अशोक पांडे-
मार्च 2018 में कुमाऊँ के एक सुदूर गाँव में भटकते हुए मुझे केसरसिंह बोथियाल मिले. चौरासी बरस के केसरसिंह जी की कुल मासिक आमदनी थी आठ सौ रुपए और वे रोज़गार की तलाश में थे. कुछ ही दिन पहले उन्होंने सड़क मजदूर का काम करते हुए चौदह सौ रुपए कमाए थे. यह उनके जीवन का हाई पॉइंट था.
उनसे मिलना दिल को हिला देने वाला अनुभव था. फुर्सत मिलते ही मैंने उनकी कहानी लिख कर पोस्ट की. कहानी को दिल्ली में बैठे विनोद (Vinod Kapri) ने भी पढ़ा और तुरंत कॉल किया कि वह पहली फुरसत में केसरसिंह जी से मिलना और संभव हुआ तो उनके जीवन को लेकर एक फ़िल्म बनाना चाहेगा. दो माह बाद हम दोनों केसरसिंह बोथियाल और उनकी पत्नी से मिल रहे थे.
दोनों की कथा सुनी गई और उस पर फ़िल्म बनाए जाने पर सहमति बनी.
तीन-चार साल की मशक्कत के बाद फ़िल्म की स्क्रिप्ट पूरी हुई और सन 2022 में शूटिंग चालू हो सकी. शुरू में फ़िल्म के लीड रोल नसीरुद्दीन शाह और उनकी पत्नी रत्ना करने वाले थे लेकिन कोरोना का दौर आ गया और नसीरुद्दीन शाह के बीमार पड़ने के कारण नए सिरे से फ़िल्म की परिकल्पना करनी पड़ी. आख़िरकार विनोद ने कुमाऊँ के ठेठ ग्रामीण परिवेश से निकले दो ऐसे लोगों को मुख्य भूमिकाओं में लेकर फ़िल्म बनाने का फ़ैसला लिया जिन्होंने अभिनय तो छोड़िए कभी मूवी कैमरा भी नहीं देखा था.
शूटिंग के बाद के दौर में ज़िद के पक्के विनोद ने माइकेल डाना को फ़िल्म का संगीत देने के लिए मना लिया. माइकेल डाना ने लाइफ़ ऑफ़ पाइ जैसी मशहूर फ़िल्म का संगीत कम्पोज़ किया था और उसके लिए ऑस्कर और गोल्डन ग्लोब अवार्ड हासिल किया था. गुलज़ार ने फ़िल्म के लिए गीत लिखा. फ़िल्म के बारे में और भी बहुत कुछ है जो कभी फुर्सत में बताया जाएगा.
फ़िल्म अब तक अट्ठाईस इंटरनेशनल फ़िल्म फ़ेस्टिवल्स में जा चुकी है और उनमें से कुल अठारह जगहों पर सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म का सम्मान हासिल कर चुकी है.
दुनिया भर में फ़िल्म को लेकर एक से बढ़ कर एक लेख और समीक्षाएँ प्रकाशित हुए. अभिनय, निर्देशन वगैरह की खूब तारीफ़ हुई. विश्व सिनेमा की कितनी ही हस्तियों ने फ़िल्म देख कर उसे अविस्मरणीय बताया.
फ़िल्म को बने हुए दो बरस होने को आए पर तमाम न बताये जाने लायक़ कारणों से उसे भारतीय सिनेमाघरों में रिलीज़ नहीं किया जा सका था.
कल सुबह विनोद ने ख़बर दी कि आख़िरकार 23 अक्टूबर को फ़िल्म ‘पायर’ देश भर में रिलीज़ होने जा रही है.
फ़िल्म का पोस्टर भी आज ही रिलीज हुआ है. बड़ा कर के देखेंगे को आपको फ़िल्म के को-प्रोड्यूसर यानी सहनिर्माता के तौर पर ख़ाकसार का नाम भी दिखाई देगा. यह अपने आप में एक दिलचस्प कीर्तिमान होगा कि बग़ैर एक भी पैसा लगाए कोई आदमी आने वाले दिनों में ब्लॉकबस्टर बनने जा रही किसी फ़िल्म का को-प्रोड्यूसर बना है.
विनोद ने इसे बनाने में अपना सब कुछ दांव पर लगाया है. बहुत सारा गँवाया भी है. विनोद को बधाई दीजिए और थोड़ा सा इंतज़ार कीजिए.
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