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उत्तर प्रदेश

ग़ाज़ीपुर को क़िस्मत से बहुत बढ़िया डीएम मिला है!

Man in a blue plaid shirt sits in an office chair, pensively resting his hand on his lips with a pen near his mouth.

ये एक आम आदमी का अपनी बोली में डीएम अनुपम शुक्ला के लिए मेडल है। मैंने बहुत दिन बाद अपने गाँव के किसी आदमी से गाजीपुर के किसी प्रशासनिक अफसर की तारीफ़ सुनी…

यशवंत सिंह-

मैं मार्क्सवादी से भाग्यवादी हो चुका हूँ। हर भाग्यवादी व्यक्ति किसी हद तक नियतिवादी सोच रख सकता है, लेकिन हर नियतिवादी भाग्यवादी नहीं होता। भाग्यवादी (Fatalistic) व्यक्ति मानता है कि उसके जीवन में बहुत कुछ भाग्य के भरोसे है, जो लिखा है, वह मिलेगा ही। वह किस्मत, संयोग या पूर्वकर्म को परिणामों का बड़ा कारण मानता है। गहराई से आप भी देखेंगे और आब्जर्व करेंगे तो लगेगा, सब कुछ कोई करा रहा है और हम सब कठपुतलियाँ हैं। सब कुछ पहले से तय है। दुनिया का संचालन मनुष्यों के बनाये नियम क़ानूनों से नहीं बल्कि प्रकृति के जंगलराज वाले नियमों और भाग्य-नियति के अदृश्य हाथों के ज़रिए होता है। आपको क्या करना है, ये आप तय नहीं करते। यहाँ तक कि आपको कैसे सोचना है, ये भी तय कोई दूसरा करता है। वो दूसरा कौन है, इस संसार का विज्ञान मौन है। दरअसल ब्रह्मांडों के असीमित विस्तार की अनंत दुनिया को समझने के मामले में हम सब शिशु हैं। हमें कुछ नहीं पता। हम बस हो हो भों भों करते हुए चले मरे जा रहे हैं।

इतनी लंबी भूमिका बनाने का मक़सद सिर्फ़ इस एक लाइन को लिखना है कि- “ग़ाज़ीपुर को क़िस्मत से बहुत बढ़िया डीएम मिला है!”

हाँ, क़िस्मत से ही। क्योंकि डीएम होने का आज के दिनों का मतलब होता है समस्त विभागों की तरफ़ से बहाकर लाई जाने वाली उगाहियों का पितृ पुरुष होना। अब तो आईएएस लोग डीएम बनने के लिए करोड़ डेढ़ दो तीन करोड़ तक देते हैं। जैसा जिला वैसा रेट। ऐसे दौर में अनुपम शुक्ला का ग़ाज़ीपुर में जिलाधिकारी होना ग़ाज़ीपुर का अहोभाग्य है।

मुझे ग़ाज़ीपुर आए हुए सत्रह अठारह दिन हो गए हैं। शुरुआती चार दिन यहाँ अपने गाँव पर रहा। एक दिन एक गँवई सज्जन मुझसे बोले- “ई डियमवा त नीक काम करत हऊवे!”

ये एक आम आदमी का अपनी बोली में डीएम अनुपम शुक्ला के लिए मेडल है। मैंने बहुत दिन बाद अपने गाँव के किसी आदमी से गाजीपुर के किसी प्रशासनिक अफसर की तारीफ़ सुनी।

शहर आया तो कई लोगों से पॉजिटिव फीडबैक मिला। सुबह जनता दर्शन में मिले समस्त केसेज को संबंधित विभागों को भेजना और उस एप्लीकेशन के साथ संबंधित विभाग के अधिकारी को शाम को तलब करना। समयबद्ध निस्तारण के लिए लिखित लेना।

इस बहुत पुराने विवाद को लेकर आए एप्लीकेशन का निस्तारण कब तक हो जाएगा?

सर एक महीना लगेगा।

डेट बताओ एक महीने बाद का?

एक अक्टूबर तक हो जाएगा सर!

नोट करो, 2 अक्टूबर तक न हुआ तो इनका सस्पेंशन ऑर्डर टाइप कर मुझसे साइन करा लेना और इन्हें थमा देना!

Man in a checkered shirt sits at a cluttered desk, talking on a mobile phone while reading a document in a wood-paneled office with Hindi signage on the wall.
Man in a blue checked shirt sits at a desk in a government office, wood-paneled wall behind with a circular seal and Hindi signage.

ग़ाज़ीपुर में छलिया नेताओं की दुकानें बंद हो चुकी है। जनता लाइन लगाकर सुबह से डीएम अनुपम शुक्ला से मुलाक़ात करती है और दो तीन दशकों से अटकी भटकी समस्याओं विवादों का आख़िरी फैसला लेकर जाती है। डीएम हर एप्लीकेशन पर संबंधित विभाग के उस अधिकारी को डायरेक्ट फ़ोन करते हैं जिसके जिम्मे वो काम है। आईएएस अनुपम शुक्ला लालफीताशाही वाले अफ़सर नहीं हैं। वे फाइल फाइल नहीं खेलते न किसी को खेलने देते हैं।

वे कहते हैं, यही फ़ाइलबाज़ी वाला कामकाज करना होता तो दुनिया में बहुत सारे जॉब और मौके हैं। यहाँ हम डिलीवर करने आए हैं। प्रशासनिक सेवा में जनता के लिए काम करने की इच्छा से आए हैं इसलिए सीधा काम करना पसंद करता हूँ ताकि परिणाम आए।

मैं अपनी निजी दो समस्याओं को लेकर मिलने गया था। जमीन पर अवैध कब्जा। इसलिए पक्की मापी का अनुरोध। भड़ास आश्रम के पास ट्रांसफार्मर और बिजली तारों का केबलीकरण। अनुपम जी ने दोनों कामों के लिए सीधे दोनों विभागों के अधिकारियों को फ़ोन किया और मुझसे भी एक हफ़्ते में फीडबैक देने के लिए कहा।

मैं दंग था। ऐसे कोई काम करता है भला। मुझे सरकारी सिस्टम की मुर्दनगी से डिप्रेशन हुआ करता था। जब मुझे इतना झेलना पड़ रहा है तो जनता कितनी झेलती होगी। लेकिन आज आशा और उम्मीद से भरा था। जैसा सुना था उससे ज़्यादा सिंसियर पाया डीएम अनुपम शुक्ला को।

बंदे के चेहरे पर तनिक तनाव नहीं। एकदम कूल। मीडिया के लिए सहज उपलब्ध। जनता से सीधा कनेक्ट। रिजल्ट देने की हर अधिकारी और हर विभाग से अपेक्षा। पूरे जिले के लोग इन्हें दुवायें दे रहे हैं।

मैंने डीएम को पूरे जिले की तरफ़ से धन्यवाद किया, नॉट आउट हुए बिना शानदार पारी खेलते हुए क्रीज पर डटे रहने के लिए।

अनुपम शुक्ला जैसे अफ़सर भाग्य से बनते और मिलते हैं क्योंकि नौकरियाँ अंततः भ्रष्ट सत्ता के दबाव में ईमानदार आत्माओं पर उदासी की चादर फैला दिया करती हैं। अनुपम शुक्ला की आत्मा आज भी ईमानदार और संवेदनशील है।

2015 की UPSC सिविल सेवा परीक्षा में पटना के अनुपम शुक्ला ने तीसरे प्रयास में 10वीं रैंक हासिल की थी। उनका विषय फिजिक्स था। सिविल सर्विस परीक्षा में सफलता के समय उनकी उम्र 27 वर्ष थी।

अनुपम शुक्ला के पिता डी.के. शुक्ला उस समय पटना में प्रधान मुख्य वन संरक्षक के पद पर तैनात थे। दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रतिष्ठित हिंदू कॉलेज में अनुपम ने भौतिकी की पढ़ाई की और इसी विषय में डिग्री पूरी की। अनुपम की शिक्षा का एक हिस्सा इंग्लैंड में पूरा हुआ। उन्होंने यूनिवर्सिटी ऑफ वेल्स में भी चार वर्ष तक अध्ययन किया।

यही अनुपम शुक्ला आज ग़ाज़ीपुर के सबसे शानदार शीर्षस्थ अधिकारी के रूप में चर्चित हैं।

मुझे नहीं लगता अनुपम शुक्ला को ये सिस्टम इसी तरह काम करने देगा। ऐसे अफसर नेताओं और सत्ताओं की आँखों की किरकिरी बन जाते हैं और अंततः उन्हें साइडलाइन पोस्टिंग दे दी जाती है और कोई परम बेईमान करोड़ों देकर जिले की पोस्टिंग लेकर आ जाता है और दिए माल का सौ गुना हड़पने में जुट जाता है। इस दौरान जनता को फाइल फाइल खेलने में उलझा दिया जाता है।

मेरी तरफ़ से अनुपम शुक्ला ज़िंदाबाद।

अच्छे अफसरों को खुलकर प्रमोट करो और चोरों को खुलकर गरियाओ! अच्छा अफसर भाग्य से मिलता है!

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