
यशवंत सिंह-
गाजीपुर में गपशप!
कल बीनू भैया Vinay Singh के नेतृत्व में Kamlesh Singh Lala भैया के ददरीघाट वाले आवास पर बैठकी हुई। तीन चार घंटे कैसे बीत गए, पता ही नहीं चला। ये विशुद्ध गपोड़ी बैठकी थी। बिना एजेंडा।
ऐसी गपोड़ी बैठकियाँ अब नहीं हुआ करतीं। बड़े शहरों में तो बिल्कुल नहीं क्योंकि वहाँ सबका वक़्त बहुत कीमती हुआ करता है। वहाँ सब कमाने फिर बीमार पड़ने और फिर सारी कमाई अस्पताल को देकर आईसीयू से डायरेक्ट स्वर्ग में जाने की प्रचंड तैयारी में सघन रूप से बिजी रहते हैं। छोटे शहरों में अभी बिन मक़सद बैठकी और खाँची भर बतकही का चलन क़ायम है।
O P Tiwari बच्चा भैया का राजनीति और समाज की दरकती नैतिक दीवारों पर ऑब्जरवेशन दिल को बड़ा छूने वाला था। वे मोहभंग की स्थिति को द्रष्टा भाव से देख रहे हैं। वे हमको बताए कि वे हमको आरएसएस वाले रक्षाबंधन कार्यक्रम में देखे थे।
वैसे, कमलेश लाला भैया को अभी उम्मीद कायम है। भारत हिंदू राष्ट्र बनकर रहेगा।
मेरा सवाल उनसे था, हिंदू राष्ट्र के आगे ब्रैकेट में क्या लिखा होगा, विकसित या दिवालिया? आर्थिक संकट सन्निकट है। चीनी का रेट देख लीजिए। अर्थव्यवस्था का नकारात्मक सेंटीमेंट देखिए।
खैर, योगी बनाम शाह से लेकर हिंदू मुस्लिम से होते हुए ग़ाज़ीपुर की बदहाली, डीएम एसपी की कार्यप्रणाली पर विमर्श शिफ्ट हुआ और अंत में विजय मिश्रा जी के बीजेपी से टिकट मिलने न मिलने को लेकर अति गोपनीय ऑफ दी रिकॉर्ड गुफ्तगू की गई जिसकी यहाँ रिपोर्टिंग करने पर सख्त मनाही है।
कल हम चारों ने चारों लोक नाप दिया। आज पेट काफ़ी हल्का महसूस हो रहा है। मित्रों के साथ बेमतलब बतियाना हँसना परनिंदा करना भी कई एंटीबायोटिक से ज़्यादा प्रभावी तरीके से दिल दिमाग़ के नकारात्मक बैक्टीरिया मारकर हेल्दी लाइफ की सौगात देता है।
ग़ाज़ीपुर एक्स्प्लोर करने का अभियान जारी है। सावन बीत गया है लेकिन कहीं से कोई शाम वाली दावत का न्योता आया नहीं। सुना है यहाँ कलिया बनाने वाले एक से एक उन्नत किस्म के प्रयोगधर्मी कलाकार और कारीगर हैं। कोई पकाए खिलाये तो जानें
हरे प्रकाश उपाध्याय जी की एक कविता का एक छोटा अंश पढ़ने बूझने लायक है-
कृपया बुरा न मानें
इस बुरे समय का प्रभाव तो कतई नहीं
दरअसल यह शाश्वत हकीकत है
कि काम नहीं आयीं
बुरे वक्त में अच्छाइयाँ
धरे रह गये नीति-वचन उपदेश
सारी अच्छी चीजें पड़ गयीं ओछी
ईमानदारी की बात यह कि बुरी चीजें
बुरे लोग, बुरी बातों और बुरे दोस्तों ने बचाई जान अकसर
उँगली थामकर उठाया साहस दिया
अच्छी चीजों और अच्छे लोगों और अच्छे रास्तों ने बुरे समय में
अकसर साथ छोड़ दिया
हमारे एकाकीपन को दूर किया
बैठे-ठाले लोगों ने
गपोड़ियों ने बचाया संवाद और हास्य
निरंतर आत्मकेंद्रित और नीरस होती दुनिया में
और जल्दी ही भुला देने के इस दौर में
मुझे मेरी बुराइयों को लेकर ही
शिद्दत से याद करते हैं उस कस्बे के लोग
जहाँ से भागकर आया हूँ दिल्ली!


