संजय कुमार सिंह
वैसे तो आज एआई सम्मेलन और गलगोटिया यूनिवर्सिटी का शोर है लेकिन हिन्दुस्तान टाइम्स की सिंगल कॉलम की खबर ने बताया कि सरकार अखबारों को पूरी तरह प्रचारक बनाने पर आमादा है। हेडलाइन मैनेजमेंट के तहत सरकार अनुकूल खबरें देती रहती है और मैं पीटीआई को इंटरव्यू देने के पहले और फिर एएनआई को इंटरव्यू देने के दो चरणों की बात कर चुका हूं। बेशक यह सब एआई सम्मेलन के दौरान अनुकूल खबरें देने के उद्देश्य से किया गया लगता है। अब पता लग रहा है कि खबरों की इस भीड़ में सरकार ऐसी व्यवस्था करने की कोशिश कर रही है कि जिससे उसे (और भविष्य की सरकारों को भी) अपमानित या शर्मसार करने वाली खबरें छप ही नहीं सकें। हिन्दुस्तान टाइम्स में पहले पन्ने पर छपी सिंगल कॉलम की खबर के अनुसार, मीडिया को सूचना लीक करने वाले सरकारी अधिकारी, आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम के तहत कार्रवाई के भागीदार हो सकते हैं। आप जानते हैं कि भ्रष्ट घोषित और प्रचारित कांग्रेस की सरकार के बनाए आरटीआई कानून को, ‘ना खाउंगा ना खाने दूंगा’ के प्रचार के साथ लगभग खत्म कर दिया गया है। यही नहीं, भ्रष्टाचार दूर करने का प्रचार करके सत्ता पाए थे लेकिन पीएम केयर्स जैसी चंदा बटोरू और कमाऊ व्यवस्था की और इसे आरटीआई से मुक्त बना दिया। आज की इस गंभीर और चिन्ताजनक खबर के मद्देनजर यह बताना जरूरी कि इस सरकार ने अपनी सुरक्षा में पुराने कानून को तो लागू नहीं होने दिया है नए कानून भी बना रही है।
आप जानते हैं कि देश में चुनाव का खर्च भ्रष्टाचार के कारणों में एक महत्वपूर्ण कारण माना जाता रहा है। नरेन्द्र मोदी की सरकार ने इसे व्यवस्थित (और पारदर्शी) बनाने का दावा किया था और इलेक्टोरल बांड योजना लेकर आई थी। पहले की सरकार में काले धन की समस्या को प्रचारित किया और सरकार की नीयत पर भी आरोप लगाए। काला धन खत्म करने के प्रचार में नोटबंदी की और डिजिटल इंडिया शुरू किया। लेकिन इसका बहुत फायदा नहीं हुआ है और छोटे भ्रष्टाचार भले खत्म हो गए हों बड़े वाले नहीं रुके हैं। इलेक्टोरल बांड से चुनावी चंदा लेने के सरकारी उपाय को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया फिर भी भाजपा को सबसे ज्यादा चंदा मिल रहा है। दूसरी ओर, डिजिटल लूट और ठगी के पैसे कहां जहां रहे हैं – पता नहीं चल रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई जांच के आदेश दिए है। सरकार ने कुछ खास नहीं किया और जो किया उसे ही आप खास मान लें तो वे प्रभावी नहीं रहे। ऐसी सरकार और उसके लोगों की अपनी ईमानदारी भी शक के घेरे में है। और चुनाव लड़ने वालों की ईमानदारी सुनिश्चित करने की कोशिश में ही चुनाव लड़ने वालों के लिए शपथपत्र देना अनिवार्य किया गया है। अब ये शपथपत्र गलत हों, झूठे हों या इनकी जांच ही नहीं हो तो इसका कोई मतलब नहीं रह जाता है। मोदी सरकार से पहले ऐसा होता हो या नहीं, वह अब नहीं होने का आधार नहीं हो सकता है लेकिन डिग्री और आय से संबंधित प्रधानमंत्री के शपथपत्र की जांच या पुष्टि नहीं हुई है। निशिंकात दुबे की पत्नी की आय बढ़ने से संबंधित मामले की जांच शिकायत करने पर भी नहीं हुई और लोकपाल ने जो कहा उसमें यह भी है कि सांसद की पत्नी लोकसेवक नहीं हैं और उनकी शिकायत वे नहीं देख सकते। सबको पता है कि नेताजी अपनी कमाई पत्नी ही नहीं, नौकरों के नाम पर भी रखते थे और उसके लिए बेनामी संपत्ति और न जाने कैसे-कैसे कितने कानून हैं और सबके तहत कार्रवाई होती रही है। सिर्फ इस सरकार के प्रिय पात्रों की जांच नहीं होती है। हालत ऐसी हो गई कि भारतीय जनता पार्टी को वाशिंग मशीन पार्टी भी कहा जाता है जो तमाम आरोपियों को धोकर अपने उपयोग लायक बना लेती है। परोक्ष रूप से यह ब्लैक मेलिंग हैं और अब तो आरोप है कि प्रधानमंत्री ही ब्लैकमेल के शिकार हैं और कंप्रोमाइज्ड हैं। बाकी झूठ को गंभीरता से नहीं लेने का नतीजा हम कल गलगोटिया यूनिवर्सिटी के मामले में देख चुके हैं।

इसके बावजूद प्रधानमंत्री ने अपनी शिक्षा से संबंधित जो शपथ पत्र दिया है उससे संबंधित शंका समाधान की कोशिशों पर कार्रवाई नहीं हुई और संबंधित अधिकारियों (संवैधानिक संस्थाओं भी कह सकते हैं) ने अपने स्तर पर इनकी जांच कर पुष्टि नहीं की है। समय निकलने के बाद जांच का कोई मतलब नहीं है क्योंकि तब कार्रवाई में सजा चाहे जो हो, पद से हटाने का समय निकल गया रहेगा। आइए देखें डिग्री के मामले में कैसे कानून का अनुपालन नहीं हुआ या जो कानून है उसका उपयोग नहीं हुआ। आपको पता है कि दिसंबर 2016 में एक आरटीआई याचिका दायर कर 1978 में दिल्ली विश्वविद्यालय से बीए करने वाले छात्रों के रिकॉर्ड का निरीक्षण करने की मांग की गई थी। यह वह वर्ष था जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इसी परीक्षा में उत्तीर्ण होने का दावा किया है। केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) ने 2016 में आदेश दिया था कि यूनिवर्सिटी छात्रों के 1978 के बैच के रिकॉर्ड का निरीक्षण करने दे और प्रमाणित प्रतियां उपलब्ध कराए, जिसमें नाम, रोल नंबर और प्राप्त अंक शामिल हों। इस आदेश का तात्पर्य था कि एक सार्वजनिक व्यक्ति की शैक्षणिक योग्यताओं से जुड़ी जानकारी सार्वजनिक हित में आ सकती है और आरटीआई के तहत दी जानी चाहिए। दिल्ली विश्वविद्यालय और बाद में सरकार की ओर से न्यायालय में जो तर्क दिए गए, उनमें दिल्ली विश्वविद्यालय ने कहा कि यह जानकारी “तीसरे पक्ष की निजी सूचना” है और इसे आरटीआई के तहत सार्वजनिक नहीं किया जा सकता। जाहिर है, ‘तीसरा पक्ष’ अदालत में नहीं था और फैसला उसके पक्ष में हुआ। इस आधार पर सीआईसी के आदेश को चुनौती दी गई कि किसी की शिक्षा-संबंधी जानकारी केवल “जिज्ञासा” को संतुष्ट करने के लिए नहीं दी जानी चाहिए। अगर इसे सही भी मान लिया जाए तो मुद्दा यह जानना था कि प्रधानमंत्री के साथ किसी और ने एंटायर पॉलिटिकल साइंस की पढ़ाई की है या नहीं। इसका पता तीसरे पक्ष की डिग्री से तो लग ही सकता था विश्वविद्यालय भी कह सकता था लेकिन उसने ऐसा कुछ कहा या नहीं पता नहीं है।
याचिकाकर्ताओं के वकीलों के अनुसार आरटीआई का लक्ष्य सार्वजनिक लाभ से जुड़ी सूचना देना है, न कि बस किसी की “जिज्ञासा” बुझाना। जाहिर है यह सार्वजनिक लाभ का मामला था और जिज्ञासा यह थी कि प्रधानमंत्री का शपथपत्र सही है। इसकी पुष्टि से यह सार्वजनिक हित जुड़ा था कि झूठा शपथपत्र देने वाला प्रधानमंत्री तो नहीं बन गया है। लेकिन उसकी जांच ही नहीं हुई, पुष्टि तो नहीं ही हुई। दिल्ली विश्वविद्यालय और सॉलिसिटर जनरल की दलील यही थी कि बिना प्रमुख सार्वजनिक हित के इस तरह की मांग स्वीकार्य नहीं है। जो भी हो, कानून की जो भी व्याख्या हुई, डिग्री की ना पुष्टि हुई ना खंडन हुआ। क्या यह सामान्य है? मुझे लगता है कि होना ही चाहिए और कानून सबके लिए बराबर है। अगर किसी आम आदमी को यह रियायत नहीं मिलेगी तो खास लोगों को क्यों मिले लेकिन कई खास लोगों को यह रियायत मिली है। अब कहा जा रहा है कि गलगोटिया विश्वविद्यालय वालों ने जो किया वह झूठ बोलने वालों की सरकार के कारण किया। बचाने की कोशिश में लगे मंत्री भी पकड़े गए और उनके लिए पीआईबी ने फैक्ट चेक किया और एक्स पर उनकी पोस्ट को फेक करार दिया। तथ्य यह है कि उनकी पोस्ट को चाइना पल्स ने शेयर कर कहा था कि भारत के मंत्री भी चीनी रोबोट को गलगोटिया का बता रहे हैं। बताने को इलेक्ट्रॉनिक्स मंत्रालय ने भी बताया था। मुझे नहीं लगता है कि केंद्रीय मंत्री या मंत्रालयों को गलगोटिया विश्वविद्यालय की इस उपलब्धि का प्रचार इतनी जल्दी करने की कोई जरूरत थी और यह सोच-समझकर किसी योजना के तहत नहीं किया गया था, तब भी हो गया तो सामान्य है। जो भी हो, मीडिया का काम था इसकी रिपोर्ट करना पर अब वह सब होता नहीं है और सरकार उसे नख-दंत विहीन करने में लगी है।
इस तरह, केंद्र सरकार अगर एक निजी विश्वविद्यालय की ‘उपलब्धि’ का प्रचार कर रही थी तो प्रधानमंत्री की डिग्री और चुनाव लड़ने के लिए दाखिल उनके शपथ पत्र की जांच और पुष्टि के लिए किए जा रहे प्रयासों तथा जिज्ञासाओं के क्रम में दिल्ली हाईकोर्ट ने आरटीआई कानून के तहत दिए गए आदेश को पलट दिया। मीडिया उसपर चुप्पी साधे रहा और यह वैसे ही था जैसे उपराष्ट्रपति के इस्तीफे पर आरटीआई का जवाब चौंकाने वाला था कि वे राष्ट्रपति से मिले ही नहीं या मिलने का रिकार्ड नहीं है और उपराष्ट्रपति का इस्तीफा स्वीकार किए जाने का कोई रिकार्ड नहीं है। अधिसूचना पर भरोसा किया जाए। और हमने कर लिया। लेकिन गलगोटिया हो गया तो सारी बातें याद आ रही हैं पर मीडिया में खबर नहीं है। खबर वह भी नहीं है जो हिन्दुस्तान टाइम्स में है। सीबीआई के जज बीएच लोया की संदिग्ध मौत की जांच नहीं होने की सूचना के बाद या बावजूद, दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा था कि शिक्षा से संबंधित विवरण में “कोई स्पष्ट सार्वजनिक हित” नहीं है जो जानकारी का खुलासा करने की मांग को आरटीआई के दायरे में लाए। अदालत ने यह भी कहा था कि ऐसी जानकारी व्यक्तिगत है और इसके खुलासे से गोपनीयता के अधिकार का उल्लंघन होगा। इस निर्णय का प्रभाव यह हुआ कि दिल्ली विश्वविद्यालय को पीएम की डिग्री का रिकॉर्ड आरटीआई के तहत सार्वजनिक करने की जरूरत नहीं है। चुनाव आयोग चूंकि प्रधानमंत्री और सरकार का ही बनाया हुआ है इसलिए उसे भी शपथपत्र की सत्यता की पुष्टि से मतलब नहीं है वह लोगों की नागरिकता की पुष्टि करते-करते लॉजिकल डेसक्रिपेंसी सुधारने के नाम पर लाखों लोगों को तबाह कर रहा है और सुप्रीम कोर्ट उसे उसका अधिकार मान रहा है। यह सब मेरी चिन्ता का विषय नहीं है लेकिन मीडिया का होना चाहिए था जो कभी नहीं रहा और इसलिए गलगोटिया हुआ। (जारी)
आगे पढ़ें आज के अखबार (दो) : हिन्दुस्तान टाइम्स की खबर को मानें तो सरकार अखबारों को नख-दंत विहीन करके मानेगी।
लिंक यह रहा – https://www.bhadas4media.com/hindustan-times-kee-khabar-ko-maane-to-sarkaar/
लेखक संजय कुमार सिंह से [email protected] पर संपर्क किया जा सकता है।


