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आज के अखबार (दो) : हिन्दुस्तान टाइम्स की खबर को मानें तो सरकार अखबारों को नख-दंत विहीन कर देगी

संजय कुमार सिंह

गलगोटिया होने के बाद भी अमर उजाला ने टॉप पर बैनर शीर्षक लगाया है, एआई महाकुम्भ के जरिए भारत ने दिखाई कूटनीतिक बुद्धिमत्ता। एक खबर का फ्लैग शीर्षक का अंश है, समुद्र के नीचे बिछेगी केबल। समझ में आ गया कि यह अनुवाद की गड़बड़ी है और समुद्र में बिछेगी केबल से भी बात समझ में आती। अंग्रेजी में यह सब सी केबल है और बस बताना जरूरी था कि मामला समुद्र में केबल बिछाने या डालने जैसा सीधा मामला नहीं है इसलिए सब सी हो गया, समुद्र के नीचे – जैसे ऊपर भी बिछ सकती है या अभी तक बिछती रही है। मुझे लगता है कि 2014 के बाद शिक्षित लोगों का ज्ञान गलगोटिया वाली नेहा सिंह जैसा ही होता है। सब कुछ हो जाने के बाद संस्थान कहता है, …. पवेलियन में मौजूद हमारी एक प्रतिनिधि के पास गलत जानकारी थी। उसे प्रोडक्ट की टेक्निकल शुरुआत के बारे में पता नहीं था और कैमरे पर आने के जोश में, उसने गलत जानकारी दी, जबकि उसे प्रेस से बात करने का अधिकार नहीं था। …. इस इनोवेशन को गलत तरीके से दिखाने का कोई संस्थानिक इरादा नहीं था। इसके बावजूद आज देशबन्धु की लीड का शीर्षक है, गलगोटिया यूनिवर्सिटी पर गिरी गाज। इंडियन एक्सप्रेस और टाइम्स ऑफ इंडिया में खबर है। हिन्दुस्तान टाइम्स ने पहले पन्ने की खबर और फोटो से बताया है कि वीआईपी के फेर में कई सड़कें बंद रहीं और इस कारण लोग घंटों सड़कों पर फंसे रहे। अब ऐसी खबरें भी नहीं छपती हैं। आज ज्यादातर अखबारों की लीड सरकारी प्रचार ही है और नवोदय टाइम्स की लीड का शीर्षक है, अगला एआई विश्व गुरु भारत से। हालांकि, यह सुंदर पिचाई का अनुमान है। दि एशियन एज की लीड का शीर्षक है, मोदी ने सात द्विपक्षीय वार्ता की। एआई मीट की प्लीनरी का उद्घाटन आज करेंगे। द टेलीग्राफ ने गलगोटिया की खबर गलगोटिया का नाम लिए बगैर छापा है। हालांकि, फोटो में गलगोटिया यूनिवर्सिटी लिखा दिख रहा है। शीर्षक हिन्दी में कुछ इस तरह हो सकता है, रोबोट विवाद के बाद विश्वविद्यालय को समिट से खदेड़ा गया। मुख्य शीर्षक है, भारतीय उत्कृष्ट (चीन में बनी)। यह सरकार के मेड इन इंडिया (भारत में निर्मित) अभियान और प्रचार पर तंज है तथा अंग्रेजी में मेड इन चाइना ही लिखा है। संदर्भ जानने-समझने वालों को पसंद आएगा और अब जब एआई भी शीर्षक बना देता है तो लगता है इसमें कुछ बुद्धिमत्ता है चाहे वह मानवीय हो या कृत्रिम।

आज सभी अखबारों की लीड अलग है। द हिन्दू की लीड से पता चलता है कि सरकार ने नागरिक उड्डयन आवश्यकताओं में संशोधन का प्रस्ताव किया है। इससे हवाई जहाज में अनुचित और असभ्य व्यवहार करने वाले यात्रियों को विमान सेवा ही प्रतिबंधित कर सकेंगी तथा जो उचित समझो करो की छूट से सरकार का काम आसान हो जाएगा और शायद उड्डयन कंपनियों का भी लेकिन एक महीने के प्रतिबंध से तो वही डरेंगे जो किन्ही कारणों से नियमति उड़ाने के लिए मजबूर हैं। जाहिर है ऐसे लोग बहुत कम होंगे और संभव है यही लोग अनुचित और असभ्य व्यवहार करते हों। आज के अखबारों में हेडलाइन मैनेजमेंट का असर इतना ज्यादा है कि खबरों की चर्चा से बेहतर होगा हिन्दुस्तान टाइम्स की खबर बताना। इसलिए पूरी खबर का अनुवाद कर दिया और उसे आप आगे पढ़ सकते हैं। यह अनुवाद गूगल से किया गया है लेकिन इसका संपादन मैंने किया है ताकि पढ़ते वक्त प्रवाह बना रहे। नई दिल्ली डेटलाइन से सुनेत्रा चौधरी की खबर का शीर्षक है, मीडिया को जानकारी लीक करने वाले सरकारी अधिकारियों पर आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम के तहत कार्रवाई हो सकती है। खबर इस प्रकार है – केंद्र सरकार ने अधिकारियों को चेतावनी दी है कि मीडिया के साथ क्लासिफाइड सेंसिटिव (विशेष संवेदनशील) जानकारी शेयर करने पर ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट (ओएसए) के तहत कार्रवाई हो सकती है। पिछले महीने, गृह मंत्रालय ने सभी मंत्रालयों और विभागों के सचिवों को एक नोट भेजा। इसके जरिए 28 साल पहले के एक सर्कुलर को अपडेट किया गया है। इसमें ओएसए के तहत कार्रवाई की धमकी भी शामिल थी। मामले से परिचित लोगों ने हिन्दुस्तान टाइम्स को नोट के कंटेंट के बारे में बताया। सर्कुलर में बताया गया है कि यह “अनधिकृत या अनचाहे तत्वों को संवेदनशील जानकारी लीक करने की घटनाओं में वृद्धि के कारण है। इससे देश के हित और सुरक्षा को खतरा होने के साथ-साथ सरकार के लिए शर्मिंदगी का कारण बनने की संभावना थी।”

सर्कुलर में “मीडिया (वालों) के साथ किसी भी अनाधिकार बातचीत” को भी टारगेट किया गया है और कहा गया है कि ऐसा किया जाए तो “उचित कार्रवाई” की जानी चाहिए। स्पष्ट है कि यह नियम अधिकृत प्रवक्ताओं पर लागू नहीं होता है। अपने अधिकृत कार्य के दौरान उन्हें जो जानकारी होती है और दस्तावेज मिलते हैं, उन्हें सुरक्षित रखना, “सभी सरकारी कर्मचारियों का कर्तव्य है।” ऊपर बताए गए लोगों में से एक ने नाम न बताने की शर्त पर कहा, “मीडिया के साथ बिना इजाज़त किसी भी तरह के संचार (कम्युनिकेश के लिए कंप्यूटर ने बातचीत लिखा है लेकिन मामला संचार का है और ईमेल से स्कैन कॉपी भेजने पर भी कार्रवाई होगी भले यह बिना बातचीत कर दी जाए और इसका मकसद डराने के साथ-साथ अथाह अधिकार हासिल कर लेना है ताकि किसी को कभी भी किसी तरह फंसाया जा सके) पर उपयुक्त कार्रवाई होनी चाहिए। यही नहीं, कोई भी क्लासिफाइड / सेंसिटिव जानकारी शेयर करने पर ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट के तहत कड़ी कार्रवाई करने पर विचार किया जाना चाहिए।” हिन्दुस्तान टाइम्स को पता चला है कि तीन पेज का यह सर्कुलर अर्धसैनिक बलों के प्रमुख को भी भेजा गया था। हिन्दुस्तान टाइम्स ने पीआईबी और गृह मंत्रालय के प्रवक्ता से बात करने की कोशिश की, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। इस नोट से ब्यूरोक्रेटिक सर्कल में भृकुटियां तन गई हैं क्योंकि यह दिसंबर 1998 के ओरिजिनल वर्जन से अलग है। वह मोटे तौर पर एक एडवाइज़री जैसा था और उसमें ओएसए का कोई ज़िक्र नहीं था। 18 साल के अंतर पर, इनमें जो बात कॉमन है, वह है सरकार के अंदर से हाल ही में हुई लीक का ज़िक्र। यह बहुत साफ़ नहीं है कि किस खास लीक की वजह से यह नोट आया, जिसे जनवरी के दूसरे हफ़्ते में सर्कुलेट किया गया था।

सर्कुलर में कहा गया है, “यह दोहराया जाता है कि सरकारी कर्मचारी की तरफ से ऐसी गलती केंद्रीय सिविल सेवा (आचरण) नियम, 1964 के नियम II का साफ़ उल्लंघन है।” ऊपर बताए गए व्यक्ति के अनुसार, सेंट्रल सिविल सर्विसेज़ कंडक्ट रूल्स के रूल II में कहा गया है: “कोई भी सरकारी कर्मचारी, सरकार के किसी आम या खास आदेश के अलावा या उसे सौंपे गए काम को अच्छी नीयत से पूरा करने के अलावा, सीधे या परोक्ष तरीके से, कोई भी ऑफिशियल डॉक्यूमेंट या उसका कोई हिस्सा या जानकारी किसी ऐसे सरकारी कर्मचारी या किसी ऐसे दूसरे व्यक्ति को नहीं देगा जिसे वह ऐसा डॉक्यूमेंट या जानकारी देने के लिए अधिकृत नहीं है। ऊपर जिन लोगों का ज़िक्र किया गया है, उनके मुताबिक, सरकारी नोट में अधिकारियों से कहा गया है कि वे पत्रकारों के किसी भी सवाल को प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो (पीआईबी) को भेजें या जवाब देने से पहले सेक्रेटरी की इजाज़त लें। इसमें यह भी कहा गया है कि अधिकारी मीडिया के साथ बातचीत के लिए सरकारी ऑफिस में एक खास जगह तय कर सकते हैं। नोट के कंटेंट से वाकिफ एक दूसरे व्यक्ति, ने भी अपना नाम न बताने की शर्त पर कहा कि यह मीडिया की भूमिका को मानता है और मानता है कि “सरकार के कामकाज के बारे में सोच बनाने में इसकी अहम भूमिका है, लेकिन यह भी चेतावनी देता है कि “अनअधिकृत सरकारी कर्मचारियों द्वारा कई मीडिया प्लेटफॉर्म पर जानकारी/गलत जानकारी को तेज़ी से और बिना वेरिफ़ाई किए फैलाने से रोकने की ज़रूरत है।” (इस सरकार ने पीआईबी को यह नया काम दे रखा है जो चुनाव आयोग से लेकर गलगोटिया तक के मामले मे सरकारी अधिकारी और सरकार के काम का बचाव करता रहता है।) एचटी ने शनिवार को बताया था कि शुक्रवार की कैबिनेट मीटिंग में इस बात पर चर्चा हुई कि “सत्ता में बैठे लोगों के लिए किताबें या यादें लिखने से पहले 20 साल का कूलिंग ऑफ पीरियड हो सकता है, जो पूर्व आर्मी चीफ जनरल मनोज नरवणे की अप्रकाशित यादें ‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ से पैदा हुए विवाद का नतीजा हो सकता है। अगस्त 2020 में पूर्वी लद्दाख में भारत-चीन सैनिक टकराव के दौरान सबसे नाजुक पलों में से एक पर उनके दावों ने पार्लियामेंट के बजट सेशन के पहले आधे हिस्से में हंगामा मचा दिया था।

पहली किस्त पढ़ें – आज के अखबार : नहीं बता रहे कि गलगोटिया क्यों हुआ और मंत्री व मंत्रालय चीनी रोबोट के प्रचारक बने बैठे थे। लिंक यह रहा – https://www.bhadas4media.com/nahee-bata-rahe-ki-galgotiya-kyon-hua/  

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

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