मनीष दुबे-
कानपुर। एक तरफ सोशल मीडिया और यूट्यूब ने हजारों युवाओं को रोज़गार और पहचान दी है, तो दूसरी तरफ इसी प्लेटफॉर्म की आड़ में अपराध की नई जमात भी तेजी से पनप रही है। खुद को “कंटेंट क्रिएटर” और “यूट्यूबर” बताने वाले कुछ लोग अब इसे ठगी, ब्लैकमेल और डर फैलाने का हथियार बना रहे हैं।
ताज़ा मामला कानपुर के गुजैनी थाना क्षेत्र का है, जहां एक महिला को उसके 10 साल के बेटे के अपहरण की फर्जी कॉल कर दी गई। फोन पर कॉल करने वाले ने कहा — “आपका लड़का हमारे कब्जे में है, पांच हजार रुपये दो और ले जाओ।”
घबराई मां ने जैसे ही पूछा कि तुम लोग कौन हो, तो उधर से जवाब आया —“हम यूट्यूबर हैं।”
फर्जी अपहरण, असली डर
बुधवार शाम बच्चा सब्ज़ी लेने घर से निकला था। इसी दौरान मां के मोबाइल पर कॉल आया कि बेटे का अपहरण हो गया है और दो लाख रुपये की फिरौती मांगी गई। बाद में रकम घटाकर पांच हजार रुपये पर बात आ गई।
डरी-सहमी मां सीधे गुजैनी थाने पहुंची। पुलिस ने रिपोर्ट दर्ज की और जांच शुरू की। करीब एक घंटे बाद बच्चा खुद घर लौट आया। तब पता चला कि यह अपहरण नहीं, बल्कि डर फैलाने का खेल था।
14–15 साल के लड़के निकले “यूट्यूबर”
पुलिस जांच में सामने आया कि कॉल करने वाले 14–15 साल के दो किशोर थे। इन्होंने स्कूल के पास से मां का नंबर हासिल किया और फिर खुद को “यूट्यूबर” बताते हुए फिरौती मांगने लगे।
यानी न कोई अपहरण था, न कोई गिरोह — सिर्फ सोशल मीडिया से प्रभावित दिमाग और अपराध की नकल।
कैमरा नहीं, कानून का डर चाहिए
यह मामला सिर्फ एक परिवार का नहीं है, बल्कि उस खतरनाक ट्रेंड की झलक है, जिसमें कुछ युवा यूट्यूब और इंस्टाग्राम को ग्लैमर समझकर क्राइम को भी कंटेंट मानने लगे हैं।
आज हालत यह है कि —कोई फर्जी स्टिंग कर रहा है, कोई ब्लैकमेल कर रहा है, कोई अपहरण की स्क्रिप्ट लिख रहा है, और अंत में खुद को “यूट्यूबर” बताकर बचने की कोशिश करता है।
सवाल सिस्टम से भी
यह घटना कई सवाल खड़े करती है —
- क्या सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर कंटेंट बनाने की कोई नैतिक सीमा है?
- क्या किशोरों को यह समझाने का कोई सिस्टम है कि व्यूज के लिए अपराध करना भी अपराध ही है?
और सबसे बड़ा सवाल: क्या “हम यूट्यूबर हैं” अब एक नया बहाना बन चुका है?
डिजिटल इंडिया का डार्क साइड
सोशल मीडिया ने जहां अभिव्यक्ति की आज़ादी दी है, वहीं उसने एक डार्क साइड भी पैदा की है — जहां कैमरा हाथ में है, लेकिन जिम्मेदारी दिमाग में नहीं।
कानपुर का यह मामला चेतावनी है कि अगर समय रहते इस ट्रेंड को नहीं रोका गया, तो अगली पीढ़ी के लिए अपराध भी सिर्फ एक ‘कंटेंट आइडिया’ बनकर रह जाएगा।
कानपुर नगर में यूट्यूबर के नाम अपराध की कुछ अन्य झलकियां भी देखिए…






