सुशोभित-
राहुल गांधी ने कल पुणे में एक अच्छा और ताज़गीभरा कार्यक्रम किया और युवा महिलाओं से जीवंत-संवाद स्थापित किया। कार्यक्रम का स्वरूप ग़ैर-राजनैतिक था। मालूम होता है कि राहुल अब सक्रिय राजनीति से भी ज़्यादा सोशल-एक्टिविज़्म में रम गए हैं। अलबत्ता कल के कार्यक्रम में बावजूद उनसे कुछ भूलें भी हुईं, जिनसे बचा जाना चाहिए था।
राहुल पितृसत्ता के विरोध में बोल रहे थे और उन्होंने मनुस्मृति को उद्धृत करते हुए उसकी मलामत की। उस उद्धरण का संदर्भ (अध्याय या श्लोक संख्या) उन्होंने नहीं दिया। ज़ाहिर है, वह उनकी रिसर्च-टीम कहीं से खोजकर लाई होगी, जिसे उन्होंने पढ़ दिया। किंतु तथ्य यही है कि संसार के सभी धर्म-मज़हब अपने मूल चरित्र में स्त्री-विरोधी और पुरुषसत्ता को पोषित करने वाले हैं। वैसे में आप किसी एक को ‘सिंगल-आउट’ नहीं कर सकते, वो भी भारत जैसे देश में जहाँ इस्लामिक पर्दा प्रथा ने मुस्लिम महिलाओं के पिछड़ेपन और अशिक्षा में केन्द्रीय भूमिका निभाई है। राहुल के कार्यक्रम में मुस्लिम लड़कियाँ भी मौजूद थीं, जिनकी मज़हब सम्बंधी समस्याओं को छुआ तक नहीं गया।
मेरा मत है कि अगर आप धुर-एथीस्ट नहीं हैं और तमाम रिलीजन्स के कठोर-आलोचक नहीं हैं (रसेल, नीत्शे, मार्क्स, डॉकिंस की तरह- जो कि राहुल यक़ीनन नहीं हैं) तो आपको राजनैतिक कारणों से किसी एक धर्म में निहित बुराइयों पर निशाना साधने से बचना चाहिए। इससे समाज में आपकी नीयत को लेकर एक ग़लत संदेश जाता है और विरोधी इसका लाभ उठाते हैं। वैसे, तथ्य यह है कि याज्ञवल्क्य स्मृति और मनुस्मृति दोनों में ही पिता की सम्पत्ति में कन्या को एक-चौथाई हिस्सा देने की अभ्यर्थना की गई है और इस बात को स्वयं आम्बेडकर ने संसद में खड़े होकर कहा था।
राहुल पर आम्बेडकर का प्रभाव दिखता है, किन्तु आम्बेडकर के जूते में पाँव डालना सहज नहीं है। आम्बेडकर भारत और दुनिया के इतिहास, संस्कृति, समाज-व्यवस्था, अर्थव्यवस्था, धर्म-दर्शन का सांगोपांग अध्ययन करने के बाद बोल रहे थे। राहुल वैसा अध्ययन करने के बाद नहीं बोल रहे हैं। आप सुधारवादी की भूमिका में महज़ विशफ़ुल-थिंकिंग (ख़ामख़याली) से नहीं आ सकते, उसके लिए एक कठोर बौद्धिक तैयारी करनी पड़ती है। ध्यान रहे, आम्बेडकर ने इस्लाम में निहित बुराइयों की भी सख़्त आलोचना की है। अगर राहुल वैसा नहीं कर सकते तो उन्हें आम्बेडकर का झण्डा उठाने का ढोंग नहीं करना चाहिए।
कल राहुल ने मंच से इस तरह की बातें भी कहीं कि भारत की 70 करोड़ महिलाएँ, 70 करोड़ पुरुषों की तुलना में अधिक महत्त्वपूर्ण हैं, क्योंकि महिलाएँ पुरुषों की तुलना में अधिक उदार, करुणापूर्ण, संवेदनशील और प्रगतिशील होती हैं आदि-आदि। ये सब बेकार की अवैज्ञानिक बातें हैं और प्रचलित धारणाओं पर आधारित हैं। युवाल हरारी ने लिखा है कि समाज में मान्यता है कि पुरुष शारीरिक रूप से महिलाओं की तुलना में अधिक बलवान होते हैं, जबकि विज्ञान इस धारणा की पुष्टि नहीं करता। ये सब पर्सेप्शंस हैं, जो निराधार ही चल पड़ते हैं। अगर कोई वैसी न्यूरोलॉजिकल रिसर्च हुई हो, जो बतलाती हो कि महिलाएँ पुरुषों की तुलना में अधिक जेंटल और सेंसेटिव हैं तो उसे प्रस्तुत किया जाना चाहिए। अन्यथा यह तुष्टीकरण और ख़ुशामद भर है। अगर हम किसी एक जाति को दूसरी से और किसी एक धर्म को दूसरे से श्रेष्ठ बताना ठीक नहीं समझते तो किसी एक जेंडर को भी दूसरे से श्रेष्ठ क्यों बताना चाहिए? समाज में पितृसत्ता की व्यवस्था रही है तो अब शीर्षासन करके महिलाओं को पुरुषों से श्रेष्ठ क्यों मान लेना चाहिए? क्या दोनों को सम-दृष्टि से नहीं देखा जा सकता?
राहुल के कार्यक्रम में युवा लड़कियों ने मंच पर आकर अपनी जेनुइन समस्याएँ साझा कीं और यह अच्छा है कि एक बड़े, राष्ट्रीय मंच से यह बातें सामने आईं। लड़कियों ने बताया कि कैसे अपनी पढ़ाई या नौकरी करने के लिए उन्हें आवागमन में सुरक्षा-सम्बंधी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, घर में उन पर विवाह का दबाव बनाया जाता है, उन्हें लड़कों की तुलना में पढ़ाई के कम अवसर मिलते हैं और कैसे उन्हें सार्वजनिक जगहों पर फब्तियों और बैड-टच आदि को झेलना पड़ता है। ये तमाम बातें नई नहीं थीं, किंतु एक राजनेता के मंच से मुखर रूप से देश के सामने आईं, यह स्वागतयोग्य है। अलबत्ता राहुल से एक और असावधानी इधर यह हो रही है कि वे सहज होकर अपने मंच का दूसरों को उपयोग करने का अवसर देते हैं- और यह अपने में अच्छी, समावेशी और लोकतांत्रिक बात है- किंतु इसमें ख़तरा यह है कि कभी भी कोई पोलिटिकली-मोटिवेटेड व्यक्ति उनके मंच से ऐसी बातें बोल जाएगा, जिसका ख़ामियाज़ा फिर राहुल को राजनैतिक रूप से भुगतना पड़ेगा।
राहुल वोकीज़्म के प्रभाव में दिखते हैं। अमरीका में हिलेरी और कमला के वोकीज़्म के प्रति घोर-अरुचि ने ही डॉनल्ड ट्रम्प का पथ प्रशस्त किया था, जो दुनिया के लिए एक हादसा साबित हुआ। वोक, क्लासिकल-लेफ़्ट तो नहीं है, लेकिन उसकी सोशल-वैल्यूज़ का एक आधुनिक संस्करण अवश्य है। वोकीज़्म की लड़ाई नस्लवाद, पितृसत्ता, श्रेष्ठताबोध, धार्मिक-सत्ता आदि से है। इन मायनों में यह अपने स्वरूप में एक प्रगतिशील विचारधारा है, अलबत्ता यह अभी दार्शनिक रूप से इतनी प्रखर-प्रबुद्ध नहीं हो सकी है और प्रतिक्रियापरक ही अधिक बनी हुई है। राहुल के इरादे भी नेक हैं। वो बुनियादी रूप से एक भले, सौम्य व्यक्ति हैं और वर्तमान के राजनैतिक परिप्रेक्ष्य में ताज़ा हवा के झोंके की तरह हैं। किंतु उन्हें ‘तुष्टीकरण’ के ट्रैप से बचना चाहिए। समाज में राजनैतिक और सामाजिक प्रश्नों की कमी नहीं, उन्हीं पर अगर एक सधा हुआ विमर्श सामने रखा जाए तो श्रेयस्कर होगा।


