पूरी खबर के लिए अखबार देखें। मकसद यह बताना है कि ऐसी खबरें नहीं छपती हैं। जीडीपी का आंकड़ा कैसे गलत है यह अखबारों में तो नहीं ही दिखा, टीवी पर बताने के दौरान समझने की कोशिश कम हुई और सवाल ज्यादा किए गए।
संजय कुमार सिंह
आज मैं अपने 10 अखबारों में कलकत्ता के द टेलीग्राफ को छोड़ दूं तो बाकी में दो तरह की खबरें लीड हैं। कुछेक में सुप्रीम कोर्ट का आदेश। इसके जरिए सीजेपी प्रदर्शनकारियों पर दर्ज सभी एफआईआर रद्द कर दी गई है। इसके बाद सीजेपी ने पांच सितंबर को प्रस्तावित अपना मार्च वापस ले लिया है। भारतीय राजनीति में यह एक बड़ा मोड़ और मील का पत्थर माना जा सकता है। एसआईआर जैसी व्यवस्था को चलने देने वाले सुप्रीम कोर्ट ने अगर वादा या समझौता करके मुकर जाने वाली सरकार की मांग और इच्छा के बावजूद सभी एफआईआर रद्द करने के आदेश दिए हैं तो खबर बड़ी है और इसके दूरगामी प्रभाव होंगे।
ऐसे समय में एसआईआर के तहत या उसके नाम पर जो हो रहा है वह भी खबर है। लेकिन सिर्फ दि इंडियन एक्सप्रेस में है और विस्तार से है। आप जानते हैं कि सत्ता में आने के बाद से नागरिकों को तरह-तरह से डराने वाली सत्तारूढ़ पार्टी ने तमाम विरोधियों को दबाने, कुचलने के साथ पार्टी में शामिल करने और महत्वपूर्ण पद देने जैसे कारनामे किए हैं। लेकिन खबरें अक्सर वही छपती रही हैं जिससे पार्टी और उसका नेतृत्व महान नजर आए। कहा जा सकता है कि प्रदर्शनकारी छात्रों के साथ की गई बर्बरता पर सवाल उठाने का असर हुआ है। यह विरोध को कुचलने के सरकारी तरीके पर लगाम लगाने जैसा है। इसके अपने मायने हैं और लगता है, सरकार खासकर प्रधानमंत्री इसे समझ रहे हैं।
डर खत्म होने और खुलेआम हो रही आलोचनाओं से परेशान प्रधानमंत्री ने खुद विदेश से वित्तीय आंकड़े दिए जो वित्त मंत्री भी दे सकती थीं। निश्चित रूप से यह ऐसा मामला नहीं है कि प्रधानमंत्री खुद रील बनाकर जारी करें पर यही उनकी राजनीति और योग्यता या विशेषज्ञता है। ऐसे में पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग ने प्रधानमंत्री के दावों की पोल खोल दी है। यह भी बड़ी खबर है लेकिन पहले पन्ने पर नहीं है। सरकारी प्रचार को प्रमुखता देने वालों को इसे भी प्रमुखता देना चाहिए था। उसपर आने से पहले बता दूं कि आज के अखबारों में सरकार के प्रचार के दो मुद्दे हैं।
एक तो, “आतंकवाद पर नहीं चलेगा दोहरा मापदंड : मोदी”। यह नवोदय टाइम्स में सेकेंड लीड का शीर्षक है। दूसरा मामला दैनिक भास्कर में लीड के साथ है, “पीएम ने फिर कहा…. जरूरत न हो तो सोना न खरीदें, विदेश में शादी और घूमने के लिए यात्राएं करने से भी बचें”। लीड वही है जो नवोदय टाइम्स में सेकेंड लीड है। शीर्षक थोड़ा अलग है – “शरीफ के सामने प्रधानमंत्री मोदी बोले; आतंक को पनाह देने वाले बेनकाब होंगे”। इसके साथ करतूत भी है… पाक पीएमओ ने मोदी की फोटो हटाई, 6 घंटे बाद फिर लगाई। इस पूरी लीड के साथ कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की प्रतिक्रिया भी है, बोले… आम जनता को कोई राहत नहीं मिली।
मोटा मोटी मामला यह है कि प्रधानमंत्री अभी भी हेडलाइन मैनेजमेंट के भरोसे हैं और तमाम अखबार उनकी सेवा में दिख रहे हैं। उदाहरण के लिए, जीडीपी बढ़ने के दावे के बाद तमाम लोगों ने कहा कि अगर अर्थव्यवस्था इतनी ही अच्छी है तो प्रधानमंत्री ने सोना नहीं खरीदने और विदेश नहीं जाने की सलाह क्यों दी थी। जाहिर है, सवाल दमदार है इसलिए प्रधानमंत्री ने अपनी पुरानी अपील, जो खाड़ी युद्ध से समय की थी, दोहराई है। अमर उजाला ने इसे प्रधानमंत्री की फोटो के साथ चार कॉलम में छापा है। शीर्षक है, “स्वदेशी पर जोर : मोदी बोले – विदेश यात्रा, सोना खरीदने से बचें”। उपशीर्षक है, “वेड इन इंडिया (भारत में शादी करें) व वोकल फॉर लोकल का दिया मंत्र”।
इसके साथ एक खबर का शीर्षक है, कुछ लोग झूठी बातें दोहरा रहे हैं। मुझे लगता है कि सरकार और सरकार समर्थक कब क्या खाएं, क्या पहनें तो तय करना ही चाहते हैं अब यह भी कि शादी कहां करें। किससे नहीं करें यह भी पहले से तय है। दूसरी ओर, तमाम विदेशी ब्रांड इस्तेमाल करने, विदेशी पुरस्कार और सम्मान लेने वालेस विदेशी कारों में घूमने वाले प्रधानमंत्री विदेश से वोकल फॉर लोकल होने की सलाह देते हैं तो यह खबर है और वैसे ही छपी भी है। अमर उजाला ने सरकार के प्रचार में आज “अर्थव्यवस्था से उम्मीद की चार खबरें…”। मुझे लगता है कि चारो खबरें प्रचार के लिए ही हैं और इनका कोई खास मतलब नहीं है। तभी खरगे ने कहा है, आम जनता को कोई राहत नहीं मिली और यह अमर उजाला में इस खबर के साथ या पहले पन्ने पर नहीं है।
नवोदय टाइम्स में यह पांच कॉलम का पेज वन एंकर है। इसे जीडीपी की 7.8% वृद्धि दर पर तकरार के तहत छापा गया है। पहले, “निराशा की गर्त में डूबे लोग फैला रहे ‘झूठ की गूंज’ : मोदी”। शीर्षक की दूसरी लाइन है, :”आम आदमी परेशान, उसके लिए कुछ नहीं बदला : खरगे”। इसकी पुष्टि के लिए यहां, ‘विदेश न जाएं, सोना नहीं खरीदें’ भी है। देशबन्धु में टॉप पर दो कॉलम की खबर का शीर्षक है, “भाजपा का लक्ष्य किसी तरह चुनाव जीतना : राहुल गांधी” है। एससीओ शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री ने जो कहा उसे यहां चार कॉलम की खबर की तरह छापा गया है। इसका शीर्षक है, आतंकवाद को खत्म करने की जरूरत। इस खबर के साथ उनका कहा हाईलाइट किया गया है, आतंकवाद के गंभीर मुद्दे पर दोहरे मापदंड की कोई जगह नहीं होनी चाहिए।
उल्लेखनीय है कि पश्चिम बंगाल के जादवपुर विश्वविद्यालय में छात्र गुटों के बीच हुई झड़प की खबर को कवर करते हुए आनंद बाजार पत्रिका ने प्रथम पृष्ठ पर “गेरुआ गुंडागर्दी” शीर्षक से खबर प्रकाशित की थी। प्रदर्शनकारियों और कई हिंदू संगठनों का तर्क है कि ‘गेरुआ’ (भगवा) रंग सनातन धर्म और संस्कृति की पवित्रता का प्रतीक है, इसलिए इसे “गुंडागर्दी” शब्द के साथ जोड़ना हिंदू भावनाओं का अपमान है। इस सिलसिले में संपादक ईशानी दत्ता रॉय और मुख्य रिपोर्टर सोमा मुखर्जी सहित संपादकीय टीम के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई गई और कोलकाता पुलिस ने प्राथमिकी दर्ज की है।
आप जानते हैं कि संविधान के अनुसार जो अपराध है उसपर कई दिनों तक एफआईआर दर्ज नहीं हुई। मल्लिकार्जुन खरगे के राज्यसभा में उठाने पर भी नहीं। राहुल गांधी ने मांग की तो उनके खिलाफ हो चुकी है। दूसरी ओर, भगवा समर्थकों की गुंडागर्दी को गेरुआ गुंडागर्दी कहने के लिए कल 1 सितंबर 2026 को भगवा वस्त्र और पटका पहने लोगों का एक समूह आनंद बाजार पत्रिका के मुख्य कार्यालय के बाहर एकत्र हुआ। उन्होंने “भगवा का अपमान नहीं सहेगा भारत” नारे लगाए और पत्र समूह के विरोध में नारेबाजी की। प्रदर्शन के दौरान कुछ युवकों ने दफ्तर के प्रवेश द्वार के सफेद खंभों और दीवारों पर भगवा पेंट पोत दिया। वीडियो में देखा गया कि प्रदर्शन के दौरान पुलिसकर्मी वहां मौजूद थे।
यह खबर आज इसी समूह के और कलकत्ता से ही प्रकाशित होने वाले द टेलीग्राफ में पहले पन्ने पर नहीं है। अंग्रेजी अखबारों में दि एशियन एज ने दोनों सरकारी प्रचार को प्रमुखता दी है। एक लीड है तो दूसरा सेकेंड लीड। टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड का शीर्षक है – पाकिस्तान ने एससीओ की अध्यक्षता स्वीकार की, मोदी ने रणनीतिक ऐसेट के रूप में आतंकवाद के इस्तेमाल की आलोचना की। सीजेपी आंदोलन से संबंधित 127 एफआईआर रद्द किए जाने की खबर सेकेंड लीड है। द हिन्दू में एफआईआर रद्द किए जाने की खबर लीड है। आंतकवाद पर प्रधानमंत्री ने जो कहा वह यहां दो कॉलम में है – एससीओ को आतंक के इकोसिस्टम को खत्म करना होगा: प्रधानमंत्री।
हिन्दुस्तान टाइम्स में एफआईआर रद्द किए जाने और पांच सितंबर के विरोध प्रदर्शन वापस लिए जाने की खबर लीड है। सरकारी प्रचार पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने पर लीड है। इसके साथ दूसरी खबर भी है। इंडियन एक्सप्रेस ने सीजेपी आंदोलन, संबंधित एफआईआर, सरकार की मांग और आपराधिक रिकार्ड वाले लोगों के खिलाफ कार्रवाई के लिए पुलिस के स्वतंत्र होने की बात को समेटते हुए सारी बातें बताने वाला शीर्षक बनाया है और खबर लीड है। प्रधानमंत्री की खबर सेकेंड लीड है। आइए अब जीडीपी के विकास दर में वृद्धि के दावे के संबंध में सुभाष चंद्र गर्ग ने जो कहा है उसे समझ लें।
जीडीपी वृद्धि से संबंधित (सरकारी) आंकड़ों की आलोचना और उसकी गणना पर उठाए गए सवालों के बाद मुख्य बात यह है कि वास्तविक विकास दर 2.6% ही है। सरकार द्वारा बताए जा रहे 7.8% के उच्च जीडीपी विकास दर के आंकड़ों के विपरीत, सुभाष चंद्र जैन के अनुसार, आंकड़ों की वास्तविक और बुनियादी गणना की जाए तो देश की वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर केवल 2.6% ही बैठती है। पिछले वर्ष की समान इसी वास्तविक उत्पादन मूल्य (ट्रिलियन रुपये में) की तुलना वर्तमान उत्पादन मूल्य से करने पर वृद्धि दर का आंकड़ा आधिकारिक दावों से काफी कम आता है। आधिकारिक जीडीपी दर को वास्तविक स्थिति से बेहतर दिखाने के लिए अलग-अलग आधार, मुद्रास्फीति और पिछली तिमाहियों के सुविधानुसार आंकड़ों का चयन कर बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है।
कहने की जरूरत नहीं है कि सरकारी खर्च पर प्रधानमंत्री के दावे को सही साबित करने की कोशिशें चल रही हैं। प्रचारक लगा दिए गए हैं लेकिन अब वे भी बोल रहे हैं जो पहले नहीं बोलते थे। उदाहरण के लिए, भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवरनर, रघुराम राजन ने कहा है, “अगर अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है तो अच्छी नौकरियां क्यों नहीं पैदा हो रही हैं? निवेश क्यों नहीं हो रहा है? उद्योगपति निवेश करने में झिझक क्यों रहे हैं? एफडीआई क्यों नहीं आ रहा है? क्या हम अच्छी नौकरियां पैदा करने के लिए ज़रूरी कदम उठा रहे हैं? अगर हम लेबर फ़ोर्स में शामिल हो रहे सभी युवाओं के लिए काफ़ी नौकरियां पैदा नहीं कर पा रहे हैं, तो हम ‘डेमोग्राफिक डिविडेंड’ का फ़ायदा गंवा सकते हैं।”

मैं रोज चार हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल दस, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


