संजय कुमार सिंह
आज मेरे नौ अखबारों में आठ लीड है। जो लीड दो अखबारों में है वह है (1) राहुल गांधी को भेजे संदेश में दिग्विजय सिंह ने (राष्ट्रीय स्वयंसेवक) संघ की संरचना की प्रशंसा की (इंडियन एक्सप्रेस) और (2) दिग्गी राजा ने भाजपा-आरएसएस की तारीफ की और मोदी के शिखर पर पहुंचने को सराहा (दि एशियन एज)। अमर उजाला में यह खबर, दिग्विजय ने मोदी की तस्वीर साझा कर भाजपा को सराहा शीर्षक से सवा कॉलम में छपी है। अखबार की लीड दूसरे सभी अखबारों से अलग है, बर्फबारी नहीं बनेगी आतंकियों की ढाल, सेना ने ऊंचाई वाले इलाकों में बनाए अस्थायी कैम्प। नवोदय टाइम्स की लीड का शीर्षक है, ग्रैप-4 हटते ही हवा बहुत खराब। देशबन्धु की लीड का शीर्षक है, सड़क से संसद तक होगा संघर्ष। वीबी जी राम जी बिल के खिलाफ कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में लिया संकल्प। टाइम्स ऑफ इंडिया की आज की लीड का शीर्षक है, विवाद बढ़ा तो मुख्य न्यायाधीश की पीठ अरावली पर स्वतः संज्ञान लेकर सुनवाई करेगी। इंट्रो है, ‘पहाड़’ की परिभाषा सोमवार के लिए सूचीबद्ध। हिन्दुस्तान टाइम्स की लीड का शीर्षक है, राजधानी में इलेक्ट्रीक वाहनों को बढ़ावा देने का विचार इसलिए पेट्रोल, सीएनजी कारें महंगी हो सकती हैं। द हिन्दू की लीड का शीर्षक है, 10.56 असम में मतदाता सूची के ड्राफ्ट (मसौदे) से 10.56 लाख वोट कटे। इस खबर का उपशीर्षक है, मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने कहा कि राज्य में 22 नवंबर से 20 दिसंबर तक विशेष पुनरीक्षण हुआ। चुनाव आयोग की घोषणा के अनुसार राज्य में एसआईआर या विशेष सघन पुनरीक्षण होना ही नहीं था। अब खबर है कि शुद्ध, पारदर्शी मतदाता सूची सुनिश्चित करने के लिए यह सब किया गया। उपशीर्षक में यह भी बताया गया है कि पश्चिम बंगाल के 32 लाख अनमैप्ड (यानी लापता या जिनका पता नहीं चला) वोटर के लिए सुनवाई शुरू हो गई है।
द टेलीग्राफ ने पहले पन्ने पर पीटीआई की एक तस्वीर के साथ जो विवरण दिया है उसका शीर्षक है, समय की ज़रूरत। आप द टेलीग्राफ से असहमत हो सकते हैं लेकिन इसके जरिए उसने नागरिकों की समस्या बताई है और पहले पन्ने पर यह भी लिखा है कि (विवरण) के लिए राज्यों की खबरों का पन्ना देखिए। पहले पन्ने पर छपी सूचना के अनुसार, शनिवार को मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन के तहत सुनवाई शुरू होने पर कोलकाता के एक सेंटर पर जमा वोटर। यहां राज्य के अलग-अलग हिस्सों से लोगों की “परेशानी” की शिकायतें सामने आईं। मुझे याद नहीं है कि मतदाता सूची में नाम लिखवाने (असल में बनाए रखने) के लिए पहले देश भर में कहीं भी, कभी भी, मतदाताओं के किसी भी समूह को इस तरह, इतने लंबे समय तक परेशान रहना पड़ा हो। नाम दर्ज कराने में जो परेशानी होती थी कुछ दिन में आर-पार हो जाता था। या तो नाम दर्ज हो जाता था या रह जाता था। अक्सर दर्ज हो ही जाता था। नाम होने या नहीं होने से किसी को परेशानी की खबर याद नहीं है। नहीं होने से वोट नहीं दे पाना सामान्य है और बहुत सारे लोग रह भी जाते थे। अब स्थितियां ऐसी बना दी गई हैं कि लोगों को मतदाता सूची में होना तो जरूरी लग ही रहा है उसमें बने रहना भी मुश्किल हो गया। दुर्भाग्य से यह किसी कानून का उल्लंघन नहीं है या सुप्रीम कोर्ट ऐसा मान नहीं रहा है। इसलिए कानून स्पष्ट होना जरूरी है पर यह भी कहा जा चुका है कि कानून स्पष्ट है चुनाव आयोग मनमानी कर रहा है। पता नहीं इसपर सुनवाई हुई या नहीं, हो सकती है या नहीं। अमृतकाल है और नामुमकिन मुमकिन है – ये पुरानी बातें हो गईं।

नवोदय टाइम्स में खबर है, उत्तर प्रदेश में एसआईआर प्रक्रिया पूरी। हट सकते हैं, 2.89 वोटर। अखिलेश यादव ने कहा, बड़ी संख्या में वोटर कटने से भाजपा के अंदर मची है कलह। मतदाता सूची में नाम के मामले में इस बार यह सब हो रहा है तो एसआईआर के कारण लेकिन असम में भी नाम कटे हैं जहां एसआईआर होना ही नहीं था। वहां शुद्ध मतदाता सूची बनाने के लिए या बनाने के क्रम में 10.56 लाख नाम कट गए तो जाहिर है जो हुआ वह समावेशी नहीं था। इतनी बड़ी संख्या में नाम कटने का साफ मतलब है कि पहले नियमों का पालन नहीं किया गया या अभी जो किया गया उसके तरीके या नियम ऐसे थे कि लोग छूट गए। चुनाव आयोग या एसआईआर करने का यह उद्देश्य होना ही नहीं चाहिए। अगर घसपैठियों को हटाना या निकालना एसआईआर का उद्देश्य मान भी लिया जाए तो यह काम समावेशी नहीं है और जाहिर है कुछ नाम ऐसे कटेंगे या कटे रह जाएंगे जो नहीं कटने चाहिए। नए जोड़ने के मामले में भी यही होगा। इस लिहाज से एसआईआर गलत न भी हो तो जैसे हो रहा, गलत लग रहा है और नागरिकों को परेशान होकर मतदाता सूची में क्यों रहना चाहिए यह मैं नहीं समझ पा रहा हूं। खुद को मेरे इलाके का बीएलओ बताने वाले ने मेरे मामले में फोन पर जो कुछ कहा उससे यह लगा कि नियम नाम काटने वाले हैं और वो नहीं चाहते कि नाम कटे इसलिए फोन किया था और चूंकि मैं कुछ खास कर नहीं सकता था इसलिए मैंने जो मालूम और याद था – बता दिया। देखना है ड्राफ्ट सूची में बचता हूं या नहीं। इससे ज्यादा मेहनत मैं नहीं करने वाला हूं और रह गया तो बताउंगा। फिलहाल तो आज की खबर पर आता हूं।
टेलीग्राफ की खबर के अनुसार, तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी ने शनिवार को चुनाव आयोग को चुनौती दी कि वह 1.36 करोड़ वोटरों की लिस्ट पब्लिश करे, जिनके नामांकन प्रपत्र (फॉर्म) में कथित तौर पर “लॉजिकल गड़बड़ियां” पाई गई हैं, या फिर बंगाल के लोगों से उस बात के लिए माफी मांगे जिसे उन्होंने “अनऑफिशियल” कहानी बताया। उन्होंने यह भी धमकी दी कि अगर लिस्ट पब्लिक नहीं की गई तो वे नई दिल्ली में ईसी के ऑफिस का घेराव करेंगे। कूच बिहार की एक वोटर अस्मिता बल (जो तस्वीर में नहीं हैं) सुनवाई में शामिल होने के लिए बेंगलुरु से आई थीं। उन्होंने बताया कि अधिकारियों ने उनका कक्षा दस का एडमिट कार्ड लेने से मना कर दिया। “वे पास होने का सर्टिफिकेट चाहते थे। मेरे पास वह नहीं है क्योंकि बेंगलुरु के कॉलेज में जहां मैं पढ़ती हूं, एडमिशन के समय उसे रख लिया था।” जाहिर है, यह शर्त नाम छोड़ने वाली है। समावेशी तो नहीं ही है और मतदाता सूची में नाम होने के लिए पास-फेल मुद्दा नहीं है। ऐसे में जो हो रहा है वह कानूनन सही भी हो तो व्यावहारिक तौर पर गलत है। पुराने कानून इसी हिसाब से हैं लेकिन नागरिकों की परेशानी (और बीएलओ की खुदकुशी या नौकरी छोड़ देना) मुद्दा ही नहीं है तो वोटर रहना नहीं रहना कहां हो सकता है। ऐसे में द टेलीग्राफ के पहले पन्ने पर यह लीड भले नहीं है सबसे ज्यादा पढ़ी जाएगी। लीड का शीर्षक है, ऑस्ट्रेलियाई रेबीज वैक्सीन अलर्ट की समीक्षा की मांग। खबर के अनुसार, एक सरकारी भारतीय वैक्सीन बनाने वाली कंपनी ने 22 दिसंबर के ऑस्ट्रेलियाई स्वास्थ्य एडवाइजरी को चुनौती दी है। इसमें नवंबर 2023 से भारत में सर्कुलेट हो रही एंटी-रेबीज वैक्सीन के “नकली बैच” के बारे में चेतावनी दी गई थी और अधिकारियों से इस नोटिस की समीक्षा करने के लिए कहा गया है। इंडियन इम्यूनोलॉजिकल्स लिमिटेड (आईआईएल) ने कहा कि उसने खुद जनवरी में अपनी एंटी-रेबीज वैक्सीन अभयरैब के एक बैच के नकली होने की घटना का पता लगाया था और कहा कि ऑस्ट्रेलियाई एडवाइजरी से जनता और हेल्थकेयर प्रोफेशनल्स के बीच “चिंता और अविश्वास” पैदा हो सकता है। जो भी हो, यह सरकारी कंपनी की समस्या या चिन्ता है। मोटे तौर पर पीआईबी के फैक्टचेक जैसा है जो सही खबरों को भी मिसलीडिंग कह देता है। यहां भी नकली वैक्सीन पर अलर्ट से दिक्कत है, एक बैच खराब या नकली थी – यह नहीं कहा जाना चाहिए।
आज की दूसरी महत्वपूर्ण खबर टाइम्स ऑफ इंडिया में सेकेंड लीड है। शीर्षक है, (देहरादून में) हत्या से पहले त्रिपुरा के छात्र के अंतिम शब्द थे, ‘मैं भारतीय हूं’।” वरिष्ठ पत्रकार शकील अख्तर ने इसकी कतरन साझा करते हुए लिखा है, “ऐसे मार्मिक हेडिंग के साथ आपने यह खबर किसी हिंदी अखबार में पेज वन पर देखी? जिस उत्तराखंड में यह निर्मम हत्या हुई है वह हिंदी क्षेत्र में ही है। दूसरी बात, कुछ अखबार इस तरह की खबर छापते तो हैं मगर ऐसी लिंचिंग क्यों होती है इसका कारण नहीं बताते। जब तक बताएंगे नहीं तब तक सिर्फ हेडिंग लगाने से काम नहीं चलेगा। वह भी नहीं हो रहा है और जो हुआ वह देश में फैलाई गई नफरत का नतीजा है। यह नफरत और विभाजन देश को बर्बाद कर देगी। अभी आपने देखा कि उत्तर प्रदेश में भाजपा के ही ब्राह्मण विधायक भी निशाने पर आ गए हैं। जो देश में दो सबसे ऊंची जातियां समझी जाती हैं ब्राह्मण और राजपूत उनमें भी आपस में नफरत और विभाजन फैला दिया गया है। क्या होगा? देश अंदर से खोखला हो जाएगा।” मुझे लगता है, हो रहा है और यह क्रिसमस पर दिखा। दस साल बाद हो रहा है उसका एक मतलब यह भी है कि केरल चुनाव की तैयारी है। केरल चुनाव जीतें या नहीं कोशिश कम नुकसानदेह नहीं है और इसकी बदनामी दुनिया भर में हुई है। लेकिन भाजपा या परिवार की तरफ से कोई अफसोस या ऐसा कोई संदेश भी दिखा? पुराना इतिहास दंगे की आग में हाथ सेंकने का रहा है और ऐसा नहीं है कि बहुमत को समझ नहीं आ रहा है। इसलिए यह चिन्ताजनक स्थिति है। अगर हम हिन्दू राष्ट्र हो ही जाएंगी तो हिन्दू पाकिस्तान हिन्दुस्तान या हिन्दूस्थान नहीं होंगे। तथ्य यह है कि प्रति व्यक्ति आय में बांग्लादेश हमें टक्कर देता है।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


