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दिल्ली

गोदी मीडिया सोनम वांगचुक को पुलिस द्वारा उठा ले जाने का समर्थन कर रहा है!

शकील अख्तर-

गोदी मीडिया सोनम वांगचुक को पुलिस द्वारा उठा कर ले जाने का समर्थन कर रहा है।

सोचिए अगर ऐसे ही अन्ना हजारे को अनशन से उठाकर ले जाया जाता तो यह मीडिया क्या करता?

एक बात और समझ लीजिए की मीडिया का संबंध सिर्फ सरकार से नहीं होता।

सरकार है इसका असर पड़ता है मगर असली चीज उसकी विचारधारा है।

विचारधारा से यह मीडिया प्रगतिशीलता विरोधी दक्षिणपंथी बना दिया गया तो सरकार कांग्रेस के नेतृत्व में होते हुए भी वह इसका विरोध कर रहा था और यूपीए के पूरे 10 साल उसने भाजपा का साथ दिया।

संघ के लोगों को घुसा कर 1977 से इसे कब्जे में लिया गया। जनता पार्टी की सरकार में लाल कृष्ण आडवानी सूचना प्रसारण मंत्री बने और उन्होंने यही काम किया दूरदर्शन रेडियो अखबार हर जगह प्रचारकों को पत्रकार बना दिया।

कांग्रेस ने भी इसमें पूरा सहयोग किया। संघ जिन लोगों को घुसाती थी कांग्रेस अपनी सरकारों के दौरान उन्हें आगे बढ़ाती थी।


मुकेश कुमार-

संवेदनहीन सरकार और क्या कर सकती है। सादे कपड़ों में आई पुलिस सोनम वांगचुक को उठाकर सफदरजंग अस्पताल ले गई।

कैमरे उसके कुकृत्य को रिकार्ड न कर सकें इसलिए सफ़ेद चादरों से पर्दे तान दिए गए। लाठी चार्ज करके घटनास्थल खाली करवा लिया गया।

लेकिन आंदोलनकारियों ने हार नहीं मानी है। अभिजीत दीपके ने वहीं पर आमरण अनशन शुरू कर दिया है। आमरण अनशन पर बैठे छात्रों को खदेड़ दिया गया था मगर वे भी फिर से मोर्चा संभालने जा रहे हैं।


नरेंद्र नाथ मिश्रा-

सोनम वांगचुक को अनशन से जबरन इसलिए हटाया गया क्योंकि उनकी स्वास्थ्य गिर रही थी! हाई कोर्ट का आर्डर था!

चलिए मान लिया!

लेकिन कोर्ट के आदेश और सोनम के हेल्थ की इतनी और ईमानदार चिंता होती तो संवाद करते! सरकार उनसे बातचीत करती! उनसे बात कर उनका अनशन समाप्त करवा सकती थी! ये सभी तो शांति तरीके से प्रोटेस्ट कर रहे थे! शिक्षा जैसे बुनियादी मुद्दे पर! क्या गलत था इसमें!

इनसे बातचीत करने के लिए किसने रोका था? यही से मंशा पर सवाल उठती है और ये उनके हेल्थ की चिंता और कोर्ट का आर्डर वाला तर्क बेमानी लगता है!


आदित्य मिश्रा-

ऑपरेशन जंतर मंतर के लिए एक कोड तय हुआ। सफेद कपड़ा। दिल्ली पुलिस के कुछ जवानों को सफेद टीशर्ट में जंतर मंतर भेजा गया। सफेद चादर मोड़कर एक जवान के पास रखा गया।

बीती शाम हुई दिल्ली पुलिस के टॉप अफसरों की मीटिंग में ये प्लान बना था। करीब दस जवान मंच पर पहुंचते ही चादर को फैलाते हैं, सोनम वांगचुक से अस्पताल चलने की request करते हैं। सोनम वांगचुक इधर उधर एक सेकंड देखते हैं। उन्हें अभिजीत दीपके दिखते तक नहीं।

तीन चार लेफ्ट की कार्यकर्ता हंगामा करने की कोशिश करती हैं। लेकिन सोनम वांगचुक आराम से पुलिस के साथ चलते हैं। उनकी इच्छा के अनुसार ही पुलिस उन्हें फोटो खिंचवाने और हाथ हिलाकर अभिवादन करने की पूरी छूट देती है।

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