सरकारें हर साल केंद्र से लेकर राज्यों तक मीडिया संस्थानों को विज्ञापनों पर अरबों रुपये खर्च करती हैं। इसके बावजूद मीडिया जगत में लंबे समय से यह सवाल उठता रहा है कि आखिर इस राजस्व का लाभ पत्रकारों और अन्य कर्मचारियों तक क्यों नहीं पहुंचता। अधिकांश मीडिया संस्थानों में वेतन वृद्धि सीमित रहती है, जबकि कई जगह कर्मचारियों को वर्षों तक इंक्रीमेंट का इंतजार करना पड़ता है। ऐसे में सरकारी विज्ञापन खर्च बढ़ने के साथ यह बहस भी तेज हो गई है कि क्या विज्ञापन से होने वाली अतिरिक्त आय का कोई हिस्सा पत्रकारों के वेतन और कार्य परिस्थितियों में सुधार पर भी खर्च किया जाता है। हालांकि, इस संबंध में कोई सार्वजनिक या आधिकारिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है, क्योंकि मीडिया कंपनियां अपने वेतन ढांचे और राजस्व के उपयोग का विस्तृत ब्योरा सार्वजनिक करने के लिए बाध्य नहीं हैं।
छत्तीसगढ़ की विष्णु सरकार ने कितना धन लुटाया पढ़ें-
रायपुर। छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार ने 1 जनवरी 2024 से 31 मार्च 2026 के बीच विभिन्न सरकारी योजनाओं के प्रचार-प्रसार पर 1,095.20 करोड़ रुपये खर्च किए। यह जानकारी राज्य सरकार ने विधानसभा में कांग्रेस विधायक सावित्री मनोज मंडावी के प्रश्न के लिखित उत्तर में दी है। इन आंकड़ों के सामने आने के बाद सरकार की खर्च प्राथमिकताओं के साथ-साथ मीडिया उद्योग की स्थिति पर भी नई बहस शुरू हो गई है।
सरकारी जवाब के अनुसार, 27 महीनों में प्रचार-प्रसार पर औसतन करीब 1.3 करोड़ रुपये प्रतिदिन खर्च किए गए। इसमें 414.01 करोड़ रुपये फील्ड पब्लिसिटी, 344.04 करोड़ रुपये इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, 198.26 करोड़ रुपये प्रिंट मीडिया, 19.17 करोड़ रुपये प्रकाशनों, 5.78 करोड़ रुपये सोशल मीडिया, 5.58 करोड़ रुपये डिजिटल मीडिया, 22 करोड़ रुपये जनजातीय उपयोजना के प्रचार और 3.50 करोड़ रुपये विशेष अवसरों के प्रचार पर खर्च किए गए।
इस बीच एक और सवाल चर्चा में है कि सरकारी विज्ञापनों से मीडिया संस्थानों को मिलने वाले करोड़ों रुपये का लाभ आखिर पत्रकारों और मीडिया कर्मचारियों तक कितना पहुंचता है? मीडिया जगत से जुड़े कई लोगों का कहना है कि सरकारी विज्ञापन राजस्व बढ़ने के बावजूद अधिकांश संस्थानों में पत्रकारों की सैलरी वर्षों से स्थिर है या बहुत मामूली बढ़ी है। कई जगह वेतन वृद्धि, नियुक्तियों और कार्य परिस्थितियों को लेकर लगातार शिकायतें सामने आती रही हैं।
हालांकि, सरकारी विज्ञापन से किसी मीडिया संस्थान को प्राप्त आय का उसके कर्मचारियों के वेतन पर क्या प्रभाव पड़ा, इसका कोई सार्वजनिक या अनिवार्य सरकारी रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं होता। मीडिया कंपनियां अपने वेतन ढांचे और आंतरिक वित्तीय निर्णय सार्वजनिक करने के लिए बाध्य नहीं हैं। ऐसे में यह पता लगाने का कोई सीधा आधिकारिक तरीका नहीं है कि सरकारी विज्ञापनों से मिली अतिरिक्त आय का कितना हिस्सा पत्रकारों के वेतन या अन्य कर्मचारी कल्याण पर खर्च हुआ।
उधर, विपक्ष का कहना है कि राज्य के कई इलाकों में अब भी बुनियादी सुविधाओं का अभाव है। बिलासपुर के घुटकू गांव में सरकारी स्कूल के बच्चे जर्जर भवन के कारण खुले में पढ़ाई कर रहे हैं, जबकि सुकमा जिले के मरुकी गांव में सड़क जैसी मूलभूत सुविधा आज भी अधूरी है। ऐसे में प्रचार-प्रसार पर 1,095 करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए जाने को लेकर सरकार की प्राथमिकताओं पर सवाल उठ रहे हैं।
इसी के साथ अब यह बहस भी तेज हो रही है कि सरकारी विज्ञापनों पर होने वाले भारी खर्च का लाभ केवल मीडिया कंपनियों के बैलेंस शीट तक सीमित रहता है या उसका कुछ हिस्सा उन पत्रकारों तक भी पहुंचता है, जो इन संस्थानों में काम करते हैं। फिलहाल, इसका कोई आधिकारिक और पारदर्शी डेटा उपलब्ध नहीं है।
यह पैसा जिन अख़बारों को गया है, वहां के पत्रकारों की सैलरी में कितनी वृद्धि हुई है, क्या यह भी जानने का कोई ज़रिया है?
-रवीश कुमार, वरिष्ठ पत्रकार
Related News…
मोदी सरकार ने पिछले पाँच साल में विज्ञापनों पर उड़ाए 2446 करोड़ रुपये, 10 बड़े मीडिया समूहों ने कूटा सबसे ज्यादा माल!



