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नेपाल के पीएम बालेंद्र शाह का संयुक्त राष्ट्र संघ में दिया गया वायरल भाषण नार्वे के प्रमुख अखबार में छपा है!

Man in a black suit and hat speaks at a United Nations podium with a large black banner reading 'En tale for historie-bøkene' in the foreground (news photo).

प्रवीण झा-

नेपाल के प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह द्वारा संयुक्त राष्ट्र संघ में दिए भाषण पर आज नॉर्वे के अखबार दाग्स अविसन में आमुख लेख छपा है। पढ़ें उसका हिंदी अनुवाद-

इतिहास की किताबों में दर्ज होने वाला भाषण

पिछले साल सभी को यकीन था कि संयुक्त राष्ट्र उस मरी हुई मछली जैसा है जो कुछ दिनों से धूप में सड़ रही हो। इस साल संयुक्त राष्ट्र के मंच से दिया गया एक भाषण वायरल हो गया और हमें याद दिलाया कि आखिर कुछ लोग संयुक्त राष्ट्र की उपयोगिता अब भी देखते हैं।

नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह ने न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र के मंच पर जाते समय अपना धूप का चश्मा क्यों नहीं उतारा? पहाड़ी देश के नेता के भाषण के बाद मेरे सोशल मीडिया पर यही सवाल छा गया।

आखिरकार द न्यूयॉर्क टाइम्स इसका जवाब लेकर आया। धूप का चश्मा और काला सूट 36 वर्षीय शाह की पहचान हैं। शाह नेपाली सार्वजनिक जीवन में एक रैपर के रूप में उभरे थे। 2022 में उन्होंने अप्रत्याशित रूप से राजनीति का रुख किया और काठमांडू के मेयर बने।

2025 में एक छात्र आंदोलन के कारण नेपाल की पिछली सरकार को पद से हटा दिया गया। फिर शाह और उनकी पार्टी ने मार्च 2026 के संसदीय चुनाव में भारी जीत हासिल की। इसके बाद अगस्त में उन्हें विनाशकारी स्तर के भूस्खलन और बाढ़ से जूझना पड़ा।

बालेन्द्र शाह एक असाधारण व्यक्तित्व हैं, जो काफी हद तक सोशल मीडिया की मदद से उभरे हैं। वे लगभग कभी साक्षात्कार नहीं देते और मुख्यतः मतदाताओं तथा अपने अनुयायियों से सीधे संवाद करते हैं। उनका पूरा व्यक्तित्व वायरल होने के लिए तैयार किया गया है।

संयुक्त राष्ट्र में उनका भाषण भी वायरल हुआ। नॉर्वे में उस भाषण पर ध्यान जाना मुश्किल था, क्योंकि यह लिखे जाने तक किसी नॉर्वेजियन मीडिया ने उसकी खबर नहीं दी थी। यहाँ लोगों का ध्यान सबसे अधिक नेतन्याहू और ट्रंप के नैतिक पतन पर था, और इस पर कि जब वे दोनों विनाश और अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को तोड़ने के लिए उकसा रहे थे, तब सभागार से कौन बाहर गया और कौन वहीं रहा।

पता चलता है कि दुनिया इससे बड़ी है। यह भी पता चलता है कि रचनात्मक और दूरदर्शी नेताओं की ज़रूरत है।

नेपाल के अपेक्षाकृत कम जाने-पहचाने, नए प्रधानमंत्री का भाषण कई कारणों से वायरल हुआ। उनकी असाधारण भाषण-कला; अगस्त की बाढ़ से मिला उनका भारी कीमत चुकाकर हासिल किया गया अनुभव—जिसमें 1,400 से अधिक लोग मारे गए और 6,000 अब भी लापता हैं; भविष्य की चुनौतियों के प्रति उनका समाधान-केंद्रित रवैया; और संयुक्त राष्ट्र की व्यवस्था, अंतरराष्ट्रीय एकजुटता तथा सहयोग में उनका विश्वास।

एक कारण उनकी यह सटीक टिप्पणी भी थी कि ईरान युद्ध और जलवायु परिवर्तन अरबों लोगों को कैसे प्रभावित करते हैं—ऐसे लोग जो अपनी संपन्न सरकारों से ईंधन पर कर घटाने और खाद्य पदार्थों पर वैट समाप्त करने की मांग नहीं कर सकते।

शाह ने कहा, “मिसाइलें समय पर पहुँच जाती हैं। राइफलें और गोला-बारूद सीमाएँ पार करते हैं, हर अड़चन से निकल जाते हैं और हर समय-सीमा पूरी करते हैं। लेकिन नेपाल का एक छोटा किसान, जब उसे सबसे अधिक ज़रूरत होती है, तब बाज़ार भाव पर खाद या ईंधन नहीं जुटा पाता।”

“हमने एक ऐसी दुनिया बनाई है जिसमें युद्ध के लिए रसद की व्यवस्था त्रुटिहीन है, लेकिन भोजन के लिए रसद की व्यवस्था काम नहीं करती।”

“और यह केवल नेपाल की अपनी त्रासदी नहीं है। बांग्लादेश से पूछिए। भूटान से पूछिए। भारत से पूछिए। मालदीव से पूछिए। पाकिस्तान से पूछिए। श्रीलंका से पूछिए। हमारे क्षेत्र के किसी भी दूसरे देश से पूछिए, और आपको वही कहानी सुनने को मिलेगी: पहले ऐसी जलवायु की मार, जिसे हमने गर्म नहीं किया; और फिर उन युद्धों की मार, जिन्हें हमने शुरू नहीं किया। यह हमें बताता है कि आज की वैश्विक सहयोग व्यवस्था में जितना पहली नज़र में दिखाई देता है, उससे कहीं अधिक टूट चुका है।”

वह एक ज़बरदस्त भाषण था। इतिहास की किताबों में दर्ज होने वाला भाषण। उसे नॉर्वेजियन अखबारों के स्तंभों में जगह नहीं मिली, लेकिन अल जज़ीरा, द गार्जियन, एसोसिएटेड प्रेस और रॉयटर्स ने उसे जगह दी।

वह उन हज़ारों आम लोगों तक पहुँचा जिन्होंने उसे साझा किया। थ्रेड्स, इंस्टाग्राम, टिकटॉक और फ़ेसबुक—हर ओर से वह मेरी फ़ीड में पहुँचा।

द हिंदू और बिज़नेस स्टैंडर्ड जैसे भारतीय अखबारों ने प्रधानमंत्री के प्रस्तावित “हिमालयी जलवायु सहनशीलता तंत्र” के बारे में लिखा, जिसका नेतृत्व नेपाल, भारत और चीन करेंगे। इसका उद्देश्य हिमालय को इन तीन देशों के बीच पर्यावरण निगरानी और जलवायु संबंधी तैयारियों में सहयोग की प्रयोगशाला बनाना है। इनमें से दो देश परमाणु शक्तियाँ हैं और क्षेत्र में उनके बीच सीमा विवाद हैं। लेकिन शाह का मानना है कि हिंदू कुश हिमालय में एक शांति परियोजना संभव है। यह क्षेत्र लगभग दो अरब लोगों को पानी उपलब्ध कराता है।

एल्गोरिदम से संचालित मीडिया की दुनिया के कई विचित्र प्रभाव हैं। यह दुनिया ज्ञान की खोज से अधिक ध्यान आकर्षित करने की होड़ को पुरस्कृत करती है। इसके कई विनाशकारी और खतरनाक प्रभाव भी हैं—जहाँ नफ़रत और गुस्से को बढ़ाया जाता है और कई गुना फैलाया जाता है।

लेकिन सोशल मीडिया के कुछ लोकतांत्रिक प्रभाव अब भी हैं। वह ऐसे लोगों को सामने ला सकता है जिन्हें हम अन्यथा अनदेखा कर देते हैं। वह यह भी दिखा सकता है कि बाहर एक ऐसा जनसमूह मौजूद है जो अत्यधिक असमानता को अपने अस्तित्व से जुड़ी समस्या मानता है। ये लोग इस बात के लिए व्याकुल हैं कि कोई उन्हें देखे और उनकी ओर से बोले।

यदि मैं केवल नॉर्वेजियन अखबार पढ़ती, तो मुझे यह तक पता नहीं चलता कि शाह का भाषण हुआ था। मुझे यह पता नहीं चलता कि ऐसे लोग भी हैं जो अपने छोटे-से देश के सबसे अँधेरे दौर में नेतृत्व करने की कोशिश कर रहे हैं।

मुझे यह पता नहीं चलता कि एक छोटा देश अपने अरबों पड़ोसियों की ओर से बोल रहा था और रचनात्मक समझौते करने तथा ठोस कदम शुरू करने की कोशिश कर रहा था।

मैं बस यही मानती कि संयुक्त राष्ट्र का उच्चस्तरीय सप्ताह बेंजामिन नेतन्याहू के बारे में था, जो नाटो सदस्य तुर्की से झगड़ा मोल ले रहे थे। या डोनाल्ड ट्रंप के बारे में, जो ईरान के इस्लामी गणराज्य को शीघ्र नष्ट करने की धमकी दे रहे थे—जिसका निहितार्थ ऐसी हिंसा थी जिससे आम नागरिकों को भारी चोट पहुँचती।

इस तरह मैं यह नहीं मानती कि इस ग्रह पर बुद्धिमान जीवन भी मौजूद है। केवल यही मानती कि ताकत ही अधिकार देती है, हमेशा के लिए।

शक्ति की भाषा और शक्ति के दुरुपयोग को संयुक्त राष्ट्र के मंच पर अच्छी-खासी जगह मिली। अंतरराष्ट्रीय प्रेस में भी उन्हें भरपूर जगह मिली।

लेकिन एल्गोरिदम ने चाहा कि एकजुटता की एक छोटी-सी अपील, वैश्विक सहयोग में थोड़ा-सा विश्वास और यह थोड़ी-सी आशा भी मुझ तक पहुँचे कि हम मनुष्यों को आगे बढ़ाने वाली दूसरी शक्तियाँ भी मौजूद हैं।

शाह के भाषण ने थोड़ी देर के लिए हिंसक शक्ति-प्रदर्शन की कठोर धमक को दबा दिया। और संयुक्त राष्ट्र के मंच में नई जान फूँक दी।

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