Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

प्रिंट

आज के अखबार : सरकार के खिलाफ आमरण अनशन की रिपोर्टिंग में ‘एंटायर पॉलिटिकल साइंस’ घुसा हुआ है

Hindi newspaper front page with a bold headline about a large fraud, showing a car at a petrol pump with an E20 sign

किसी भी तरह की प्रतिकूल खबर और लगभग हर विरोध को साजिश कह देने वाली सरकार के खिलाफ सोनम वांगचुक के आमरण अनशन की खबर नहीं के बराबर छपी। हालत खराब होने पर अनशन वापस लेने की अपील अनसुनी करके सहयोग देने और 20 जुलाई को प्रस्तावित ‘संसद चलो’ मार्च में देश के छात्रों, युवाओं और आम नागरिकों से बड़ी संख्या में पहुंचने की उनकी अपील आज पहले पन्ने पर लगभग नहीं है।

संजय कुमार सिंह

आज की खबरों में सरकार के खिलाफ आमरण अनशन के बाद के 19 दिनों का हिसाब नहीं है। हो भी नहीं सकता था। खबरें ऐसे छपी हैं जैसे सोनम वांगचुक से कहा जा रहा हो – सोनम जी, राजनीति समझिए, मामला एंटायर पॉलिटिकल साइंस का है। अच्छे दिन चल रहे हैं। पहले के समय से कनफूजियाना महंगा पड़ सकता है। इसी तरह ई10 के बाद जबरन जल्दबाजी में ई20 पेट्रोल बेचने तथा उससे गाड़ियों में खराबी की शिकायतें नहीं मानने, ई-10 या शुद्ध पेट्रोल सही कीमत पर उपलब्ध कराने की मांग पर भी ध्यान नहीं देने वाली सरकार की मनमानी पर रिपोर्ट नहीं के बराबर होती है। इस मनमानी के खिलाफ उपभोक्ता अदालत के फैसले को भी अखबारों ने प्रमुखता नहीं दी है। आज अमर उजाला में पहले पन्ने के बॉटम के अनुसार, छत्तीसगढ़ की उपभोक्ता अदालत ने कार निर्माता कंपनी मारुति और उसके डीलर को आदेश दिया है कि ग्राहक को दूसरी कार दे या रजिस्ट्रेशन, बीमा राशि के अलावा मानसिक उत्पीड़न के लिए एक लाख रुपए मिलाकर 22 लाख रुपए दे। निश्चित रूप से यह बड़ा मामला है पर आज यह खबर भी नहीं के बराबर छपी है। सरकार का काम और उसका नतीजा बताने वाली एक खबर दैनिक भास्कर में भी है। इसके मुताबिक दो साल में 100 से ज्यादा इस्तीफों के बाद अब इसरो में इस्तीफों का फैसला दिल्ली से होगा। ई-20 के चक्कर में गाड़ियां न बिकें, कोई दुकान समेट ले तो कौन रोक सकता है। इसी तरह होर्मुज से गुजरने वाले जहाज पर भारतीय नाविकों को न रखने का सख्त आदेश दिया गया है। मतलब करे कोई भरे कोई।

Front page of a Hindi newspaper with a large headline stating that more than 100 people left their jobs in two years, with a subheading and a boxed section of text beneath.
Screenshot 2026 07 17 DB

सोनम वांगचुक की खबर आज हिन्दुस्तान टाइम्स में सिंगल कॉलम की है, हाईकोर्ट ने सरकार को निर्देश दिया कि वांगचुक के स्वास्थ्य की निगरानी रोज की जाए। टाइम्स ऑफ इंडिया में पहले पन्ने पर कोई खबर नहीं है। हालांकि, अंदर केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के निर्देश की खबर होने की सूचना है। खबर यह कि (हाईकोर्ट के आदेश पर) केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने केंद्र सरकार के तीन अस्पतालों को निर्देश दिया है कि जंतर मंतर पर भूख हड़ताल कर रहे एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक और अन्य के स्वास्थ्य की जांच रोज दो बार की जाए। इंडियन एक्सप्रेस में यह खबर लीड है। तीन कॉलम की इस खबर का शीर्षक है, हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि सरकारी डॉक्टर वांगचुक के स्वास्थ्य की निगरानी अवश्य करें। इस खबर का इंट्रो है – कोर्ट ने कहा, किसी भी नागरिक का जीवन बहुमूल्य है; सॉलिसीटर जनरल ने कहा आदेश पर कोई एतराज नहीं है। खबर के साथ दो कॉलम की फोटो है। इसका कैप्शन है – गुरुवार को जंतर मंतर प्रदर्शन स्थल पर सोनम वांगचुक के साथ आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविन्द केजरीवाल। यह फोटो ताशी तोबग्याल की है। मुख्य खबर के साथ छपी एक और खबर का शीर्षक है – आप से कांग्रेस, समाजवादी पार्टी से नेशनल कांफ्रेंस, विपक्षी दल एक्टिविस्ट के समर्थन में एकजुट हुए। द हिन्दू में यह खबर चार कॉलम की लीड है। इसके साथ सोनम वांगचुक की फोटो भी है। द हिन्दू की लीड का शीर्षक है, वांगचुक की स्थिति कमज़ोर, दिल्ली हाई कोर्ट ने नियमित निगरानी के आदेश दिए। उपशीर्षक है, डॉक्टर का कहना है कि भूख हड़ताल शुरू करने के बाद वांगचुक का वज़न 9 किलो से ज़्यादा घट गया है और उनका शरीर मांसपेशियों का इस्तेमाल कर रहा है; इसके बाद उनके अंगों पर असर पड़ सकता है। सरकार ने हाई कोर्ट को ज़रूरी मेडिकल मदद का भरोसा दिलाया है। इस खबर के साथ सोनम वांगचुक की दो कॉलम की फोटो का कैप्शन है, गुरुवार को नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर भूख हड़ताल के दौरान डटे हुए सोनम वांगचुक। तस्वीर में सोनम ने कोविड वाला मास्क लगा रखा है। खबर अरूण दीप की बाइलाइन से है और फोटो शशि शेखर कश्यप ने ली है।

दि एशियन एज में यह खबर लीड नहीं है लेकिन पांच कॉलम में है। यहां भी फोटो दो कॉलम में है। कैप्शन लगभग वही है जो इंडियन एक्सप्रेस में। यह भी बाइलाइन वाली खबर है जिसमें फोटोग्राफर का भी नाम दिया गया है। खबर का मुख्य शीर्षक है, विपक्ष ने वांगचुक से अनशन खत्म करने की अपील की, आंदोलन का समर्थन किया। उपशीर्षक में बताया गया है, केंद्र की आलोचना, प्रधान के इस्तीफे पर जोर दिया, केजरीवाल पहुंचे, केजरीवाल, उमर अब्दुल्ला और कपिल सिबल ने एकजुटता दिखाई। इस खबर का हाईलाइट किया हिस्सा है – अन्य के अलावा समाजवादी पार्टी की सांसद डिम्पल यादव और किसान नेता राकेश टिकैत ने भी वांगचुक से मुलाकात की और विरोध प्रदर्शन से एकजुटता जताई। द टेलीग्राफ में यह खबर दो कॉलम की फोटो के साथ दो कॉलम में है। शीर्षक है, सोनम के विरोध पर कांग्रेस जागी। यह खबर भी बाइलाइन के साथ है। फोटो पीटीआई की है। हिन्दी अखबारों में नवोदय टाइम्स में यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है। दैनिक भास्कर में लीड है। बताया गया है कि अनशन के 19 दिन हो चुके हैं और सोनम वांगचुक का वजन 9 किलो घट गया है।  मुख्य शीर्षक है : डॉक्टर ने कहा – वांगचुक के अंगों पर खतरा; हाईकोर्ट ने कहा – जीवन अमूल्य, इसे बचाएं। दैनिक भास्कर ने अरविन्द केजरीवाल की इस मांग को भी प्रमुखता दी है कि धर्मेन्द्र प्रधान इस्तीफा दें, वांगचुक को शिक्षा मंत्री बनाएं। देशबन्धु में यह खबर चार कॉलम में है। फ्लैग शीर्षक है – सोनम वांगचुक के अनशन पर हाईकोर्ट ने दिया निर्देश मुख्य शीर्षक है – हर जान कीमती, रोजाना मेडिकल जांच हो। अमर उजाला में भी यह खबर फोटो के साथ पहले पन्ने पर है। यहां भी शीर्षक वही है। फोटो सिंगल कॉलम की है और सोनम वांगचुक के साथ डिम्पल यादव की फोटो छपी है।

यह सब तब है जब वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने कल कहा था, “जब अन्ना हजारे ने अनशन किया था, तो हम (मीडिया) चौबीसों घंटे उसे दिखाते थे। लेकिन सोनम वांगचुक के इस लंबे अनशन को बमुश्किल ही कोई जगह मिली है। यह इस बात को दर्शाता है कि हम क्या दिखाना चुनते हैं और 2011 से अब तक चीजें कितनी बदल चुकी हैं।” यही नहीं, आमरण अनशन को आत्महत्या की कोशिश माना जा सकता है और असफल रहने पर भी मुकदमा चल सकता है। इस लिहाज से सरकार का काम है कि वह यह सुनिश्चित करे कि आमरण अनशन करने वाले की मौत न हो जाए। तमाम मामलों में ऐसे लोगों को जबरन उठाया और अस्पताल में भर्ती करा दिया जाता है। नाक से पाइप लगाकर जबरन खाना खिलाना शामिल है। ऐसे अनशनकारियों में पूर्वोत्तर भारत के मणिपुर राज्य की मानवाधिकार कार्यकर्ता इरोम चानू शर्मिला प्रमुख हैं। इन्होंने आमरण अनशन का विश्व रिकॉर्ड बनाया है। उन्हें “मणिपुर की लौह महिला” भी कहा जाता है। यह अलग बात है कि चुनाव लड़ने पर उन्हें बहुत कम वोट मिले। तब वोट चोरी का मामला आम नहीं था। पता नहीं वास्तविकता क्या है। अनशन के दौरान उन्हें आत्महत्या के प्रयास के आरोप में हिरासत में रखा जाता था और नाक के माध्यम से तरल भोजन देकर जबरन जीवित रखा जाता था। इन्होंने मणिपुर से सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम (आफस्पा) को हटाने की मांग को लेकर दो नवंबर 2000 से नौ अगस्त 2016 तक लगभग 16 वर्षों (कुल 5,793 दिनों) तक लगातार अनशन किया।

भारत में अनशन से मौत का एक और मामला भी इन दिनों चर्चा में है। गंगा की अविरलता और स्वच्छता के लिए अनवरत संघर्ष करने वाले और ‘गंगा पुत्र’ के नाम से मशहूर प्रोफेसर जी.डी. अग्रवाल ने 111 दिनों तक आमरण अनशन किया था। उनकी प्रमुख मांगों में गंगा की सुरक्षा के लिए कड़ा कानून बनाना और नदी पर निर्माणाधीन जलविद्युत परियोजनाओं को रोकना शामिल था। पर्यावरणविद् प्रोफेसर जीडी अग्रवाल (स्वामी ज्ञान स्वरूप सानंद) ने 22 जून 2018 को आमरण अनशन शुरू किया था। अनशन के 109वें दिन 9 अक्टूबर 2018 को उन्होंने पानी पीना भी छोड़ दिया था। 10 अक्टूबर 2018 को प्रशासन ने उन्हें जबरन अस्पताल पहुंचा दिया जहां 11 अक्टूबर 2018 को उनका निधन हो गया। उनके निधन के तुरंत बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट कर शोक व्यक्त किया था। उन्होंने अपने संदेश में कहा था, “श्री जीडी अग्रवाल जी के निधन से व्यथित हूँ। शिक्षा, ज्ञान, पर्यावरण संरक्षण और विशेष रूप से गंगा की सफाई के प्रति उनका समर्पण हमेशा याद रहेगा। मेरी संवेदनाएं।” सोनम वांगचुक ने भूख हड़ताल (अनशन) शुरू की तो कुछ लोगों ने पानी पीते हुए उनकी तस्वीर ली और इसके वीडियो सोशल मीडिया पर जारी किए। समाज में नरेन्द्र मोदी और उनके समर्थकों की मौजदूगी और पुरानी घटनाओं के आलोक में ऐसी, फोटो, वीडियो या सोशल मीडिया पोस्ट का मतलब या उसकी राजनीति अथवा संदर्भ को समझा जा सकता है। फिर भी सोनम वांगचुक आमरण अनशन के अपने निर्णय पर कायम हैं।  

एक वीडियो जारी कर उन्होंने कहा है, सोनम वांगचुक ने बुधवार रात और गुरुवार (16 जुलाई 2026) को सुबह जारी किए वीडियो संदेश में साफ किया है कि वे अपना अनशन समाप्त नहीं करेंगे। विपक्ष के नेताओं, अदालत और आम जनता की ओर से अनशन खत्म करने की अपीलों का जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि जब तक सरकार उनकी मांगों पर कोई स्पष्ट कदम नहीं उठाती, आंदोलन जारी रहेगा। उन्होंने बताया कि 19 दिनों के अनशन के कारण उनका शरीर जरूर कमजोर हो रहा है और मांसपेशियां लगातार खत्म हो रही हैं, लेकिन उनका दिल और दिमाग पूरी तरह ठीक काम कर रहा है। उन्होंने कहा कि उनके कई मेडिकल टेस्ट और ईसीजी किए गए हैं, जो अभी तक के अनशन के लिहाज से संतोषजनक और सामान्य आए हैं। उन्होंने कहा कि फिलहाल ऐसी स्थिति नहीं है कि अगले कुछ दिनों में जान का खतरा हो, इसलिए वे अनशन जारी रख सकते हैं। अनशन खत्म करने की अपील पर उन्होंने शुभचिंतकों से कहा, “मुझसे मेरा अनशन खत्म करने के लिए मत कहिए, बल्कि सरकार से पूछिए कि वह बातचीत क्यों नहीं कर रही है।” यदि वे अनशन खत्म कर देंगे तो सरकार को यह संदेश जाएगा कि उसे जवाबदेही तय करने की कोई जरूरत नहीं है। उन्होंने 20 जुलाई को प्रस्तावित ‘संसद चलो’ मार्च में देश के छात्रों, युवाओं और आम नागरिकों से बड़ी संख्या में दिल्ली जुटने की अपील की है। कहने की जरूरत नहीं है कि आज की खबर में ये सारी बातें प्रमुखता से नहीं हैं। आज की खबर कोर्ट के आदेश से प्रेरित है जो अधिवक्ता आरके सैनी की याचिका पर दी गई है। इंडियन एक्सप्रेस की खबर के अनुसार, उन्होंने हाईकोर्ट में यह आरोप लगाते हुए याचिका दायर की थी कि सरकार वांगचुक से “आतंकवादी” जैसा व्यवहार कर रही है और स्थिति के प्रति “उदासीन” नजर आ रही है। आप समझ सकते हैं कि यह सरकार कैसी है।

सोनम वांगचुक का यह अनशन एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है जहाँ सरकार की उदासीनता, विपक्ष की राजनीति उसका नफा-नुकसान है और अन्ना आंदोलन से जली जनता जो छाछ को हाथ लगाने से भी डर रही है। बीच में एक गांधीवादी आंदोलनकारी जो सबको अपने जैसा ही मानता है। इसीलिए बहुत दिनों बाद जंतर-मंतर भारतीय राजनीति और छात्र चेतना के एक अनोखे और बेहद जटिल रूप का गवाह बना है। यह आंदोलन डिजिटल व्यंग्य, ज़मीनी हकीकत और देश के सबसे सम्मानित पर्यावरणविदों में से एक—सोनम वांगचुक—की जान जोखिम में डालने वाले दृढ़ संकल्प का मिश्रण बन गया है। आंदोलन की शुरुआत किसी पारंपरिक राजनीतिक दल या छात्र संघ ने नहीं, बल्कि अभिजीत दीपके द्वारा सोशल मीडिया पर शुरू किए गए एक व्यंग्यात्मक अभियान से हुई जो सुप्रीम कोर्ट की एक टिप्पणी से प्रेरित नाम वाली है। शुरू में यह एक ‘ऑनलाइन ट्रेंड’ या ‘मीम’ समझा गया, लेकिन अब यह एक चुनौती बनकर उभरा लगता है। सोनम वांगचुक ने युवाओं की इस आवाज को अपना नैतिक बल दिया है। खुद को आंदोलन का ‘मानद कॉकरोच’ कहते हुए वे 28 जून से अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर हैं। इस आंदोलन का सबसे दिलचस्प राजनीतिक मोड़ तब आया जब सोनम वांगचुक और सीजेपी ने इसे पूरी तरह ‘गैर-राजनीतिक’ (Apolitical) मंच बताते हुए भी सभी दलों को शामिल होने का न्योता दिया। सोनम वांगचुक ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यह युवाओं के भविष्य का मुद्दा है और विपक्ष के बड़े नेताओं, खासकर लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को यहाँ आना चाहिए। वांगचुक ने यहाँ तक कहा कि यदि बड़े नेता ऐसे गंभीर मुद्दों से दूरी बनाकर रखेंगे, तो जनता उनकी इस संकीर्णता को खारिज कर देगी। इसके राजनीतिक मायने लगाए जा रहे हैं पर मुझे लगता है कि सोनम वांगचुक को राजनीति आती होती तो वे अनशन क्यों करते? मीडिया ने अपने स्वभाव के अनुकूल या सत्तारूढ़ दल के दबाव में राहुल गांधी को विवाद में घसीट ही लिया है जबकि कॉक्रोच जनता पार्टी कांग्रेस विरोधियों और भाजपा समर्थकों की ही है। भले अब उसे भारी समर्थन मिल रहा हो। ऐसे में मीडिया की ‘सिलेक्टिव और पक्षपाती रिपोर्टिंग’ अलग समस्या है।

मैं रोज चार हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल दस, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

Pahad Ki Dada: Hill Mail Uttarakhand
CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन