रोडवेज बस के कंडक्टर का हरामीपना… देखें वीडियो

Yashwant Singh :  बीते साल बाइस दिसंबर को आगरा एक कार्यक्रम में शिरकत करने के लिए जा रहा था. नोएडा में सिटी सेंटर मेट्रो स्टेशन के पास स्थित रोडवेस बस अड्डे पर बड़ौत डिपो की एक बस पर बैठ गया. यह बस वाया यमुना एक्सप्रेसवे ले जाने वाली थी. बस चल दी और परी चौक से ठीक पहले खराब भी हो गई.

पूरी भरी हुई बस के यात्रियों को नीचे उतार कर कंडक्टर दूसरी बसों को रोक कर बिठाने लगा. एक तो बसें रुकती ही नहीं थीं, दूसरे हम जैसे कई लोग ऐसे थे जो बस की बजाय अब साझे में ओला करके आगरा जाना चाहते थे. सो हम लोगों ने रिफंड मांगना शुरू किया. कंडक्टर रिफंड के नाम पर भड़क जाए और पीछे से आ रही रोडवेज की दूसरी बसों में बैठ जाने की नसीहत दे. अपने एक मित्र रोडवेज अधिकारी से कंडक्टर की बात कराई तो कंडक्टर थोड़े औकात में आया और रिफंड कर दिया.

नोएडा बस अड्डे से परी चौक तक का किराया काटा, तीस रुपये. आगरा तक का कुल किराया लिया था- दो सौ साठ रुपये. तीस काटकर दो सौ तीस रुपये वापस लौटाया. पर बाकी जिन-जिन ने रिफंड लिया, सबको साठ रुपये काटकर लौटाया. हम तीन यात्री मिलकर ओला किए और आगरा चल दिए. लेकिन ओला स्टार्ट होने से ठीक पहले देखते हैं कि जो रोडवेस बस खराब थी, वह चल गई और उसे लेकर ड्राइवर कंडक्टर बैक टू पैवेलियन यानि नोएडा बस अड्डे चले गए. सवाल कई हैं–

-बस खराब थी तो चल कैसे गई… अगर चल सकती थी तो सभी को कम से कम आगे परी चौक तक ले जाना चाहिए था जिससे वहां से सबको कोई न कोई साधन आराम से मिल जाता.

-नोएडा बस अड्डे से परी चौक का किराया तीस रुपये था तो बाकी यात्रियों को रिफंड करने के दौरान साठ साठ रुपये क्यों किराया लिया…

-दर्जनों यात्रियों को जिसमें महिलाएं बच्चे बुजुर्ग तक थे, सड़क पर यूं छोड़ देना और उनके साथ बुरा व्यवहार करना, रिफंड न करना.. यह कहां का शिष्टाचार है…

उम्मीद है यूपी शासन से जुड़े लोग इस पर एक्शन लेंगे. रोडवेज बस और उसके बदमाश कंडक्टर की फोटो शेयर कर रहा हूं. साथ ही एक वीडियो का लिंक भी दे रहा हूं जिसे बस खराबी से लेकर ओला वाली कार पर सवार होकर आगरा जाने के दौरान तैयार किया था. बस खराब होने से हम जो तीन अपरिचित लोग एकजुट हुए, उनमें से एक Guru Sharan भाई तो अपने एफबी मित्र भी बन चुके हैं, दूसरा भाई स्टूडेंट था, उसका नाम याद नहीं आ रहा, हालांकि वह भी एफबी लिस्ट में मेरे कनेक्ट है… हम तीनों ने मिलकर ओला किया, फिर मैंने पूरे घटनाक्रम पर एक बातचीत रिकार्ड की. इस वार्ता में रोडवेज बस के कंडक्टर के हरामीपने की चर्चा है.

वीडियो लिंक ये है… https://youtu.be/_5jaC6VlPx4

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.

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एक्सिस बैंक का हरामीपना, काट लिया हजार रुपये

मधुसूदन शर्मा का एक्सिस बैंक में सेविंग एकाउंट है. वे सन 2006 से अपना एकाउंट आपरेट कर रहे हैं पिछले दिनों उन्होंने देखा कि अचानक उनके एकाउंट से हजार से ज्यादा रुपये बैंक वालों ने काट लिए. जब उन्होंने बैंक वालों से पूछा कि ये क्यों और कैसे काट लिया गया तो कोई कायदे का जवाब नहीं दे पा रहा. भड़ास को मधुसूदन ने अपने बैंक से काटी गई रकम का स्क्रीनशाट भेजा है, साथ ही ये संदेश भी :

Hello myself Madhusudan sharma .. this is my axis Bank saving account using since 2006 .. today bank cut my 936 rs as the name of consolidated charges and 168 rs for GST .. but bank didn’t give any reason why these charges are charged..

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यूनियन बैंक ऑफ़ इंडिया से दुखी व्यक्ति ने पीएम को लिखा पत्र

मान्यवर,
सेवा में,
माननीय प्रधान मंत्री,
नई दिल्ली ।

विषय :- यूनियन बैंक ऑफ़ इंडिया की बिहारशरीफ शाखा के बैंककर्मियों द्वारा छह माह तक दौड़ाने के बाद भी मुद्रा लोन नहीं देने तथा स्वतंत्रता दिवस के मौके पर भी राष्ट्रीय ध्वज नहीं फहराए जाने के सम्बन्ध में।

मान्यवर,

निवेदन है कि बिहार के मुख्य मंत्री नीतीश कुमार के पैतृक जिला नालन्दा के मुख्यालय बिहारशरीफ में यूनियन बैंक ऑफ़ इंडिया की मुख्य शाखा है। इससे मात्र दो सौ मीटर की दूरी पर 65 वर्षों से अधिक पुरानी हिंदुस्तान जनरल स्टोर नामक मेरी दूकान अवस्थित है। पहले पिता जी दूकान चलाते थे और अब मैं चलता हूँ। मैंने दूकान के विस्तार के लिए तत्कालीन मैनेजर इंद्रजीत जी से 3 लाख रुपये लोन लेने के लिया मिला। उनके कहने पर मैंने उक्त बैंक में चालू खाता खुलवाया तथा इनकम टैक्स रिटर्न भर कर बैलेंस शीट भी प्रस्तुत किया। उन्होंने 25 अप्रैल 2017 को लोन से सम्बंधित मेरे कागजातों  को सम्बंधित बैंक पदाधिकारी को भेजा था। उनके बुलाने पर मैं 2 मई 2017 को पुनः उनसे मिला, तो उन्होंने बताया कि अभी आपकी फाइल मेरे पास नहीं लौट कर नहीं आई है। आप शाम को एक बार फिर बैंक आकर देख लीजियेगा। दुकानदारी की व्यस्तता के कारण मैं उस दिन न जाकर अगले दिन बैंक गया, तो पता चला कि अन्यत्र तबादला हो जाने के कारण मैनेजर इंद्रजीत जी,का विदाई समारोह हो चुका था।

दो-तीन दिन बैंक का चक्कर लगाने के बाद मेरी मुलाकात नए मैनेजर नीतेश रंजन जी से हुई। मैंने उन्हें पूरी बात बताई तथा 3 लाख रुपये लोन की मांग की। उन्होंने कहा कि उन्हें इसके लिए किसी से परमिशन की जरुरत नहीं है तथा एक करोड़ तक लोन देने का अधिकार है। हम लोन देंगे, पर अभी हमारे पास आदमी नहीं है। बाद में मिलिएगा। आठ-नौ बार मिलने के बाद उन्होंने बैंक की महिला लोन अफसर से मिलने को कहा। मैडम ने एक आवेदन तथा पैन कार्ड, आधार कार्ड तथा भारत सरकार द्वारा निर्गत उद्योग आधार कार्ड  की फोटो कॉपी जमा करवाई। बाद में मैडम ने कहा कि दूकान का वेरिफिकेशन करने  आएँगी। इसके बाद मैंने दूकान छोड़ कर अलग-अलग तिथियों में बैंक में मैडम से 12-13 बार मुलाकात की। उन्होंने हर बार यही कहा कि उन्हें छुट्टी नहीं मिल पा रही है। पर मैं उनसे मिलता रहा। इसी क्रम में मैडम ने एक दिन कहा कि आपके कागजात नहीं मिल रहे हैं, दुबारा दे दीजिये। मैंने मैडम को उसी दिन दूकान से लाकर पुनः कागजात दे दिया। उनका रटा-रटाया जवाब मिलता रहा कि दूकान देखने आएँगी। एक दिन अपनी पत्नी को दूकान पर बिठा कर मैं बैंक गया तो मैडम नहीं मिली। मैं मैनेजर से मिला। मैडम आईं, तो उन्होंने मैनेजर को बताया कि वे दूकान देखने गई थीं। मैनेजर ने कहा कि अभी विजिलेंस जांच चल रही हैं। अगले माह के प्रथम सप्ताह इन्हें लोन दे दीजियेगा। मैडम ने अपने टेबल पर मुझसे कहा कि आपकी दूकान देख ली हैं। घर भी देखने आऊंगी। मैं इंतजार करता रहा और वे नहीं आईं। निराश हो कर मैं एक दिन फिर बैंक जाकर मैडम से मिला, तो उन्होंने एक लाख का टर्म लोन देने की बात कही। मैंने कहा कि पूर्व मैनेजर ने सीसी लोन के लिए ही चालू खाता खुलवाया था, तो मैडम ने साफ कहा कि सीसी लोन नहीं दूंगी। मैंने कहा कि मुझे बैंक लोन चुकाना भी है। मैं घर का कागज़ात भी जमा करने को तैयार हूँ। मैडम ने कहा कि ठीक है, मैनेजर साहब से बात करुँगी। एक दिन फिर मैं मैडम से मिला, तो उन्होंने कहा कि टर्म लोन ही दूँगी। लगता है कि मैडम कमीशन के चक्कर में सीसी लोन नहीं दे रही हैं। घर देखने के क्रम में वे मेरे घर पर ही लेन-देन करने की नीयत होगी। अब सवाल है कि क्या मैडम ने सभी लोन देने वालों के घरों को जाकर देखा है?

एक चाय बिक्रेता को एक लाख का लोन दिया जाता है, वहीँ 65 वर्षों पुरानी दूकान को व्यापार विस्तार के लिए 3 लाख का सीसी लोन देने के लिए टहलाया जा रहा है। लगता यही है कि रिश्वत दो, नहीं तो बैंक का चक्कर लगा-लगा कर थक-हार कर घर बैठ जाओ! बैंक दलाल के मार्फत तुरंत लोन मिल जाता है। बैंक दलाल इतनी पैठ बना लेते हैं कि वे दिन भर बैंक में ही रहते हैं और लोग यही समझते हैं कि वे बैंक के ही स्टाफ हैं। सीसी टीवी कैमरा का फुटेज देखने से यह सच्चाई स्वयं उजागर हो जाएगी कि आखिर कौन बैंक का दलाल है?

मान्यवर! यूनियन बैंक बिहारशरीफ से हमारा सम्बन्ध करीब 35-36 वर्षों से रहा है। मेरे पिता जी के साथ हमारा संयुक्त खाता नं.887 है। 1983-84 के आस-पास मेरे पिता ने बैंक से 25 हजार का सीसी लोन लिया था। जरुरत नहीं रहने पर लोन लौटा दिया गया था। अच्छा बैंक,अच्छे लोग! मैं बचपन से ही बैंक परिसर में लगा यह स्लोगन पढ़ा करता था। मुझे वाकई उस दौर यह स्लोगन फिट लगता था। वही आज उक्त स्लोगन का मायना ही बदल सा गया है। अच्छे ग्राहक तो हैं, अच्छा बैंककर्मी नहीं। अब मामूली से मामूली काम के लिए बैंककर्मी ग्राहकों को कई दिन चक्कर लगवाते हैं। कोई चक्कर लगा रहा है, तो कोई खाता बंद करवा कर दूसरे बैंक में खाता खुलवा रहा है। आम तौर पर लोग निकट के बैंक में ही खाता खुलवाते हैं। पर बैंककर्मियों के रवैये से तंग आकर बैंक परिसर के मार्किट के ही एक दुकानदार ने अपना खाता बंद करवा लिया। इतना ही नहीं, उक्त दूकानदार को खाता बंद करवाने में एक हजार रुपये की हानि भी उठानी पड़ी।

मुझे भी बैंक के लेखाकार की मनमानी का शिकार होना पड़ा है। मैंने वांछित कागजातों के साथ केवाईसी फॉर्म भर कर 19 अप्रैल 2017 को चालू खाता खुलवाया। पर जब मैं अपराह्न एक बजे एटीएम फॉर्म जमा करने गया तो लेखाकार ने लंच के बाद आने को कहा। मैं लंच के बाद गया’ तो लेखाकार ने   कहा कि आपका केवाईसी फॉर्म नहीं भरा हुआ है। मैंने कहा कि मेरा नया खाता है और केवाईसी फॉर्म भर कर दिया हुआ है। उन्होंने कहा कि फिर से दीजिये। और फिर से भर कर दिया, तो कहा कि आज समय ख़त्म हो गया है कल दीजियेगा। ग्राहक इस टेबुल से उस टेबुल का चक्कर लगाते हैं, पर उनका काम नहीं होता है। बैंककर्मी और ग्राहक के बीच हॉट टॉक होनी आम बात हो गई है। बताया जाता है कि लेखाकार और ऋण पदाधिकारी दोनों स्थानीय हैं तथा ग्राहकों पर दबंगता दिखाने से जरा भी बाज नहीं आते हैं। सीसी टीवी फुटेज देखने से पता चल जायेगा कि बैंककर्मी ग्राहकों को कितना परेशान करते हैं!

माननीय! मेरा अनुरोध और सुझाव है कि वरीय पदाधिकारी की देख-रेख में बैंक परिसर में समय-समय पर ग्राहक मिलान समारोह का आयोजन करवाना चाहिए, ताकि आम ग्राहक अपनी परेशानी बता सकें।  बंद करवा चुके खाताधारकों से भी जानकारी ली जाय कि उन्होंने क्यों खाता बंद करवाया? बैंककर्मियों के रवैये के कारण बैंक की प्रतिष्ठा ख़राब हो रही है। आज भी इस बैंक में लम्बी लाईन लगकर पर्ची पर नंबर लेने के बाद ही काउंटर पर पैसा जमा हो पता है। मेरी जानकारी के अनुसार यह प्रथा अन्य बैंकों में समाप्त हो चुकी है। पर्ची भर कर सीधा काउंटर पर पैसा जमा होता है और तुरत खाते में जमा राशि की एंट्री हो जाती है।

इस बैंक में ग्राहक लाईन में लगे रहते हैं और बैंककर्मी काउंटर छोड़ कर इधर-उधर रहते हैं। और कोई ग्राहक जल्दी करने को कहता है, तो ये कर्मी रौब दिखाने से जरा भी परहेज नहीं करते हैं। यहाँ ना तो मैनेजर के गेट पर नेम प्लेट है और ना ही अन्य पदाधिकारी या बैंककर्मी के टेबुल पर ही नाम व पद का नेम प्लेट लगा है। इससे ग्राहकों को यह पता नहीं चल पाता है कि कौन सी टेबुल किसका है और उसका नाम क्या है? हर साल गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस के मौके पर बैंक की छत पर राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा फहराया जाता रहा है। पर इस बार 15 अगस्त 2017 को बैंक में झंडा नहीं फहराया गया। इसे बैंक मैनेजर की लापरवाही कहा जाये या लालफीताशाही? आस-पास के दुकानदारों से तथा सीसी टीवी फुटेज से सच्चाई सामने आ जाएगी। बताया जाता है कि बैंककर्मी अपनी कारगुजारियों पर पर्दा डालने के लिए समय-समय पर सीसी टीवी को बंद रखते हैं तथा कभी-कभी फुटेज से भी छेड़छाड़ करने से गुरेज नहीं करते हैं।

मान्यवर! केंद्र में भाजपा की सरकार है, परन्तु बैंककर्मी कांग्रेस सरकार की समयावली से ही देर चल रहे हैं। दलाल-बिचौलियों के मार्फ़त लोन तुरत लो। वरना जूते-चप्पल घिस जायेंगे, लोन नहीं मिलेगा। ऐसे में थक-हार कर लोग बैंक का चक्कर लगाना छोड़ देते हैं तथा महाजन-सूदखोरों से मोटी ब्याज पर पैसा लेकर अपना काम-धंधा चलाने को मजबूर हैं। मुझ जैसे आशावान व न्यायप्रिय लोगों को विश्वास है कि माननीय प्रधानमंत्री हकीकत जानते ही वह इस दिशा में स्वयं पहल करेंगे तथा समुचित जांच करवाकर मेरे जैसे जरूरतमंदों को बैंक से आसानी से लोन दिलवाने की कार्रवाई जरूर करेंगे! 

अतः आपसे सादर अनुरोध है कि मेरे उक्त मामले की यथोचित जांच करवाने तथा जल्द से जल्द लोन दिलवाने की कृपा करेंगे, ताकि मैं अपने व्यापार का आवश्यकतानुकूल विस्तार कर सकूँ। आशा ही नहीं, अपितु पूर्ण विश्वास है कि आप बहुत जल्द मेरी विनती पर कार्रवाई करेंगे।   

आपका विश्वासी

संजय कुमार

हिंदुस्तान जनरल स्टोर,
एम जी रोड, भरावपर,
बिहारशरीफ, नालंदा,
बिहार – 803101              
ईमेल- sanjayjisanju@gmail.com
मोबाइल नंबर-9608311251

प्रतिलिपि प्रेषित-
1. गवर्नर,  भारतीय रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया, मुंबई.
2. बैंकिंग लोकपाल.  पटना.

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Naukari planet और Varchashav adventure नामक दो धोखेबाज कंपनियों से रहें सावधान

श्री मान सम्पादक महोदय, मैं रमाशंकर यादव हूं. मेरे पिता का नाम श्री जयराम यादव है. ग्राम- छिवर चक, पो.-धुरियापार, जिला-गोरखपुर का निवासी हूं. मैं इस भ्रष्ट व्यवस्था से त्रस्त हूं. यहॉं जिसको मौका मिलता है वह लूट ही लेता है. कई सारी फर्जी कम्पनियां कंटिया लगाए बैठी हैं. कोई न कोई मछली फंस ही जाती है. ऐसी दो कम्पनियों के बारे मे मैं लिखने जा रहा हूं जिसने हजारों लोगों को करोड़ों रुपये का चूना लगाया है…

१: Naukari planet नामक कम्पनी नौकरी दिलाने के नाम पर फोन कर के लोगों को ट्रैक करती है. मैने भी तीन बार में २०००० रुपये दिया. इस कंपनी से ठगे जाने के एहसास के बाद यू. पी. सरकार की जन सुनवाई पोर्टल पर शिकायत की लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई.     

२: Varchashav adventure pvt. Ltd.नामक कम्पनी जॉर्जिया और कनाडा भेजने के नाम पर कई लोगों का ५५ से ८०हजार रुपये लेकर कोलकाता से मुम्बई भाग गई. इसमें मैंने भी ५५ हजार रुपए जमा किया था. इसकी शिकायत हमने कोलकाता पुलिस में, गोरखपुर पुलिस में तथा प्रधन मंत्री के पी जी पोर्टल पर दे रखी है. इसका कोड नं. PMOPG/E/2017/0277477 है. कोई सुनवाई नहीं हुई.

मेरे पास कुछ प्रार्थना पत्र हैं जिसे मैं आप को भेज रहा हूं. वैसे तो किसी के पास सुनने का समय नहीं है लेकिन फिर भी पढ सकते हैं तो पढ लीजिएगा. अगर गरीब पर दया आ जाए तो जो भी कर सकते हैं वह कर लीजिएगा.

Ramashankar Yadav

rmshankaryadav@gmail.com

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ये तो आईसीआईसीआई बैंक वालों की गुंडागर्दी है! (सुनें टेप)

बिना आधार कार्ड बैंक एकाउंट नहीं खोल रहे आईसीआईसीआई वाले! ICICI Bank, sector 4, Gurgaon शाखा ने एकाउंट खोलने के लिए आधार मांगा और कहा कि RBI के निर्देशानुसार, आधार के बिना एकाउंट नहीं खोल सकते। जब उनसे RBI के निर्देशों की कॉपी मांगी गई तो बैंक की कर्मचारी रानी सिंह ने कहा कि वे निर्देशों की कॉपी ईमेल पर भेज देंगी। ईमेल पर नहीं भेजा तो फिर फोन बात हुई। उन्होंने बहाने बनाने शुरू कर दिए और निर्देशों की कॉपी नहीं दी।

बैंक कर्मचारी रानी के मोबाइल नंबर पर जो बातचीत हुई है, उसे सुनें। इस रिकॉर्डिंग क्लिप की बुनियाद पर ICICI Bank के खिलाफ निजता के अधिकार पर चोट का केस दर्ज करने जा रहा हूं। यह सबको पता है कि बैंक एकाउंट खोलने के लिए आधार कार्ड की अनिवार्यता संबंधित कोई भी कानूनी आदेश RBI या भारत सरकार ने लिखित में जारी नहीं किये हैं। क्या देश अब सिर्फ तानाशाही फरमानों से चलेगा? कानून नाम की कोई चीज़ नहीं रहेगी मोदी जी के राज में? सुनिए बातचीत का टेप…

मुकेश सोनी कुल्ठिया की एफबी वॉल से.

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भड़ास4मीडिया की खबरें अब यूट्यूब पर भी मिलेंगी, करें चैनल को सब्सक्राइब

अगले कुछ दिनों में भड़ास4मीडिया की खबरें वीडियो फार्मेट में यूट्यूब पर भी मिला करेंगी. इसके पीछे तीन कारण हैं. अगर कोई बड़ी खबर है और उसे तुरंत शेयर करना है तो यूट्यूब के जरिए लाइव उसे ब्राडकास्ट कर दिया जाए. बाद में इत्मीनान से उसे भड़ास4मीडिया पर लिखा-पढ़ा जाए. दूसरा कारण है यूट्यूब के जरिए लाइव ब्राडकास्ट के एक बेहतरीन विकल्प का इस्तेमाल बढ़ाना ताकि इस माध्यम से उन खबरों को सामने लाया जाए जिसे आम तौर पर टीवी / चैनल वाले इग्नोर करते हैं.

तीसरा कारण है यूट्यूब एक मानेटाइज्ड प्लेटफार्म है जिसकी तकनीकी से लेकर सर्वर तक का सारा खर्च खुद यूट्यूब यानि गूगल वाले वहन करते हैं, सो इसमें निवेश लगभग शून्य है और चैनल के वीडियोज हिट होने पर बतौर पार्टनर भड़ास4मीडिया यहां से रेवेन्यूज जनरेट कर सकता है.

अगर आप यूट्यूब पर भड़ास4मीडिया के चैनल को सब्सक्राइव कर लेंगे तो लाइव ब्राडकास्ट होते ही या नया वीडियो अपलोड होते ही आपके पास नोटिफिकेशन आ जाएगा जिसके बाद आप तुरंत लाइव या ताजा अपलोड वीडियोज को वॉच कर सकेंगे. नीचे भड़ास4मीडिया के यूट्यूब चैनल का स्क्रीनशाट है. इस पर क्लिक करते ही आप यूट्यूब पर भड़ास4मीडिया के पेज पर पहुंच जाएंगे जहां टॉप में दाएं तरफ लाल रंग से चौकोर घेरे में सफेद रंग से लिखा SUBSCRIBE दिखेगा.

इस पर क्लिक करते ही आप चैनल सब्सक्राइव कर लेंगे. इसका प्रमाण होगा अब तक लाल दिख रहे सब्सक्राइव बटन का ग्रे रंग में तब्दील हो जाना. साथ ही इसके ठीक बगल में एक घंटा जैसा आइकन दिखेगा. इस घंटा पर भी क्लिक करना है यानि घंटा बजा देना है. इस पर क्लिक करने से आपको भड़ास के चैनल की गतिविधि का नोटिफिकेशन मिलने लगेगा.

 

 

उपर क्रम से चारों अवस्थाओं के स्क्रीनशाट हैं. सबसे पहले भड़ास4मीडिया के यूट्यूब चैनल का नार्मल टॉप लोगो है जहां दाहिने तरफ लाल रंग के चौकोर घेरे में सफेद रंग से SUBSCRIBE लिखा है. अगले स्क्रीनशाट में SUBSCRIBE को काले घेरे में इसलिए दिखाया गया है ताकि आप जान सकें कि आपको कहां क्लिक करके सब्सक्राइब करना है. सब्सक्राइब करते ही SUBSCRIBE का रंग लाल से ग्रे हो जाएगा. साथ ही इसके बगल में एक घंटा दिखने लगेगा. देखें तीसरे नंबर का स्क्रीनशाट. उपर आखिरी यानि चौथे स्क्रीनशाट में गोल घेरे में घंटे को दिखाया गया है जिस पर आपको क्लिक करना है.

ध्यान रखें, ये एक जरूरी काम है, जिसके जरिए आप अपने स्मार्टफोन से भड़ास के यूट्यूब चैनल से कनेक्ट रहेंगे और यूट्यूब पर भड़ास4मीडिया की हर एक गतिविधि से वाकिफ रहेंगे. संभव है, यूट्यूब पर भड़ास4मीडिया के चैनल से खबरों के प्रसारण का पहला प्रयोग आज या कल में शुरू कर दिया जाए.

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भाजपा यानि भ्रष्टाचारियों को बचाने और मीडिया पर अंकुश लगाने वाली पार्टी! (देखें वीडियो)

राजस्थान की भाजपा सरकार ने एक काला कानून बनाने की तैयारी कर ली है. इसक कानून के बन जाने के बाद भ्रष्टों के खिलाफ कोई खबर मीडिया वाले न लिख सकते हैं और न दिखा सकते हैं. महारानी वसुंधरा राजे फिलहाल लोकतंत्र को मध्ययुगीन राजशाही में तब्दील करने पर आमादा हैं. जितना विरोध कर सकते हैं कर लीजिए वरना कल को विरोध करने लायक हम सब बचेंगे ही नहीं क्योंकि देश बहुत तेजी से आपातकाल और तानाशाही की तरफ बढ़ रहा है. ज्यादातर बड़े मीडिया हाउसेज बिक चुके हैं. जो बचे हैं उनको धमका कर और पाबंदी लगाकर चुप कराया जा रहा है. राजस्थान सरकार का काला कानून पाबंदी लगाकर मीडिया को चुप कराने की साजिश का एक हिस्सा है.

भड़ास4मीडिया के संस्थापक और संपादक यशवंत एक वीडियो संदेश के जरिए समाज के सभी वर्गों से अपील कर रहे हैं कि इस काले कानून का जमकर विरोध किया जाना चाहिए ताकि राजस्थान सरकार इस अध्यादेश को वापस लेने पर मजबूर हो सके. अगर राजस्थान में यह कानून पास हो गया तो जल्द ही इसे केंद्र सरकार भी बनाने की तैयारी कर सकती है. राजस्थान की भाजपा सरकार के जरिए एक राज्य में इस कानून को बनवा कर एक तरह से टेस्ट किया जा रहा है कि इसका कितना और किस लेवल तक विरोध होता है. देखें वीडियो:

यशवंत ने इस बारे में फेसबुक पर जो कुछ लिखा है, वह यूं है :

Yashwant Singh : भाजपा वाले बहुते पतित हैं, कांग्रेसियों से भी ज्यादा. राजस्थान की भाजपा सरकार मुर्दाबाद. वसुंधरा राजे होश में आओ. मीडिया पर पाबंदी लगाने वाला कानून तुरंत वापस कराओ. आज से भाजपा का असली अर्थ जान जाइए. भाजपा यानि भ्रष्टाचारियों को बचाने और मीडिया पर अंकुश लगाने वाली पार्टी. आगे की कहानी मेरी जुबानी सुनिए। नीचे दिए वीडियो लिंक पर क्लिक करें :

https://www.youtube.com/watch?v=Wl0cAPpLPNw

इन्हें भी पढ़ें :

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आइए, सच्ची दिवाली मनाएं, मन के अंधेरे घटाएं

दिवाली में दिए ज़रूर जलाएं, लेकिन खुद के दिलो-दिमाग को भी रोशन करते जाएं. सहज बनें, सरल बनें, क्षमाशील रहें और नया कुछ न कुछ सीखते-पढ़ते रहें, हर चीज के प्रति संवेदनशील बनें, बने-बनाए खांचों से उबरने / परे देखने की कोशिश करें, हर रोज थोड़ा मौन थोड़ा एकांत और थोड़ा ध्यान जरूर जिएं.

आइए, सच्ची दिवाली मनाएं, मन के अंधेरे घटाएं.

आप सभी को दिवाली की बहुत-बहुत शुभकामनाएं.

मैं हर तरफ और हर किसी के लिए शांति-सुख-समृद्धि की कामना करता हूँ।

आभार

यशवन्त

फाउंडर, भड़ास4मीडिया डॉट कॉम

संपर्क : yashwant@bhadas4media.com

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मुझे भी यही लगता है कि भड़ास एक स्तरहीन पोर्टल है!

भड़ास के खिलाफ भड़ास निकालने वाले अभय को दिवाकर और अवनिन्द्र ने भी दिया जवाब, पढ़िए

भड़ास4मीडिया को शुरू से ही एक खुला, पारदर्शी और लोकतांत्रिक मंच बनाकर रखने की कोशिश की गई. यही कारण है कि जब जब भड़ास या इसके फाउंडर यशवंत के खिलाफ कुछ भी किसी ने लिखकर भेजा तो उसे पूरे सम्मान के साथ छापा गया. इसी क्रम में कल भड़ास के एक पाठक अभय सिंह का पत्र भड़ास पर प्रकाशित किया गया, साथ ही संपादक यशवंत द्वारा दिया गया क्रमवार जवाब भी… इसके पब्लिश होते ही दो प्रतिक्रियाएं भड़ास के पास मेल से आई हैं. बनारस से युवा पत्रकार अवनिंद्र और नोएडा से आईटी कंपनी के संचालक दिवाकर ने जो कुछ भेजा है, उसे नीचे प्रकाशित किया जा रहा है.

नोएडा से आईटी कंपनी के हेड दिवाकर प्रताप की चिट्ठी…

कल भड़ास के एक पाठक द्वारा यशवंत जी को भेजा गया एक पत्र पढ़ा जो भड़ास पर प्रकाशित हुआ. पाठक ने सवाल किया था कि ऐसा स्तरहीन पोर्टल चलाकर यशवंत क्या हासिल कर लेंगे.  मैं भी बहुत दिनों से यही सोच रहा था, बस यशवंत जी को बता नहीं पा रहा था. मुझे भी यही लगता है कि भड़ास एक स्तरहीन पोर्टल है. असल में यशवंत जी का काम ही सिरे से स्तरहीन है.

आज जब मीडिया में तमाम स्तर बन गए हैं, यशवंत उनसे कोसों दूर हैं. क्या हैं वो स्तर, बताता हूँ. पहली स्तरहीनता है चाटुकारिता की. अक्सर मीडिया संस्थान राजनीति के एक धड़े से सम्बद्ध होते हैं. जो नहीं होते वो चल नहीं पाते, या फिर अंततोगत्वा वो चाटुकारिता के स्तर पर आ ही जाते हैं.

मुझे लगता है यशवंत का काम चाटुकारिता वाले इस स्तर पर बिलकुल खरा नहीं उतरता. वो अक्सर चाटुकारों को गरियाते पाए जाते हैं. सच को सच की तरह प्रस्तुत करके उन्होंने स्थापित स्तरों के परे जाने की ही कोशिश हमेशा की है. इसलिए उनका काम बिलकुल भी स्तरीय नहीं है.

दूसरी स्तरहीनता है धन कमाने की. हमारे यहाँ मीडिया संस्थानों को उनकी पैसे कमाने की कुव्वत के हिसाब से रैंक किया जाता है. अब ये पैसा कल्पवृक्ष से तो आता नहीं, जाहिर है मीडिया संस्थानों के निहित स्वार्थों को पूरा करने के लिए गलत तरीके से कमाए गए पैसे ही होते हैं. भले ही बाद में उनको विज्ञापन की आय बताया जाए.

तो वो जो पैसा कामने का स्तर है, यशवंत उससे भी कोसों दूर हैं. कह सकते हैं कि एक बहुत बड़ी स्तरहीनता है.

तीसरा स्तर है समझौता करने वाला स्तर. अधिकतर पत्रकार और उनके संस्थान समझौता करके ही चलते हैं. किसी का स्टिंग विडियो आया तो उससे पैसा लेकर उसको दबा दिया जाता है. किसी की अन्दर की खबर प्रकाशित होती है तो कुछ समय बाद हटा दी जाती है. ये जो स्तर कायम हो गया है, उसकी आवश्यकता को यशवंत नहीं समझ पा रहे हैं. तो यहाँ भी वो स्तर वाली पत्रकारिता से बहुत दूर हैं.

चौथा स्तर है भीरूपन का स्तर. आज तमाम अपराधी हर तरह से मीडिया को दबाने का काम कर रहे हैं. ऐसे में अपनी मीडिया की दूकान को चलाने के लिए ये संस्थान पूँछ दबाकर अक्सर दुबके हुए पाए जाते हैं. यशवंत यहाँ भी दुबकने को राजी नहीं. जेल जा चुके हैं, हमला भी झेल चुके हैं. पर भीरु बनने को राजी नहीं. ये भी निरी स्तरहीनता ही है. शायद इन भीरूओं की तरह रहे तो अवश्य स्तरीय कहलायेंगे.

ऐसे और भी तमाम स्तर हैं जहाँ यशवंत फिट नहीं बैठते. उनको चाहिए कि वो इन स्थापित स्तरों के अनुसार जल्द से जल्द स्तरीय पत्रकारिता की शुरुआत करें. तब हम जैसे तमाम पाठक उनके काम को सराहेंगे. उम्मीद है जल्द ही वो इन सारे स्तरों पर पहले से अधिक फिट होंगे और अपने पाठकों का अधिक से अधिक प्यार हासिल करेंगे.

दिवाकर प्रताप सिंह
dsingh@qtriangle.in


बनारस से अवनिन्द्र कुमार सिंह का जवाब…

डियर यशवंत जी (जेल जिसकी जानेमन है), अभी-अभी व्हाट्सअप पर आप द्वारा भड़ास की खबरों को प्राप्त किया। रोजाना की तरह पहले सभी खबरों की हेडलाइन देखा। पहले मेरी नजर ‘जी न्यूज से रोहित सरदाना गए’ खबर पर टिकी, जिसके बाद अंत में ‘भड़ास के खिलाफ एक पाठक ने यूं निकाली अपनी भड़ास, ‘यशवंत जी, भड़ास का अंत आवश्यक हो गया है!’ नामक शीर्षक पर गई तो गाड़ी चलाते समय भी खुद को रोक नहीं पाया और लिंक पर क्लिक करके खबर खोला। पहले तो प्रिय अभय जी के पत्र को पढ़ा तो अचंभित रह गया फिर सोचा शायद अभय जी को यह मालूम न होगा कि किन परिस्थियों में भड़ास की शुरुआत हुई थी। मित्र आपके प्रश्नों के कुछ उत्तर आपको देने का प्रयास करता हूँ बाकी के खुद भड़ासी (यशवंत जी) ने दे दी है।

यशवंत जी जो अमर-उजाला और जागरण जैसे संस्थानों में नौकरी करने वाले वह पत्रकार थे जिसकी कलम जब सच्चाई न लिख पाती थी तो वह अपने अंदर का आक्रोश शांत नहीं कर पाते होंगे, शायद इसलिए भड़ास की शुरुआत हुई, जहा तक मैं जानता हूँ जीवन में प्रयोग करना यशवंत जी का रूटीन है। जहा तक बात मीडियाकर्मियों द्वारा यशवंत जी पर लात-घूसों से मारने का है आप उतने में ही घबरा गए मित्र। भड़ास के शुरु होने के बाद कई बड़े संस्थानों को पशीने छुटे थे अलबत्ता यशवंत जी को षड्यंत्र रचकर प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने जेल तक भेजा था, वहा भी यशवंत जी अल्हड़पन और मस्तमौला जीवन यापन करके जेल को ही ‘जानेमन’ बना लिए। जेल से छूटने के बाद जेलयात्रा का जो वृतांत ‘जानेमन जेल’ पुस्तक में लिखी उसे पढ़कर जेल नाम से भय समाप्त हो जाता है। भ्रष्ट और कारपोरेट मीडियाघराना कभी नहीं चाहता कि भड़ास सुचारु रुप से चले क्योंकि मिडियाघरानों के तहखाने की खबर, भ्रष्टाचार, यौनशोषण की बातें जनता तक पहुंचाने का कोई माध्यम न बचे।

मित्र अभय जी जिस भड़ास को आप स्तरहीन कह रहे है वह वास्तव में बाप है मीडिया का।कार्पोरेट और करप्ट मीडिया घरानों का। बात यादि अर्जित करने की है तो यशवंत जी को आर्थिक लाभ हुआ हो या नहीं मगर आत्मसंतुष्टि और लाखों पीड़ित मीडियाकर्मियों की दुआ अवश्य अर्जित हुई है।

रही बात ईमानदार और निष्पक्ष पत्रकारिता की मिसाल पेश करने की तोदिल्ली में बैठकर अकेले यशवंत जी यह काम नहीं कर सकते कारण स्पष्ट है मित्र जिस साथियों को वह जोड़ेंगे उन ईमानदार और निष्पक्ष पत्रकारों को अगले ही पल संस्थान बाहर का रास्ता दिखा देगा शायद आपको मालूम न हो कि कई मीडिया संस्थानों ने दफ्तर में भड़ास वेबसाइट को खोलने पर प्रतिबंध लगा रखा है।

मित्र आपने जो यशवंत जी से आशा कि है कि मीडिया में उनके जैसे साहसी, निडर पत्रकार की जरुरत है इसलिए भड़ास की जरुरत है। कारपोरेट मीडिया को आईना दिखाने चौथे स्तम्भ को उसकी अहमियत लगातार भड़ास बताता आया है और जो आपने भड़ास के शीघ्र त्याग की बात कही है वह होने से रहा क्योंकि जब-जब भड़ास से मदद की अपील की है तो चोरी-छिपे हजारों मीडियाकर्मियों ने देशभर से सहायता राशि भेजते होंगे क्योंकि उनका दर्द, अखबार मैनेजमेंट की तानाशाही और संपादक का तुगलकी फरमान का विरोध केवल भड़ास ही कर सकता है।

आप सबका बनारस का साथी

अवनिन्द्र कुमार सिंह
avanindrreporter@gmail.com


जिन सज्जन अभय सिंह ने भड़ास पर कल भड़ास निकाली थी, उनका एक और मेल आया है, वो इस प्रकार है…

यशवंत भैया
सादर प्रणाम

बेहद खुशी हुई कि आपने मेरी भड़ास का बड़ी बेबाकी से उत्तर दिया।पर हर प्रतिक्रिया पर तिलमिलाने की आदत से आज हर नेता,एंकर, पत्रकार पीड़ित है शायद सब्र का बांध अब टूट चुका है । मीडिया भी बिगबॉस का नकारात्मक शो बनकर रह गया है जहाँ प्रतिभागियों को लड़ा भिड़ाकर trp बटोरी जाती है। शायद स्वयं में बदलाव का ये सबसे सही समय है। मेरी आपसे बड़ी उम्मीद है और मेरा विश्वास है कि आप मेरा भरोसा नही तोड़ेंगे भड़ास से भी दूरगामी पहल करेंगे।

मैं आपके पोर्टल का अदना सा पाठक हूं ।न्यूज़,डिबेट देखने सुनने में मेरी गहरी रुचि है ।पत्रकारिता से मेरा दूर तक कोई वास्ता नहीं है ।बस दिल किया और आपको अपनी बात बता दी। पत्र में वर्तनी, वाक्यांश का दोष जरूर होगा क्योंकि अगर अंग्रेजी में टाइप करता तो शायद संवाद में कमी होती इसलिए मोबाइल पर जल्दी में हिंदी टाइप करना उचित समझा लेकिन मोबाइल पर हिंदी टाइप करना कितना कठिन है कि मेरी उंगलिया जवाब दे गई बेहतर होता कि मैं आपको हस्तलिखित पत्र स्कैन करके मेल कर देता।

मेरा आपसे यही सवाल था कि मीडिया के गुण दोषों में अपना समय बर्बाद करने की बजाय खुद एक बेहतर विकल्प बनने का प्रयास किया जाय। हम दूसरों को बदलने की कोशिश करने की बजाय खुद को ऐसा बनाये की लोग हमें देखकर अपनी गलतियों का आभास करें और उन्हें दूर करें।अगर आप किसी की भयंकर आलोचना करते है तो दो संभावनाये बनती हैं या तो आप सच्चे आलोचक हैं या ब्लैकमेलर।आज मीडिया ब्लैकमेलर की भूमिका में है जब उसके हित पूरे हो जाते है तो वे आलोचना बंद कर देते है।उदाहरण के तौर पर यूपी चुनाव में अखिलेश यादव ने लंबे समय तक ऐसा मीडिया मैनेज किया की जमीनी सच्चाई से दूर सारे पत्रकार लगातार गलत विश्लेषण कर रहे थे । चुनाव परिणाम के बाद अधिकांश पत्रकारों की राजनीतिक समझ पर खूब छीछालेदर हुई।आखिर क्या पत्रकारिता पर पेट भारी है।

मीडिया को ब्लैकमेलिंग का धंधा बनाकर अपना उल्लू सीधा करना आज आम है इसे बदलने की जरूरत है । ऐसा देखा जाता है कि जहाँ मीडिया के आर्थिक हित होते है वहाँ सही गलत का फर्क खत्म हो जाता है।

जब आप पर हमला हुआ तब मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ कि आपके भड़ास4मीडिया के अलावा कहीं भी इस बात की चर्चा तक नहीं हुई आप खुद ही अकेले लड़ते रहे।आखिर क्यों आप अकेले पड़ गए इसका आत्ममंथन आपको करना जरूरी है।

मुझे लगता है कि भविष्य में मीडिया में बड़ा बदलाव अत्यावश्यक है जिसकी आप एक बड़ी उम्मीद बन सकते है ।मैं एक पाठक हूँ अपनी राय रख सकता हूँ बाकी फैसला आपका है। भाषण में मेरा यकीन नही है हां पत्रकारिता के उभरते हनुमान को उनके बल, सामर्थ्य की की याद जरूर दिला सकता हूं।

शुरू से ही मीडिया के बदलते रंग रूप को देखकर गहरा संदेह होता है इसी को जानने के लिए भड़ास4मीडिया की मदद लेता रहा हूं।एक उम्मीद दिखती है लेकिन क्या ये सब पर्याप्त है। मेरी एक उम्मीद है कि भविष्य में ऐसा मीडिया हो जिसमे निष्पक्ष, ईमानदार लोग हो जो trp की होड़ से कोसो दूर हो। दिल्ली और हनीप्रीत के ड्रामे केअलावा देश के और भी हिस्सों की समस्याओं को सामने रखें।डिबेट में शांत संतुलित बहस हो। सत्ता के आगे रेंगने की बजाय उनसे सवाल पूछने का माद्दा हो।चैनल की विश्वसनीयता इतनी हो कि देश उस पर भरोसा करे लेकिन आज स्थिति बिल्कुल उलट है।इसमे बदलाव के वाहक आप बने यही ईश्वर से मेरी कामना है। बस एक उम्मीद से आपसे अपनी हाँफती उंगलियों को विराम देना चाहूंगा।

धन्यवाद

एक पाठक

अभय सिंह

abhays170@gmail.com


मूल मसला इसमें है…

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भड़ास पर भी लग गया ‘आनलाइन कटोरा’, आप भी कुछ डालें इसमें

Yashwant Singh : द वायर और न्यूज लांड्री जैसी कारपोरेट फंडित वेबसाइटों ने भी जनता से पैसा मांगने के लिए हर खबर के नीचेे एक कटोरा (बल्कि आनलाइन कटोरा कहना चाहिए) लगा रखा है, ”दे दो रे, सौ दो सौ तीन सौ चार सौ… जो सूझे वही दे दो क्योंकि हम लोग बड़ी किरांती कर रहे हैं.. आप जनता की खातिर…” टाइप वाला कटोरा…

कटोरा समझ रहे हैं न… चार-पांच चिल्लर उछालने से निकलती टन टन टन की आवाज के बीच दे दो रे बाबा.. भगवान भला करेगा… गाने वालों के हाथ में होता है ये..

तो द वायर और न्यूजलांड्री के आनलाइन कटोरों को देखने के बाद हमको भी लगा कि यार ये कटोरा तो भड़ास पर भी हर खबर के नीचे सटकर डटकर लगा होना चाहिए… सो फौरन अपने टेक गुरु Divakar Singh से संपर्क साधा. उनसे पूछा कि क्या यह कटोरा लगाने वाला काम आसानी से हो जाएगा? दिवाकर ने सदा की तरह कहा- आप टेंशन न लें सर, आपने कह दिया, समझो काम हो गया.

और, फाइनली कटोरा लग गया.

मजेदार ये कि कटोरा लगते ही दनादन पैसे भी गिरने लगे… अब तक साढ़े बारह हजार रुपये आ चुके हैं.. इसमें सबसे आनंद वाली चीज है कि सबसे पहले सौ रुपये उस एक लड़के ने भेजा जो पिछले काफी समय से नौकरी खोज रहा है… मैंने उसे फोन कर कहा, तूने क्यों भेजा बे… तो बोला- भइया चेक कर रहा था कि जा रहा है या नहीं… मैं बोला- तो रिफंड कर देता हूं… वो लगा हंसने.. आप भी गजबे करते हैं… चेक करने और रिफंड करने में कटोरा वाली कंपनी पांच दस रुपया काट कर कमा लगी… रहने दीजिए अपने पास…

एक बड़े आदमी नुमा मित्र ने पांच हजार रुपये इकट्ठा भेजा.. वो भी काफी समय से ठीकठाक रोजगार में नहीं हैं… मैंने कहा कि हे बड़े आदमी… माना कि आपको सौ दो सौ पांच सौ रुपये देने में शर्म लगती है सो आपने कटोरे में इंगित की गई अधिकतम राशि पर क्लिक मार कर भेज दिया लेकिन मुझे तो पता है न कि आप काफी समय से अपना बचा गड़ा माल ही निकाल कर खा रहे हैं तो फिर ये नेकी क्यों?

वो तर्क देते रहे लेकिन मैं सुना नहीं… उनका पैसा रिफंड करा दिया.. यानि उनके एकाउंट में वापस करा दिया…

मुझे तो आनंद केवल देने वालों के नाम पढ़ने में आ रहा है.. सारे नाम परिचित सुने से हैं… अच्छा लगता है जब सौ या दो सौ या पांच सौ या हजार रुपये रिसीव होने का मैसेज मेल से आता है उसमें किसी परिचित का नाम होता है, सेंडर के रूप में.. तब सच में लगता है कि लोग भड़ास को प्यार करते हैं…

और हां, अपने टेक गुरु दिवाकर जी ने भी हजार रुपये भेज दिए हैं… मतलब जिनको भड़ास से लेना चाहिए, इसका तकनीकी कामकाज देखने के वास्ते, वो भड़ास को दे रहे हैं… इनका भी रिफंड करूंगा… 🙂

लव यू आल… 🙂

सो, अब आप भी भड़ास4मीडिया डाट काम पर हर खबर के ठीक नीचे सौ, दो सौ, पांच सौ, हजार, दो हजार और पांच हजार रुपये डोनेशन देने के विकल्प को पाएंगे और उम्मीद करते हैं कि अपने सामर्थ्य भर जरूर मदद कर भड़ास4मीडिया जैसे पोर्टल को जिंदा रखने में मदद करेंगे.

भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.

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भड़ास के खिलाफ एक पाठक ने यूं निकाली अपनी भड़ास, ‘यशवंत जी, भड़ास का अंत आवश्यक हो गया है!’

यशवंत जी

भड़ास पर मेरी भी एक भड़ास है। ये भड़ास आपके पोर्टल से उत्पन्न हुई है। जब आप मीडिया के कुकृत्यों पर भड़ास निकालते हैं तो मीडिया के ही लोग आप पर लात घूसों की मुक्केबाजी करके भड़ास निकालने लगते हैं। आखिर ये सिलसिला कब तक चलेगा। जब NBA, एडिटर्स गिल्ड जैसी अनेक संस्थाएं मीडिया के कुकृत्यों पर लगाम लगाने में अक्षम हैं तो आप भड़ास जैसा स्तरहीन पोर्टल चलाकर क्या अर्जित कर रहे हैं?

बेहतर ये होता कि आप खुद गंभीर पहल करके मीडिया के अच्छे पत्रकारों का एक अलग समूह बनाते जिसमें ईमानदार-निष्पक्ष पत्रकारिता की मिसाल पेश की जाती जो देश के बिकाऊ मीडिया के लिए आईना होती। गंभीर आर्थिक संकटों से गुजरते मीडिया की मजबूरियों को भी समझना जरूरी होगा। साथ ही मीडिया के टीआरपी होड़ पर भी गौर करना जरूरी होगा।

भड़ास की बेशर्मी वाली भाषा न तो पाठकों को सुकून देती है ना ही आप को। हाल ही में आप पर लात घूसों से हमला हुआ पर इक्का दुक्का छोड़ कोई मीडिया आपके समर्थन में नही आया। मुझे लगता है कि मीडिया को आप जैसे साहसी निडर पत्रकार की जरूरत है जो निष्पक्ष, ईमानदार बेबाक पत्रकारिता से कारपोरेट मीडिया को आईना दिखा सके और उसे चौथे स्तम्भ की अहमियत बताये। यशवंत जी, आप भड़ास जैसे पोर्टल का शीघ्र त्याग करेंगे, यही मेरा आपसे निवेदन है।

एक पाठक

अभय सिंह

abhays170@gmail.com


अभय के उपरोक्त पत्र का भड़ास एडिटर यशवंत ने यूं दिया क्रमवार जवाब…

शुक्रिया अभय भाई, पत्र लिखने के लिए, और अपने दिल-मन में अटकी हुई भड़ास निकालने के लिए… आपने जो कुछ कहा है, उसे उद्धृत करते हुए सिलसिलेवार मैं अपना जवाब लिख रहा हूं…

-मीडिया के ही लोग आप पर लात घूसों की मुक्केबाजी करके भड़ास निकालते है। आखिर ये सिलसिला कब तक चलेगा?

(अरे भाई, पहली बार हमला हुआ है, वो भी पोलखोल खबर के कारण. यह तो भड़ास पोर्टल की सफलता है. क्या पत्रकार हमले, जेल और पुलिस के डर से पत्रकारिता करना बंद कर दें? और हां, आगे भी हमले होंगे, यह जानता हूं. आगे भी जेल जा सकता हूं, यह जानता हूं. तो, भय के कारण हम अपने कर्तव्य, अपने काम से विमुख हो जाएं, ये तो कोई तरीका न हुआ ब्रदर. सिलसिला चलते रहना चाहिए… मैं अपना काम करूंगा… वो अपना काम करें… वो कहानी पढ़ी है न आपने… साधु और बिच्छू वाली… साधु बार बार बिच्छू को बहते नदी से निकाल कर उसकी जान बचाने की कोशिश करे और बिच्छू बार-बार उसे डंक मार दे… दोनों अपना अपना काम कर रहे थे… साधु अपनी साधुता नहीं छोड़ रहा था और बिच्छु अपने डंक मारने के स्वभाव से मजबूर था… )

-जब NBA, एडिटर्स गिल्ड जैसी अनेक संस्थाएं मीडिया के कुकृत्यों पर लगाम लगाने में अक्षम है तो आप भड़ास जैसा स्तरहीन पोर्टल चलाकर क्या अर्जित कर रहे हैं?

(एनबीए, एडिटर्स गिल्ड जैसी अनेक मीडिया संस्थाएं मीडिया के कुकृत्यों पर लगाम लगाने के लिए नहीं बनी हैं बल्कि ये मीडिया के कारपोरेट मालिकों और मीडिया के करप्ट संपादकों की रक्षा के लिए कवच हैं… इन संस्थाओं के जरिए कारपोरेट मीडिया मालिक और उसके करप्ट संपादक देश की सरकारों से बारगेन करते हैं, चौथे स्तंभ का मुलम्मा ओढ़कर और ढेर सारी सुविधाएं हासिल करते हैं, ढेर सारे लाभ लेते हैं. ये संस्थाएं सच्चे पत्रकारों और सच्ची पत्रकारिता का साथ नहीं देतीं… जनहित की पत्रकारिता पर ये चुप्पी साधे रहते हैं… ये केवल कारपोरेट मीडिया हाउसेज की रक्षक संस्थाएं हैं इसलिए इनसे मीडिया के कुकृत्यों पर लगाम लगाने की उम्मीद करना ही बेमानी है. रही बात भड़ास के स्तरहीन होने की तो ये बात उन हजारों पत्रकारों से पूछिए जिनकी मजीठिया वेज बोर्ड की लड़ाई में भड़ास न सिर्फ एक मंच और अगुवा बना बल्कि सुप्रीम कोर्ट में लड़ाई लड़ने में बड़ा माध्यम बना. देश भर के हजारों पत्रकारों को एकजुट कर पाने के लिए भड़ास ही निमित्त बना हुआ है. शोषित पत्रकारों की आवाज को उठाने का एकमात्र मंच भड़ास बना हुआ है… सैकड़ों उदाहरण हैं पिछले दस साल के जब भड़ास ने साहस के साथ सच को उजागर कर आम मीडियाकर्मयिों की आवाज को बुलंद किया और कारपोरेट मीडिया के मुंह पर कालिख पोतकर नंगा किया. राडिया टेप कांड हो या नवीन जिंदल सुधीर चौधरी स्टिंग, ऐसे दर्जनों मामलों को भड़ास ही पब्लिश कर सका क्योंकि मीडिया से जुड़े ये घपले घोटाले उठाने के लिए कारपोरेट मीडिया वाले तैयार न थे.. चोर-चोर मौसेरे भाई के अंदाज में चुप्पी साधे थे… हो सकता है आपको भड़ास स्तरहीन लगता हो… मुंडे मुंडे मतिर्भिन्ना… जाके रही भावना जैसी, प्रभु मूर देखी तिन तैसी… दिन भर पोर्न और घटिया खबरें छपने वाले बड़े बड़े मीडिया हाउसों के पोर्टल आपको अच्छे लगते हैं और भड़ास स्तरहीन तो भई मुझे इस पर कुछ नहीं कहना…)

-बेहतर ये होता कि आप खुद गंभीर पहल करके मीडिया के अच्छे पत्रकारों का एक अलग समूह बनाते जिसमें ईमानदार निष्पक्ष पत्रकारिता की मिसाल पेश की जाती जो देश की बिकाऊ मीडिया के लिए आईना होती।

(-सब काम हमहीं कर लेंगे तो आप क्या करेंगे…. खाली भाषण देंगे भाई? …ज्यादा अच्छा होता कि मुझे चिट्ठी लिखने से पहले इस काम के लिए आप पहल शुरू कर देते… ये बीड़ा आप उठाते… वैसे भारत में ‘पर उपदेश कुशल बहुतुरे’ बहुत हैं… राय बहादुर बहुत सारे लोग हैं… गला फाड़ ढेर सारे लोग हैं.. भाषणबाज और बतोलेबाजों की कमी कहां अपन के देश में… उम्मीद करता हूं आप बतोलेबाज नहीं होंगे.. तो बताइएगा कि आपने क्या पहल की है और अब तक क्या किया है पत्रकारिता में…)

-भड़ास की बेशर्मी वाली भाषा न तो पाठक को सुकून देती है ना ही आप को।

(भाषा बहता हुआ जल है. इसे आम जन से जुड़ा हुआ यानि बोलचाल वाली सहज सरल होनी चाहिए… बाकी, आप अगर साहित्य थोड़ा-बहुत भी पढ़े होते (अपढ़ नहीं कहूंगा आपको क्योंकि आप लिख तो लेते हैं, हालांकि ढेर सारी वर्तनी और वाक्य विन्यास की त्रुटियां हैं, सो आपकी पढ़ाई-लिखाई के लेवल को स्तरहीन कह सकता हूं) तो आप भड़ास की भाषा पर आपत्ति न करते. काशीनाथ सिंह का एक उपन्यास है, बनारस पर, अस्सी घाट पर, इसे आप लेकर पढिएगा फिर जानिएगा भाषा चीज क्या होती है… वैसे, मैं जानना चाहूंगा कि आपको भड़ास की किस खबर का कौन सा शब्द बेशर्मी भर लगा जिसके आपका सुकून चैन छिन गया.. आप अगर उदाहरण यानि फैक्ट्स के साथ बात करते तो मैं शायद ठीक से जवाब दे पाता..)

-आप पर लात-घूसों से हमला हुआ पर इक्का-दुक्का छोड़ कोई मीडिया आपके समर्थन में नहीं आया।

(हम इस उम्मीद में काम नहीं करते मुश्किल वक्त आने पर आप या वो मेरे समर्थन में आएं.. मीडिया तो वैसे ही मेरे यानि भड़ास के खिलाफ रहता है क्योंकि उनकी पोल तो भड़ास ही खोलता है… दूसरे हम जिन आम मीडियाकर्मियों के मंच हैं, आवाज हैं, वो बेचारे अपनी जरूरतों-संघर्षों और मीडिया संस्थानों में अपनी नौकरियों को लेकर इतना बिजी हैं, परेशान हैं कि उनसे अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह मेरे लिए सड़क पर आकर मार्च करें. खबर लिखने के कारण, पोलखोल के कारण हमले होना कोई नई बात नहीं है… बहुत सारे पत्रकारों ने इसके लिए जान तक गंवाए हैं… पर पत्रकारिता बंद तो नहीं हुई… लोगों ने पत्रकार बनना बंद तो नहीं किया… आज भी बहुत सारे जोरदार पत्रकार हैं जो जान की बाजी लगाकर काम कर रहे हैं…. मैं जेल भी गया… इसी भड़ास के कारण… तब भी कौन पूरा देश उठ खड़ा हुआ था मेरे समर्थन में…. पर जेल से लौटकर भड़ास तो नहीं बंद किया… मैंने हमलावरों को माफ कर दिया.. उनके खिलाफ एफआईआर तक नहीं कराया… एक वकील मित्र के दबाव देने पर केवल लिखित कंप्लेन थाने में दे आया था ताकि सनद रहे. गीता में कहा गया है, काम किए जाइए, नतीजे की परवाह न कीजिए… भड़ास अब कुछ वैसा ही हो गया है मेरे लिए… बहुत सारे लोगों के साथ भीड़ नहीं दिखती लेकिन उनके पास अदृश्य ताकतें खड़ी होती हैं, कोस्मिक एनर्जी की लेयर्स उन्हें प्रोटेक्ट करती हैं… आंतरिक यात्रा की इन बातों को आप न समझ पाएंगे क्योंकि इतना कुछ समझ पाते तो आपकी चिट्ठी की लाइनें वाक्य शब्द कुछ और होते. वैसे, आपको लगता है कि मेरे पर हमले के बाद केवल इक्का-दुक्का लोग ही खड़े हुए… मैंने तो देखा, हजारों मैसेजेज, फोन काल्स, आर्टकिल्स आए मेरे पास… कुछ ऐसे लोग भी मिले जो हमलावरों को उन्हीं की भाषा में जवाब देने के लिए तत्पर थे… पर मुझे सड़क चलते मिले कुछ पागलों से उलझना न था, आगे बढ़ जाना था इसलिए जो कुछ हुआ उसे इगनोर किया, उन पागलों को माफ किया और अपने काम पर लग गया.)

-मेरी आपसे आशा है कि मीडिया को आप जैसे साहसी निडर पत्रकार की जरूरत जो निष्पक्ष, ईमानदार बेबाक पत्रकारिता से कारपोरेट मीडिया को आईना दिखा उस 4th स्तम्भ की अहमियत बताये। यशवंत जी आप भड़ास जैसे पोर्टल का शीघ्र त्याग करेंगे यही मेरा आपसे निवेदन है।

(एक तरफ मुझे आप साहसी निडर जाने क्या क्या बता रहे हैं और फिर भड़ास के त्याग के लिए भी कह रहे हैं.. ये कांट्राडिक्टरी स्टेटमेंट समझ नहीं पाया… खैर, चलिए, आपका कहना मान लेते हैं. लो अभी से त्याग दिया भड़ास… अब आगे बताइए. क्या किया जाए? क्या कोई आपके पास एक्शन प्लान है? या यूं ही भड़ास के खिलाफ भड़ास निकालने के लिए भड़ास निकाले हैं.. वैसे, भड़ास को बंद करने के लिए मैं भी अक्सर सोचता रहता हूं लेकिन उसकी वजह दूसरी है… अगले दस साल कुछ दूसरा काम यानि घुमक्कड़ी, आंतरिक यात्रा, अध्यात्म आदि को देना चाहता हूं… पर आप जिन कारणों से भड़ास मुझसे बंद कराना चाहते हैं, वो मेरी समझ से परे है)

आभार

यशवंत

yashwant@bhadas4media.com


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‘भडास4मीडिया’ के बाद ‘कैफे भड़ास’ शुरू, देखें यहां कैसे निकालते हैं ‘भड़ास’! (वीडियो)

Kunal Verma : सुना है आपने ‘कैफे भड़ास’ के बारे में? मुझे पता है आप लोगों में अधिकतर ने भड़ास का नाम सुना होगा। हां वही भड़ास जो फ्रस्ट्रेशन के नाम से हमारे मन के भीतर होता है। मीडिया के लिए चर्चित तब हुआ जब वरिष्ठ पत्रकार यशवंत सिंह ने मीडिया के लोगों को अपना फ्रस्ट्रेशन निकालने के लिए एक मंच प्रदान किया। इसे नाम दिया ‘भड़ास फॉर मीडिया’। तमाम झंझावतों को झेलते हुए भड़ास फॉर मीडिया आज भी हिंदी का सबसे लोकप्रिय साइट बना हुआ है। लोकप्रिय क्यों है, यह एक रिसर्च का विषय है। पर साधारण शब्दों में कहा जाए तो सभी के अंदर कुछ न कुछ भड़ास है जिसे वह पढ़कर, लिखकर, सुनकर, बोलकर निकाल लेना चाहता है। भड़ास ने वह प्लेटफॉर्म सभी को दिया।

अब जिस भड़ास की मैं बात आपको बताने जा रहा हूं उसके बारे में शायद आपने कभी नहीं सुना होगा। यह है ‘कैफे भड़ास’। इंदौर में इस कैफे का संचालन होता है। मैंने इस कैफे भड़ास के बारे में आज ही सुना है। बड़ा रोमांचक लगा इसीलिए आपसे इसकी बातें साझा कर रहा हूं। कल टीम इंडिया से बुरी तरह हारने के बाद आस्ट्रेलिया टीम के कुछ प्लेयर्स यहां पहुंचे थे। इन खिलाड़ियों ने बेसबॉल की बैट से टीवी, कंप्यूटर और अन्य सामनों को तोड़कर अपनी भड़ास निकाली।

यह भड़ास निकालने का अनोखा प्लेटफॉर्म हैं। यहां आप अपनी फ्रस्ट्रेशन निकालने के लिए खूब तोड़-फोड़ कर सकते हैं। आस्ट्रेलिया के डीन जोन्स और ब्रैड हॉग ने कहा है कि हार से हम फ्रस्टेड हो गए हैं। अब फ्रस्टेशन निकल गया है। अगले मैच में जीत के लिए हम तरोताजा हो चुके हैं। एक वीडियो भी है जिसे शेयर कर रहा हूं। आप भी इस कैफे भड़ास का मजा लें। देखें वीडियो…

‘आज समाज’ अखबार के संपादक कुनाल वर्मा की एफबी वॉल से.

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क्या ‘भड़ास टास्क फोर्स’ बनाने का वक्त आ गया है?

भड़ास संपादक यशवंत पर पत्रकार कहे जाने वाले दो हमलावरों भूपेंद्र नारायण भुप्पी और अनुराग त्रिपाठी ने प्रेस क्लब आफ इंडिया के गेट पर हमला किया था. उस हमले से उबरने के बाद यशवंत ने अपने भविष्य की योजनाओं को लेकर काफी कुछ खुलासा किया है. इसमें एक भड़ास टास्क फोर्स बनाने का प्रस्ताव भी शामिल है.

इस बाबत यशवंत ने फेसबुक पर जो लिखा है, वो इस प्रकार है…

यशवंत ने अपनी पूरी बात इस वीडियो में कही है…

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dealzkart नामक धोखेबाज आनलाइन कंपनी से कोई सामान न खरीदिएगा!

Yashwant Singh : पिछले दिनों फेसबुक पर एक विज्ञापन देखा. 998 रुपये में सैमसंग पावर बैंक (25000MAH का) और साथ में सोनी का एक MDR-ZX110A Headphones फ्री. मुझे इन दोनों की जरूरत थी. नाम ब्रांडेड. दाम बेहद कम. फौरन क्लिक कर आनलाइन प्रासेस पूरा किया. जब ये हाथ में आया तो तीसरे दिन तक पता चल गया कि हम लोग बुरी तरह ठगे जा चुके हैं. पावर बैंक पर कहीं सैमसंग नहीं लिखा था. कोई बेहद लोकल और घटिया माल था. आधे घंटे में पावर बैंक दम तोड़ देता था.

उसी तरह हेडफोन भी किसी दूसरी कंपनी का निकला. वह भी सस्ता और घटिया वाला. दोनों का दाम मिलाकर मेरे हिसाब से तीन सौ रुपये से ज्यादा नहीं था. पर सैमसंग का पावर बैंक और सोनी का हेडफोन बताकर बंदे ने हजार रुपये लेकर ठग लिया. इस तरह आनलाइन खरीदारी से भरोसा उठता जा रहा है. सोचा कंप्लेन करूं लेकिन लगा कि उससे पहले लिख कर सबको सचेत कर दूं कि भाइयों, dealzkart नाम की कंपनी जो dealzkart.com नाम से धंधा करती है, इन दिनों फेसबुक पर विज्ञापन देकर कस्टमर फांस रही है, बेहद ही धोखेबाज है. इनके दावों और लुभावने आफर के चक्कर में न पड़िएगा. dealzkart नामक धोखेबाज आनलाइन कंपनी से कोई सामान न खरीदिएगा.

अभी-अभी कंपनी को मेल से अपनी शिकायत भेज दी है, जो इस प्रकार है-

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से. संपर्क : yashwant@bhadas4media.com

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भड़ास4मीडिया के भविष्य को लेकर यशवंत ने क्या लिया फैसला, जानें इस एफबी पोस्ट से

Yashwant Singh : ऐ भाई लोगों, कल हम पूरे 44 के हो जाएंगे. इलाहाबाद में हायर एजुकेशन की पढ़ाई के दौरान ओशो-मार्क्स के साथ-साथ अपन पामोलाजी-न्यूमरोलॉजी की किताब पर भी हाथ आजमाए थे. उस जमाने में हासिल ज्ञान से पता चलता है कि मेरा जन्मांक 8 और मूलांक 9 है. जन्मांक छब्बीस का छह और दो जोड़कर आठ बना इसलिए आठ हुआ. मूलांक तारीख, महीना और साल जोड़कर पता किया जाता है जो मेरा 9 होता है. इस बार जो 26 अगस्त सन 2017 है, इसका योग 8 बैठ रहा. 44 साल का होने के कारण चार प्लस चार यानि आठ हो रहा. मतलब जन्मांक और मूलांक दोनों आठ हो रहा है. ग़ज़ब संयोग या दुर्योग, जो कहिए, बैठ रहा है इस बार. वैसे, अपन तो कई साल पहले लिख चुके हैं कि बोनस लाइफ जी रहा हूं, इसलिए हर दिन जिंदाबाद. 🙂

अपने एक पत्रकार साथी मृदुल त्यागी, दैनिक जागरण मेरठ के जमाने में ज्योतिषीय ज्ञान-गणना के आधार पर राहु-केतु टाइप के दो खूंखार जीवों / ग्रहों-नक्षत्रों का मुझ पर भयंकर प्रकोप बताया-समझाया करते थे. तब मुझे मन ही मन लगता रहा कि जरूर ये मूलांक 9 वाला अंक राहु है और जन्मांक 8 वाला केतु. अंक ज्योतिष के हिसाब से 8 वाला अंक थोड़ा क्रिएटिव पर्सनाल्टी डेवलप करता है और 9 वाला दुस्साहसी / खाड़कू / दबंग टाइप का. जब दोनों साथ हों तो आदमी ‘एक तरफ उसका घर एक तरफ मयकदा’ मार्का द्वंद्व समेटे हुआ जीवन के हर क्षण को हाहाकारी टाइप से जीता है. अपन का भी कुछ कुछ ऐसा रहा है. 🙂

ऐसा लग रहा है कि राहु-केतु मेरा पिंड छोड़ रहे हैं. ज्योतिष के विद्वान लोग बताएं कि क्या मेरे इस बर्थडे पर राहु और केतु की अनंत प्यास बुझ जाएगी और वो मेरा पिंड छोड़कर मेरे किसी ‘चाहने’ वाले के कपार पर सवार हो उसे सदा के लिए बेचैन आत्मा बनाकर छोड़ेंगे 🙂

मौज लेते रहना चाहिए.

इस जन्मदिन पर मैं क्या सोच-गुन रहा हूं?

बस दो चीजें.

एक तो सोचने-दिमाग लड़ाने का काम लगभग बंद कर रहा हूं. ‘जाहे विधि राखे प्रभु, ताहे विधि रहिए’ वाला मेरा हाल हो गया है. इस रास्ते पर चलते हुए लग रहा है कि चलते रहो, जब जीवन का अंतत: कोई मकसद ही नहीं होता तो फिर काहें को टेंशन लेने का, हर साल का चार्ट काहें को तैयार करने का. तत्काल में यानि तुरंत में जीते रहो, न अतीत को लेकर परेशान होओ और न भविष्य को लेकर चिंतित. तत्क्षण को उदात्त तरीके से जीते रहो. जीवन यापन के लिए जो करो, इतने कलात्मक ढंग से, इतने मन से और इतने डूब कर करो कि वही तपस्या और ध्यान बन जाए.

बीते दो दशकों के दौरान समझ, संघर्ष, समय, चेतना और नियति आदि के मेलजोल के चलते अब एक जाग्रत भाव-सा निर्मित हुआ है. यह भाव महसूस किया जा सकता है, बताया नहीं जा सकता, क्योंकि जो इससे वंचित है, वह सारा का सारा शब्दजाल मानेगा. एक नया जीवन चर्या डेवलप होने लगा है. पुराने संस्कारों की ज़िद खत्म होती जा रही है. नई लाइफस्टाइल ने खुद ब खुद जगह बनाना शुरू किया है. एक ट्रांजीशन फेज चल रहा था पिछले चार पांच साल से, वह पूरा होने की ओर है. सहजता और शांति, ये ऐसी चीजें हैं जो बीते एक साल के दौरान शिद्दद से खुद के भीतर महसूस किया, कर रहा हूं. इन्हें खदेड़ने के वास्ते बाहरी तौर पर बेहद अशांत और असहज माहौल क्रिएट करता रहा, जान बूझ कर, पर जीतता रहा अंदर वाला ही. अपने आप.

किसी भी चीज की परवाह न करना, तत्क्षण में जीना, किसी भी तर्क-वितर्क या घटनाक्रम की निर्रथकता महसूस करना, ‘ये हो जाएगा तो क्या हो जाएगा और वो नहीं हो रहा तो क्या बिगड़ रहा’ टाइप फीलिंग का घर करते जाना… ये सब मिलाकर एक अ-सामाजिक सा व्यक्तित्व निर्मित होता रहा. एक शब्द आता है हाइबरनेशन. शायद मेरे मामले में उसी की बारी है. अतिशय उर्जा खर्च कर अब तक का भड़ भड़ टाइप जिया हुआ करियरवादी / क्रांतिकारी / अराजकतावादी (जिसे जो मानना हो माने, अपन तो जीवन को समग्रता में देखते हैं) जीवन फिलहाल इनके इतर या इन्हीं चीजों के दूसरे कांट्रास्ट / छोर की तरफ शिफ्ट हो गया है. सबका भला हो, सबको प्रेम मिले, सब सहज हों, सब भयमुक्त हों. ऐसा फील आने लगा है. ऐसा करने-कराने का मन करने लगा है. पहले भी थी, लेकिन तब दूसरे रास्ते तलाशे जाते थे. दूसरे हथियार अख्तियार किए जाते थे. अब तो अलग बात है. अब तो सहज बात है.

इस आंतरिक मन:स्थिति के इस लेवल की ज्यादा व्याख्या यहां संभव नहीं है. शब्द शायद सटीक न मिलें और इसके अभाव में व्याख्या कहीं सतही न हो जाए. वैसे भी, आंतरिक यात्राएं अधिकांशत: निजी हुआ करती हैं. बाहरी यात्राएं अक्सर सामूहिकता और परंपरा का स्वभाव लिए होती हैं. अध्यात्म आंतरिक यात्रा से जुड़ा मामला है. इसमें बाहरी मदद ज्यादा नहीं मिल सकती. इसमें सामूहिकता का कोई ज्यादा मतलब नहीं है. अप्प दीपो भव: वाली स्थिति होती है यहां. विज्ञान और व्यवस्था आदि चीजें परंपरा दर परंपरा निर्मित होती रहती है. इसमें हर पीढ़ी कुछ न कुछ जोड़ती रहती है. और, हर आदमी के जाग्रत होने के खुद के रास्ते तरीके होते हैं. फिलहाल इस विषय को यहीं छोड़ते हैं. यह इतना बड़ा टापिक है, इतने डायमेंशन हैं कि इसे लिखा नहीं जा सकता. दूसरे, अगर सब लिख दिया तो उसे सब महसूस नहीं कर सकते.

अब दूसरी बात. भड़ास को 26 अगस्त को बंद करने को लेकर जो मेरा ऐलान था, उसके बाद से लगातार मंथन, चर्चा और विमर्श अलग-अलग लोगों से होता रहा. तय फिलहाल ये हुआ कि भड़ास को बंद न किया जाए. और, इसमें बहुत ज्यादा उर्जा भी न खर्च की जाए. इसके संचालन के लिए आय के स्रोत क्रिएट करने को लेकर कई किस्म की चर्चाएं हुईं. मेरा निजी मन भड़ास से इतर कुछ नये आंतरिक प्रयोगों को लेकर है, सो भड़ास मेरी प्रियारिटी में न रहेगा. हां, बड़ा प्रकरण / मामला आएगा तो छोड़ेंगे नहीं, छोटे-मोटे मामलों का लोड लेंगे नहीं.

आखिरी बात. जो कुछ विजिबल है, उतना ही गहरा, उतना ही मजबूत इनविजिबल चीजें हैं. उर्जानांतरण इधर से उधर होता रहता है. इसे आप विजिबल मोड में फील कर सकते हैं, उस पाले, यानि इनविजिबल हिस्से को महसूस कर सकते हैं. इसके लिए दिन के उजाले से बचिए, रातों की दिनचर्या शुरू करिए. रात में बगल के पेड़ से आ रही चिट चिट वाली गिलहरी की आवाज के जरिए गिलहरी की रातचर्या को महसूस करिए. अगल-बगल दिखने वाले कुछ चुनिंदा अंधेरों से बतियाइए, उनसे दोस्ती करिए. ये सब एक डोर हैं जिनके जरिए आगे बढ़ा जा सकता है.

फिलहाल जैजै वरना कमरेडवा सब कहेंगे कि गड़बड़ा गया है 🙂

पर ये भी सच है कि ‘सबसे बड़ा रोग, क्या कहेंगे लोग.’ इसलिए मस्त होकर अपनी लाइफ खुद चुनिए, जीइए.

फिर से जैजै मित्रों.

भड़ास के एडिटर यशवंत की एफबी वॉल से.

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भड़ास4मीडिया की मौत का ऐलान हम सबके लिए एक बुरी खबर है

चर्चित मीडिया केन्द्रित वेबसाइट भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत सिंह ने ऐलान किया है कि 26 अगस्त से वेबसाइट का संचालन बंद कर दिया जाएगा। पिछले एक दशक से मीडिया संस्थानों के न्यूज़ रूम के अंदर और बाहर पत्रकारों और उनके मालिकों के अच्छे-बुरे कर्मों को बेबाकी के साथ प्रकाशित करने वाले यशवंत सिंह आर्थिक संकट की वजह से भड़ास को बंद करने की बात पहले भी करते रहे हैं, लेकिन जैसे-तैसे यह वेबसाइट अब तक चलती आ रही है।

अब एक बार फिर यशवंत सिंह ने बकायदा 26 अगस्त का दिन मुर्करर करते हुए भड़ास को बंद करने का ऐलान किया है। यशवंत ने इसकी वजह आर्थिक संकट के साथ ही हिन्दी समाज और समझ को बताया है। भड़ास की भूमिका का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यह वेबसाइट देश के ज्यादातर हिन्दी अखबारों व न्यूज़ चैनल के कार्यालयों में बैन कर दी गई है। संपादक की कुर्सी पर बैठकर सामंतों की तरह व्यवहार करने वाले मालिक-संपादकों को हमेशा इस बात की चिंता रहती है कि कहीं उनके काले कारनामे लीक होकर भड़ास तक न पहुंच जाएं। संपादकों की अयाशी से लेकर दलाली तक की खबरों को भड़ास पर जगह मिलती रही है।

मीडिया के भीतर की सड़ाध को बाहर लाने में भड़ास का एक अहम रोल रहा है। यही वजह रही है कि भड़ास, भ्रष्ट व सत्ता की दलाली करने वाले पत्रकार व मीडिया मालिकों की आंख की किरकिरी बना रहता है। हालांकि भड़ास पर भी आरोप लगता रहा है कि वह एकतरफा रिपोर्टिंग के जरिये सनसनी की तरह खबरें प्रकाशित करता है और गाहे-बगाहे चिरकुट किस्म के धंधेबाजों को जरूरत से ज्यादा स्पेस देता है।

ऐसे वक्त में जब भारत में मीडिया का कारपोरेटीकरण तेजी से हो रहा हैे, और मीडिया संस्थाओं के न्यूज़ रूम में साजिशों, षडयंत्रों का सिलसिला पहले से और भयावह होता जा रहा है, तब भड़ास जैसी संस्थाओं का होना और भी बेहद जरूरी है। ऐसे में भड़ास की बंदी का ऐलान हम सब जो भी उसके चाहने वाले हैं, के लिए एक बुरी खबर है। इस पर हम मातम ही मना सकते हैं! यशवंत की हिम्मत अब अगर जवाब दे रही है और वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि  भड़ास के लिए अब मौत ही बेहतर विकल्प है तो यही सही! नई यात्रा के लिए शुभकामनाएं!

लेखक दीपक आज़ाद उत्तराखंड के तेजतर्रार पत्रकार और ‘वाचडाग‘ के एडिटर हैं.

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यशवंत ने फेसबुक पर लिखा- ”26 अगस्त से भड़ास बंद!”

भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत ने फेसबुक पर एक छोटी-सी पोस्ट डालकर ऐलान किया कि भड़ास4मीडिया का संचालन 26 अगस्त से बंद कर दिया जाएगा. इसके पीछे उन्होंने वजह आर्थिक संकट के साथ-साथ हिंदी समाज व इसकी समझ को भी बताया है. इस ऐलान के बाद आए सैकड़ों कमेंट्स में से कुछ चुनिंदा यहां दिए जा रहे हैं…

Kamal Kumar Singh स्टेटस रात 12 बजे के बाद आया है। पब्लिक टेंशन न ले। 🙂

Yashwant Singh मैंने अपनी ज़िंदगी के सारे बड़े फैसले नशे में लिया, लेकिन लंबी आंतरिक उत्तेजना और शांति के साथ।

Ashutosh Dixit नहीं बंद होगा, क्योंकि फिर कोई जगा देगा आपके अंदर की भड़ास..शुभकामनाएं, नए युद्ध की जो जल्द शुरू होगी भईया…

Yashwant Singh शायद अब नहीं। मेरी आंतरिक यात्रा का आवेग प्रबलता शायद बाहरी से प्रभावित न हो। ये एक लंबे समय से स्थगित फैसले का एक सही वक्त पर एलान ही है।

Kamlesh Kumar बेहद दुखद… आप हार मानने वालो में से नही हो भाई

Yashwant Singh सच है। लेकिन आंतरिक आदेश के लगातार आह्वान का अनुपालन हार नहीं बल्कि एक नया आगाज़ है।

Arpan Jain हर समस्या का समाधान बना है… इसका भी निकलेगा… आप सुधि साथियों से सहयोग ले सकते है… मैं भी तैयार हुँ… परन्तु यह अनंत की यात्रा की रुकावट असहनीय है….

Yashwant Singh अनंत की यात्राएं हमेशा आंतरिक होती हैं। बाहरी अनंत यात्राएं अम्बानी टाइप लोग करते हैं।

Nikhil Dave सबसे कठिन दौर सफलता के पहले का पड़ाव है। हिम्मत रखिए, भड़ास बनी भी रहे और निकलती भी रहे ।

Yashwant Singh मेरी कोई रुचि नहीं बची, न मुझे चंदा चाहिए।

Vishnu Rajgadia आप एक जरूरी काम कर रहे हैं और आप इसे अब छोड़ नहीं सकते।

Yashwant Singh कभी कामरेड था काफी समय से बिल्कुल नहीं हूं। जन सरोकार की मेरी प्रतिबद्धता निजी रही है। अब नितांत निजी प्रयोगों जीवन से दो- चार होने की आकांक्षा है।

Santosh Singh भड़ास के बंद होने की सूचना भड़ास पर डालिए बाकि खबर कॉमेंट बॉक्स में। काहे पका रहे हैं लोगों को।

Yashwant Singh कल लग जाएगा। और, तय तारीख पर बन्द भी हो जाएगा। ज्यादा लोड न लें।

Santosh Singh aisa nahi hoga. chalta rahe ye apecha

Fareed Shamsi hahahah kya baat hai yashvant bhai phirki le rhen sabhi ki, ek waqt ko sans lena to bhul sakten hain, lekin bhadas band ho jaye ye kabhi ho hi nahi sakta hai

Yashwant Singh ये एक नंगा सच है। कुबूल करिए।

Vijay Vardhan अपने समर्थकों को प्रेरित कर रहे हैं ठीक हैं, अन्यथा गलत

Yashwant Singh दोनों काम नहीं कर रहा।

Ghanshyam Dubey क्या किसी ने मुहूर्त बताया है ? फिर कुछ और होगा ! भड़ासी चुप बैठ ही नही सकता न !! देखते हैं…..!!

Yashwant Singh हम देखेंगे, लाज़िम है कि हम भी देखेंगे

Reetesh Tewari यशवंत भाई, उत्तम फैसला, क्योंकि धाराएं कभी ठहरी नहीं, उनका काम है बहना। पानी गर रुक गया तो सड़ान्ध मारने लगता है। अपने प्रयोगधर्मी दिमाग में कुछ नया सोचे, भड़ास से भी बेहतर।

Yashwant Singh सबसे बेहतर कमेंट। लव यू। आगे की यात्रा नितांत निजी है भैया।

Nadim S. Akhter सही सोच रहे हैं। एकदम बंद कीजिए। अब मानिएगा नहीं। घर परिवार के लिए कुछ कीजिए।

Yashwant Singh भाई, इस देश में हर कोई चाहता है कि क्रांति हो लेकिन कोई नहीं चाहता कि उसके घर का चिराग इसमें जले। वो सिर्फ दूसरों के घर का चिराग जलते देखना चाहते हैं।

Amit Pathe :  भड़ास मीडिया का अपने तरह का अग्रणी और सबसे चर्चित नाम है Yashwant सर. मीडिया की ख़बरों का पर्याय है भड़ास. इसका ख़ौफ़ मैंने स्वयं बड़े मीडिया संस्थानों में देखा है जहाँ आज भी भड़ास ब्लॉक किया हुआ है. लेकिन किस मीडिया की ख़बरों/विचारों का मंच जमाते-सजाते रहेंगे आप? वो जो अपने वर्क कल्चर, सैलरी और नैतिकता के मामले में बुरी की खाया हुआ है. जिसमें एक जुटता है न लोग एक-दूसरे से ईमानदार हैं. बड़े शहर के और कुछ बड़े संस्थानों को छोड़ हर न्यूज़ रूम ख़ुशहाल नहीं है. और ये हालात और बदतर भी होते जा रहे हैं. मीडिया के भले के लिए आया मजीठिया हाल ख़स्ता कर गया. नोट बैन ने आग में और घी डाला. HT ने सबको शॉक किया और मीडिया की नींव से बड़ा पत्थर निकाल लिया. देश में jio क्रांति के बाद प्रिंट को outdated क़रार दिया जाने लगा है और प्रिंट मीडिया में ‘स्टॉक क्लीरन्स’ चल रही है. कुकुरमुत्ते की तरह websites आ रही हैं. उनका अपना अजेंडा और स्वार्थ. कुछ अच्छा काम कर रही हैं लेकिन बड़े corporate मीडिया संस्थान ही हर तरफ़ आगे हैं. ऐसी मीडिया के लिए आप क्यूँ आहुति दे रहे हैं. क्या पाएँगे ऐसी मीडिया के लिए अपने आर्थिक मसलों को ताक पे रख के? बे-मिशन मीडिया के लिए आप कौन सा मिशन चला लेंगे? अगर कोई सम्पादकीय दख़ल के बिना बड़ी पूँजी और संसाधन उपलब्ध करवा कर इन्वेस्टमेंट करना चाहे तो किसी रेवेन्यू मॉडल के बारे में ज़रूर सोचें. जैसे वेब को लिमिटेड कर paid App बनाना या किसी IT/web स्टार्ट-अप से जुड़कर काम करना. बाक़ी स्वहित और निजी आर्थिक पहलुओं को प्राथमिकता दें. मंगलकामनाएँ

AK Yadav : जब से Yashwant भैया का मैसेज पढ़ा हूं कि 26 अगस्त से भड़ास बंद करने का विचार कर रहे हैं तब से मन बहुत व्यथित है ​क्योंकि जब मीडिया में नहीं आया था उस समय एक दिन ऐसे ही गुगल पर पत्रकारों के बारे में सर्च कर रहा था कि मेरी आखों के सामने भड़ास4मीडिया का लिंक आया मुझे लगा कि नाम अलग है तो काम भी अलग ही होगा। उस समय मैं भी ब्लागर पर लिखता था लेकिन भड़ास को देखने के बाद लगा कि कोई तो है जो इन सबकी बजाता है पत्रकारों की आवाज को उठाता है। भड़ास पेज पर पहुचकर मैं कितना खुश हुआ था यह न लिखा नहीं जा सकता न ही बताया जा सकता है। उसके बाद पत्रकारिता में वहीं से लगाव होने लगा और फिर फरवरी 2010 में जनपद से प्रकाशित होने वाले एक साप्ताहित समाचार पत्र में नौकरी करने चला गया। उसके बाद राष्ट्रीय सहारा, जनसंदेश में काम करने के बाद मुम्बई का अखबार बनारस में लाया दिनरात मेहनत किया उसमें सफलता नहीं मिली उसके बाद जागरण समेत कई अन्य अखबारों वेब पोर्टल में काम करने का मौका मिला लेकिन दिल में एक ही बात थी कि Yashwant भैया से एक बार मुलाकात करूं। पहली मुलकात उनसे गाजीपुर में हुई जहां मेरे एक अनुरोध पर वे ग्रापए के सम्मेलन में आये और जमकर भडास निकाले। उसके बाद फिर दूसरी ​मुलाकात दिल्ली में आयोजित मीडिया मोनाटाईजिंग वर्कशाॅप में हुई। मेरे जीवन में पत्रकारिता के दौरान कई उतार चढ़ाव आये कई सहयोगियों ने टांग खीचने का भी कई दफा प्रयास किया जब जब मेरा विरोेध साथी पत्रकारों द्वारा होता तो उनको Yashwant भैया की किताब जानेमन जेल की कुछ लाईने सुनाकर भैया के ही शब्दों में जमकर गरिया देता। फिर खुश हो जाता। पत्रकारिता में मेरा मन जब जब दुखी हुआ तो दो पैग लगाकर #जानेमन_जेल की यह लाईन आज भी गुनगुना लेता हूॅ कभी—कभी मेरे दिल में यह खयाल आता है कि जिन्दगी लौ… लग गयी फिर खुश हो जाता। वास्तव में Bhadas4media के बंद होने से बहुतों को खुशी मिलेगी, बहुतों को कोई फर्क नहीं पड़ने वाला लेकिन जो भड़ास के पाठक हैं जो भड़ास के समर्थक हैं जो भड़ास को बहुत मानते हैं उनको लगेगा जैसे उनकी दुनियां उजड़ गयी। अब कहां और कैसे निकालेंगे भड़ास? Yashwant भैया प्लीज Bhadas4media को बंद करने से पहले एक बार जरूर विचार कीजिए। -आपका छोटा सा समर्थक

मुकुन्द हरि शुक्ल : www.bhadas4media.com का अगले महीने से बंद होना निराशाजनक है लेकिन अकेले दम पर भाई Yashwant Singh ने इतने साल तक जैसे इसे चलाया, उस समर्पण, पत्रकारों और पत्रकारिता के हित के लिए किसी भी हद तक लड़ने के जज्बे के लिए यशवंत जी की जितनी भी तारीफ़ की जाय, कम ही होगी। फिर भी उम्मीद है कि बेहतर आर्थिक सम्बल के साथ शायद फिर कभी भड़ास वापसी करेगा।

Nadim S. Akhter : भाई Yashwant Singh भड़ास बंद करना चाहते हैं। मैं उनके फैसले के साथ हूँ। एकदम बंद कीजिए। अब मानिएगा नहीं। घर परिवार के लिए कुछ कीजिए। इस देश में हर कोई चाहता है कि क्रांति हो लेकिन कोई नहीं चाहता कि उसके घर का चिराग इसमें जले। वो सिर्फ दूसरों के घर का चिराग जलते देखना चाहते हैं। भारतीय समाज में हर कोई चाहता है कि पत्रकार ईमानदार रहे लेकिन इस ईमानदारी की कीमत चुकाकर जब वो सड़क पे आ जाता है तो उसकी मदद के लिए कोई संस्था नहीं। अब कौन गांधी बचा है इस देश में जो अपने घर परिवार को ताक पे रखकर सामाजिक क्रांति की अलख जगाएगा? यशवंत भाई पे भी आरोप लगे हैं। मुझे नहीं पता उनमें कितनी सच्चाई है पर भड़ास को इतने लंबे समय तक अपने बलबूते खींचना किसी आश्चर्य से कम भी नहीं। एक और बात दीगर है कि उनकी वेबसाइट ने पीड़ित-शोषित पत्रकारों की आवाज़ को एक बड़ा प्लेटफार्म दिया है। ये छोटी बात नहीं। हां, कई दफा एकतरफा खबरें भी दिखीं, जिसे इग्नोर किया जा सकता है क्योंकि ये किसी अकेले शख्स के बूते की बात नहीं कि वो हर खबर की तहकीकात कर सके। यशवंत भाई, अब कुछ घर परिवार और अपने बारे में सोचिए। बहुत हुआ। अब इस काम को नई पीढ़ी के कंधे पे डालिए। वो उठाये तो ठीक, वरना दुनिया तो चल ही रही है।

Sanjaya Kumar Singh एक सुधार चाहता हूं, क्योंकि जानता हूं। अगर एकतऱफा आरोप छपे तो उसका एकतरफा जवाब भी छपा। शिकायत करने वालों से यशवंत यही कहते रहे हैं (और छापा – लिखा भी है) कि आप अपना पक्ष लिखकर भेज दीजिए, उसे भी छाप देंगे और वह छपता रहा है।

Nadim S. Akhter हाँ। उन्होंने छापा है। आपसे सहमत।

Vivek Singh बिलकुल, और जवाब वैसा का वैसा ही छापा। चाहे उसमें उन्हें जो लिखा गया हो।

Shyam Singh Rawat ‘घर फूँक तमाशा’ कितने दिन चल सकता है भला, वह भी जन-सरोकारी तो बिल्कुल भी नहीं। इस तरह की पत्रकारिता में आर्थिक संकट सदैव घेरे रहता है और जान का जोखिम अलग। आप जैसा जीवटधारी व्यक्ति ऐसा निर्णय विवशता में ही ले सकता है।

Gautam Tiwari Whatttt…Try to save such a nees portal..which connects all journos through multi face news items…Its a VOICE…
Anil Janvijay हिन्दी की यही नियति है।

अंकित द्विवेदी सर योद्धा इतनी जल्दी हथियार नहीं डालते। एक बार फिर से विचार करिये।

प्रवीण श्रीवास्तव दुःखद…. ह त ढ़ेर अदिमी त खुस हो जइहें… मीडिया ग्रुप के मनमानी और बढ़ जाई.. अइसन ना होखे त बेहतर बा

Vijayshankar Chaturvedi भड़ास बहुत दिनों तक वैसे भी नहीं निकलती रह सकती। यह नव विकसित मनुष्य के स्वभाव के विपरीत है जैसे कोई 24*7 प्यार नहीं कर सकता।

Murar Kandari समय की धारा जहाँ ले जाए , यशवन्त भाई

Syed Mazhar Husain आप ने अगर भड़ास बन्द करने की सोची है तो ज़रूर आपके ज़ेहन में कुछ और वेहतर होगा। मैं जानता हूं आप हार मानने वालो में से नही । हमारे लायक कुछ हो तो बताईयेगा हमेशा खड़ा पाइयेगा।

Ram Dayal Rajpurohit भड़ास को बंद करना अपने आप पर घोर अत्यचार हैं ।। जब मोदी अपनी भड़ास को मन की बात कहे कर करता है । तो आप भी ,,, भड़ास से बहुत कुछ ज्ञान मिलता पब्लिक को सो ये ज्ञान गंगा बहती रहनीं चाइये

Jaleshwar Upadhyay यह प्रयास भी अच्छा था और आगे जो भी करेंगे, अच्छा ही होगा। भविष्य की शुभकामनाएं। आप सफल होंगे अपने मकसद में यही उम्मीद करता हूं।

Care Naman कोशिश कर हल निकलेगा आज नहीं तो कल निकलेगा जो थमा थमा सा है वो भी चल निकलेगा

Kamal Sharma यह बंद मत कीजिए स्‍वामी भडासानंद जी। भडास आश्रम, भडास साइट का चलना जरुरी है। 26 अगस्‍त का मुहूर्त निकलवाया है क्‍या यशवंत भाई।

Somit Srivastav Destruction is first stage of construction !!

Jitendra Narayan दुखद है बंद होना…प्रयास करें हमसब साथ हैं आपके…!

Pushpendra Albe आप आदर्श हैं सर, आनलाईन मीडिया बिरादरी के लिए

Maruf Khan Kyaa hua bhai,..to fir hm.logo.ko ab khabre kise ptaa chlengii bhadas ki

Dinker Srivastava बाप रे बाप….सुधी पाठकों को झटका..

Ashok Anurag मेरी चिंता न करो मैं तो संभल जाऊँगा, गीली मिट्टी हूँ हर रूप में ढल जाऊँगा…

संजीव सिन्हा ओह! भड़ास के शुभचिंतकों को आगे आना चाहिए।

Prameel Kumar Manohra अब तो हम भी भड़ासी हो गए। और आप बंद करने की सोच रहे हो।।

Anil Kumar Upadhyaya व्यापार बंद पर फ़ेसबुक तो भड़ास निकालने का ज़रिया बना रहेगा बना रहेगा।

Arun Khare निसंदेह कुछ और बेहतर होने वाला है । शुभकामनाएं।

Vinay Pandey जिस तरह विद्यार्थी के लिए यूनिफार्म अनिवार्य होती है वैसे ही पत्रकारों के लिए भड़ास ऐसा कोई पत्रकार नहीं जो दिन में एक दो बार भड़ास को खोल के देखे नसर बंद मत करिए बोलिये तो हम लोग मिल के आर्थिक संकट को दूर करें

Vijay Tiwari शायद एक दो साल पहले आपने कही थी कि भड़ास को डॉलर में पैसे मिलते है । और अब बंद करने की सोच ली।

Vinod Kumar Bhardwaj अलविदा दोस्त। मजे से रहना।

Dinesh Mansera मंगल वक्रीय होगया है

Vishal Ojha समझा जा सकता है

Anupam Pandey इसको बंद न करें….हम और हमारी टीम इसको चलाने या सहयोग करने के लिए तैयार है।

Sanjay Kumar Agarwal i am agree

Umesh Srivastava Socialist किसी विषय से लिप्सा ना होना यही तो ज्ञान है इस मोहभंग होने की क्या बात ज्ञानी हमेशा नई खोजों में लगा रहता है किसी एक विषय से उसकी लिप्सा नहीं होती उसकी प्रत्येक विषय में लिप्सा है और किसी में नहीं है यही ज्ञान की पराकाष्ठा है जय हिंद जय भारत

Rajiv Tiwari भड़ास चैनेल की शरुआत करने वाले है क्या?

Sushil Shukla भाई अगर किसी पत्रकार की करतूत जाननी हो तो वो भड़ास से ही पता चलती है । अब कौन बताएगा कि फला पत्रकार क्या क्या गुल खिला रहा है? हे मेरे भड़ास प्रमुख इसे बन्द न करें अगर सच्चाई को जिन्दा रखना है तो भड़ास को चलना होगा।

Sujeet Singh Prince आपकी भड़ास न कभी बन्द थी, और न पूरे जीवन बन्द होगी……

Rajshekhar Vyas दुःखद समाचार सुबह सुबह – युद्धस्व!

Dilip Clerk दादा ऐसा मत कीजिये हम लोगो को मार्गदर्शन में भड़ास अहम् भूमिका में है

Sheetal P Singh बन्द मत करो, बेच दो या दान कर दो! कोई दूसरा इससे जीवन यापन करे तो क्यों गुरेज़?

Upendra Prasad हाँ, बंद करने से बेहतर है इसे बेच देना. कोई और इसे चला लेगा.

Rajendra Joshi ऐसा न करियेगा… हम समझ सकते हैं कितना मुश्किल होता है पोर्टल चलना

Vinod Bhardwaj न जाने कितनों की आवाज़ बन चुके भड़ासी बाबा ने ज़रूर कुछ नया सोचा होगा| शांत बैठने वालों में से तो नहीं है ये| जिसे औरों के लिए कुछ कर गुजरने की आदत पड़ जाये, वह कुछ न कुछ ज़रूर करेगा| और यहाँ तो बात यशवंत की है…इस प्रयोगधर्मी दिमाग की नयी उपज देखने का इंतज़ार है अब| शुभकामनायें……

Vinay Shrikar अभी न करो बाबू ऐसा ! पांच-छह साल रुक जाओ, ताकि यह दिन देखने के लिए मैं न रहूँ।

Abhinandan Mishra यशवंत ji, please let us know if we can contribute in any way to keep your efforts alive… BHADASH cannot shut down.

Rajaram Tripathi आर्थिक संकट अगर मूल कारण है, तो , जैसे भी हो दूर कर लिया जाएगा, मैं इसकी जिम्मेदारी लेता हूं, आप चलाइये इसे, ये जरुरी है। मोहभंग, लोगों की समझ वाली बातें वक्ती जुनून है, दिमागी खलल है,,हर साधक को यह पुल पार करना ही पड़ता है,, मेरे भाई,, भड़ासानंद,,इसका भी शत प्रतिशत इलाज संभव है , हमारे विशुद्ध हर्बल से।

Sanjay Shukla This is the one platform for expressing grievances of exploited journalists. I request you to not close it. Will try to help in whatever way we can

Madhu Sudan Yaswant kitna paisa / month se chal jayega aapko milta rahega chahaiye bahut hi jaruri hi

Sachin Chaudhuri 60k to abhi bhi per month portal ko Google ad se mil rhe hai. Koi arthik presani ho portal ko mai nai manta Baki band Mat Karo Sir isko.

Devendra Surjan Yashwant भाई इतने सारे मित्रों और शुभचिंतकों की सुनिये और अपना निर्णय बदलिए , यथासंभव सहयोग करने सब तैयार हैं . मीडिया की पोल पट्टी खोलने का यह अद्भुत प्रयोग है , इसे अनवरत जारी रखना चाहिए .

Sachin Chaudhuri Yashwant Singh apko arthik problem hai ki portal ko …..portal ko to koi arthik tangi mujhe nai lagta ho jo data portal pai hai usse jayda wo earn kar rha hai

Ashok Aggarwal अब कौन से समाज में रहने का प्लान है… जो भी करोगे उसके लिये अग्रिम शुभकामनाएं…

Kamta Prasad कुछ बेहतर होगा इसे लेकर खुश होऊँ, या हम जैसे निरीह नागरिकों का मंच चला जाएगा इसे लेकर अफसोस करूँ। खैर, आने वाला समय बताएगा।

Deepak Pandey अरे ऐसे कैसे बंद हो जाएगा सर… हम लोग हैं न.. हैंडओवर कर दीजिए अपने अपने विश्वस्त लोगों को। वो खुद चला लेंगे। भड़ास का होना मीडिया के लिए बहुत जरूरी है।

Sanjay Shekhar यशवंत जी आप नए प्रयोग जरूर करें। आपको शुभकामनाएं, लेकिन यह जरूर सुनिश्चित करना होगा कि भड़ास चलता रहे। इसे बंद करना पत्रकारों की आवाज़ को बंद करना होगा जिसे आप कभी नही करना चाहेंगे। बाकी परेशानियों का हल निकालने में हम आपके साथ है। मेरी जिस स्तर पर मदद की जरूरत हो मैं तैयार हूं।

Singhasan Chauhan इतना क्यों नाराज हैं यसवंत भाई हमारे जैसे लोगों को आपसे बहुत आश है …

Ved Prakash Singh हिम्मत न हारो हजारों को मारो। संस्था चलाना आसान नहीं होता। आप दूसरा प्रयोग करना चाहते हैं करिए इसके लिए एक उप संपादक रख कर व्यापारियों की तरह चलाइये। विज्ञापन प्रतिनिधि भी रखना न भूलिएगा।

Purushottam Asnora बहुत दुखद, घाटे में आखिर कहां तक निकल सकेगा? क्या कोई समाधान हो सकता है सर।

डॉ. अजित मैं आपके नए आत्मिक वेंचर को लेकर उत्साहित हूं निसन्देह यह व्यष्टि और समष्टि के लिए होगा। आपको चैतन्य शुभकामनाएं !

Syed Faizur Rahman Sufi भड़ास के बन्द होने से हजारों पत्रकार की आवाज भी बन्द हो जाएगी

Ramji Mishra अरे ऐसा न कहिये। बस एक बार आपसे बात हो जाये तो कुछ निवेदित करना चाहूँगा……

Manoj Dublish सरजी ; एक बार राजनीति में भी भाग्य आजमा लीजिये क्योंकि लोकतंत्र कौशल विकास का सबसे बडा सबूत है जहाँ आठवीं पास उप मुख्य मंत्री और अनपढ शिक्षा मंत्री बन जाता है तथा रेलवे संपत्ति बेचकर अरबपति तो बनता ही है साथ में देश का मालिक भी बन जाता है और दूसरी तरफ एक पोस्ट ग्रेजुएट;इंजीनियर या डाक्टर नौकरी के लिए दर बदर की ठोकर खाता है

Gaurav K Singhal Go for crowd funding. I am ready to give ten thousand for BHADAS as crowd funding. My advice is make app and once 10000 users download this app this will be hundred crore venture.

Dhirendra Asthana लाखों लोगों द्वारा रोज देखी जाने वाली वेबसाइट पर भी संकट?

Anup Kr Awasthi पोर्टल बंद करना समस्या का समाधान नहीं…कोई हल या सिस्टम ढूंढा जाए तो बहुत कुछ संभव है.

Sanjaya Kumar Singh अरे !! मैं समझ रहा था कि गूगल ऐड से खर्चा निकल जा रहा होगा। अभी तक अगर आर्थिक स्थिति खर्चा चलाने लायक नहीं हुई है तो बिल्कुल बंद कर देना चाहिए।

Ram Gurjar इतनी बाते करने से बेहतर है कि हम सब मिलकर उनका हाथ थाम ले…

Vinod Bhardwaj पत्रकारों के लिए बहुत दुःखद और पीड़ादायक निर्णय है ये । पीड़ित पत्रकार भड़ास को अपना मंच मानते हैं । निर्णय पर पुनर्विचार करो यशवंत भाई !

Ashok Das मैं आपके इस फैसले में आपके साथ हूं भइया। हर चीज का एक अंत होता है। उससे ज्यादा मोह ठीक भी नहीं। जिंदगी में उससे इतर भी करने को बहुत कुछ है। संभव है कि आपको वही बातें परेशान करती होगी। नई यात्रा पर निकलिए। हां, बंद करने की घोषणा के साथ एक ऑप्शन यह रखा ज…See more

Pradumn Kaushik अब कौन पत्रकारो को आइना दिखायेगा सर

Ashutosh Chaturvedi अरे सर मीडिया पर लगाम कौन कसेगा फिर

Pawan Lalchand हो सके तो चलने दें. भले कुछ नया भी लेकर आ रहे हों तब.

Negi Laxman जो सिरफिरे समाज हित मे कूछ करना भी चाहे तो उनको आगे लाने मे सबके पसीने उतर जाते हैं चाहे कोई भडास वाला हो या कोई अन्य

Arti Awasthi Dixit बंद करना जरुरी है क्या

Ramji Mishra भड़ास अब आपकी सम्पत्ति नही है जो आप बंद कर देंगे। कुछ तो हक हम पाठकों का भी है। कृपा करके प्रार्थना को स्वीकार करें और इसे समाज हित के लिए चलने दें। प्लीज प्लीज प्लीज.. जनहित की जंग वाले सब बन्द होते जा रहे हैं और तमाशे वाले लोग और मजबूत होते जा रहे हैं। सरकार भी सो रही है भड़ास जैसे मीडिया को सहायता देकर समाज के लिए सरकार एक और अच्छा काम कर सकती है। भारत सरकार को इस ओर ध्यान देना चाहिए।

Mahesh Singh मित्र आपका लगभग हर पोस्ट और न्यूज़ पढता रहा हू इधर बहुत दिनों से आप से बात नहीं कर पाया कुछ ऐसी व्यस्तता थी। मित्र इसा मसीह चले गए, बुद्ध चले गए, मुहम्मद चले गए, गांधी चले गए जो बुराइया समाज में तब थी वही आज भी हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि सज्जन अपनी सज्जनता छोड़ दे। हां एक बात है कि मोदी जी हैं औऱ योगी जी ने अपनी एक जीवन शैली चुन ली थी जो सबके लिए संभव नहीं है। किसी भी संस्था को चलाने के लिए धन की आवश्यकता होती हैं इसमें कोई संदेह नहीं है। आपने जिस उंचाई पे भड़ास को पहुंचाया है वह काबिले तारीफ है और आज जो आपकी पहचान है उसमें भड़ास का भी योगदान है। मित्र इतनी जल्दी में आवेश में निर्णय लेना ठीक नहीं प्रतीत हो रहा है। किसी भी समस्या का समाधान निकाला जा सकता है। निसंदेह परिवार के कीमत पर कोई भी कार्य उचित नहीं होता है। यदि मैं आपकी किसी भी प्रकार से काम आ सकता हु तो मुझे खुशी होगी। हां इतना जरूर कहना चाहूंगा कि एक पत्रकार पत्रकारिता की बुलंदी पे तो जा सकता है पर साथ ही राजनीतिज्ञ, उद्योगपति नहीं हो सकता… उसके लिए तो कुछ और ही करना होगा। मैं आपके हर निर्णय में साथ हूं…

Yajat Dwivedi फिर पत्रकारों के हक़ के लिए आवाज़ कौन उठाएगा ।

Shashikant Singh सर प्लीज़ ऐसा न करें। मजीठिया क्रांतिकारियों का क्या होगा

Narendra M Chaturvedi भाई भड़ास किसी भी कीमत पर बन्द नही होना चाहिये….कुछ मिल बैठकर रास्ता निकालते है।

Vinay Singh लोकतंत्र में भड़ास कहाँ बंद हो पाएगी भाई….. भड़ासिए और खुब भड़ासिए यही कहते थे न..

Dharmendra Pratap Singh भैया, मुझे नहीं लगता कि किसी तरह का आर्थिक संकट “भड़ास” को बंद कर सकता है ! जिस “भड़ास” को बड़े-बड़े समाचार-पत्र समूह नहीं बंद करवा पाए, वह इस तरह से बंद हो जाएगा… असंभव !! पहली बात तो यह है कि हमारा समय जब अच्छा होने के करीब है, तब “भड़ास” बंद करने का इरादा ठीक नहीं… अगर वही वजह है, जो आप बता रहे हैं तो हम सब मिलकर इसे भविष्य में भी चलाते रहेंगे। वैसे भी जो “भड़ास” अब हम सभी मीडियाकर्मियों की आवाज़ बन चुका है, उसे बंद करने का फैसला आप अकेले कैसे ले सकते हैं?

DrMandhata Singh आप हमेशा उचित फैसला लेते रहे हैं। और सोच-समझकर ही बंद करना तय किया है तो आपके और परिवार के हित में शायद यही ठीक हो। मुझे तो उम्मीद है कि आप जहां भी होंगे एक जुझारू की भूमिका में ही रहेंगे।

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फर्जी ब्रांड ikall से सावधान… खराब प्रोडक्ट्स भेजकर ग्राहकों से कर रही है ठगी

इंडियन कम्पनी iball से मिलते जुलते नाम वाली एक कम्पनी ikall ऑनलाइन मार्केट के जरिये लोगों से ठगी कर रही है। आपको बता दें कि यह कम्पनी दूसरे कॉमन प्रोडक्ट्स को अपना बताकर यानी पैकेजिंग में ikall वाला हॉलमार्क लगाकर कई गुना दामों पर बेच रही है। इसके लिए यह homeshop18 और इस जैसी अन्य ऑनलाइन सेलिंग वेबसाइट्स की मदद ले रही है।

इतना ही नहीं यह प्रोडक्ट्स पर गारंटी/वारंटी देने और कस्टमर केयर होने का भी दावा करती है। लेकिन मध्यप्रदेश से जो केसेज मिले हैं उनके मुताबिक पैसे मिलने के बाद यह कम्पनी तड़ीपार हो जाती है। इन्होंने छोटे दुकानदारों को अपना सर्विस सेंटर दे रखा है जिनको यह ऑथराइज्ड बताते हैं लेकिन हकीकत में यह उनके द्वारा बनाई गई जॉब शीट तक ओपन नहीं करते। जिसके चलते खरीददार महीनों-महीनों सर्विस सेंटर के चक्कर काटता है।

फ़िलहाल इस फर्जी कम्पनी के खिलाफ एक कस्टमर ने कंज्यूमर फोरम में केस करने की तैयारी कर ली है। कस्टमर के मुताबिक उसने एक स्मार्टवाच मंगवाई थी जो डिफेक्टिव निकली। शिकायत करने के बाद से महीनों तक उसे सर्विस सेंटर भटकाया गया जिसके बाद उसने homeshop18 और ikall के nikon systems privet ltd (Delhi) के खिलाफ नोटिस भेजकर कंज्यूमर फोरम की कार्रवाई करने की बात कही है।

Ashish Chouksey
Journalist
ashishchouksey0019@gmail.com

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सुधीर चौधरियों और रवीश कुमारों की बातों पर भरोसा क्यों न करें, बता रहे हैं यशवंत सिंह

Yashwant Singh : सुधीर चौधरियों और रवीश कुमारों की बातों पर भरोसा मत करिए. ये पेड लोग हैं. ये दोनों अपने-अपने मालिकों के धंधों को बचाने-बढ़ाने के लिए वैचारिक उछल कूद करते हुए आपको बरगलाएंगे, भरमाएंगे, डराएंगे, अपने पक्ष में खड़े होने के लिए उकसाएंगे और इसके लिए देर तक व दूर तक ब्रेन वाश करते चलते जाएंगे…

रवीश कुमार को हर पत्रकार डरपोक दिखने लगा है. उन्हें दिल्ली में डर लगने लगा है. हर किसी का फोन टेप होता दिखने लगा है…लोकतंत्र में सारा सत्यानाश हुआ दिख रहा है…ये दौर भाजपा राज का है सो एनडीटीवी को अंधेरा ही अंधेरा दिख रहा है और रवीश कुमार सुर ताल भिड़ाकर गाने में जुटे हैं- ”अंधेरे में जो बैठे हैं, नजर हम पर भी तुम डालो…. अरे ओ रोशनी वालों…”

कुछ ऐसा ही हाल तब जी ग्रुप का था, जब कांग्रेस राज में उगाही के मामले में सुधीर चौधरी उठाकर जेल भेज दिए गए थे और सुभाष चंद्रा प्राण बचाए भागते फिर रहे थे. तब जी न्यूज को सब कुछ खराब होता हुआ, हर ओर अराजकता की स्थिति, अभिव्यक्ति की आजादी का गला घुटा हुआ, आपातकाल सरीखा माहौल दिख रहा था… तबके जी न्यूज के एंकर सुर ताल भिड़ाकर कुछ वैसा ही गीत गाए बकबकाए जा रहे थे.

दोस्तों, भारत अदभुत देश है. यहां कोई मोदी आए या कोई मनमोहन, जनता को बहुत फरक नहीं पड़ता. भारत वाले बहुत संतोषी और मस्त जीव हैं. जब हम सब अंग्रेज को सौ साल तक झेल गए जो कि बाहरी और विदेशी थे, फिर ये मनमोहन, मोदी तो अपने ही देश के हैं. मनमोहन ने क्या बना-बिगाड़ दिया था और मोदी ने क्या रच-उखाड़ लिया है…तब भी अंबानी बिरला लूट रहे थे, सत्ता के प्रिय बने हुए थे… आज भी अंबानी अडानी बिरला सब लूट रहे हैं, सत्ता के प्रिय बने हुए हैं… तब भी जो ‘अप्रिय’ थे उन्हें ठीक करने के लिए ढेर सारे सरकारी कुकर्म किए जाते थे, आज भी जो ‘अप्रिय’ हैं, उनकी हंटिंग होती रहेगी…

कांग्रेस के जमाने में जो आर्थिक नीति थी, वही भाजपा के जमाने में है बल्कि भाजपा वाले कांग्रेस से कुछ ज्यादा स्पीड से उनकी सारी पालिसिज लागू कर रहे हैं.. जीएसटी से लेकर फारेन इनवेस्टमेंट और प्राइवेटाइजेशन को देख लीजिए… इसलिए उनके नाम पर डराकर इनके पाले में करने का खेल वही नहीं समझेगा जो वाकई दिमाग से पैदल होगा…

धर्म जाति की पालिटिक्स हर वक्त थी. 1857 की क्रांति से लेकर किसान विद्रोहों तक में धर्म जाति के आधार पर गोलबंदियां की गई थीं. आजादी के इतने सालों बाद भी गोलबंदियां इसी आधार पर होती रही हैं. कांग्रेस वाले धर्म-जाति-क्रांति आदि के समस्त पैकेज का इस्तेमाल रणनीतिक तौर पर समय व माहौल देखकर करते रहते हैं, बिलकुल ‘निर्दोष’ अंदाज में.. पर भाजपाई और अन्य पार्टियां वही काम खुलकर ‘भदेस’ तरीके से कर रही हैं..

जनता चेतनासंपन्न होती जाएगी तो उनके सोचने विचारने और वोट देने का पैर्टन बदलता जाएगा. इसमें कोई घबड़ाने वाली बात नहीं है. हम मनुष्य आज जहां तक पहुंचे हैं, वहां तक किसी पैराशूट से हमें नहीं लाया गया है बल्कि हम क्रमिक विकास और इवोल्यूशन की हजारों लाखों करोड़ों साल की यात्रा करके आए हैं… ये यात्रा जारी है और सब कुछ बेहतर होगा, ये उम्मीद करते रहना चाहिए…

जो लोग भाजपा से डराकर हमको आपको कांग्रेस के पक्ष में गोलबंद करना चाहते हैें उनको बताना चाहता हूं कि कांग्रेस ने सबसे ज्यादा कम्युनिस्ट नौजवान अपने राजकाज के दौरान मरवाए हैं. वो चाहे पश्चिम बंगाल में नक्सलबाड़ी आंदोलन को कुचलने का काम रहा हो या पूरे देश में कांग्रेसियों द्वारा चलाए गए नक्सल-कम्युनिस्ट विरोधी अभियान के जरिए बड़े पैमाने पर छात्रों, किसानों-मजदूरों का सफाया करवाना रहा हो.

इसी कांग्रेस ने लाखों सिखों का कत्लेआम पूरे देश में अपने नेताओं के नेतृत्व में कराए. सारे पाप इन कांग्रेसियों ने कराए और सिखाए हैं. इसलिए भाजपा का डर दिखाकर आपको जिनके पक्ष के सपने दिखाए जा रहे हैं, जिनके पक्ष में हमें गोलबंद करने को उत्तेजित-उत्प्रेरित किया जा रहा है, वे ज्यादा बड़े पापी हैं. भाजपा वाले तो बड़े पापियों से थोड़ा बहुत सबक सीखकर आए हैं और इसका समय समय पर नौसिखियों की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं, और इस प्रक्रिया में पकड़े भी जा रहे हैं. कांग्रेस के जमाने में भी सीबीआई का रोजाना गलत व मनमाफिक इस्तेमाल होता था, आज भाजपा के राज में भी हो रहा है. सत्ता में आपने पर सबका चरित्र एक-सा हो जाता है, इसे समझ लीजिए क्योंकि सत्ता खुद में एक संस्था होती है जो सबसे ज्यादा मजबूत और सबसे ज्यादा संगठित होती है. सत्ता में भाजपाई आएं या कांग्रेसी या कम्युनिस्ट या सपाई या बसपाई या कोई और… सबकी कार्यशैली अंतत: सत्ता परस्ती वाली यानि बड़े लोगों के पक्षधर वाली हो जाती है… जनता तो बेचारी जनता ही बनी रहती है, थोड़ी कम, थोड़ी ज्यादा… वो अपने मित्र जेपी त्रिपाठी एक जगह लिखते हैं न- ”बाबू हुए तुम, राजा हुए तुम, आदमी बेचारे के बेचारे हुए हम…”

भाजपा, कांग्रेस, सपा, बसपा आदि इत्यादि ढेरों पार्टियां जो हैं.. .ये सब पावर की लालची हैं, सत्ता की लालची हैं, पैसे की लालची हैं, पूंजीपरस्त हैं, झूठे और मक्कार हैं. जनविरोधी हैं… ब्लैकमनी के केंद्र हैं… हरामीपने और उपद्रव की कुंजी हैं… इनके चक्कर में न फंसिए. इन पार्टियों ने अब अपने अपने टीवी चैनल गढ़ लिए हैं. जो सत्ता मेंं होता है, उसकी तरफ मीडिया परस्ती ज्यादा होती है, उसकी तरफ न्यूज चैनल ज्यादा झुके रहते हैं. जैसे सूरज की तरफ सारे फूल पौधे और वनस्पतियां झुकी होती हैं. रीयल जर्नलिज्म अगर कोई कर रहा है तो वह सोशल मीडिया मे थोडा बहुत हो रहा है, वेबसाइटों और ब्लागों के जरिए थोड़ा बहुत हो रहा है. ये बाजारू मीडिया वाले, ये एनडीटीवी और जी न्यूज वाले तो बस टर्नओवर जोड़ रहे हैं, फायदे देख रहे हैं…

चिदंबरम की गोद में बैठकर जब प्रणय राय टूजी स्कैम के पैसे के ब्लैक से ह्वाइट कर रहे थे तो रवीश कुमार को दिल्ली में घना अंधेरा नहीं दिख रहा था… जब एनडीटीवी और चिदंबरम के स्कैम को उजागर करने वाले ईमानदार आईआरएस अधिकारी एसके श्रीवास्तव को पागलखाने भिजवा गया था तो रवीश कुमार की संवेदना नहीं थरथराई और उनको मनुष्यता व लोकतंत्र के लिए एक भयावह दौर नहीं दिखा. अब जब उनके मालिक की चमड़ी उनके काले कारनामों के चलते उधेड़ी जा रही है तो उन्हें सारी नैतिकता और दुनिया भर के सारे आदर्श याद आने लगे हैं… उनका बस चैनल की स्क्रीन पर फूट फूट कर रोना ही बाकी रह गया है..

अरे भइये रवीश कुमार, तू अपनी सेलरी भर पूरा पैसा वसूल एक्टिंग कर ले रहा है… उसके बाद आराम से रह.. चिल्ल कर… एक्टर वैसे भी दिल पर नहीं लेते… रोल खत्म, पैसा हजम… उसके बाद घर परिवार और मस्ती…इस अदभुत देश को और यहां की फक्कड़ जनता को कुछ नहीं होने जा रहा… बहुत आए गए शक हूण कुषाण मुगल अंग्रेज और ढेरों आक्रांता… देश नहीं मरा न मरेगा… आप कृपा करके एनडीटीवी के शेयरों का भाव डबल दिखाकर बैंक को चूतिया बनाकर कर्ज लेने के फर्जीवाड़े की सच्चाई पर एक प्राइम टाइम डिबेट करिए जिसमें बैंक के प्रतिनिधि समेत सभी पक्षों को लाकर स्टूडियो में बैठाइए बुलाइए और दूध का दूध पानी पानी कर दीजिए… आप जरा एनडीटीवी-चिदंबरम के सौजन्य से पागलखाने भिजवाए गए आईआरएस अधिकारी एसके श्रीवास्तव को भी बुला लीजिएगा पैनल में जो सुना देंगे आपके एनडीटीवी चैनल और इसके मालिक प्रणय राय की चोरी की 100 कहानियां…

रवीश जी, युवाओं को भरमाना छोड़िए… सच्ची पत्रकारिता का नाटक बंद करिए… हां, पेट पालने के लिए आपको सेलरी की जरूरत पड़ती है और प्रणय राय को एक ऐसे एंकर की जरूरत पड़ती है जो उनको डिफेंड कर सके तो आप दोनों की जोड़ी ‘जेनुइन’ है, उसी तरह जैसे सुधीर चौधरी और सुभाष चंद्रा की है. कांग्रेस राज में जिस तरह संघिये सब डराते थे कि जल्द ही भारत में कांग्रेस के सहयोग से मुस्लिम राज आने वाला है, उसी तरह भाजपा के राज में एनडीटीवी वाले डरा रहे हैं कि बस सब कुछ खत्म होने वाला है क्योंकि मोदिया अब सबका गला ही घोंटने वाला है…

अरे यार बस करो… इतना भी हांका चांपा न करो… प्रणय राय की थोड़ी पोल क्या खुल गई, थोड़ी चड्ढी क्या सरका दी गई, आप तो अपने करियर का ‘द बेस्ट’ देने पर उतारू हो गए… पोलैंड से लेकर न्यूयार्क टाइम्स और ट्रंप से लेकर प्रेस कार्प की नैतिकता के पत्र के जरिए प्रणय राय को दूध से नहलाकर पवित्र कहने को मजबूर करने लगे….

हम लोगों को यकीन है कि जितनी चिरकुटई कांग्रेस शासन के राज मेंं हुई, उससे काम ही भाजपा के राज में होगी क्योकि भाजपाइयों को अभी संपूर्ण कांग्रेसी चिरकुटई सीखने में वक्त लगेगा… हां, ये पता है कि दोनों ही पूंजीपतियों को संरक्षण देकर और उनसे आश्वस्ति पाकर राज करते हैं इसलिए इनके शासनकालों में जनता का बहुत भला न होने वाला है.. और, जनता बहुत बुरे में भी या तो मस्त रहती है या फिर मारपीट करती है या फिर सुसाइड कर लेती है. उसे अपने रास्ते पता हैं… उसके लिए नए रास्ते न तो आपके प्राइम टाइम लेक्चर से खुल सकते हैं और न ही मोदी जी के ‘देश बदल रहा है’ के जुमलों से…

रवीश भाई और सुधीर चौधरी जी, लगे रहिए… आप दोनों को देखकर यकीन होने लगा है कि एक कांग्रेस और दूसरा भाजपा का प्रवक्ता कितना दम लगाकर और कितना क्रिएटिव होकर काम कर रहे हैं… बस इतना कहना चाहूंगा कि ये देश इस छोर या उस छोर पर नहीं जीता है और न जीता रहा है… इस देश का अदभुत मिजाज है… वह कोई नृप होए हमें का हानि की तर्ज पर अपने अंदाज में अपनी शैली में जीवित रहा है और जीवित रहेगा.. पहाड़ से लेकर मैदान तक और रेगिस्तान से लेकर समुद्र तटीय इलाकों तक में फैले इस देश में अंधेरा लाने की औकात न किसी मोदी में है और न किसी मनमोहन में हो सकी…

फेसबुक के साथियों से कहना चाहूंगा कि इस छोर या उस छोर की राजनीति-मीडियाबाजी से बचें.. दोनों छोर बुरे हैं… दोनों निहित स्वार्थी और जनविरोधी हैं.. सारा खेल बाजारू है और इसके उपभोक्ता हमकों आपको बनाया जा रहा है, जबरन… आप रिएक्ट न करें.. आप मस्त रहें… जीवन में राजनीति-मीडिया के अलावा ढेर सारा कुछ है लिखने करने पढ़ने देखने को… इस भयानक गर्मी में जाइए घूम आइए पहाड़… चढ़ जाइए हिमालय की उंचाई और अपनी आत्मा तक को पवित्र और मस्त कर आइए… देह के पार देख आइए और रुह संग बतिया आइए… ये रवीश कुमार और सुधीर चौधरी तो लाखों रुपये लेता है, जैसा मालिक कहता है, वैसा स्क्रिप्ट पढ़ता है… एक का मालिक कांग्रेस के गोद में बैठा रहता है, दूसरे का भाजपा की गोद में… इनके चक्कर में अपनी नींद, उर्जा और धैर्य बर्बाद न करिए… जाइए, हिमाचल उत्तराखंड आपको बुला रहा है… किसी जाती हुई सामान्य सी सरकारी बस पर बैठ जाइए और चार पांच सौ रुपये में पहाड़ की बर्फ से ढकी चादर को हिला आइए…

जाइए अपनी जिंदगी जी आइए और भटक मरने से बच जाइए…. ध्यान रखिएगा, सारा प्रपंच यह तंत्र आपको भटकाने और मुर्दा बनाने के लिए रचता है… ताकि आपका खून पीकर वह अपने को अमर रख सके…

वो कहते हैं न कबीर… साधो ये मुर्दों का गांंव… और ये भी कि… भटक मरे न कोई….

तो दोस्तों, मुर्दों से दिल लगाना बंद कर दीजिए और भटक मरने से बचने की तरकीब ढूंढने में लग जाइए… शायद जीवन का मतलब मकसद समझ में आ जाए…

जैजै
यशवंत

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से. संपर्क : yashwant@bhadas4media.com


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आरक्षण को लेकर एक पत्रकार का मोदी को खुला खत- ”कुर्सी के लालची हैं मोदी”

बाबा तुलसीदास ने रामायण में लिखा है कि संसार में ऐसा कोई नहीं है जिसे सत्ता मिलने पर मद न हो। देश के पीएम भी इससे अछूते नहीं उनके दो फैसले बहुत बुरे लगे।एक नोटबंदी और दूसरा आरक्षण की वकालत। नोटबंदी के कारण आज भी बैंकों व एटीएम पर्याप्त धन न होने के कारण लोग परेशान हैं। गांव के लोग भेलेभाले और मेहनतकश हैं। गांवों में शिक्षा का अभाव है। वह ई बैंकिंग क्या करेंगे। हम जैसे छोटे पत्रकार जिनको चंद पैसे वेतन मिलता है। समय पर रुपये बैंकों व एटीएम से नहीं निकलते। बहुत परेशानी होती है।

गाड़ियों से लाल नीली बत्ती उतरवाना, नोटबंदी से सिर्फ मोदी अपनी कुर्सी बचाने को वोट बैंक मजबूत कर रहे हैं। इसके अलावा एक दिन पीएम का बयान आया कि वह आरक्षण कभी खत्म नहीं करेंगे। छोटे सरकारी पदों पर प्रमोशन में आरक्षण देंगे। यह कुर्सी का मोह नहीं तो और क्या है मोदी जी। सामान्य वर्ग के पढ़े लिखे लोग आज भूखों मरने को मजबूर हैं और माननीय आरक्षण का राग अलाप रहे हैं। अरे कुर्सी का लालच नहीं है तो एससी, एसटी, ओबीसी को को ही नहीं सभी गरीबों को एसी लगे होस्टल में पढ़ओ, मुर्गा खिलाओ और जनरल वर्ग को प्राइमरी में पढ़ने दो फिर कंपटीशन कराओ। सामान्य वर्ग को आरक्षण नहीं चाहिए। हम ऐसे कुर्सी के लालची नेताओं के रहमोकरम पर नहीं जीते। लेकिन दम है तो गरीबों को खूब सुविधा दो सामान्य को यों ही पढ़ने दो। आरक्षण ब़ढ़ाएंगे। कुर्सी बचाएंगे।

सामान्य वर्ग ने क्या नहीं किया आपको पीएम बनाने को। इसका परिणाम आपको मिलेगा अगले लोक सभा व विधान सभा चुनाव में। अगर ऐसे ही फैसले लिए तो केजरीवाल जैसा हाल न हो तो कहना मोदी जी। स्वच्छ भागरत मिशन में शौचालय बनवा रहे हैं। धन प्रधानों के खाते में जा रहा है। वह जर्जर र्शाचालय बनवा रहे हैं। सिस्टम दुरुस्त कर नहीं पाए। चले देश बदलने। नोटबंदी के बाद डिजिटल पेमेंट को बढ़ावा दे रहे हैं। जो ग्रामीण अपना नाम नहीं लिख पाते वह डिजिटल पेमेंट करेंगे।

ग्रामीणों के अलावा हम जैसे देहाड़ी मजदूर कहां से लाएंगे एंड्रायड मोबाइल। अपना सबसे अच्छा मित्र रूष आपकी रणनीति ने खो दिया। आज आप विश्व में किसी से लड़ने लायक नहीं हैं। ये वही रूष है जो दुनिया में सबसे ज्यादा भारत की मदद करता था। हर बुरे वक्त में भारत के साथ होता था। खैर गुरुदेव आप अपनी कुर्सी बचाओ देश की जनता आपके साथ है। आपको यह पढ़कर बहुत गुस्सा आ रहा होगा। मैं इसलिए खुद को आपसे बचाने का प्रयास करता हूं। लगे रहो पीएम सर सयमय बताएगा कुर्सी रहेगी या जाएगी। प्रयास तो सभी को करना ही चाहिए।

जय हिन्द

लाल हरेंद्र सिंह जूदेव

पत्रकार

hsedit1@gmail.com

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Problem in bank a/c related to pseudonym

प्रिय महोदय,

जैसा कि आपको विदित है बहुत से लेखक पुस्तकें व लेख आदि अपने वास्तविक नाम से न लिखकर किसी दूसरे छद्मनाम से लिखते हैं ज़िसे pseudonym कहते हैं और ज़ाहिर है कि फिर  इसी नाम से उनकी रौयल्टी आदि के चैक बनते हैंl

अब मेरे जैसे तमाम लेखकों के साथ समस्या यह आ गयी है कि जो नाम आधार कार्ड या पैन कार्ड में दर्ज है, बैंक में खाता उसी नाम से खुलेगा और चैक भी उसी नाम से जमा होगा जबकि औडिट के नियमानुसार प्रकाशक द्वारा चैक उस नाम से बनाया जायेगा जो किताब या लेख पर दिया गया हैl

ऐसे में बतायें कि पिछले 20-20 , 30-30 वर्षो से पुस्तकें आदि लिखनेवाले स्थापित लेखक पारिश्रामिक और रौयल्टी के तौर पर मिले चैक किस खाते में जमा करें क्योकि छद्मनाम से तो एकाउंट खुल नहीं सकता जब तक आधार कार्ड और पैन कार्ड में इसे वास्तविक नाम के साथ समाहित ना कर दिया जाये तो फिर क्या रास्ता है?

इसतरह के लेखक वर्ग के लिये कोई तो नियम होना चाहियेl

आशा है हमारी इस समस्या का समाधान करने के लिये आप इसे जन-जन तक पहुंचाने में हमारी मदद करेंगेl

धन्यवाद

आइवर यूशिएल

लोकप्रिय बाल-विज्ञान लेखक

ज्ञाशिम
सी- 203, कृष्णा काउंटी
मिनी बाईपास , बरेली -243122
मो : 09456670808
gyashim@gmail.com

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माई लॉर्ड ने वरिष्ठ पत्रकार को अवमानना में तिहाड़ भेजा पर मीडिया मालिकों के लिए शुभ मुहुर्त का इंतजार!

…सहारा का होटल न खरीद पाने वाले चेन्नई के एक वरिष्ठ पत्रकार को सुप्रीम कोर्ट ने अवमानना का दोषी मान कर आनन-फानन में जेल भेज दिया… यह वरिष्ठ पत्रकार गिड़गिड़ाता रहा लेकिन जज नहीं पसीजे… पर मीडिया मालिक तो खुद एक बार सुप्रीम कोर्ट के सामने उपस्थित तक नहीं हुए और कोर्ट को चकरघिन्नी की तरह हिलाडुला कर, कोर्ट से समय पर समय लेकर अघोषित रूप से ललकारने में लगे हैं कि जेल भेज सको तो जरा भेज कर दिखाओ….

सवाल है कि मजीठिया वेज बोर्ड मामले में अवमानना पर अवमानना कर रहे मीडिया मालिकों के सिर पर सुप्रीम कोर्ट ने क्यों कर रखी है अच्छी खासी कृपा… आखिर इन्हें जेल भेजने के लिए क्यों नहीं निकल पा रहा शुभ मुहुर्त और क्यों नहीं जग पा रहे सुप्रीम कोर्ट के जज साहिब लोग… एक वरिष्ठ पत्रकार को अवमानना के मामले में लालची आदि बताते हुए जितनी तेजी से जेल भेजा गया, उतनी तेजी आखिर महा लालची मीडिया मालिकों के प्रकरण में क्यों नहीं दिखती… सवाल तो अब उठेंगे सुप्रीम कोर्ट पर भी क्योंकि पीड़ित मीडियाकर्मियों के सिर से उपर पानी बहने लगा है… 

पहले जानिए वरिष्ठ पत्रकार का प्रकरण जिसे सहारा के न्यूयार्क स्थित होटल को खरीदने के वादे से मुकरने पर जजों ने लानत-मलानत करते हुए आनन-फानन में जेल भेज दिया, उस पत्रकार के लाख गिड़गिड़ाने, कांपने, रोने और दस लाख रुपये तक जुर्माना भरने की अपील के बावजूद…

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Loot in private schools

Hon’ble District Magistrate Madam,

With a lot of grief and pain I am writing to you that my two daughters are studying in Adharsheela Global School, Sector – 3, Vasundhara, Ghaziabad in class 6th & 7th respectively. The problem of school’s compulsion to buy BOOKS & STATIONERY” from school only, persists this year too.

Today my wife went to school to buy the text books for the new session from the book counter which is situated in school campus only as communicated by them on result’s day that if anybody who want only books they can come on 3rd April but today they refused to give books to her saying that we do not sell only books, you have to buy stationery also as it is COMPULSORY for every parent to buy books as well as stationery from school only.

School is not only forcing to buy books & stationery from the school but they are also charging for providing annual syllabus which is supposed to be provided FREE to every student. Moreover, the lady at reception also refused my wife to meet coordinator stating that nobody can meet coordinator in working days or working time.

THOUGH AFTER A LONG WAIT OF MORE THAN 2 HRS & DISCUSSION SCHOOL AUTHORITIES ALLOWED TO BUY BOOKS ONLY BUT ALSO THREATENED TO MY WIFE SAYING THAT IF YOU WILL NOT BUY STATIONERY FROM US, ANY OF THE NOTE BOOK WOULD NEITHER BE INSPECTED NOR SIGNED BY THE TEACHER.

Madam, it is my humble request with folded hands to please take action against the school management and save parent’s skin.

With best Regards

Ashish Goel
9310016364
ashish.goel73@gmail.com

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Vastu Vihar Scam (1) : भाजपा सांसद मनोज तिवारी के ‘संरक्षण’ में एक ठग कंपनी ने जनता से की अरबों की लूट

Yashwant Singh : बीजेपी दिल्ली के अध्यक्ष और बीजेपी सांसद मनोज तिवारी ने किस तरह अपने खास लोगों को वास्तुविहार कंस्ट्रक्शन कंपनी के जरिए जनता को लूटने की छूट दी, किस तरह वे लूट के इस खेल में अप्रत्यक्ष तौर पर शामिल रहे, इसका खुलासा जल्द भड़ास पर होगा. मनोज तिवारी द्वारा ‘संरक्षित’ वास्तुविहार कंस्ट्रक्शन कंपनी के जाल में लोग मनोज तिवारी का चेहरा देखकर फंस रहे हैं और ठग कंपनी मालामाल होती जा रही है.

इस ठग कंपनी ने उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड समेत देश के कई हिस्सों में जाल बिछा रखा है और लगातार भोले भाले लोगों को शिकार बनाया जा रहा है. अगर आपके संपर्क में भी किसी व्यक्ति का धन इस कंपनी में डूबा हो तो कृपया सामने आएं. डिटेल लिख कर bhadas4media@gmail.com पर भेज दें, उसे भी भड़ास पर आने वाली खबर में शामिल किया जाएगा.

याद रखिए, इस खुलासे को कोई चैनल या अखबार नहीं दिखाएगा… वजह आप खुद जानते होंगे… लगभग सारे चैनल और लगभग सारे अखबार जब धंधा बिजनेस लाभ स्वार्थ के लिए भगवा रंग में हर हर हो चुके हों तो सच्चाई सामने लाने का काम सोशल मीडिया और वेब माध्यमों को ही करना पड़ेगा… खोजी पत्रकारों के लिए बनारस की वास्तु विहार कांस्ट्रक्शन कंपनी और वास्तु विहार प्रोजेक्ट शोध का विषय है.. लग जाएं…

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.

पूरे प्रकरण का खुलासा पढ़ने के लिए नीचे दिए शीर्षकों पर क्लिक करें :

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नवोदय टाइम्स : मेहनत करे पत्रकार, हक खाए दलाल

दूसरों को नियम कानून और नैतिकता का उपदेश देने वाले मीडिया संस्थान इन्ही उपदेशों का किस तरह नंगा नाच करते हैं यह किसी से छुपा नहीं है। एक ऐसी ही शिकायत है नवोदय टाइम्स के कर्मचारियों की जहां कर्मचारियों से मशीन की तरह काम लिया जाता है, लेकिन उसके बदले मालिक और संपादक की नजर कर्मचरियों के वेतन काटने में रहती है। किसी को मेडिकल कार्ड नहीं, अवकाश कार्ड नहीं, पीएफ का पैसा कहा जाता है, पता नहीं लेकिन मुंह खोले तो निकालने की धमकी पहले दी जाती है। यहां साप्ताहिक अवकाश या अवकाश के बारे में सोचो ही मत। जान पर आफत हो तो क्या,  दवाई खाकर आओ और काम करो। जान से ज्यादा यहां काम कीमती है।

पूछ हिलाने वाला चहिए… कुछ मीडिया संस्थान चापलूसी के गढ़ बना दिए गए हैं। यहां काम करने वालों की कीमत नहीं है। ऐसे लोगों की जरूरत है जो सही हो या गलत, बस पूंछ हिलाते घूमे। संपादक या मालिक कुछ भी बोले तो ये वाह-वाह बोलें… ”वाह सर, आपने सौ टके सच बात कही” टाइप जुमले फेंकते रहे। यह सब सुन कर शोषणकर्ताओं का सीना फूलकर ऐसे चौड़ा होता है मानो वही धर्मराज हैं। दूसरे की कमाई पर ऐश करने वालों को शोषण कानूनी लगता है। हालांकि पूंछ हिलाने वालों की भी कीमत तभी तक है जब तक वे काम के हैं। जो व्यक्ति सही को सही और गलत को गलत कहने की हिम्मत नहीं कर सकता वह दूसरों के साथ क्या न्याय करेगा। जबकि कीमत उसके काम की ही मिलती है। सिर्फ अंतर यह होता है कि एक बिस्कुट अतिरिक्त मिलने के साथ थोड़ा सहला दो।

कर्मचारी तो बंधुआ मजदूर हैं… कर्मचारियों का शोषण बंधुआ मजदूर के समान किया जाता है। लेकिन सरकार और श्रम विभाग के आंख में पट्टी बंधी रहती है। श्रम विभाग के लोगों का हाल तो ये है कि कि श्रमिकों को न्याय दिलाने के नाम पर टैक्सपेयर के पैसे से वेतन तो ले लेते हैं लेकिन काम शोषणकर्ताओं के बचाव का करते हैं। यहां कुछ सीनियर्स संपादक की चमचागिरी करते हैं। जूनियरों के साथ बेहद बदतमीजी के साथ बात किया जाता है। ऐसा लगता है जैसे यहां पत्रकार नहीं किसी जेल का कैदी काम करता हो। संपादक महोदय की चमचागिरी करने वाले सीनियर्स की यहां चांदी है। काम कम भौकाल ज्यादा। यहां कर्मचारियों को जो संस्थान ने कार्ड दिया है वो नवोदय वेबसाइट का दिया गया है, जबकि यहां लोग काम करते हैं अखबार में। ये कैसा फर्जीवाड़ा है। मजीठिया से बचने के लिए संपादक अखबार मालिक से मिलकर इस षडय़ंत्र में मुख्य रूप ये शामिल हैं। जो कार्ड अभी है कर्मचारियों के पास, उसका भी अगस्त में टाइम खत्म हो चुका है। प्रबंधन नहीं चेता तो जल्द ही यहां कर्मचारी अपने हक के लिए कोई बड़ा घटनाक्रम अंजाम दे सकते हैं। 

एक मीडियाकर्मी द्वारा भेजे गए मेल पर आधारित.

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हिमगिरि एक्सप्रेस के सेकंड एसी में comesum catering ने परोसा सड़ा खाना, चोरों ने ब्रीफकेस उड़ाया

हावड़ा से लखनऊ जाने वाली गाड़ी हिमगिरि एक्सप्रेस के सेकंड एसी के A1 कोच में comesum catering द्वारा मुग़लसराय स्टेशन पर सड़े खाने की सप्लाई की गई। इस सड़े खाने के बारे में पूछने पर वेंडर ने बदतमीजी की। श्री संजीत कुमार, जो कि देवघर में एक सीमेंट व्यवसायी हैं, का 26″ का VIP का मैरून रंग का ब्रीफ़केस क्विल जं. और पटना के बीच में चोरी हो गया। बक्सर में GRP ने आकर खानापूरी करते हुवे फॉर्मल FIR लॉज कर लिया है।

पीड़ित संजीत कुमार का मोबाइल नंबर 8877180561 है। इतने बड़े बैग की चोरी बिना पुलिस और रेलवे स्टाफ के मिलीभगत के संभव नहीं है। फिर इतना सड़ा खाना ये इतने आराम से बेच लेते हैं food inspector पैसे खा के चुप बैठ जाते हैं शायद। जनता त्राहिमाम कर रही है प्रभु।

भड़ास को मिले एक पत्र पर आधारित.

इसे भी पढ़ें…

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यशवंत का भड़ासी चिंतन- पार्ट एक और दो : मनुष्यता से इस्तीफा देने का वक्त आ गया है…

Yashwant Singh : भड़ासी चिंतन पार्ट वन… उम्र और अनुभव के इस नाजुक व कमसिन पड़ाव पर पहुंच कर, फेसबुक को साक्षी मानते हुए, आप सभी के कपार पर अपना हाथ रखकर कसम खाते हुए… होश में रहकर पूरे जोश के साथ ऐलान करना चाहूंगा कि…..

…मनुष्य से बड़ा कमीना, धूर्त, चालबाज, मक्कार, विध्वंसक, स्वार्थी और पाखंडी दूसरी कोई मुंह-हाथ-पैर-पेट वाली प्रजाति नहीं….

…इसलिए मैं खुद को मनुष्य की जगह जानवर, चिड़िया, पंछी, कीड़ा, मकोड़ा आदि प्रजाति में से किसी एक में शामिल करने पर विचार कर रहा हूं…

…तदनुसार अपना धर्म ‘मनुष्यता’ को त्यागकर ‘जानवता’ या ‘चिड़ियाता’ या ‘किड़किड़ाता’ या ‘चहचहाता’ या ‘रेकियाता’ या ‘रेंगियाता’ में से कोई एक अपनाने पर विचार कर रहा हूं….

…और, आप लोगों से अपील करूंगा कि दुनिया के विध्वंस, मनुष्यों के शोषण, जानवरों के खात्मे, जंगल के विनाश, हाथियों के वन विहीन वास, शेरों के जंगल विहीन जीवन, मुर्गों-बकरों के लिए लगातार व सामूहिक उत्सवी कत्लेआम, पर्यावरण के जीवन विरोधी होने के लिए जिम्मेदार मनुष्यों की प्रजाति से इस्तीफा देकर खुद को कोई जानवर या पंछी या चिड़िया या पौधा मान लें, और उसी प्रजाति के हिसाब से जीवन गुजारें….

…मनुष्य के चक्कर और चंगुल में किसी भी रूप (वैचारिक, मानसिक, शारीरिक, सांस्कृतिक) में फंसेंगे तो समझिए कि आपके जीवन का अपव्यय तय है….

…मनुष्य व मनुष्यता के चंगुल में फंसने वाले लोग सदा हींग खाई मुर्गी की तरह बेहद कनफ्यूज भाव से यत्र-तत्र डोलते बकते जीते रहते हैं… और उन्हें खुद समझ नहीं आता कि वे जी डोल बक क्यों रहे हैं…

…मनुष्यों का बनाया वैचारिक जाल जंजाल इतना तगड़ा है कि इससे शायद ही कोई मनुष्य निकल कर मनुष्य व मनुष्यता के निहित स्वार्थी चिंतन से परे उठकर ब्रह्मांड के बुनियादी भावना का एहसास कर पाता है…. क्योंकि मनुष्य ने मनुष्यों के लिए ऐसी व्यवस्था कर रखी है कि दो तिहाई से ज्यादा तो पापी पेट के ऐंठन से उबर नहीं पाते, इसी से उर्जा पाते और इसी में होम हो जाते हैं.. बाकी बचे लोग मनुष्य को न्याय दिलाने और बचाने के चक्कर में बाकी गैर-मनुष्यों का नाश कर जाते हैं.. बाकी बचे लोग मनुष्य को जानवर मानकर उनका भरपूर शोषण व सत्यानाश करते हैं… बाकी बचे लोग मनुष्य मनुष्य कहकर अपनी दुकान चलाते हैं और इस दुकान से होने वाली यश अर्थ पद नुमा लाभ से अपना जीवन सफलता पूर्वक संचालित करते रहते हैं…

…कुछ एक बकचोद, फकीर, नागा, पियक्कड़, गपोड़ी, ऐबी, बनुच्चर, पागल, आलसी, एकांतवासी, असामाजिक, अमानवीय टाइप लोग जीवन के असली दर्शन को बूझ भी जाते हैं तो वे किसी को बता नहीं पाते, या बताना ही नहीं चाहते क्योंकि उनके लिए कोई उनके जैसा श्रोता दर्शक पाठक ही नहीं मिल पाता…. या फिर संभवतः ये भी कि जो चरम सच को, असली मर्म को बूझ जाता है वो खुद में मगन रहता है, उसे किसी और को बताने समझाने का काम उचित नहीं लगता क्योंकि मनुष्य तो निहित स्वार्थी मनुष्यता में पागल है और बेचारे ढेर सारे गैर-मनुष्य तो इन्हीं हरामी मनुष्यों के मारे-सताए हैं…. या फिर ये भी कि जो मनुष्यों के दल दलदल से इस्तीफा देकर जीवन ब्रह्मांड का सच बूझ पाया हो तो फिर वह भला निहित स्वार्थी मनुष्य को क्यों बताए, समझाए.. क्योंकि चालाक व धूर्त मनुष्य को बताने का मतलब है वह मनुष्य आपकी भी फोटो लगाकर मंदिर बनाकर पूजा शुरू कर देगा और इस तरह ढेर सारे मनुष्यों को फांसने बांधने लूटने का एक और उपक्रम शुरू कर देगा…

और ये भी कि जीवन ब्रह्मांड का सच बूझ लेने वाला प्राणी आखिरी सच को किसी गैर-मनुष्य को अच्छे से कनवे कर पाएगा, बिना शब्द के ही, क्योंकि जहां सहजता और उदात्तता है, वहां सब कुछ संप्रेषणीय है.. पर मनुष्य के यहां कहां है सहजता.. वह सहजता भी मनुष्यता के इर्दगिर्द है जो बाकियों के लिए गैर-मनुष्यों के लिए, प्रकृति के लिए असहजता और असंवेदनशीलता का कारण बनता है…

जय हो…

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भड़ासी चिंतन पार्ट दो…

अपने गांव में खेत, हरियाली, धूप, नदी, शांति, अलसाए पशु-पक्षियों की मुदित चपलता, प्राकृतिक कलरवी संगीत के बीच रहते हुए हर वक्त महसूस करता हूं कि ज़िंदगी से मुझे कोई शिकायत नहीं. मैं भाग्यशाली और धनी हूं जो इन अदभुत क्षणों- अकथनीय सुखों का उपभोग कर रहा हूं. प्रकृति मुझे सचमुच अपनी खूबसूरत प्रेमिका सी लगती है जिसे महसूस करते हुए ज्यादा उदात्त और शांत हो जाता हूं… गाने लगता हूं- तुम मिले, दिल खिले, और जीने को क्या चाहिए…

मुझे लगता है कि समाज, सिस्टम, ढेर सारे चिरकुट किस्म के कथित बड़े लोगों, चालाक शासकों, चतुर चारण विद्वानों, मूर्ख चिंतकों, अज्ञानी अध्येताओं आदि इत्यादि ने मिलजुल कर हर किसी के जीवन में इतना शोर, कलह, तनाव, उत्तेजना पैदा कर दिया है कि मनुष्य नार्मल रह ही नहीं सकता. वह प्रकृति को महसूस करने लायक रह ही नहीं जाता क्योंकि वह अप्राकृतिक हो चुका होता है. वह दुखी हो चुका होता है. वह अंतहीन संघर्षों में फंस चुका होता है.

प्रकृति के संगीत को महसूस करने के लिए और इस पर खिलखिलाने के लिए अब जरूरी हो गया है कि खुद को हर लेवल पर सिर के बल खड़ा कर दें… मैं आपको समझा नहीं सकता कि मैं क्या क्या महसूस कर रहा हूं इन दिनों… और कितना अच्छा अच्छा महसूस कर रहा हूं इन दिनों… थोड़ा दुखी हो रहा हूं कि फिर शहर लौटने का वक्त आ गया है… 

भड़ास के एडिटर यशवंत के एफबी वॉल से. संपर्क : yashwant@bhadas4media.com

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“LOOT” by private school authorities

Mrs. Smriti Irani

Hon’ble Education Minister

India.

Respected Madam,

I would like to bring to your kind notice the following activities which are going on regularly in Adharsheela Global School, Sector-3, Vasundhara, Ghaziabad:-

1. All parents are forced to buy books, stationery & uniform from school only (audio clip 29th March enclosed in which teacher of this school is confirming to me that it’s mandatory to buy books & stationery from school only and there is no other choice for parents).

2. In audio clip of 30th March (1st) there is a long conversation between me and school principal where she is saying whatever she do is correct and whatever she says is right. She is not ready to accept this that all parents are being forced by the school to buy books and stationery from the school only whereas I am saying that it is not correct whatever she is saying as I have a proof that I am being told by your staff that “ALL THE PARENTS HAVE TO BUY BOOKS & STATIONERY FROM SCHOOL ONLY”.

She is also agreeing that there is no “Parent Teacher Association” which is mandatory for every CBSE affiliated school.

3. In Audio clip of 30th March (2nd) you can listen the conversation between me and school principal in which she is saying that the NCERT books are of very low level and also accepting that the books of private publishers are being used by the schools just because of the COMMISSION goes to school management.

4.  In audio clip of 23rd April you can listen that principal is again saying that NCERT books are of very low level and also not able to satisfy me why school is charging – Activity Fee, Examination Fee & Sports Fee on monthly basis when they have already charged Rs.9500/- towards annual fee. In reply to my monthly fee question she said that this is the only school who is giving breakup of monthly fee and also said there are lot of expanses on printing and examination sheets which is also wrong statement of the principal because school uploads the assignments & holiday homework and asks students to download on their own and complete.

School is also charging Rs.100/- for syllabus which I believe is also not correct. School is also “LURED” students by saying that “IF THEY WILL TAKE SUBSCRIPTION OF TIME N/E MAGAZINE THEY WILL TAKE THEM TO CINEMA HALL TO WATCH “JUNGLE BOOK” MOVIE. School offered the same subscription last year also and made it mandatory but rolled back the mandatory and made it optional when school authorities were questioned by the parents.

In reply to my question regarding annual charges, she said that Rs.9500/- is towards development charges because school is expanding and also making Labs and moreover school has not generated any profit so far. My question is that if Rs.9500/- is towards development than for what they are charging Rs.1500/- (FEE RECEIPTS ENCLOSED OF DIFFERENT SCHOOL).

Madam, I am not able to understand that is the school now a “EDUCATION SHOP” from where management wants to generate profit instead of giving education?

Madam, I request you to kindly look into it and take appropriate action against the school to stop the “LOOT” and save hard earned money of the parents.

Best Regards

Ashish Goel

ashish.goel73@gmail.com

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लूटने का व्हाट ए आइडिया सर जी!

आइडिया मोबाइल वालों ने अपनी टेक्निकल चाल चल कर एक सीनियर सिटिज़न को लूट लिया। किस्सा मेरे मोबाइल नंबर 09221232130 से जुड़ा हुआ है। मैंने 6 तारीख को मोबाइल में 103 रुपये का इंटरनेट पैक डलवाया था। मुझे बाहर घूमने जाना था।  इंटरनेट पैक डलवाने के बाद इंटरनेट तो चालू हो गया पर उसमे बार–बार कंपनी से संदेश आ रहे थे। ये कर वालो तो ऐसा होगा, वगैरह। मैं तो इतना अँग्रेजी पढ़ा–लिखा नहीं हूं। जो भी संदेश आता था उसे ओके कर देता था। इसमें देखा तो मेरे बैलेन्स में से 200 रुपया निकाल लिया गया।

चूंकि मैं वसई से बाहर था तो चुप करना पढ़ा। दूसरे दिन फिर संदेश आने लगे। मेरे द्वारा ओके करने पर दोबारा 200 रुपये बैलेन्स निकल गया। यहाँ वसई में आकर नाइस मोबाइल वाला, जिससे मैंने रिचार्ज करवाया था, को शिकायत करी। उसने बताया कि ऐसा पैक लेने पर ऐसा ही होता है। जैसा भी होता हो, कंपनी ने तो मुझ सीनियर सिटिज़न को लूट लिया।

अशोक भाटिया
सेक्रेटरी
वसई ईस्ट सीनियर सिटिज़न असोशिएशन (रजि)
अ /1 वैंचर अपार्टमेंट
वसंत नगरी, वसई पूर्व (जिला– पालघर)
फोन – 09221232130

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जुआ खेलकर रक़म जीतने का लालच देता ये विज्ञापन भड़ास को शोभा नहीं देता!

यशवंत सिंह जी

संपादक, भड़ास4मीडिया

भड़ास को हम सब पत्रकार बहुत गंभीरता से लेते हैं… पर एक ऐसा विज्ञापन देखा कि आपको पत्र लिखने को मजबूर हुआ.. लिखने को तो दस पेज भी लिख सकता हूँ.. मगर आप बुद्धिजीवी हैं… इसलिए पूरा यकीन है कि कम लिखे को ज़्यादा ही समझेंगे… इस मेल के साथ में एक तस्वीर अटैच की है, उसे देखिए… इसमें जो ऑफर है, वो किसी भी नज़रिये से स्वस्थ नहीं कहा जा सकता… जुआ खेलने का ऑफर देकर रक़म जीतने की उम्मीद या लालच देता ये विज्ञापन भड़ास को शोभा नहीं देता… आशा करता हूं कि आप इस पर ध्यान देंगे.

धन्यवाद.

आसिफ खान

Asif Khan

kasif.niaz@gmail.com

आसिफ भाई,

आपने बिलकुल सही प्वाइंट की ओर ध्यान दिलाया है.  हम भड़ास के लोग खुद भी दूसरे न्यूज पोर्टल्स के गंदे विज्ञापनों के खिलाफ छापते रहे हैं. ये जो विज्ञापन भड़ास पर चलते हैं, वह गूगल की तरफ से चलाए जाते हैं. गूगल बहुत ही सोच समझ कर विज्ञापन देता है. जब भी आप क्लिक करते हो तो गूगल नए किस्म का विज्ञापन दिखाता है. ज्यादातर विज्ञापन यूजर की पसंद या सर्च या रुझान के हिसाब से होते हैं. मान लीजिए आप अगर सर्वर तलाश रहे हों और इस बारे में गूगल या जीमेल पर सर्च कर रहे हों, मेल कर रहे हों, तो गूगल के पास फीडबैक पहुंच जाता है कि आप सर्वर की तलाश में है. आपको तब यह सर्वर के विज्ञापन ही दिखाएगा.

इसी तरह जो लोग सेक्स आदि ज्यादा सर्च करते हैं उन्हें गूगल सेक्स रिलेटेड विज्ञापन दिखाता है. मेरे कहने का आशय ये है कि आप को जो विज्ञापन दिखाया गया गूगल द्वारा, जरूरी नहीं कि वह दूसरों को भी दिखाया जा रहा हो. फिर भी, ये जुवे का विज्ञापन बिलकुल गलत है. इसके खिलाफ हम लोग गूगल को पत्र लिखकर अपनी आपत्ति जताएंगे और ऐसे विज्ञापन न दिखाने को लेकर अनुरोध करेंगे. आपके लेटर को हम भड़ास पर प्रकाशित कर रहे हैं ताकि भड़ास अपनी खुद की आलोचना को भी सुन और छाप सके, साथ ही इसके जरिए हम खुद को सुधार सकें.

आभार

यशवंत सिंह

एडिटर

भड़ास4मीडिया

 

 

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