
पंकज शुक्ला-
ये फ़ोटो साल 1993 का है, कानपुर का है। और, इस फ़ोटो के पीछे की जो कहानी है, उसे सुनने के बाद ‘अमर उजाला’ के कानपुर, मेरठ और बरेली केंद्र में हल्ला हो गया था। इस फ़ोटो को आज लगाने का सिग्नल ये है कि ‘मझेरिया से मेक्सिको’ के लिए चली गाड़ी रफ़्तार पकड़ने वाली है। अब पत्रकारिता के ऐसे-ऐसे क़िस्से सामने आने वाले हैं, जिन्हें अक्सर ख़बरों में जगह नहीं मिलती।
साल 1993 वैसे भी धमाकों के साल के तौर पर याद किया जाता है, यही वह साल है जब दाऊद इब्राहिम के इशारे पर मुंबई की लोकल ट्रेनों में एक के बाद एक 12 बम धमाके किए गए और यही वह साल है, जब राम जन्मभूमि आंदोलन के बाबरी मस्जिद ढाँचे को गिराने जाने तक पहुँचने के बाद भी उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार न बन सकी।
ख़ैर, पिछली कड़ी में हमने बात जहाँ ख़त्म की थी, वहीं से शुरू करते हैं। पत्रकारिता में अक्सर ऐसा होता है कि रिपोर्टर जब बहुत सीनियर हो जाता है, या उसकी अपनी बीट के दिग्गज नेताओं, अभिनेताओं व अफ़सरों के बीच नियमित बैठकी होने लगती है तो वह ज़मीन से दो इंच ऊपर चलने लगता है। और, ऐसे सारे रिपोर्टरों से अपने पैर छुआने के लिए शाम होते ही ‘अमर उजाला’ कानपुर के गेट पर खड़े हो जाते थे, उस समय के महाप्रबंधक, कमलेश दीक्षित।
एक से एक दिग्गज रिपोर्टर आते। अपनी मोटरसाइकिल खड़ी करते, कोई उनके घुटनों को हाथ लगाता, कोई ‘पोताम्बरी’ करता और इक्का-दुक्का ही होता जो पंजों के पास तक झुककर उनके पैर छूता। ये उनका चाटुकारिता टेस्ट होता था, जिसने दफ़्तर में घुसते समय उनके पैर छुए, वह पास, जिसने नहीं छुए, उसकी कोई न कोई शिकायत वह अतुल माहेश्वरी या राजुल माहेश्वरी के कानपुर आने पर करते ज़रूर थे।
रोज़ सुबह उठकर उनके पैर छूने पर मेरे पापा को हमेशा गर्व रहा। उनके विद्यालय के सारे ब्राह्मण अध्यापक और गाँव जवार के भी सारे बुजुर्ग ब्राह्मण उनसे कहा करते, ‘पंकज, मिलते ही पैर जरूर छूते हैं, वह भी पंजों तक नीचे झुककर..।’ “अभिवादन शीलस्य नित्यम् वृद्धोपिसेविन:….” तो अपन ने स्कूल के समय से ही रट रखा था। लेकिन, बात ये भी गाँठ रखी थी कि कोई हेकड़ी में पैर छुआना चाहे तो उसे बता देना है कि भैया हम पैकू के सुकुल हैं, बीस बिसुवा वाले..! बस, कमलेश दीक्षित के साथ मामला यहीं अटक गया। वह चाहते थे कि मैं उनके गेटावतार के समय उनके पैर छू लूँ और अपन ठीक उनके काँधे के बगल से कन्नी काटकर गेट के अंदर..!
तब कानपुर संस्करण में बच्चों का एक पन्ना भी स्थानीय रूप से निकलता था। जुयाल जी ने मुझसे बच्चों की कोई कविता लिखकर देने को कहा और मैंने यूँ ही दफ़्तर में बैठे बैठे कुछ तुकबंदी बनाई और उन्हें दे दी। कविता मौलिक थी, लेकिन कमलेश दीक्षित ने शिकायत लगाई कि ये कविता मैंने सैनिक स्कूल की किसी पत्रिका से उठाकर अपने नाम से लगवा दी है। मुझे उनकी शिकायत की जानकारी मिली। जिनके पास शिकायत पहुँची थी, उनको पता था कि सैनिक स्कूल वाला रेफरेंस फ़र्ज़ी था। इस झूठी शिकायत का पर्दाफ़ाश होने के बाद मुझे इस बात की तवज्जो मिलने लगी थी कि मैं सही बात पर डटा रह सकता हूँ।
जैसा कि मैंने पिछली कड़ी में बताया ही कि मेरी ड्यूटी सिटी डेस्क पर लगी थी। कुशल कोठियाल उस दिन सिटी इंचार्ज की भूमिका में थे और उन्होंने मुझे साफ़ कह रखा था कि बहुत सख़्ती से एडिट करना है। रिपोर्टिंग में अक्सर रिपोर्टर अपनी ख़बर चार कॉलम तक फैलाने के लिए बढ़िया इंट्रो लिखा करते थे, फिर चार पांच पैरे में पुरानी ख़बर या लंतरानी और फिर आख़िरी पैरे में एक दो नई बातें लिखकर काम खत्म। खबरें तब सारी हाथ से ही लिखी जाती थीं और उनको संपादित करना भी कम आसान काम नहीं होता था।
संपादन में तब उसे सबसे तेज़ माना जाता था, जो दो कॉलम डबल लाइन, तीन कॉलम सिंगल लाइन विद सब हेडिंग और क्रॉसर, या चार कॉलम हेडिंग बिना अक्षर और मात्राएं गिने लगा देता था। खबरों के तब ब्रोमाइड प्रिंट निकलते, उन्हें सुखाने के बाद, ख़बरें पेज पर चिपकाई जाती थीं और फिर उनकी प्लेट बनकर प्रिटिंग होती। दो से तीन महीने में ही मैंने हेडिंग लिखने में रफ़्तार पकड़ ली थी। कुशल कोठियाल मेरी इस तेज़ी से ख़ुश भी रहते। वह पेज बनवाने का काम भी मुझे दे चुके थे।
सो, जब दिग्गज पत्रकार प्रशांत मिश्र जी की वह ‘ख़बर’ मुझ जैसे ट्रेनी की नज़र से गुज़री। तो मैंने कुशल कोठियाल के बताए मंत्र को याद किया। ‘सार सार को गहा और थोथा…’ सब उड़ा दिया। पूरे चार-पाँच पन्ने की वह ख़बर अब बस इंट्रो और आख़िरी पैरे में ही बची थी। टाइपिंग रूम में कानाफ़ूसी हुई तो लेकिन मैंने ध्यान नहीं दिया। हाँ, मैंने इतना ध्यान ज़रूर रखा कि वह ख़बर पेज पर सबसे ऊपर ज़रूर लगे। अगले दिन मॉर्निंग मीटिंग में बवाल मचा। कुशल कोठियाल ने मुझसे कुछ नहीं कहा। बस, आँखों से इशारा किया, “चुप रहो, मैं संभाल लूंगा।”
उस दिन मैंने पहली बार सीखा कि लीडरशिप क्या होती है? और, उनके बताए इस मंत्र का पूरे करियर पालन किया। टीम लीडर वही होता है जो अपनी टीम के हर कार्य की ज़िम्मेदारी ले सके और अपनी जवाबदेही किसी टीम मेंबर पर न थोपता रहे।
ये बात वहीं ख़त्म हो गई। न ऊपर मेरी कहीं कोई शिकायत हुई और न ही किसी ने मुझसे जवाब तलब किया। एक दो लोग बाहर चाय की दुकान पर पीठ और ठोंक गए, “सही जा रहे हो गुरू..!” पत्रकारिता में बस आपको इसी मौक़े पर सतर्क हो जाना है। यहाँ तारीफ़ मिलने का मतलब है कि जल्दी ही कोई नया बाँस आने वाला है। डेस्क से मेरी छुट्टी हुई और मुझे रिपोर्टिंग में उतार दिया गया। साल 1993 में मैंने कानपुर में शिक्षा, ट्रांसपोर्ट और डाक की बीट देखी। इसी दौरान कानपुर विश्वविद्यालय का दीक्षांत समारोह हुआ और जागरण के पहले पन्ने पर एक ऐसी फ़ोटो छपी, जिसमें मैं समारोह में आए राष्ट्रपति जी के साथ मंच की तरफ़ बढ़ता दिख रहा था। ये फ़्रेम संयोग से बना था लेकिन…
उसी साल फ़िल्म निर्माता साजिद नाडियाडवाला और सुनील शेट्टी कानपुर आए फ़िल्म “वक़्त हमारा है” का प्रचार करने। फ़िल्म पर लिखते-लिखते और दैनिक जागरण जैसे अख़बार के फ़ीचर पेज पर छपते छपते तीन साल हो चुके थे। मुंबई से आई टीम ने मुझे खोजा और मैंने मॉल रोड पर नए-नए खुले पंचसितारा होटल में जाकर दोनों का इंटरव्यू चाप दिया। तब फ़िल्मों की ख़बरें, इंटरव्यू हफ्ते में एक दो दिन ही छपते थे, और वह भी फ़ीचर पेज पर।
एक क़िस्सा और, इससे कुछ ही दिन पहले मैं एक दिन मंजूश्री टॉकीज स्थित राजश्री पिक्चर्स के दफ़्तर पहुँचा, वहाँ मैं फ़िल्म इनफॉर्मेशन और ट्रेड गाइड, मैगज़ीन पढ़ने जाया करता था। मैंने वहाँ माधुरी दीक्षित की नई फ़ोटो देखी जो आने वाली फ़िल्म “हम आपके हैं कौन!” के सेट पर खींची गई थी। मैंने वह तस्वीर ली और दैनिक जागरण के फ़िल्म पेज पर उसे छपवा भी दिया। हालाँकि, बाद में तिवारी जी से माफ़ी मांगकर वह तस्वीर मैंने उन्हें लौटा भी दी।
अब, लौटकर आते हैं, सुनील शेट्टी के इंटरव्यू पर। सुनील शेट्टी का ये इंटरव्यू मैंने तब मेरठ से निकलने वाले ‘अमर उजाला’ के फ़िल्म परिशिष्ट ‘रंगायन’ के लिए भेजा था। नरेंद्र निर्मल तब उसके प्रभारी थे, उन्होंने ये इंटरव्यू ‘प्रकाशन योग्य नहीं, ख़ेद सहित वापस’ की टिप्पणी के साथ मुझे वापस भेज दिया। मैंने वह टिप्पणी वाला कागज़ हटाया। मोटरसाइकिल उठाई। और, पूरा का पूरा इंटरव्यू हू ब हू, दैनिक जागरण के फ़िल्म पेज प्रभारी, प्रवीण श्रीवास्तव को दे आया। प्रवीण जी ने मेरी फ़िल्म पत्रकारिता को हौसला देने का बहुत बड़ा काम किया था उन दिनों, और इसके लिए मैं उनका हमेशा आभारी रहूँगा।
अगले शनिवार, सुनील शेट्टी का वह इंटरव्यू दैनिक जागरण में मेरे नाम समेत छप गया। अबकी बार, हल्ला सरकार हो गई..! कानपुर से लेकर मेरठ और बरेली तक इतने फ़ोन घनघनाए कि राजुल जी, के कानपुर आते ही मेरी पेशी हो गई। मैंने नरेंद्र निर्मल जी की वह हाथ से लिखी टिप्पणी राजुल जी के आगे धरी और कहा, “जो लेख अमर उजाला में छपने लायक ही नहीं है, उसे जागरण छाप दे रहा है तो इसमें मेरी कहां ग़लती है? और, मैं तो अभी ‘अमर उजाला’ के पे रोल पर भी नहीं हूं।”
राजुल जी ने संभलकर काम करने को कहा और ये भी समझाया कि एक अख़बार में काम करते हुए दूसरे अख़बार के लिए लिखना इस पेशे में ठीक नहीं है। तुरंत ही मेरा अप्वाइंटमेंट लेटर बनवाया गया और मेरे ऊपर ‘अमर उजाला’ का पूर्णकालिक पत्रकार होने का ठप्पा लगा दिया गया।
उसी साल हमारे घर में लक्ष्मी आई। बिटिया श्रद्धा का फ़तेहपुर चौरासी में ही जन्म हुआ। और, ईश्वर कृपा बनी रहे कि उसके बाद तो अब तक, जब भी, जैसी भी ज़रूरत होती है, लक्ष्मीजी ने कभी निराश नहीं किया। कानपुर के बाद कौन सा शहर बना मेरा ‘अमर उजाला’ में अगला पड़ाव? और, वहाँ किस दबंग नेता के घर रात 11 बजे पहुँचकर मैंने किया इंटरव्यू? जानने के लिए पढ़ते रहिए…मझेरिया से मेक्सिको। यात्रा अभी जारी है। जै जै..!


