अशोक कुमार पांडेय-
सब लोग गलगोटिया की उन महिला प्रोफेसर के पीछे पड़े हैं। वह इम्प्लॉइ हैं। प्रोफेसर कम्यूनिकेशन की हैं। बोलती बढ़िया हैं तो उनकी ड्यूटी लगा दी गई होगी स्टॉल पर, लेकिन बोला तो वही होगा जो बोलने के लिए कहा गया होगा। नौकरी थी उनकी संस्थान को बचाना, जैसे प्रवक्ता हर हाल में पार्टी को बचाता है। कोशिश की लेकिन संस्थान की बदमाशी इतनी बड़ी थी कि बचाना असंभव था तो ज़िम्मेदारी भी अपने सर ली और संस्थान ने पूरी क्रूरता से सब उनके सर डाल दिया।
असल सवाल तो बड़े-बड़े आलीशान कैम्पसों वाले निजी विश्वविद्यालयों का है। दिल्ली से दौलताबाद तक खुली शिक्षा की ये दुकानें यही तो कर रही हैं। शिक्षक नौकर हैं, सेल्समैन हैं। उत्तर पूर्व, बिहार, झारखंड जाकर एडमिशन के मौसम में स्टूडेंट फँसाने का टारगेट पूरा करना होता है। मालिक सरकारों से अच्छे सम्बन्ध करके माल बनाते हैं, काला धन ठिकाने लगाते हैं।
मना कर सकती थीं वह संस्थान को? निजी संस्थाओं का कोई कर्मचारी मालिक को मना कर सकता है? मना करने का मतलब है नौकरी से छुट्टी। क्या कर सकतीं थीं वह? कम्यूनिकेशन के प्रोफेसर को क्या पता होगा AI के बारे में? सेल्समैन बना दिया उन्हें जिन्होंने उन पर सवाल उठाइए।
सवाल उठाइए उन पर जिन्होंने इस यूनिवर्सिटी को बेस्ट प्राइवेट यूनिवर्सिटी का खिताब दिया। जिनके लिए इसने छात्रों को तख्ती लेकर भेज दिया। जिनके मंत्री इनके आयोजनों में जाकर सेंटर ऑफ एक्सलेंस बता आए थे। किसी का मजाक उड़े तो लिहो-लिहो करने सब पहुँच जाते हैं, जो ज़िम्मेदार हैं उनसे सवाल पूछने में सबको डर लगता है।
मुकेश कुमार-
इंडिया एआई सम्मिट प्रधानमंत्री मोदी और उनकी सरकार को उल्टा पड़ गया है। कहाँ तो वे इसे अपनी ब्रांडिंग और छवि चमकाने के लिए इस्तेमाल करना चाहते थे और कहाँ अब चारों तरफ़ उनकी छीछालेदर हो रही है। हर तरफ उनकी जगहँसाई हो रही है, बेइज्जती हो रही है।
सबसे ज़्यादा फ़ज़ीहत तो अंतरराष्ट्रीय जगत में हो रही है जहाँ मीडिया बता रहा है कि सम्मिट में घनघोर अव्यवस्था है और फ़र्ज़ीवाड़ा भी। गलगोटियास यूनिवर्सिटी के रोबोडॉग बनाने के दावे ने तो सरकार की पोल ही खोलकर रख दी है।
ख़ास तौर पर इसलिए भी कि खुद आईटी मिनिस्टर अश्विनी वैष्णव ने इससे जुड़े वीडियो को ट्वीट किया और फिर उसे उन्हें डिलीट करना पड़ गया। इसका मतलब साफ़ था कि सरकारी तंत्र ने सम्मिट के भागीदारों की जाँच-पड़ताल तक नहीं की थी या फिर चापलूसों को खुली छूट दे दी गई।
इसके पहले मोदी के फोटो शूट से मची अफरा तफरी, अनियंत्रित भीड़ और ज़रूरी सुविधाओं के अभाव ने भी साबित कर दिया था कि सरकार ने किस तरह से इस बड़े सम्मेलन को आयोजित करने में लापरवाही बरती है। बिल गेट्स के कीनोट स्पीकर के तौर पर हिस्सा लेने को लेकर भी विवाद चल ही रहा है।
लेकिन इससे एक बड़ा सवाल ये भी उठ गया है कि मोदी सरकार लगातार क्यों पिट रही है। ऑपरेशन सिंदूर, अमेरिका से ट्रेड डील और एप्स्टीन फाइल्स में हरदीप पुरी विवाद के बाद मोदी सरकार अब AI Summit में फँस गई है।
ऐसे में ये प्रश्न उठना लाज़िमी है कि आख़िर मोदी हर मामले में फेल क्यों हो रहे हैं? क्या उनका उल्टा समय शुरू हो चुका है?
विनोद भारद्वाज-
एआई समिट: गलती किसकी, सजा किसे?…. दिल्ली में आयोजित एआई समिट में गलगोटिया विश्वविद्यालय से जुड़ा विवाद अब केवल एक संस्थान या एक प्रतिनिधि तक सीमित नहीं रह गया। रोबोटिक डॉग और ड्रोन को लेकर उठे सवालों ने पहले एक शिक्षिका को विवाद के केंद्र में ला खड़ा किया, फिर संस्थान की तैयारियों पर प्रश्न उठे, और यह मामला देश की तकनीकी विश्वसनीयता तक पहुंच गया।
संस्थान की ओर से यह कहा जा रहा है कि मंच पर मौजूद शिक्षिका न तो एआई विशेषज्ञ थीं और न ही मीडिया से बात करने के लिए अधिकृत थीं। लेकिन यह सफाई विवाद को शांत करने के बजाय और गंभीर सवाल खड़े करती है। यदि वह एआई विशेषज्ञ नहीं थीं, तो उन्हें ऐसे मंच पर प्रतिनिधित्व के लिए क्यों भेजा गया? और यदि वह मीडिया से बात करने के लिए अधिकृत नहीं थीं, तो क्या संस्थान को यह नहीं मालूम था कि सार्वजनिक प्रदर्शनी में उपस्थित प्रतिनिधि से पत्रकार बातचीत करेंगे?
किसी भी गंभीर शैक्षणिक संस्थान में यह स्पष्ट होता है कि कौन विशेषज्ञ है, कौन मीडिया से बात करेगा और कौन-सा दावा किस आधार पर किया जाएगा। यदि यह सब तय नहीं था, तो यह किसी एक व्यक्ति की चूक नहीं, बल्कि संस्थागत तैयारी की कमी है।
पिछले कुछ वर्षों में निजी विश्वविद्यालयों में प्रदर्शन-प्रधान संस्कृति का विस्तार हुआ है। ब्रांडिंग और प्रवेश अभियानों की प्रतिस्पर्धा में कई संस्थान चमकदार प्रस्तुतियों और बड़े दावों को प्राथमिकता देने लगे हैं। शोध की जटिल और समय लेने वाली प्रक्रिया की तुलना में बाजार में उपलब्ध तकनीक का प्रदर्शन आसान रास्ता बन जाता है। लेकिन ऐसे रास्ते की सबसे बड़ी कीमत विश्वसनीयता को चुकानी पड़ती है।
इस पूरे प्रकरण में सबसे चिंताजनक प्रवृत्ति यह दिखाई देती है कि विवाद उठते ही जिम्मेदारी एक प्रतिनिधि पर केंद्रित कर दी गई। जब तक मंच पर प्रदर्शन को उपलब्धि की तरह पेश किया जा रहा था, वह संस्थान की प्रतिष्ठा का हिस्सा था। जैसे ही सवाल उठे, कहा जाने लगा कि प्रतिनिधि अधिकृत नहीं थीं। यह तर्क जिम्मेदारी तय करने की जगह उससे बचने का प्रयास अधिक प्रतीत होता है।
इस विवाद का एक और पक्ष है, जो अब अधिक गंभीर दिखाई देता है। मंच पर प्रदर्शित रोबोटिक डॉग कुछ ही समय में मीडिया रिपोर्टों और सरकारी प्रतिनिधियों के सोशल मीडिया मंचों तक “भारतीय नवाचार” के रूप में पहुंच गया। यह प्रश्न स्वाभाविक है कि बिना तथ्य-जांच के ऐसा प्रचार कैसे हो गया।
अंतरराष्ट्रीय स्तर के मंच पर प्रदर्शित किसी तकनीक के बारे में यह सुनिश्चित करना कि वह वास्तव में स्वदेशी नवाचार है या बाजार में उपलब्ध उत्पाद, कोई जटिल प्रक्रिया नहीं है। यदि यह सत्यापन पहले ही कर लिया जाता, तो न तो यह विवाद पैदा होता और न ही देश की साख पर प्रश्न उठते।
यहीं यह प्रकरण एक संस्थान की चूक से आगे बढ़कर प्रणालीगत विफलता का संकेत देने लगता है। जब प्रचार की गति तथ्य-जांच से तेज हो जाती है, तो छवि निर्माण तो तुरंत हो सकता है, पर विश्वसनीयता लंबे समय तक क्षतिग्रस्त रहती है। एआई जैसे संवेदनशील क्षेत्र में यह जोखिम और भी गंभीर है, क्योंकि यहां भरोसा ही सबसे बड़ी पूंजी है।
इस घटना ने यह भी स्पष्ट किया है कि शिक्षा संस्थानों में शिक्षक की भूमिका बदल रही है। अनेक निजी विश्वविद्यालयों में शिक्षक अब केवल कक्षा और प्रयोगशाला तक सीमित नहीं हैं। उनसे संस्थान का चेहरा बनने, प्रदर्शनों में भाग लेने और प्रचार गतिविधियों का हिस्सा बनने की अपेक्षा की जाती है। नौकरी की असुरक्षा और प्रबंधन-केंद्रित व्यवस्था में उनके पास संस्थागत निर्देशों से अलग चलने की गुंजाइश भी कम होती है।
ऐसे में विवाद की स्थिति में किसी एक प्रतिनिधि को केंद्र में रखकर पूरी जिम्मेदारी तय करना न केवल अन्यायपूर्ण है, बल्कि मूल समस्या से ध्यान हटाने का तरीका भी है। यदि कोई संस्थान यह कहता है कि उसका प्रतिनिधि अधिकृत नहीं था, तो यह उसके अपने प्रशासनिक ढांचे और समन्वय की कमी का संकेत है।
यह घटना केवल एक तकनीकी दावे की भूल नहीं है। यह उस व्यापक प्रवृत्ति की ओर संकेत करती है, जिसमें शिक्षा संस्थान ज्ञान और शोध की बजाय प्रदर्शन और प्रचार को प्राथमिकता देने लगे हैं। यदि विश्वविद्यालयों में शोध की जगह शोकेस और शिक्षक की जगह प्रतिनिधि खड़ा किया जाएगा, तो ऐसी घटनाएं अपवाद नहीं रहेंगी।
एआई समिट का यह प्रकरण इसलिए केवल एक संस्थान या एक शिक्षिका का मामला नहीं है। यह उस व्यवस्था की परीक्षा है, जिसमें उपलब्धि का दावा सामूहिक होता है, लेकिन गलती की जिम्मेदारी व्यक्तिगत बना दी जाती है।
और इससे भी आगे, यह उस राष्ट्रीय दृष्टिकोण का प्रश्न है, जिसमें तकनीकी उपलब्धियों का प्रचार तो तेज होता है, पर उनके सत्यापन की प्रक्रिया कमजोर रहती है। यदि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर देश की तकनीकी साख को बनाए रखना है, तो प्रचार से पहले तथ्य-जांच और संस्थागत जवाबदेही को प्राथमिकता देनी ही होगी।
अन्यथा, जिस मंच पर देश अपनी क्षमता दिखाने जाता है, वही मंच उसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठाने का कारण बन सकता है।
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