रहे हैं. ज्योतिष के विद्वान लोग बताएं कि क्या मेरे इस बर्थडे पर राहु और केतु की अनंत प्यास बुझ जाएगी और वो मेरा पिंड छोड़कर मेरे किसी ‘चाहने’ वाले के कपार पर सवार हो उसे सदा के लिए बेचैन आत्मा बनाकर छोड़ेंगे 🙂

मौज लेते रहना चाहिए.

इस जन्मदिन पर मैं क्या सोच-गुन रहा हूं?

बस दो चीजें.

एक तो सोचने-दिमाग लड़ाने का काम लगभग बंद कर रहा हूं. ‘जाहे विधि राखे प्रभु, ताहे विधि रहिए’ वाला मेरा हाल हो गया है. इस रास्ते पर चलते हुए लग रहा है कि चलते रहो, जब जीवन का अंतत: कोई मकसद ही नहीं होता तो फिर काहें को टेंशन लेने का, हर साल का चार्ट काहें को तैयार करने का. तत्काल में यानि तुरंत में जीते रहो, न अतीत को लेकर परेशान होओ और न भविष्य को लेकर चिंतित. तत्क्षण को उदात्त तरीके से जीते रहो. जीवन यापन के लिए जो करो, इतने कलात्मक ढंग से, इतने मन से और इतने डूब कर करो कि वही तपस्या और ध्यान बन जाए.

बीते दो दशकों के दौरान समझ, संघर्ष, समय, चेतना और नियति आदि के मेलजोल के चलते अब एक जाग्रत भाव-सा निर्मित हुआ है. यह भाव महसूस किया जा सकता है, बताया नहीं जा सकता, क्योंकि जो इससे वंचित है, वह सारा का सारा शब्दजाल मानेगा. एक नया जीवन चर्या डेवलप होने लगा है. पुराने संस्कारों की ज़िद खत्म होती जा रही है. नई लाइफस्टाइल ने खुद ब खुद जगह बनाना शुरू किया है. एक ट्रांजीशन फेज चल रहा था पिछले चार पांच साल से, वह पूरा होने की ओर है. सहजता और शांति, ये ऐसी चीजें हैं जो बीते एक साल के दौरान शिद्दद से खुद के भीतर महसूस किया, कर रहा हूं. इन्हें खदेड़ने के वास्ते बाहरी तौर पर बेहद अशांत और असहज माहौल क्रिएट करता रहा, जान बूझ कर, पर जीतता रहा अंदर वाला ही. अपने आप.

किसी भी चीज की परवाह न करना, तत्क्षण में जीना, किसी भी तर्क-वितर्क या घटनाक्रम की निर्रथकता महसूस करना, ‘ये हो जाएगा तो क्या हो जाएगा और वो नहीं हो रहा तो क्या बिगड़ रहा’ टाइप फीलिंग का घर करते जाना… ये सब मिलाकर एक अ-सामाजिक सा व्यक्तित्व निर्मित होता रहा. एक शब्द आता है हाइबरनेशन. शायद मेरे मामले में उसी की बारी है. अतिशय उर्जा खर्च कर अब तक का भड़ भड़ टाइप जिया हुआ करियरवादी / क्रांतिकारी / अराजकतावादी (जिसे जो मानना हो माने, अपन तो जीवन को समग्रता में देखते हैं) जीवन फिलहाल इनके इतर या इन्हीं चीजों के दूसरे कांट्रास्ट / छोर की तरफ शिफ्ट हो गया है. सबका भला हो, सबको प्रेम मिले, सब सहज हों, सब भयमुक्त हों. ऐसा फील आने लगा है. ऐसा करने-कराने का मन करने लगा है. पहले भी थी, लेकिन तब दूसरे रास्ते तलाशे जाते थे. दूसरे हथियार अख्तियार किए जाते थे. अब तो अलग बात है. अब तो सहज बात है.

इस आंतरिक मन:स्थिति के इस लेवल की ज्यादा व्याख्या यहां संभव नहीं है. शब्द शायद सटीक न मिलें और इसके अभाव में व्याख्या कहीं सतही न हो जाए. वैसे भी, आंतरिक यात्राएं अधिकांशत: निजी हुआ करती हैं. बाहरी यात्राएं अक्सर सामूहिकता और परंपरा का स्वभाव लिए होती हैं. अध्यात्म आंतरिक यात्रा से जुड़ा मामला है. इसमें बाहरी मदद ज्यादा नहीं मिल सकती. इसमें सामूहिकता का कोई ज्यादा मतलब नहीं है. अप्प दीपो भव: वाली स्थिति होती है यहां. विज्ञान और व्यवस्था आदि चीजें परंपरा दर परंपरा निर्मित होती रहती है. इसमें हर पीढ़ी कुछ न कुछ जोड़ती रहती है. और, हर आदमी के जाग्रत होने के खुद के रास्ते तरीके होते हैं. फिलहाल इस विषय को यहीं छोड़ते हैं. यह इतना बड़ा टापिक है, इतने डायमेंशन हैं कि इसे लिखा नहीं जा सकता. दूसरे, अगर सब लिख दिया तो उसे सब महसूस नहीं कर सकते.

अब दूसरी बात. भड़ास को 26 अगस्त को बंद करने को लेकर जो मेरा ऐलान था, उसके बाद से लगातार मंथन, चर्चा और विमर्श अलग-अलग लोगों से होता रहा. तय फिलहाल ये हुआ कि भड़ास को बंद न किया जाए. और, इसमें बहुत ज्यादा उर्जा भी न खर्च की जाए. इसके संचालन के लिए आय के स्रोत क्रिएट करने को लेकर कई किस्म की चर्चाएं हुईं. मेरा निजी मन भड़ास से इतर कुछ नये आंतरिक प्रयोगों को लेकर है, सो भड़ास मेरी प्रियारिटी में न रहेगा. हां, बड़ा प्रकरण / मामला आएगा तो छोड़ेंगे नहीं, छोटे-मोटे मामलों का लोड लेंगे नहीं.

आखिरी बात. जो कुछ विजिबल है, उतना ही गहरा, उतना ही मजबूत इनविजिबल चीजें हैं. उर्जानांतरण इधर से उधर होता रहता है. इसे आप विजिबल मोड में फील कर सकते हैं, उस पाले, यानि इनविजिबल हिस्से को महसूस कर सकते हैं. इसके लिए दिन के उजाले से बचिए, रातों की दिनचर्या शुरू करिए. रात में बगल के पेड़ से आ रही चिट चिट वाली गिलहरी की आवाज के जरिए गिलहरी की रातचर्या को महसूस करिए. अगल-बगल दिखने वाले कुछ चुनिंदा अंधेरों से बतियाइए, उनसे दोस्ती करिए. ये सब एक डोर हैं जिनके जरिए आगे बढ़ा जा सकता है.

फिलहाल जैजै वरना कमरेडवा सब कहेंगे कि गड़बड़ा गया है 🙂

पर ये भी सच है कि ‘सबसे बड़ा रोग, क्या कहेंगे लोग.’ इसलिए मस्त होकर अपनी लाइफ खुद चुनिए, जीइए.

फिर से जैजै मित्रों.

भड़ास के एडिटर यशवंत की एफबी वॉल से.

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भड़ास4मीडिया की मौत का ऐलान हम सबके लिए एक बुरी खबर है

चर्चित मीडिया केन्द्रित वेबसाइट भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत सिंह ने ऐलान किया है कि 26 अगस्त से वेबसाइट का संचालन बंद कर दिया जाएगा। पिछले एक दशक से मीडिया संस्थानों के न्यूज़ रूम के अंदर और बाहर पत्रकारों और उनके मालिकों के अच्छे-बुरे कर्मों को बेबाकी के साथ प्रकाशित करने वाले यशवंत सिंह आर्थिक संकट की वजह से भड़ास को बंद करने की बात पहले भी करते रहे हैं, लेकिन जैसे-तैसे यह वेबसाइट अब तक चलती आ रही है।

अब एक बार फिर यशवंत सिंह ने बकायदा 26 अगस्त का दिन मुर्करर करते हुए भड़ास को बंद करने का ऐलान किया है। यशवंत ने इसकी वजह आर्थिक संकट के साथ ही हिन्दी समाज और समझ को बताया है। भड़ास की भूमिका का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यह वेबसाइट देश के ज्यादातर हिन्दी अखबारों व न्यूज़ चैनल के कार्यालयों में बैन कर दी गई है। संपादक की कुर्सी पर बैठकर सामंतों की तरह व्यवहार करने वाले मालिक-संपादकों को हमेशा इस बात की चिंता रहती है कि कहीं उनके काले कारनामे लीक होकर भड़ास तक न पहुंच जाएं। संपादकों की अयाशी से लेकर दलाली तक की खबरों को भड़ास पर जगह मिलती रही है।

मीडिया के भीतर की सड़ाध को बाहर लाने में भड़ास का एक अहम रोल रहा है। यही वजह रही है कि भड़ास, भ्रष्ट व सत्ता की दलाली करने वाले पत्रकार व मीडिया मालिकों की आंख की किरकिरी बना रहता है। हालांकि भड़ास पर भी आरोप लगता रहा है कि वह एकतरफा रिपोर्टिंग के जरिये सनसनी की तरह खबरें प्रकाशित करता है और गाहे-बगाहे चिरकुट किस्म के धंधेबाजों को जरूरत से ज्यादा स्पेस देता है।

ऐसे वक्त में जब भारत में मीडिया का कारपोरेटीकरण तेजी से हो रहा हैे, और मीडिया संस्थाओं के न्यूज़ रूम में साजिशों, षडयंत्रों का सिलसिला पहले से और भयावह होता जा रहा है, तब भड़ास जैसी संस्थाओं का होना और भी बेहद जरूरी है। ऐसे में भड़ास की बंदी का ऐलान हम सब जो भी उसके चाहने वाले हैं, के लिए एक बुरी खबर है। इस पर हम मातम ही मना सकते हैं! यशवंत की हिम्मत अब अगर जवाब दे रही है और वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि  भड़ास के लिए अब मौत ही बेहतर विकल्प है तो यही सही! नई यात्रा के लिए शुभकामनाएं!

लेखक दीपक आज़ाद उत्तराखंड के तेजतर्रार पत्रकार और ‘वाचडाग‘ के एडिटर हैं.

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यशवंत ने फेसबुक पर लिखा- ”26 अगस्त से भड़ास बंद!”

भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत ने फेसबुक पर एक छोटी-सी पोस्ट डालकर ऐलान किया कि भड़ास4मीडिया का संचालन 26 अगस्त से बंद कर दिया जाएगा. इसके पीछे उन्होंने वजह आर्थिक संकट के साथ-साथ हिंदी समाज व इसकी समझ को भी बताया है. इस ऐलान के बाद आए सैकड़ों कमेंट्स में से कुछ चुनिंदा यहां दिए जा रहे हैं…

Kamal Kumar Singh स्टेटस रात 12 बजे के बाद आया है। पब्लिक टेंशन न ले। 🙂

Yashwant Singh मैंने अपनी ज़िंदगी के सारे बड़े फैसले नशे में लिया, लेकिन लंबी आंतरिक उत्तेजना और शांति के साथ।

Ashutosh Dixit नहीं बंद होगा, क्योंकि फिर कोई जगा देगा आपके अंदर की भड़ास..शुभकामनाएं, नए युद्ध की जो जल्द शुरू होगी भईया…

Yashwant Singh शायद अब नहीं। मेरी आंतरिक यात्रा का आवेग प्रबलता शायद बाहरी से प्रभावित न हो। ये एक लंबे समय से स्थगित फैसले का एक सही वक्त पर एलान ही है।

Kamlesh Kumar बेहद दुखद… आप हार मानने वालो में से नही हो भाई

Yashwant Singh सच है। लेकिन आंतरिक आदेश के लगातार आह्वान का अनुपालन हार नहीं बल्कि एक नया आगाज़ है।

Arpan Jain हर समस्या का समाधान बना है… इसका भी निकलेगा… आप सुधि साथियों से सहयोग ले सकते है… मैं भी तैयार हुँ… परन्तु यह अनंत की यात्रा की रुकावट असहनीय है….

Yashwant Singh अनंत की यात्राएं हमेशा आंतरिक होती हैं। बाहरी अनंत यात्राएं अम्बानी टाइप लोग करते हैं।

Nikhil Dave सबसे कठिन दौर सफलता के पहले का पड़ाव है। हिम्मत रखिए, भड़ास बनी भी रहे और निकलती भी रहे ।

Yashwant Singh मेरी कोई रुचि नहीं बची, न मुझे चंदा चाहिए।

Vishnu Rajgadia आप एक जरूरी काम कर रहे हैं और आप इसे अब छोड़ नहीं सकते।

Yashwant Singh कभी कामरेड था काफी समय से बिल्कुल नहीं हूं। जन सरोकार की मेरी प्रतिबद्धता निजी रही है। अब नितांत निजी प्रयोगों जीवन से दो- चार होने की आकांक्षा है।

Santosh Singh भड़ास के बंद होने की सूचना भड़ास पर डालिए बाकि खबर कॉमेंट बॉक्स में। काहे पका रहे हैं लोगों को।

Yashwant Singh कल लग जाएगा। और, तय तारीख पर बन्द भी हो जाएगा। ज्यादा लोड न लें।

Santosh Singh aisa nahi hoga. chalta rahe ye apecha

Fareed Shamsi hahahah kya baat hai yashvant bhai phirki le rhen sabhi ki, ek waqt ko sans lena to bhul sakten hain, lekin bhadas band ho jaye ye kabhi ho hi nahi sakta hai

Yashwant Singh ये एक नंगा सच है। कुबूल करिए।

Vijay Vardhan अपने समर्थकों को प्रेरित कर रहे हैं ठीक हैं, अन्यथा गलत

Yashwant Singh दोनों काम नहीं कर रहा।

Ghanshyam Dubey क्या किसी ने मुहूर्त बताया है ? फिर कुछ और होगा ! भड़ासी चुप बैठ ही नही सकता न !! देखते हैं…..!!

Yashwant Singh हम देखेंगे, लाज़िम है कि हम भी देखेंगे

Reetesh Tewari यशवंत भाई, उत्तम फैसला, क्योंकि धाराएं कभी ठहरी नहीं, उनका काम है बहना। पानी गर रुक गया तो सड़ान्ध मारने लगता है। अपने प्रयोगधर्मी दिमाग में कुछ नया सोचे, भड़ास से भी बेहतर।

Yashwant Singh सबसे बेहतर कमेंट। लव यू। आगे की यात्रा नितांत निजी है भैया।

Nadim S. Akhter सही सोच रहे हैं। एकदम बंद कीजिए। अब मानिएगा नहीं। घर परिवार के लिए कुछ कीजिए।

Yashwant Singh भाई, इस देश में हर कोई चाहता है कि क्रांति हो लेकिन कोई नहीं चाहता कि उसके घर का चिराग इसमें जले। वो सिर्फ दूसरों के घर का चिराग जलते देखना चाहते हैं।

Amit Pathe :  भड़ास मीडिया का अपने तरह का अग्रणी और सबसे चर्चित नाम है Yashwant सर. मीडिया की ख़बरों का पर्याय है भड़ास. इसका ख़ौफ़ मैंने स्वयं बड़े मीडिया संस्थानों में देखा है जहाँ आज भी भड़ास ब्लॉक किया हुआ है. लेकिन किस मीडिया की ख़बरों/विचारों का मंच जमाते-सजाते रहेंगे आप? वो जो अपने वर्क कल्चर, सैलरी और नैतिकता के मामले में बुरी की खाया हुआ है. जिसमें एक जुटता है न लोग एक-दूसरे से ईमानदार हैं. बड़े शहर के और कुछ बड़े संस्थानों को छोड़ हर न्यूज़ रूम ख़ुशहाल नहीं है. और ये हालात और बदतर भी होते जा रहे हैं. मीडिया के भले के लिए आया मजीठिया हाल ख़स्ता कर गया. नोट बैन ने आग में और घी डाला. HT ने सबको शॉक किया और मीडिया की नींव से बड़ा पत्थर निकाल लिया. देश में jio क्रांति के बाद प्रिंट को outdated क़रार दिया जाने लगा है और प्रिंट मीडिया में ‘स्टॉक क्लीरन्स’ चल रही है. कुकुरमुत्ते की तरह websites आ रही हैं. उनका अपना अजेंडा और स्वार्थ. कुछ अच्छा काम कर रही हैं लेकिन बड़े corporate मीडिया संस्थान ही हर तरफ़ आगे हैं. ऐसी मीडिया के लिए आप क्यूँ आहुति दे रहे हैं. क्या पाएँगे ऐसी मीडिया के लिए अपने आर्थिक मसलों को ताक पे रख के? बे-मिशन मीडिया के लिए आप कौन सा मिशन चला लेंगे? अगर कोई सम्पादकीय दख़ल के बिना बड़ी पूँजी और संसाधन उपलब्ध करवा कर इन्वेस्टमेंट करना चाहे तो किसी रेवेन्यू मॉडल के बारे में ज़रूर सोचें. जैसे वेब को लिमिटेड कर paid App बनाना या किसी IT/web स्टार्ट-अप से जुड़कर काम करना. बाक़ी स्वहित और निजी आर्थिक पहलुओं को प्राथमिकता दें. मंगलकामनाएँ

AK Yadav : जब से Yashwant भैया का मैसेज पढ़ा हूं कि 26 अगस्त से भड़ास बंद करने का विचार कर रहे हैं तब से मन बहुत व्यथित है ​क्योंकि जब मीडिया में नहीं आया था उस समय एक दिन ऐसे ही गुगल पर पत्रकारों के बारे में सर्च कर रहा था कि मेरी आखों के सामने भड़ास4मीडिया का लिंक आया मुझे लगा कि नाम अलग है तो काम भी अलग ही होगा। उस समय मैं भी ब्लागर पर लिखता था लेकिन भड़ास को देखने के बाद लगा कि कोई तो है जो इन सबकी बजाता है पत्रकारों की आवाज को उठाता है। भड़ास पेज पर पहुचकर मैं कितना खुश हुआ था यह न लिखा नहीं जा सकता न ही बताया जा सकता है। उसके बाद पत्रकारिता में वहीं से लगाव होने लगा और फिर फरवरी 2010 में जनपद से प्रकाशित होने वाले एक साप्ताहित समाचार पत्र में नौकरी करने चला गया। उसके बाद राष्ट्रीय सहारा, जनसंदेश में काम करने के बाद मुम्बई का अखबार बनारस में लाया दिनरात मेहनत किया उसमें सफलता नहीं मिली उसके बाद जागरण समेत कई अन्य अखबारों वेब पोर्टल में काम करने का मौका मिला लेकिन दिल में एक ही बात थी कि Yashwant भैया से एक बार मुलाकात करूं। पहली मुलकात उनसे गाजीपुर में हुई जहां मेरे एक अनुरोध पर वे ग्रापए के सम्मेलन में आये और जमकर भडास निकाले। उसके बाद फिर दूसरी ​मुलाकात दिल्ली में आयोजित मीडिया मोनाटाईजिंग वर्कशाॅप में हुई। मेरे जीवन में पत्रकारिता के दौरान कई उतार चढ़ाव आये कई सहयोगियों ने टांग खीचने का भी कई दफा प्रयास किया जब जब मेरा विरोेध साथी पत्रकारों द्वारा होता तो उनको Yashwant भैया की किताब जानेमन जेल की कुछ लाईने सुनाकर भैया के ही शब्दों में जमकर गरिया देता। फिर खुश हो जाता। पत्रकारिता में मेरा मन जब जब दुखी हुआ तो दो पैग लगाकर #जानेमन_जेल की यह लाईन आज भी गुनगुना लेता हूॅ कभी—कभी मेरे दिल में यह खयाल आता है कि जिन्दगी लौ… लग गयी फिर खुश हो जाता। वास्तव में Bhadas4media के बंद होने से बहुतों को खुशी मिलेगी, बहुतों को कोई फर्क नहीं पड़ने वाला लेकिन जो भड़ास के पाठक हैं जो भड़ास के समर्थक हैं जो भड़ास को बहुत मानते हैं उनको लगेगा जैसे उनकी दुनियां उजड़ गयी। अब कहां और कैसे निकालेंगे भड़ास? Yashwant भैया प्लीज Bhadas4media को बंद करने से पहले एक बार जरूर विचार कीजिए। -आपका छोटा सा समर्थक

मुकुन्द हरि शुक्ल : www.bhadas4media.com का अगले महीने से बंद होना निराशाजनक है लेकिन अकेले दम पर भाई Yashwant Singh ने इतने साल तक जैसे इसे चलाया, उस समर्पण, पत्रकारों और पत्रकारिता के हित के लिए किसी भी हद तक लड़ने के जज्बे के लिए यशवंत जी की जितनी भी तारीफ़ की जाय, कम ही होगी। फिर भी उम्मीद है कि बेहतर आर्थिक सम्बल के साथ शायद फिर कभी भड़ास वापसी करेगा।

Nadim S. Akhter : भाई Yashwant Singh भड़ास बंद करना चाहते हैं। मैं उनके फैसले के साथ हूँ। एकदम बंद कीजिए। अब मानिएगा नहीं। घर परिवार के लिए कुछ कीजिए। इस देश में हर कोई चाहता है कि क्रांति हो लेकिन कोई नहीं चाहता कि उसके घर का चिराग इसमें जले। वो सिर्फ दूसरों के घर का चिराग जलते देखना चाहते हैं। भारतीय समाज में हर कोई चाहता है कि पत्रकार ईमानदार रहे लेकिन इस ईमानदारी की कीमत चुकाकर जब वो सड़क पे आ जाता है तो उसकी मदद के लिए कोई संस्था नहीं। अब कौन गांधी बचा है इस देश में जो अपने घर परिवार को ताक पे रखकर सामाजिक क्रांति की अलख जगाएगा? यशवंत भाई पे भी आरोप लगे हैं। मुझे नहीं पता उनमें कितनी सच्चाई है पर भड़ास को इतने लंबे समय तक अपने बलबूते खींचना किसी आश्चर्य से कम भी नहीं। एक और बात दीगर है कि उनकी वेबसाइट ने पीड़ित-शोषित पत्रकारों की आवाज़ को एक बड़ा प्लेटफार्म दिया है। ये छोटी बात नहीं। हां, कई दफा एकतरफा खबरें भी दिखीं, जिसे इग्नोर किया जा सकता है क्योंकि ये किसी अकेले शख्स के बूते की बात नहीं कि वो हर खबर की तहकीकात कर सके। यशवंत भाई, अब कुछ घर परिवार और अपने बारे में सोचिए। बहुत हुआ। अब इस काम को नई पीढ़ी के कंधे पे डालिए। वो उठाये तो ठीक, वरना दुनिया तो चल ही रही है।

Sanjaya Kumar Singh एक सुधार चाहता हूं, क्योंकि जानता हूं। अगर एकतऱफा आरोप छपे तो उसका एकतरफा जवाब भी छपा। शिकायत करने वालों से यशवंत यही कहते रहे हैं (और छापा – लिखा भी है) कि आप अपना पक्ष लिखकर भेज दीजिए, उसे भी छाप देंगे और वह छपता रहा है।

Nadim S. Akhter हाँ। उन्होंने छापा है। आपसे सहमत।

Vivek Singh बिलकुल, और जवाब वैसा का वैसा ही छापा। चाहे उसमें उन्हें जो लिखा गया हो।

Shyam Singh Rawat ‘घर फूँक तमाशा’ कितने दिन चल सकता है भला, वह भी जन-सरोकारी तो बिल्कुल भी नहीं। इस तरह की पत्रकारिता में आर्थिक संकट सदैव घेरे रहता है और जान का जोखिम अलग। आप जैसा जीवटधारी व्यक्ति ऐसा निर्णय विवशता में ही ले सकता है।

Gautam Tiwari Whatttt…Try to save such a nees portal..which connects all journos through multi face news items…Its a VOICE…
Anil Janvijay हिन्दी की यही नियति है।

अंकित द्विवेदी सर योद्धा इतनी जल्दी हथियार नहीं डालते। एक बार फिर से विचार करिये।

प्रवीण श्रीवास्तव दुःखद…. ह त ढ़ेर अदिमी त खुस हो जइहें… मीडिया ग्रुप के मनमानी और बढ़ जाई.. अइसन ना होखे त बेहतर बा

Vijayshankar Chaturvedi भड़ास बहुत दिनों तक वैसे भी नहीं निकलती रह सकती। यह नव विकसित मनुष्य के स्वभाव के विपरीत है जैसे कोई 24*7 प्यार नहीं कर सकता।

Murar Kandari समय की धारा जहाँ ले जाए , यशवन्त भाई

Syed Mazhar Husain आप ने अगर भड़ास बन्द करने की सोची है तो ज़रूर आपके ज़ेहन में कुछ और वेहतर होगा। मैं जानता हूं आप हार मानने वालो में से नही । हमारे लायक कुछ हो तो बताईयेगा हमेशा खड़ा पाइयेगा।

Ram Dayal Rajpurohit भड़ास को बंद करना अपने आप पर घोर अत्यचार हैं ।। जब मोदी अपनी भड़ास को मन की बात कहे कर करता है । तो आप भी ,,, भड़ास से बहुत कुछ ज्ञान मिलता पब्लिक को सो ये ज्ञान गंगा बहती रहनीं चाइये

Jaleshwar Upadhyay यह प्रयास भी अच्छा था और आगे जो भी करेंगे, अच्छा ही होगा। भविष्य की शुभकामनाएं। आप सफल होंगे अपने मकसद में यही उम्मीद करता हूं।

Care Naman कोशिश कर हल निकलेगा आज नहीं तो कल निकलेगा जो थमा थमा सा है वो भी चल निकलेगा

Kamal Sharma यह बंद मत कीजिए स्‍वामी भडासानंद जी। भडास आश्रम, भडास साइट का चलना जरुरी है। 26 अगस्‍त का मुहूर्त निकलवाया है क्‍या यशवंत भाई।

Somit Srivastav Destruction is first stage of construction !!

Jitendra Narayan दुखद है बंद होना…प्रयास करें हमसब साथ हैं आपके…!

Pushpendra Albe आप आदर्श हैं सर, आनलाईन मीडिया बिरादरी के लिए

Maruf Khan Kyaa hua bhai,..to fir hm.logo.ko ab khabre kise ptaa chlengii bhadas ki

Dinker Srivastava बाप रे बाप….सुधी पाठकों को झटका..

Ashok Anurag मेरी चिंता न करो मैं तो संभल जाऊँगा, गीली मिट्टी हूँ हर रूप में ढल जाऊँगा…

संजीव सिन्हा ओह! भड़ास के शुभचिंतकों को आगे आना चाहिए।

Prameel Kumar Manohra अब तो हम भी भड़ासी हो गए। और आप बंद करने की सोच रहे हो।।

Anil Kumar Upadhyaya व्यापार बंद पर फ़ेसबुक तो भड़ास निकालने का ज़रिया बना रहेगा बना रहेगा।

Arun Khare निसंदेह कुछ और बेहतर होने वाला है । शुभकामनाएं।

Vinay Pandey जिस तरह विद्यार्थी के लिए यूनिफार्म अनिवार्य होती है वैसे ही पत्रकारों के लिए भड़ास ऐसा कोई पत्रकार नहीं जो दिन में एक दो बार भड़ास को खोल के देखे नसर बंद मत करिए बोलिये तो हम लोग मिल के आर्थिक संकट को दूर करें

Vijay Tiwari शायद एक दो साल पहले आपने कही थी कि भड़ास को डॉलर में पैसे मिलते है । और अब बंद करने की सोच ली।

Vinod Kumar Bhardwaj अलविदा दोस्त। मजे से रहना।

Dinesh Mansera मंगल वक्रीय होगया है

Vishal Ojha समझा जा सकता है

Anupam Pandey इसको बंद न करें….हम और हमारी टीम इसको चलाने या सहयोग करने के लिए तैयार है।

Sanjay Kumar Agarwal i am agree

Umesh Srivastava Socialist किसी विषय से लिप्सा ना होना यही तो ज्ञान है इस मोहभंग होने की क्या बात ज्ञानी हमेशा नई खोजों में लगा रहता है किसी एक विषय से उसकी लिप्सा नहीं होती उसकी प्रत्येक विषय में लिप्सा है और किसी में नहीं है यही ज्ञान की पराकाष्ठा है जय हिंद जय भारत

Rajiv Tiwari भड़ास चैनेल की शरुआत करने वाले है क्या?

Sushil Shukla भाई अगर किसी पत्रकार की करतूत जाननी हो तो वो भड़ास से ही पता चलती है । अब कौन बताएगा कि फला पत्रकार क्या क्या गुल खिला रहा है? हे मेरे भड़ास प्रमुख इसे बन्द न करें अगर सच्चाई को जिन्दा रखना है तो भड़ास को चलना होगा।

Sujeet Singh Prince आपकी भड़ास न कभी बन्द थी, और न पूरे जीवन बन्द होगी……

Rajshekhar Vyas दुःखद समाचार सुबह सुबह – युद्धस्व!

Dilip Clerk दादा ऐसा मत कीजिये हम लोगो को मार्गदर्शन में भड़ास अहम् भूमिका में है

Sheetal P Singh बन्द मत करो, बेच दो या दान कर दो! कोई दूसरा इससे जीवन यापन करे तो क्यों गुरेज़?

Upendra Prasad हाँ, बंद करने से बेहतर है इसे बेच देना. कोई और इसे चला लेगा.

Rajendra Joshi ऐसा न करियेगा… हम समझ सकते हैं कितना मुश्किल होता है पोर्टल चलना

Vinod Bhardwaj न जाने कितनों की आवाज़ बन चुके भड़ासी बाबा ने ज़रूर कुछ नया सोचा होगा| शांत बैठने वालों में से तो नहीं है ये| जिसे औरों के लिए कुछ कर गुजरने की आदत पड़ जाये, वह कुछ न कुछ ज़रूर करेगा| और यहाँ तो बात यशवंत की है…इस प्रयोगधर्मी दिमाग की नयी उपज देखने का इंतज़ार है अब| शुभकामनायें……

Vinay Shrikar अभी न करो बाबू ऐसा ! पांच-छह साल रुक जाओ, ताकि यह दिन देखने के लिए मैं न रहूँ।

Abhinandan Mishra यशवंत ji, please let us know if we can contribute in any way to keep your efforts alive… BHADASH cannot shut down.

Rajaram Tripathi आर्थिक संकट अगर मूल कारण है, तो , जैसे भी हो दूर कर लिया जाएगा, मैं इसकी जिम्मेदारी लेता हूं, आप चलाइये इसे, ये जरुरी है। मोहभंग, लोगों की समझ वाली बातें वक्ती जुनून है, दिमागी खलल है,,हर साधक को यह पुल पार करना ही पड़ता है,, मेरे भाई,, भड़ासानंद,,इसका भी शत प्रतिशत इलाज संभव है , हमारे विशुद्ध हर्बल से।

Sanjay Shukla This is the one platform for expressing grievances of exploited journalists. I request you to not close it. Will try to help in whatever way we can

Madhu Sudan Yaswant kitna paisa / month se chal jayega aapko milta rahega chahaiye bahut hi jaruri hi

Sachin Chaudhuri 60k to abhi bhi per month portal ko Google ad se mil rhe hai. Koi arthik presani ho portal ko mai nai manta Baki band Mat Karo Sir isko.

Devendra Surjan Yashwant भाई इतने सारे मित्रों और शुभचिंतकों की सुनिये और अपना निर्णय बदलिए , यथासंभव सहयोग करने सब तैयार हैं . मीडिया की पोल पट्टी खोलने का यह अद्भुत प्रयोग है , इसे अनवरत जारी रखना चाहिए .

Sachin Chaudhuri Yashwant Singh apko arthik problem hai ki portal ko …..portal ko to koi arthik tangi mujhe nai lagta ho jo data portal pai hai usse jayda wo earn kar rha hai

Ashok Aggarwal अब कौन से समाज में रहने का प्लान है… जो भी करोगे उसके लिये अग्रिम शुभकामनाएं…

Kamta Prasad कुछ बेहतर होगा इसे लेकर खुश होऊँ, या हम जैसे निरीह नागरिकों का मंच चला जाएगा इसे लेकर अफसोस करूँ। खैर, आने वाला समय बताएगा।

Deepak Pandey अरे ऐसे कैसे बंद हो जाएगा सर… हम लोग हैं न.. हैंडओवर कर दीजिए अपने अपने विश्वस्त लोगों को। वो खुद चला लेंगे। भड़ास का होना मीडिया के लिए बहुत जरूरी है।

Sanjay Shekhar यशवंत जी आप नए प्रयोग जरूर करें। आपको शुभकामनाएं, लेकिन यह जरूर सुनिश्चित करना होगा कि भड़ास चलता रहे। इसे बंद करना पत्रकारों की आवाज़ को बंद करना होगा जिसे आप कभी नही करना चाहेंगे। बाकी परेशानियों का हल निकालने में हम आपके साथ है। मेरी जिस स्तर पर मदद की जरूरत हो मैं तैयार हूं।

Singhasan Chauhan इतना क्यों नाराज हैं यसवंत भाई हमारे जैसे लोगों को आपसे बहुत आश है …

Ved Prakash Singh हिम्मत न हारो हजारों को मारो। संस्था चलाना आसान नहीं होता। आप दूसरा प्रयोग करना चाहते हैं करिए इसके लिए एक उप संपादक रख कर व्यापारियों की तरह चलाइये। विज्ञापन प्रतिनिधि भी रखना न भूलिएगा।

Purushottam Asnora बहुत दुखद, घाटे में आखिर कहां तक निकल सकेगा? क्या कोई समाधान हो सकता है सर।

डॉ. अजित मैं आपके नए आत्मिक वेंचर को लेकर उत्साहित हूं निसन्देह यह व्यष्टि और समष्टि के लिए होगा। आपको चैतन्य शुभकामनाएं !

Syed Faizur Rahman Sufi भड़ास के बन्द होने से हजारों पत्रकार की आवाज भी बन्द हो जाएगी

Ramji Mishra अरे ऐसा न कहिये। बस एक बार आपसे बात हो जाये तो कुछ निवेदित करना चाहूँगा……

Manoj Dublish सरजी ; एक बार राजनीति में भी भाग्य आजमा लीजिये क्योंकि लोकतंत्र कौशल विकास का सबसे बडा सबूत है जहाँ आठवीं पास उप मुख्य मंत्री और अनपढ शिक्षा मंत्री बन जाता है तथा रेलवे संपत्ति बेचकर अरबपति तो बनता ही है साथ में देश का मालिक भी बन जाता है और दूसरी तरफ एक पोस्ट ग्रेजुएट;इंजीनियर या डाक्टर नौकरी के लिए दर बदर की ठोकर खाता है

Gaurav K Singhal Go for crowd funding. I am ready to give ten thousand for BHADAS as crowd funding. My advice is make app and once 10000 users download this app this will be hundred crore venture.

Dhirendra Asthana लाखों लोगों द्वारा रोज देखी जाने वाली वेबसाइट पर भी संकट?

Anup Kr Awasthi पोर्टल बंद करना समस्या का समाधान नहीं…कोई हल या सिस्टम ढूंढा जाए तो बहुत कुछ संभव है.

Sanjaya Kumar Singh अरे !! मैं समझ रहा था कि गूगल ऐड से खर्चा निकल जा रहा होगा। अभी तक अगर आर्थिक स्थिति खर्चा चलाने लायक नहीं हुई है तो बिल्कुल बंद कर देना चाहिए।

Ram Gurjar इतनी बाते करने से बेहतर है कि हम सब मिलकर उनका हाथ थाम ले…

Vinod Bhardwaj पत्रकारों के लिए बहुत दुःखद और पीड़ादायक निर्णय है ये । पीड़ित पत्रकार भड़ास को अपना मंच मानते हैं । निर्णय पर पुनर्विचार करो यशवंत भाई !

Ashok Das मैं आपके इस फैसले में आपके साथ हूं भइया। हर चीज का एक अंत होता है। उससे ज्यादा मोह ठीक भी नहीं। जिंदगी में उससे इतर भी करने को बहुत कुछ है। संभव है कि आपको वही बातें परेशान करती होगी। नई यात्रा पर निकलिए। हां, बंद करने की घोषणा के साथ एक ऑप्शन यह रखा ज…See more

Pradumn Kaushik अब कौन पत्रकारो को आइना दिखायेगा सर

Ashutosh Chaturvedi अरे सर मीडिया पर लगाम कौन कसेगा फिर

Pawan Lalchand हो सके तो चलने दें. भले कुछ नया भी लेकर आ रहे हों तब.

Negi Laxman जो सिरफिरे समाज हित मे कूछ करना भी चाहे तो उनको आगे लाने मे सबके पसीने उतर जाते हैं चाहे कोई भडास वाला हो या कोई अन्य

Arti Awasthi Dixit बंद करना जरुरी है क्या

Ramji Mishra भड़ास अब आपकी सम्पत्ति नही है जो आप बंद कर देंगे। कुछ तो हक हम पाठकों का भी है। कृपा करके प्रार्थना को स्वीकार करें और इसे समाज हित के लिए चलने दें। प्लीज प्लीज प्लीज.. जनहित की जंग वाले सब बन्द होते जा रहे हैं और तमाशे वाले लोग और मजबूत होते जा रहे हैं। सरकार भी सो रही है भड़ास जैसे मीडिया को सहायता देकर समाज के लिए सरकार एक और अच्छा काम कर सकती है। भारत सरकार को इस ओर ध्यान देना चाहिए।

Mahesh Singh मित्र आपका लगभग हर पोस्ट और न्यूज़ पढता रहा हू इधर बहुत दिनों से आप से बात नहीं कर पाया कुछ ऐसी व्यस्तता थी। मित्र इसा मसीह चले गए, बुद्ध चले गए, मुहम्मद चले गए, गांधी चले गए जो बुराइया समाज में तब थी वही आज भी हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि सज्जन अपनी सज्जनता छोड़ दे। हां एक बात है कि मोदी जी हैं औऱ योगी जी ने अपनी एक जीवन शैली चुन ली थी जो सबके लिए संभव नहीं है। किसी भी संस्था को चलाने के लिए धन की आवश्यकता होती हैं इसमें कोई संदेह नहीं है। आपने जिस उंचाई पे भड़ास को पहुंचाया है वह काबिले तारीफ है और आज जो आपकी पहचान है उसमें भड़ास का भी योगदान है। मित्र इतनी जल्दी में आवेश में निर्णय लेना ठीक नहीं प्रतीत हो रहा है। किसी भी समस्या का समाधान निकाला जा सकता है। निसंदेह परिवार के कीमत पर कोई भी कार्य उचित नहीं होता है। यदि मैं आपकी किसी भी प्रकार से काम आ सकता हु तो मुझे खुशी होगी। हां इतना जरूर कहना चाहूंगा कि एक पत्रकार पत्रकारिता की बुलंदी पे तो जा सकता है पर साथ ही राजनीतिज्ञ, उद्योगपति नहीं हो सकता… उसके लिए तो कुछ और ही करना होगा। मैं आपके हर निर्णय में साथ हूं…

Yajat Dwivedi फिर पत्रकारों के हक़ के लिए आवाज़ कौन उठाएगा ।

Shashikant Singh सर प्लीज़ ऐसा न करें। मजीठिया क्रांतिकारियों का क्या होगा

Narendra M Chaturvedi भाई भड़ास किसी भी कीमत पर बन्द नही होना चाहिये….कुछ मिल बैठकर रास्ता निकालते है।

Vinay Singh लोकतंत्र में भड़ास कहाँ बंद हो पाएगी भाई….. भड़ासिए और खुब भड़ासिए यही कहते थे न..

Dharmendra Pratap Singh भैया, मुझे नहीं लगता कि किसी तरह का आर्थिक संकट “भड़ास” को बंद कर सकता है ! जिस “भड़ास” को बड़े-बड़े समाचार-पत्र समूह नहीं बंद करवा पाए, वह इस तरह से बंद हो जाएगा… असंभव !! पहली बात तो यह है कि हमारा समय जब अच्छा होने के करीब है, तब “भड़ास” बंद करने का इरादा ठीक नहीं… अगर वही वजह है, जो आप बता रहे हैं तो हम सब मिलकर इसे भविष्य में भी चलाते रहेंगे। वैसे भी जो “भड़ास” अब हम सभी मीडियाकर्मियों की आवाज़ बन चुका है, उसे बंद करने का फैसला आप अकेले कैसे ले सकते हैं?

DrMandhata Singh आप हमेशा उचित फैसला लेते रहे हैं। और सोच-समझकर ही बंद करना तय किया है तो आपके और परिवार के हित में शायद यही ठीक हो। मुझे तो उम्मीद है कि आप जहां भी होंगे एक जुझारू की भूमिका में ही रहेंगे।

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भड़ासानंद कहिन (2)- योगीजी खाने का मेनू एबीपी न्यूज देखकर तय करते हैं! (देखें वीडियो)

एबीपी न्यूज देख कर अपने खाने का मेनू तय करते हैं योगी जी… आजतक वाले योगी जी के बेडरूम में भी घुस जाते हैं ब्रेकिंग न्यूज के चक्कर में… मीडिया के संपादक लोग आखिर क्यों सीएम से मिलने जाते हैं लाइन लगा कर..  सुनिए भड़ासानंद कहिन… यशवंत की जुबानी… मीडिया की अल्टीमेट कहानी..

नीचे क्लिक करें…

भड़ासानंद की तरफ से ब्रेक की गई एक बड़ी खबर देखिए-सुनिए…

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नोएडा के भड़ास आश्रम से बाबा भड़ासानंद यशवंत का प्रवचन आप भी झेलें

Yashwant Singh : आजकल नोएडा सेक्टर 70 में एक मित्र द्वारा बनवाए गए भड़ास आश्रम में हूं. क्या खूब जगह है. लग ही नहीं रहा कि दिल्ली एनसीआर के धूल भीड़ शोर में हूं. बेहद शांत और हरा भरा इलाका. हवादार और नेचुरल रोशनी से चमक रहे एक कमरे का यह फ्लैट एक अधिकारी मित्र ने इसलिए बनवाया ताकि उनके मित्र लोग आकर रुक सकें. सो, इसका नामकरण मैंने ‘नोएडा का भड़ास आश्रम’ कर दिया है. परसों से यहां दोस्तों का आना जाना खाना गाना बजाना लगा हुआ है. सबको फोन कर बोल दिया था- ‘आओ रे, हम यहां पर हूं’.

नोएडा के भड़ास आश्रम में यशवंत

एक दिन रात को यह पकाया गया…

आज बिलकुल अकेले हूं. शोर के बाद शांति जरूरी / मजबूरी हो जाती है. उद्देश्य, लक्ष्य, मकसद, मंजिल नामक शब्दों के साथ कई दशकों तक जीते जीते अब इनसे उलट निरुद्देश्य जीवन जीने में कितना असीम आनंद आ रहा है, कितना सार्थक वाइब्रेशन फील हो रहा है, यह मैं महसूस कर रहा हूं.

जब आप निष्प्रयोज्य जीवन जी रहे हों और बिना वजह कुछ कर रहे हों तो उन क्षणों में आप परमात्मा के सबसे करीब होते हैं, यह महसूस करने लगा हूं. दिल्ली आता हूं तो चार छह जरूरी कामों की लिस्ट बनाकर लाता हूं लेकिन यहां आकर सब कामधाम भूल जाता हूं. खुद से ही सवाल पूछने लगता हूं कि ये काम हो भी जाए तो क्या, न भी हो तो क्या… दुनियादारी से दिन प्रतिदिन बढ़ती दूरी बड़ी सुखद से सुंदरतम होती जा रही है. लाखों करोड़ों की बातें चीजें प्रस्ताव आसपास होते रहते हैं / आते रहते हैं पर उसके प्रति आकर्षण / लालसा अब उतनी नहीं रही. संचय संग्रह के प्रति पहले भी बहुत अनिच्छा थी.

मेरा क्या है जो मेरे पास ही रहे? कुछ नहीं… हम बेवजह चीजों को अपने इर्दगिर्द अपने कब्जे में समेटकर रखना चाहते हैं जबकि असल में कुछ भी हमारे वश कब्जे में नहीं होता.. छोड़ते फेंकते देते जाइए और देखिए, दिन प्रतिदिन उदात्ततम होते जाएंगे…

जीवन जीने की न्यूनतम जरूरत क्या है… एक किलो आटा, आधा किलो आलू, सौ ग्राम तेल, पचास ग्राम नून. बस. कहीं पका लो. कहीं झोपड़ी बनाकर रह लो. इस धरती पर हम लोगों के लिए इतना काफी होना चाहिए क्योंकि ये धरती सिर्फ मनुष्यों की नहीं है. हम मनुष्यों ने अपने विस्तार अपनी लिप्सा अपनी वासनाओं के लिए लाखों करोड़ों अरबों प्रजातियों को धरती से खदेड़ दिया, नष्ट कर दिया. जिधर देखो उधर आदमी… आदमी उदरस्थ करता जा रहा है यह धरती. धरती की विविधता और सौंदर्यबोध को लेकर जो पाठ हम सभी को जीवन के शुरुआत में ही पढ़ाया सिखाया बताया अनुभव कराया जाना चाहिए, ऐसा कुछ नहीं. हम केवल एक ही चीज बढ़ाते बताते सिखाते और खुद जीते हैं, वो है पैसा. और, ये पैसा हमें मनुष्य नहीं रहने देता. हमें मानवीय नहीं होने देता. हमें उदात्त नहीं होने देता. हमें शांत नहीं रहने देता.

इस बेजान से रुपये पैसे में इतनी जान है कि हम लाखों करोड़ों प्रजातियों की जान ले चुके हैं और पूरी धरती को निगलने में लगे हैं और बरास्ते यूं हम खुद को शूली पर बिना वजह शहीद बनाने के लिए चढ़ा देते हैं…. हम अपने लिए नहीं जीते हैं. हम बेटे, पत्नी, परिवार आदि इत्यादि का नाम ले लेकर खुद का जीवन तो नष्ट कर ही डालते हैं, उन्हें भी पिंजरे का बुलबुल बनाकर छोड़ते हैं. प्रकृति को सूक्ष्मतम गहनतम रूप में देखें तो समझ आएगा कि हर प्रजाति में सरवाइवल के लिए जो स्ट्रगल, जो दुख सुख झेलना पड़ता है, उसी के जरिए उस प्रजाति के श्रेष्ठतम / बेस्ट सामने आ पाते हैं. लेकिन हम चाहते हैं हमारे अपने हमारे प्रिय लक्ष्मण रेखा के भीतर ही रहें ताकि उन्हें कोई दुख न पहुंचे. कोई अहित न हो जाए. पर इससे होता उलटा है. उनकी आंतरिक ताकत विकसित नहीं हो पाती. उनकी उदात्तता, उनकी समझ, उनका ब्रेन विकसित नहीं हो पाता. वो बाहर से भले गोल मटोल सुंदर सुरक्षित दिखें पर उनका आंतरिक अविकसित और विकलांग रह जाता है. तो, एक जीवन पैसा विहीन. एक आंदोलन पैसे के खिलाफ. एक पाठ अर्थ की राजनीति और समाजशास्त्र को लेकर.. एक समझ जीवन के प्रति बेहद जरूरी है.

लंबा हो गया. झेलना मुश्किल होगा. इसलिए विराम. और, प्रणाम. लीजिए ये एक मेरा पसंदीदा कबीर भजन….

बीत गये दिन भजन बिना रे ।
भजन बिना रे भजन बिना रे ॥

बाल अवस्था खेल गवांयो ।
जब यौवन तब मान घना रे ॥

लाहे कारण मूल गवाँयो ।
अजहुं न गयी मन की तृष्णा रे ॥

कहत कबीर सुनो भई साधो ।
पार उतर गये संत जना रे ॥

बीत गये दिन भजन बिना रे ।
भजन बिना रे भजन बिना रे ॥

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से. संपर्क : yashwant@bhadas4media.com

उपरोक्त पोस्ट पर आए कमेंट्स में कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं….

Vivek Satya Mitram : अ से अ: और क से ज्ञ तक के बीच जितने संभव शब्द हो सकते हैं, उनमें से जो भी सबसे शानदार हों वो जीवन के इस अद्भुत विश्लेषण को समर्पित करने के लिए कम हैं। थैंक्यू Yashwant भईया, इस पोस्ट के लिए। सच कहूं तो कई बार बहुत जलन होती है आपसे, चाहकर भी हम आपसे क्यों नहीं हो सकते, पर हां..ये समझना भी कि हम क्या चाहते हैं अपनी जिंदगी से, वो आप जैसे लोगों की जिंदगी को देखकर ही पता चलता है, वरना इस निष्कर्ष तक पहुंचने में ही न जाने क्या कुछ और गंवाना पड़ता बेवजह। थैंक्स।

Sant Sameer निरुद्देश्य जीवन…यानी स्थितिप्रज्ञता प्राप्त होने वाली है। नाम मेरा, सन्तई आप कर रहे है! जय हो स्वामी यशवन्तानन्द की।

Anand Gkp 23 साल पहले नाना पाटेकर ने मुझसे कहा था-मुझे जिंदा रहने के लिए क्या चाहिए…..चार सूखी रोटी, एक मुर्गी की भुनी हुई टांग और दो पैग दारू। बस। मुर्गी न मिले तो मां की दाल भी चलेगी। वही गति यशवंत बाबू आप भी बता रहे हैं। बढ़िया है।

Ghanshyam Dubey “जीवन की न्यूनतम जरूरत क्या है…..” यही सत्य – या इसे आनन्द भी कहा सकते है, जीवन- मार्ग है ।

Bhagwat Shukla बदला बदला सा अलग अंदाज….पर सत्य के काफी करीब

Chandra Kant Tiwari जीवन जीने की न्यूनतम जरूरत क्या है… एक किलो आटा, आधा किलो आलू, सौ ग्राम तेल, पचास ग्राम नून ….कुछ दिनो बाद आदमी को यह भी नसीब नहीं होगा…

Sanjaya Kumar Singh एक भड़ासी प्रवचन रोज सुबह दे सकते हैं आप। शिष्य बनाने की योग्यता है आपमें।

Naveen Sinha मैंने भी आज इसी बात को दूसरे ढंग से सोचा था ,जब भी भूकंप आता है हम जो हैं जैसे हैं उसी हालात में बहार भाग लेते हैं मतलब जहाँ शरीर वंही सब कुछ ।बाकी सब भरम है

Rajnikant Shukla भड़ास आश्रम से प्रवचन श्रृंखला – 1

Pankaj Kumar जीवन जीने की न्यूनतम जरूरतों में भड़ास बाबा आपने दो बड़ी छोड़ दी।। जिनके योगदान से आप और हम सरक रहे है। पहला स्मार्टफ़ोन,लैपटॉप और नेट की सुविधा। तब जाकर मनुष्य की न्यूनतम जरुरतें पूरी होंगी।

Sanjay Rai बेहतरीन लेख। समय की मांग यही है। कुछ नया होना चाहिए जिससे कि जीवन बिना पैसे के भी लोग सही तरीके से गुजार सकें। जानलेवा बन चुका है ये पैसा।

Chandan Singh Bndhu aap jo bhi ho mhan aatma ho mai aapki es soch ki kdar krta hu.khud bhi ye rah per chlne ki koshish m hu

Divakar Singh आपकी बातें देख सुन कर पैसे के प्रति अरुचि उत्पन्न हो गयी है। जै जै।

मैं सत्या हूं bahut khoob likha bhaiya aapne…jeevan ka param satya ka anubhav or ahsaas

Dheeraj Kumar Anuragi Hame bhi le chalo sir……?

Sudhanshu Dwivedi शानदार। अगर हरिद्वार या ऋषिकेश में आश्रम खोलना हो तो नाचीज भी साथ है।

Anand Agnihotri तब तो मजा आ गया, मेरे रुकने का भी एक ठिकाना बन गया।

Mukund Hari जीवन को तो अविरल झरने की तरह बहने देना चाहिए।

Arun Srivastava देवभूमि देहरादून भी उत्तम जगह है । नाम भी तय हो गया है भडास का “बच्चा” आश्रम।

Golesh Swami Life jeene ka sahi tarika yahi Hai.

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