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सुख-दुख

वृंदावन के संत प्रेमानंद महाराज की सारी मार्केटिंग ध्वस्त!

एक और बाबा रहस्यमय निकले, आश्रम पर ढेरों आरोप!

गणेश झा-

सनातन धर्म में कहा गया है कि संत की निंदा नहीं करनी चाहिए पर जब पानी सिर से ऊपर बह निकले तो बात भी निकल ही पड़ती है। वृंदावन के संत प्रेमानंद महाराज पिछले दो-तीन सालों से कुछ ज्यादा ही चर्चा में रहे हैं। सोशल मीडिया पर तो और भी ज्यादा। उनकी भक्ति और उनको महान बताने की मार्केटिंग बहुत ही प्रोफेशनल अंदाज में होती रही है। बाकायदा एक अभियान की तरह किया गया प्रचार-प्रसार। राष्ट्रपति जी भी दर्शन के लिए उनके आश्रम पधारीं।

अब उनके आश्रम में तरह-तरह के मामले होने की खबरें निकलकर आ रही हैं। कुछ चेलों के लापता होने की खबर भी निकली है। उनके एक शिष्य रसिक दुधारी शरण की तो बधिया हालत में मौत हो गई और लाश भी बरामद हुई है। उनका प्राइवेट पार्ट शरीर से गायब था मतलब सबकुछ कटा हुआ था। शायद आत्मसाक्षात्कार के लिए बधिया होना जरूरी होता है। अब बाबा राम रहीम ने भी अपने करीब 400 चेलों को सत्य से साक्षात्कार कराने के लिए बधिया ही तो करवाया था। बाकायदा सर्जन रखकर। तो सवाल मन में उठ रहा है कि वृंदावन के आश्रम में भी कहीं बधिया करने का कोई खेल तो नहीं चल रहा। चेले राम रहीम के भी गायब हुए थे और प्रेमानंद महाराज के भी गायब हुए बताए जा रहे हैं।

आखिर कुछ तो अंदर जरूर चल रहा है। और वहां जो कुछ भी चल रहा है उसे दुनिया की नजरों से छिपाया जा रहा है। कहते हैं पुलिस भी इस आश्रम को लेकर कोई शिकायत नहीं लेती। आश्रम के खिलाफ शिकायत लेकर आनेवालों को डराया-धमकाया भी जाता है। शिकायतकर्ताओं यानी बाहरी लोगों को आश्रम में प्रवेश की इजाजत मिलना तो दूर, उन्हें आश्रम की तरफ जानेवाले रास्ते पर भी आश्रम से फर्लांग भर पहले ही रोक दिया जाता है। इस आश्रम को करीब से देखनेवाले बताते हैं कि प्रेमानंद महाराज का यह आश्रम हमेशा से ही घने रहस्यों से घिरा रहा है।

प्रेमानंद महाराज की खुद की नौटंकी भी कुछ कम नहीं रही है। वे आधी रात को अपने बड़े से लाव-लस्कर को साथ लेकर पूरे गाजे बाजे के साथ वृंदावन की सड़कों पर निकल पड़ते थे। कहा जाता था कि महाराज जी भक्तों को दर्शन देने के लिए रात को निकलते हैं। यो क्या दिनभर दर्शन नहीं दे पाते थे जो रात के अंधेरे में सबकी नींद हराम करने निकल पड़ते थे। वो तो रास्ते में बसे लोगों ने आजिज़ होकर जब पुलिस और प्रशासन से शिकायत की तब जाकर वह रात्रिकालीन परेड बंद हुआ।

प्रेमानंद महाराज के प्रचार-प्रसार ब्रिगेड ने एक कहानी दुनिया को यह भी प्रसारित की है कि महाराज जी के आश्रम में उनके कई चेले ऐसे भी हैं जो पहले आईएएस-आईपीएस अधिकारी थे और महाराज जी के आत्मसाक्षात्कार से ऐसे प्रभावित हुए कि सबकुछ छोड़-छाड़ कर संन्यास ग्रहण कर लिया और वृंदावन आकर आश्रम में ही रहने लग गए। हो सकता है यह सच भी हो।

शिष्य रसिक दुलारी जी की बधिया हालत में मौत और लाश बरामद होने के बाद प्रेमानंद महाराज और उनके वृंदावन आश्रम की जांच अब शुरू हो गई है। अब देखना है कि आगे क्या-क्या निकलकर सामने आता है।


Split-screen collage: left shows a young man in a blue shirt with a bright yellow strap across his chest; right shows an older man with yellow Holi powder on his face and a flower garland, against a festive background. A Hindi news headline overlays the top.

प्रेमानंद आश्रम के बाहर धरना, 3 महीने से लापता अनुज के पिता बोले – जब तक बेटा नहीं मिलता बैठा रहूंगा

3 महीने से लापता अनुज का मामला: हाथरस (सादाबाद) का 18 वर्षीय अनुज चौधरी 3 महीने पहले दीक्षा लेने वृंदावन आया था, जिसके बाद से वह लापता था और परिजन लगातार आश्रम के चक्कर काट रहे थे।

मीडिया व जन-आक्रोश के बाद बदला आश्रम का रुख: साधक रसिक दुलारी शरण की संदिग्ध मौत के बाद जब मीडिया कवरेज और दबाव बढ़ा, तब आश्रम प्रबंधन ने स्वीकार किया कि अनुज आश्रम में ही है और उसे परिजनों को सौंपा जाएगा।

परिजनों को न मिलने देने का आरोप: परिजनों ने आरोप लगाया कि 3 महीने तक आश्रम का कोई व्यक्ति उनसे बात करने को तैयार नहीं था और बच्चे के बारे में कोई स्पष्ट जानकारी नहीं दी जा रही थी।

दिवंगत साधक रसिक दुलारी शरण के परिजनों ने भी आरोप लगाया था कि मिलने आने पर उन्हें 4-4 दिन बाहर बिठाकर बिना मिलाए लौटा दिया जाता था, जिससे आश्रम की कड़ी व संदेहास्पद कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो रहे हैं।


स्वामी आनंद देव-

पूज्य प्रेमानंद जी महाराज के शिष्य थे, रसिक दुलारी दास, पुलिस जांच के अनुसार इन्होंने कामवासना से पीड़ित होकर अपने जननांग ग्राइंडर मशीन से काट लिए, पहले दर्द और पीड़ा से वह इधर-उधर दौड़ते दिखाई दिए हैं, जब दर्द और ब्लड नहीं रुका दुलारी जी ने बिल्डिंग से कूदकर आत्महत्या कर ली l

वह 25 साल के थे,25 साल की आयु में कामवासना एक प्राकृतिक चीज है l सभी युवकों में एक आयु पर कामवासना आती है, अब आपके पास तीन उपाय है, पहला प्राकृतिक उपाय यही है कि आप एक जीवन साथी खोजें और अगर आध्यात्मिक प्रवृत्ति के हैं तो परिवार में रहते हुए साधना करें l साधू संतों की उन बातों को कचरे में डाल दें, जो कहते हैं कि भोग पाप है और पतन है l भोग न पाप है और न पुण्य है, वह बस शरीर की बायोलॉजिकल आवश्यकता है l यह सारी व्यवस्था भी परमात्मा की ही बनाई हुई है, इसे स्वीकार करें l अधिकांश धार्मिक लोग जीवन विरोधी हैं, जीवन की सहजता को स्वीकार नहीं कर पाते हैं l

फिर भी अगर आपने संकल्प ले ही लिया है तो आपको यह समझना होगा कि कामवासना को दबा लेना कोई ब्रह्मचर्य नहीं है l इस तरह के दमन से आपके भीतर तो कामवासना उबलती रहती है और आप ऊपर ऊपर राम राम भी जपते रहते हैं l एक और ब्रह्मचर्य भी है, जहां कामवासना तिरोहित होने लगती है, जैसे एक पांच साल का बच्चा है तो वह कामवासना को दबाये हुए नहीं है, वह अभी मुक्त है, जो भी व्यक्ति कामवासना से मुक्त हो जाता है, वह बच्चे की तरह ही सरल हो जाता है l ऐसा नहीं है कि वह कामवासना को दबाये बैठा होता है, बल्कि उसकी स्त्री या पुरुष में उत्सुकता ही समाप्त हो जाती है l

लेकिन यह राधे-राधे जपने से नहीं होगा, न राम- राम जपने से होगा l यह तो बहुत प्राईमरी स्तर की साधना है, कुछ शब्दों को बार बार दोहराने से कोई ऊंची आध्यात्मिक अवस्था उपलब्ध नहीं की जा सकती है लेकिन सारी दुनिया इसी मूढ़ता में है, लोग समझते हैं कि किसी शब्द को बार बार दोहराने से कुछ उपलब्ध हो जाएगा l मैं जगतगुरु श्री कृपालु महाराज के पास भी रह चुका हूं, तो मैं अपने अनुभव से ही कह रहा हूँ l आज भी कृपालु महाराज के प्रति श्रद्धा रखता हूँ और फिर भी कहता हूं कि यह बहुत ही प्राईमरी स्कूल की शिक्षा है l मेरे एक मित्र खुद ही पूरे दिन राम नाम की माला घुमाते हैं और एक दिन सत्य जुबान पर आ ही गया, पूछने लगे कि दिन भर भजन करने के बाद भी काम क्रोध कम क्यों नहीं होते हैं?

जब तक आपको नहीं पता कि सुषुम्ना से कैसे साँस ली जाती है ? साँस कब कौन से स्वर पर चल रही है? जब तक आपको समाधि की अनुभूति नहीं है, समाधि का ज्ञान नहीं है, तब तक आप अपनी ऊर्जा को रूपांतरित न कर पाएंगे l अगर चित्त तनाव ग्रस्त रहता है तो तनाव ग्रस्त चित्त हल्के होने के लिए काम वासना की मांग करेगा l इसलिए सांसरिक कार्यो में बोध और होश के साथ जिएं ताकि चित्त प्रफुल्लित रहे l

मन का एक नियम है, इसे जहां सुख मिलता है, यह वहीं भागता है l अभी तक मनुष्य जाति ने स्वाद और सेक्स से ऊपर कोई सुख जाना भी नहीं है, इसीलिए दोनों की बड़ी मांग है l जब आप भीतर कोई और रस,कोई और आनंद से परिचित हो जाते हैं तो बाकी के रस मन सहज छोड़ देता है, कबीर कहते हैं- राम रस पिया रे, जा रस बिसर गए रस और…

बाकी सूरदास जी के बारे में भी कहा जाता है कि स्त्रियाँ उनको आकर्षित करती थी, इसलिए उन्होंने अपनी आँख फोड़ ली थी, अरे आँख तो यही बुद्ध के पास भी है, यही कबीर के पास भी है l आँख थोड़े ही वासना के लिए जिम्मेदार है, मन का सारा खेल है, जननांग को काटने से भी वासना नहीं जाती है, मन वासना से घिरा है l कान का काम बाहर की ध्वनि को भीतर पहुंचाना है, यह तो मन का रस है कि वह क्या सुनना चाहता है l विवेक भी तो विकसित कीजिए l

धार्मिक लोगों की समझ ऐसी है कि अगर आप कामवासना पर बात करते हैं तो आप कैसे धार्मिक व्यक्ति हैं l धार्मिक लोगों की सबसे बड़ी समस्या भी यही है क्योंकि वे कामवासना का दमन करते हैं और दमन के कारण कामवासना से ही ग्रस्त भी रहते हैं, रूपांतरण का कोई ज्ञान नहीं है l बाकी पूजनीय संत प्रेमानंद जी आज बहुत प्रसिद्ध हैं,लेकिन प्रसिद्धि सत्य की कसौटी नहीं है l मैं भी उनके प्रति श्रद्धा रखता हूँ लेकिन यह भी जानता हूं कि वे सत्य को उपलब्ध नहीं है, लेकिन संत बहुत प्यारे हैं l हृदय में किसी तरह का छल, कपट इत्यादि कुछ भी नहीं है लेकिन पूर्णत्व भी नहीं है l

किसी भी दुर्भावना से पोस्ट प्रभावित नहीं है, बस एक साधक की दुखद यात्रा के लिए खेद है और जो युवक इस मार्ग पर हैं, उनके लिए करुणा है l

स्वामी आनंद देव….

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