देवप्रिय अवस्थी-
जनसत्ता में दूसरी पारी…. अप्रैल 1987 के पहले हफ्ते में मैंने चंडीगढ़ पहुंच कर वहां जनसत्ता का संस्करण निकालने की तैयारी शुरू कर दी. शुरू के कुछ दिन मैं वहां जनसत्ता का अकेला पत्रकार था. न तो स्थानीय संपादक तय हुआ था और न ही बाकी स्टाफ का चयन हुआ था. स्थानीय संपादक पद के लिए प्रभाष जी की पहली पसंद इंडिया टुडे के तत्कालीन भोपाल ब्यूरो प्रमुख नरेंद्र कुमार सिंह थे. वह पहले भोपाल में ही इंडियन एक्सप्रेस के रिपोर्टर रह चुके थे. उन्हें प्रभाष जी ने सपत्नीक चंडीगढ़ बुलाकर आरएनजी (रामनाथ गोयनका) से मिलाया भी.
एनके पहले तो नई जिम्मेदारी संभालने के लिए हामी भर गए, पर बाद में ऐन वक्त पर मुकर गए. बाकी स्टाफ का चयन प्रभाष जी को स्थानीय संपादक के साथ मिलकर करना था, जो उन्हें अकेले ही करना पड़ा. जहां जरूरी लगा, वहां उन्होंने मुझसे सलाह ली. चुने गए साथियों ने अखबार का प्रकाशन शुरू होने से करीब 15-20 पहले ज्वाइन करके जनसत्ता की भाषा-वर्तनी आदि के मुताबिक काम सीखना-करना शुरू कर दिया.
उन दिनों संपादकीय पेज की पूरी सामग्री, अंतरराष्ट्रीय, राष्ट्रीय, खेल और व्यापार पेज की ज्यादातर खबरें मोडम के जरिए दिल्ली से चंडीगढ़ आती थीं. चंडीगढ़ की संपादकीय टीम की जिम्मेदारी संस्करण के प्रसार क्षेत्र की खबरें तैयार करना थी. शिमला और जम्मू में भी पूर्णकालिक रिपोर्टर -रवींद्र रणदेव और अश्विनी शर्मा की नियुक्ति की गई थीं.
चंडीगढ़ में जनसत्ता-इंडियन एक्सप्रेस के जीएम सुशील गोयनका थे-युवा और बेहद उत्साही. उन्होंने पहले ही दिन का एक लाख प्रतियों का प्रिंट आर्डर हासिल करने का लक्ष्य रखा था. उसे हासिल किया भी. किसी हिंदी अखबार की इतने बड़े प्रिंट ऑर्डर से शुरुआत होने का यह पहला मौका था. स्थानीय संपादक की नियुक्ति हुए बगैर ही 1 मई 1987 से अखबार का प्रकाशन शुरू हुआ. उसका प्रतिसाद भी अच्छा मिला. दीगर है कि सुशील गोयनका के आग्रह और दबाव में कुछ एजेंटों ने मांग से ज्यादा प्रतियों के आर्डर बुक करा दिए थे. उन्होंने ये आर्डर जल्द ही घटा दिए और प्रिंट आर्डर घट कर 65-70 हजार के दरम्यान रह गया.
चंडीगढ़ संस्करण निकलने के कुछ ही दिन बाद हरियाणा विधानसभा के चुनाव होने थे. इन चुनाव के लिए कांग्रेस के टिकट बंटवारे की खबर ‘बंसी ज्यादा बजी, भजन कम’ शीर्षक से लीड के रूप में छपी. यह अनूठा शीर्षक था. जाहिर है कि बंसीलाल गुट को भजनलाल गुट के मुकाबले ज्यादा टिकट मिले थे. इसी तरह महादेवी वर्मा के निधन पर हमारी लीड खबर का शीर्षक था -‘महादेवी का महाप्रयाण.’
अनगढ़ संपादक की नसीहतें
इस बीच स्थानीय संपादक की तलाश चलती रही. अखबार छपना शुरू होने के 15-20 दिन बाद प्रभाष जी ने दिल्ली में बतौर सहायक संपादक काम कर रहे जितेंद्र बजाज को चंडीगढ़ का स्थानीय संपादक बनाकर भेज दिया. जितेंद्र बजाज के साथ ही बनवारी जी दिल्ली के स्थानीय संपादक पद पर प्रमोट कर दिए गए और हरिशंकर व्यास जनसत्ता समाचार सेवा के संपादक बना दिए गए. पता नहीं प्रभाष जी ने जितेंद्र बजाज में पत्रकारिता तथा नेतृत्व के कौन से गुण देखें थे-सिवाय बनवारी जी का करीबी मित्र होने और औसत दर्जे का कालम व संपादकीय लिखने के. संपादकीय और कालम लिखना और अखबार निकालना दो अलग-अलग कौशल हैं. जरूरी नहीं कि नहीं कि एक अच्छा कालमिस्ट या संपादकीय लिखने वाला अच्छा टीम लीडर हो या खबरों की अच्छी समझ रखता हो.
जितेंद्र बजाज ने चंडीगढ़ पहुंचते ही मुझ पर अविश्वास जताना और मेरी जासूसी करना शुरू किया. अपना सिक्का जमाने के लिए संपादकीय बैठकों में मेरी हर बात को काटना और दूसरे साथियों के मेरे खिलाफ बोलने के लिए उकसाना उनका शगल था. कुछ साथी उनकी हां में हां भरते तो कुछ खामोश रहते. हद तो तब हो गई जब जितेंद्र बजाज मुझे जनसत्ता की भाषा-वर्तनी और परंपरा सिखाने-बताने लगे. कल्पना कीजिए कि जिस शख्स ने जनसत्ता की भाषा-वर्तनी और परंपराएं बनाने में अग्रणी भूमिका निभाई हो, उसे किसी अनगढ़ संपादक की नसीहतें सुनकर कैसा लगता होगा?
एक बार तो बजाज ने हद कर दी. एक बड़ी आतंकी घटना को सरकारी प्रचार करार देकर एक कालम की छोटी खबर के रूप में निपटाने का फरमान सुना दिया.. उस दिन प्रभाष जी चंडीगढ़ में ही थे. उन्होंने हस्तक्षेप करके वह खबर पहले पेज पर लीड के रूप में लगाने को कहा.
मुझे कभी-कभार जितेंद्र बजाज के अटपटे निर्देशों की अवहेलना भी करनी पड़ती क्योंकि मैं अपने अखबार को किसी की सनक का, भले ही वह मेरा वरिष्ठ क्यों न हो, शिकार नहीं बनने दे सकता था.
इसे बजाज ने प्रतिष्ठा का मुद्दा बना लिया और मेरे खिलाफ प्रभाष जी के कान भरने लगे. नतीजतन, ऐसी अनहोनी हुई जिसकी मैं क्या, जनसत्ता में मेरे योगदान को जानने वाला कोई भी व्यक्ति कल्पना भी नहीं कर सकता. यह अनहोनी थी-मार्च 1988 के मध्य में जनसत्ता में मेरी सेवाएं समाप्त करने का तीन माह का नोटिस मिलना. इस अवधि के लिए मैं दिल्ली में प्रभाष जी के साथ अटैच कर दिया गया. औपचारिक नोटिस के साथ ही प्रभाष जी का एक लंबा भावुकता भरा पत्र भी मिला जिसमें उन्होंने मुझे भरोसा तोड़ने का उलाहना दिया था.
पत्रकारिता की मेरी यात्रा के अब तक के पड़ावों में चंडीगढ़ सबसे कठिन और सबसे पीड़ाजनक रहा. इस पड़ाव में जो लोग मेरे साथ रहे उनमें से प्रदीप पंडित, राजीव मित्तल, हरिशचंद्र पंत, सुशील शर्मा, भूपेंद्र नागपाल, जगमोहन फुटेला, नीलम गुप्ता, विद्यासागर, ओमप्रकाश तपस, पवन बंसल, मुकेश भारद्वाज, मीनाक्षी त्रिखा, वंदना शर्मा, अशोक महाजन, विमल जैन, अजित दलाल, केशवानंद ममगाई, गणेश झा, रोशनलाल शर्मा, हरजिंदर, अशोक मिश्र, शारदा, आदि की गहरी-धुंधली यादें आज भी मेरे जेहन में अंकित हैं.
चंडीगढ़ में ट्रेनी के रूप में भर्ती हुए मुकेश भारद्वाज पिछले कई वर्षों से जनसत्ता, दिल्ली में कार्यकारी संपादक हैं. वे एक ही अखबार में 39 बरस काट चुके हैं. वहां के एक और साथी सर्वदमन सांगवान की बेटी सर्वप्रिया सांगवान ने एनडीटीवी और बीबीसी में शानदार पत्रकारिता की है.
नोटिस मिलने के साथ ही दिल्ली से अमित प्रकाश सिंह और सुधांश मिश्र को मेरी जगह काम करने भेज दिया गया. चूंकि अब चंडीगढ़ में मेरे लिए कोई काम नहीं बचा था इसलिए मैंने जितेंद्र बजाज को औपचारिक सूचना देकर चंडीगढ़ संस्करण के प्रसार क्षेत्र के प्रमुख केंद्रों का दौरा कार्यक्रम बनाया. इस दौरे में शिमला, पालमपुर, धर्मशाला, जम्मू, पठानकोट, अमृतसर और लुधियाना की फौरी यात्रा शामिल थी. इस यात्रा के बाद अप्रैल शुरू में दिल्ली प्रभाष जी को रिपोर्ट करना था.
यहां स्पष्ट कर दूं कि चंडीगढ़ में स्थानीय संपादक बनने की मेरी जरा भी इच्छा नहीं थी. मैं मानता था कि मैं उस पद के लिए परिपक्व नहीं हुआ हूं, साथ ही, इस पद पर बैठने वाले व्यक्ति के लिए तीन राज्यों-पंजाब, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश में अच्छी नेटवर्किंग जरूरी है. यह काम मेरे स्वभाव और रुचि के अनुरूप नहीं था. मेरे विचार से स्थानीय संपादक पद के लिए रमेश नैयर से संपर्क किया जाना चाहिए था. वे उन दिनों दैनिक ट्रिब्यून में सहायक संपादक थे. संकोचवश मैं प्रभाष जी यह बात कह नहीं पाया था.
पिछला भाग…
मेरी पत्रकारिता यात्रा (6) : यह नवभारत टाइम्स में मेरी दूसरी पारी का अंत भी था!


