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आज के अखबार : अमर उजाला ने प्रदूषण पर ‘सरकार’ का रुख (समझ/सोच भी कह सकते हैं) प्रचारित किया है

संजय कुमार सिंह

आज के अखबारों में पहले पन्ने जो प्रमुख खबरें हैं उनमें एसआईआर की तारीख बढ़ने, गोवा के क्लब मालिकों को थाईलैंड में गिरफ्तार किए जाने और इंडिगो के यात्रियों को 10 हजार का ट्रैवल वाउचर देने का एलान जैसी सरकारी और सरकार के प्रचार वाली खबरें हैं। मेरे नौ अखबारों में अकेले अमर उजाला ने प्रदूषण पर संसद में सवाल उठाए जाने और उसपर सरकार का पक्ष बताने वाली खबर को लीड बनाया है। उसपर आने से पहले बता दूं कि इंडियन एक्सप्रेस ने बताया है कि व्यापार सौदे के बीच प्रधानमंत्री ने ट्रम्प से बात की और कहा मिलकर काम करेंगे। हिन्दुस्तान टाइम्स ने इसे पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने पर लीड बनाया है। शीर्षक है, मोदी-ट्रम्प ने संबंधों-व्यापार में प्रगति पर चर्चा की। दि एशियन एज में राज्य सभा में चुनाव आयोग की आलोचना, वोट चोरी के आरोप की खबर को लीड बनाया है और शीर्षक में लिखा है कि भाजपा ने राज्यसभा में एसआईआर का बचाव किया। तथ्य यह है कि एसआईआर की जल्दबाजी के कारण तमाम मौतें हुईं, तब चुनाव आयोग ने ध्यान नहीं दिया। समय बढ़ाने, स्थगित करने आदि की मांगों पर सुनवाई नहीं की और अब तारीख बढ़ा दी। इस बीच भाजपा ने अपने लोगों के आवेदन ले लिए या जमा करवा दिए और अब जो नाम दर्ज होंगे वे भाजपा के वोटर न होने या भाजपा को वोट देने के लिहाज से कमजोर होने या कट्टर न होने के रूप में चिह्नित किए जा सकेंगे।

मेरा अनुभव यह है कि मतदाता सूची से नाम हटाने का काम भाजपा पहले से करती आई है और मेरे कम से कम दो करीबी ऐसे हैं जिनका नाम बिना आवेदन, बिना सूचना हटाया गया है और दोबारा दर्ज करवाने की जो मुसीबतें हैं उनमें दोनों शायद ही दोबारा दर्ज करवा पाएं। मेरा अनुमान है कि दोनों भाजपा के वोटर नहीं हैं और केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा ने इन्हें मतदाता सूची से बाहर रखने की लगभग पक्की व्यवस्था कर दी है। बीएलओ ऐसे लोगों के आवेदन लेने से मना कर रहा है। नेट पर खुद करने की कोशिश में मैंने देखा कि नए वोटर के रूप में फिर से नाम दर्ज कराने की शर्तों के तहत भले नामांकन हो जाए लेकिन साठ पार के वोटर को नया नहीं मानकर फिर हटा दिया जाए तो कोई क्या कर लेगा। पुराने वोटर के रूप में दर्ज होने के लिए जरूरी है कि 2003 में माता-पिता या जीवन साथी के मतदाता होने का सबूत हो। बेटा, बेटी या नाती पोतों का अब वोटर होना नहीं माना जाएगा। जाहिर है, चुनाव आयोग जब 45 दिन बाद रिकार्ड रद्द कर सकता है तो मतदाता से 2003 का रिकार्ड क्यों मांगा जा रहा है। यह नेट पर मशीन रीडेबल फॉर्म में उपलब्ध हो तो आसानी से मिल जाएगा। अभी नेट पर उपलब्ध है या नहीं – पता नहीं। मैं तो नहीं ढूंढ़ पाया। 60 पार के इन लोगों के माता-पिता का रिकार्ड इनके पास होने की उम्मीद क्यों करना जब चुनाव आयोग 45 दिन तक ही रखता है। जाहिर है, ये वोटर नहीं हो सकते हैं और इनकी जगह जो वोटर बनाए गए हैं उसका सीसीटीवी फुटेज 45 दिन के अंदर   मुकदमा दायर किए बगैर नहीं मिलेगा।

यह कोई वोटर छूटे ना के खिलाफ है। एसआईआर के नियमों के कारण ऐसा होगा। दूसरी ओर, इन नियमों और एसआईआर से भाजपा को फायदा बताने वाली ढेरों खबरें हैं। इसीलिए राहुल गांधी ने चुनाव चोरी को देशद्रोह कहा है और यह गलत नहीं है। परेशानी में गृहमंत्री के मुंह से गाली निकल जाना, लोकसभा अध्यक्ष को हटा देने का आदेश देना, भाषण का क्रम तय करने के मुद्दे पर गुस्सा जाना और 102 डिग्री बुखार होना इसी के दबाव औऱ तनाव के लक्षण हो सकते हैं। तथ्य यह है कि साठ पार के कम से कम दो लोग उसी पते पर रहते हुए मतदाता सूची से अकारण, बिना सूचना, बिना अनुमति हटा दिए गए हैं। सामान्य तौर पर दोबारा शामिल नहीं हो सकते हैं। जहां तक आज के अखबारों में खबरों की बात है, नवोदय टाइम्स और द टेलीग्राफ की लीड भी प्रधानमंत्री और ट्रम्प की बातचीत तथा अमेरिका के साथ व्यापार सौदे की खबर है। द हिन्दू ने आज पांच राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में एसआईआर की अंतिम तिथि बढ़ाए जाने की खबर को लीड बनाया है। देशबन्धु में एसआईआर की तारीख बढाने की खबर टॉप पर छह कॉलम में है नीचे तीन कॉलम की खबर का शीर्षक है, भारत लोकतंत्र की जननी पर अब प्रश्न चिन्ह : (अजय) माकनटाइम्स ऑफ इंडिया ने गोवा के क्लब मालिकों के फुकेत में  पकड़े जाने और भारत द्वारा उन्हें वापस मांगे जाने की खबर को लीड बनाया है।इन सबसे अलग अमर उजाला की लीड का शीर्षक है – संसद में गूंजा प्रदूषण का मुद्दा, घुट रही दिल्ली… क्या कर रही सरकार। इस खबर के अनुसार,     

  • बीजू जनता दल के सांसद ने कहा है – वायु प्रदूषण मानव निर्मित आपदा है
  • कांग्रेस सांसद ने कहा है –  राहत के लिए बीजिंग योजना अपनाया जाए

सरकार ने कहा है

  • दुनिया में प्रदूषण की कोई आधिकारिक रैंकिंग नहीं है
  • भारत वैश्विक जलवायु जोखिम को नहीं मानता है
  • वह विदेशी रैंकिंग को अपनी अपनी नीतियां बनाने का आधार नहीं मानती
  • दिल्ली में हवा बेहतर रहने वाले दिनों की संख्या बढ़ी है 
  • विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की वायु गुणवत्ता गाइडलाइंस बाध्यकारी नहीं है
  • पटाखों के मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का क्या हुआ वह भी मुद्दा है

इसके अलावा

पटाखों के मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का क्या हुआ वह भी मुद्दा है

जो सरकार अभी तक वोट चोरी को मुद्दा नहीं मानती है, राहुल गांधी का मजाक बनाने में लगी है वह प्रदूषण को क्यों और कैसे मान ले। खास बात यह है कि समर्थन की जिन बैसाखियों पर यह सरकार टिकी है उनके लिए भी प्रदूषण मुद्दा नहीं है। 272 विशिष्ट नागरिकों, पूर्व फौजियों के साथ तमाम लोग, प्रचारक, ठेका, पद और सम्मान पाए आरएसएस वाले तथा दूसरे समर्थक, संपादक, पत्रकार आदि भी सरकार के साथ ही रहेंगे। भले प्रदूषण ही नहीं महंगाई और डॉलर की बढ़ती कीमत से परेशान या चकित हों। ये लोग डॉलर के 60 रुपए का होने पर बोलते थे। अब नहीं बोलते हैं। दूसरी ओर, सोशल मीडिया पर सरकारी और गैर सरकारी प्रचारक तथा ट्रोल सरकार के प्रचार में लगे हैं। ऐसे में सरकार ने कहा नहीं है लेकिन कह दे तो कोई क्या बिगाड़ लेगा और सरकार वोट चोरी से नहीं तो वोट खरीदकर, चुनाव आयोग के सहयोग से चुनाव जीतती रहेगी। यह सब को पता है या यही संकट है। ऐसे में प्रदूषण सरकार को  समस्या नहीं लगती है, उसकी दलील हो कि नेहरू जी के समय भी यही स्थिति थी और हमने तो (सरकारी पैसे से) एयर प्यूरीफायर खरीद लिए हैं। एयर कंडीशन कारों में चलते हैं। आम आदमी की हमें चिन्ता नहीं है। पैसे वालों को दिक्कत नहीं है तो कुछ होना नहीं है। आप अपना सोचिए। खबर के रूप में यह पहले पन्ने पर छपी है तो मकसद आपको-मुझे यही बताना होगा। मुख्य खबर के साथ सरकार का रुख बताने वाली जो खबरें छपी हैं। उनमें पहला है, केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेन्द्र यादव ने कहा है, दिल्ली में हवा बेहतर रहने वाले दिनों की संख्या बढ़ी है। अगर ऐसा है और दावा किया जा रहा है तो कोई कैसे कह सकता है कि सरकार काम नहीं कर रही है या प्रदूषण की यह स्थिति सरकार के कारण या बावजूद है।

यह सूचना भी दिलचस्प है कि भारत वैश्विक जलवायु जोखिम सूचकांक को नहीं मानता है। वह भी तब जब भारत नौवें स्थान पर है। विश्व गुरु यानी अपना भारत और हमारे पर्यावरण मंत्री कीर्तिवर्धन ने कहा है कि देश किसी भी बाहरी रैंकिंग को अपनी नीतियां बनाने का आधार नहीं मानता है। भले ही, विश्व बैंक ने 60 करोड़ डॉलर यानी कोई 539 करोड़ रुपए की दो योजनाओं को मंजूरी दी है। ये योजनाएं डबल इंजन वाले उत्तर प्रदेश तथा हरियाणा में वायु प्रदूषण को कम करने तथा साफ हवा को बढ़ावा देने के लिए हैं। यह खबर भी आज ही छपी है। डबल इंजन वाली सरकारें दिल्ली में वायु प्रदूषण के लिए पंजाब में पराली जलाए जाने को भी कारण बताती रही हैं लेकिन वह अलग मुद्दा है। कांग्रेस सांसद मणिकम टैगोर ने प्रदूषण कम करने के लिए बीजिंग योजना अपनाने की मांग की है लेकिन यह तो तभी होगा जब सरकार मानेगी कि प्रदूषण खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है और लोगों की जान बचाने तथा स्वास्थ्य के लिए कुछ करने की जरूरत है।  

मुझे याद है कि गए साल (2024 में) दीवाली पर पटाखों (बिक्री, भंडारण, उपयोग) पर प्रतिबंध था फिर भी खूब चले थे। उस समय दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार थी लेकिन पुलिस तो केंद्र सरकार के पास ही थी। शिकायत थी कि भाजपा नेताओं ने भी पटाखे चलाए थे। सोशल मीडिया पर नाम थे, शिकायत तो है ही। तब दिल्ली सरकार ने नहीं रोका। इस साल सुप्रीम कोर्ट ने हरित पटाखों के निर्माण की इजाजत दी थी लेकिन बिक्री पर पुराना प्रतिबंध जारी रहा। असल में, अदालत ने पूर्ण प्रतिबंध को रद्द या खारिज नहीं किया, बल्कि कहा कि यह “प्रैक्टिकल यानी व्यावहारिक या आदर्श नहीं है” क्योंकि अक्सर यह लागू नहीं होता। सुप्रीम कोर्ट ने हरित पटाखों पर प्रतिबंध का भविष्य देखने के लिए आदेश सुरक्षित रखा। 15 अक्टूबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली-एनसीआर में 18 से 20/21 अक्टूबर तक हरित पटाखों की बिक्री और उपयोग की अनुमति दी। शर्त थी कि पटाखे केवल 6-7 बजे सुबह और 8-10 बजे शाम के बीच फोड़े जा सकेंगे 2) केवल पूर्व घोषित “ग्रीन या हरित” पटाखे की बिक्री होगी और 3) पुलिस और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को निगरानी करनी है। दिल्ली सरकार ने क्या व्यवस्था की वह तो नहीं मालूम लेकिन अखबारों में खबर थी कि सुप्रीम कोर्ट के हरित पटाखों के आदेश के बावजूद, दिल्ली के कई बाजारों में पटाखों की खुली बिक्री जारी रही। हरित पटाखों के साथ अन्य पटाखे भी देखे गए। हालांकि, लाइसेंस लेने वाले व्यापारियों की संख्या कम थी; अधिकतर विक्रेता पहले से ही पटाखे बेच रहे थे। तथ्य यह है कि पूर्ण प्रतिबंध का व्यवहारिक पालन मुश्किल रहा है, इसलिए सीमित हरित पटाखों की अनुमति दी गयी।

तथ्य है कि प्रदूषण रोकने के लिए नियमों को राजधानी दिल्ली में प्रभावी ढंग से लागू नहीं किया गया या किया जा सका। हालांकि, हरित पटाखे भी पूरी तरह प्रदूषण-मुक्त नहीं हैं। पारंपरिक पटाखों की तुलना में ये कम प्रदूषण करते हैं (30% तक कम, लेकिन शून्य नहीं)। इस लिहाज से कहा जा सकता है कि बीजद सांसद का कहना सही है। तथ्य यह भी है कि दिल्ली की मुख्य मंत्री रेखा गुप्ता ने कहा था, “हम सुप्रीम कोर्ट से हरित पटाखों की अनुमति मांग रहे हैं, ताकि त्योहार और प्रदूषण नियंत्रण के बीच संतुलन बन सके। यह प्रस्ताव सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट में लिखित रूप से प्रस्तुत किया जाएगा।” यह दावा भी किया गया कि पहले की आप सरकार के दौरान पटाखों पर लागू नियमों में कमी थी और नई सरकार ने अनुमति दिलवाई। निश्चित रूप से यह राजनीतिक बयान था और इसका मकसद स्पष्ट है। आदेश लागू रहने, प्रतिबंध पर ध्यान न देने, भाजपा नेताओं द्वारा उसके उल्लंघन के बाद सुप्रीम कोर्ट में इस अपील का मतलब जो हो, केंद्र की सत्ता में होने और कार्यशैली के कारण इस मांग के दबाव अपनी जगह हैं। भले वह चर्चा का मुद्दा न हो।

पटाखों की बिक्री रोकने के आदेश को व्यावहारिक नहीं मानने का एक कारण यह भी हो सकता है कि देश की राजधानी दिल्ली में तमाम पटाखे खुलेआम बिके। हिन्दुस्तान टाइम्स में खबर थी। दिल्ली की मुख्यमंत्री ने दावा किया कि अरविन्द केजरीवाल ने कुछ नहीं किया मेरी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से अनुमति दिलाई। यह सुप्रीम कोर्ट पर दबाव डालने की बात स्वीकार करने जैसा भी है। इसी तरह, प्रदूषण कम करने के लिए सरकार ने पुरानी गाड़ियों पर प्रतिबंध लगाया लेकिन वह भी नहीं चला। हालांकि यह प्रतिबंध जनता की गाड़ियों के लिए ही था। सरकारी खासकर पुलिस और फौज की पुरानी गाड़ियां तो चल ही रही थीं।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

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