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सुख-दुख

वरिष्ठ पत्रकार महेंद्र मिश्र भी दिल्ली पुलिस के दुर्व्यवहार के हुए शिकार!

Reporter with a microphone confronts a man in a blue vest who gestures with his arm as police stand nearby in a crowded street, storefronts in the background.

गिरीश मालवीय-

यदि किसी जनांदोलन, विरोध-प्रदर्शन या सार्वजनिक आंदोलन को कवर करने आए पत्रकारों को धमकाया जाए, रोका जाए, हुज्जत की जाए, हिरासत में लेने की धमकी दी जाए या कैमरे या माईक पर हाथ डालकर उन्हें लगातार रिपोर्टिंग करने से बाधित किया गया हो, तो यह लोकतांत्रिक दृष्टि से गंभीर चिंता का विषय है। लोकतंत्र में यह महत्वपूर्ण है कि पत्रकार बिना डर के रिपोर्टिंग कर पाए। हमें समझना होगा कि पत्रकारों को किसी भी आंदोलन, प्रदर्शन या सरकारी कार्रवाई को कवर करने का अधिकार है।

लेकिन अफ़सोस ऐसा हो नहीं पा रहा है। दिल्ली में हालात इतने खराब है कि आंदोलन कवर करने वाली महिला पत्रकारों ने एक एसीपी (ACP) स्तर के अधिकारी पर धक्का-मुक्की, मारपीट और अनुचित तरीके से छूने (यौन उत्पीड़न) का गंभीर आरोप लगाया है। इस घटना की एफआईआर दर्ज करने में देरी को लेकर पत्रकारों को संसद मार्ग थाने के बाहर जोरदार प्रदर्शन करना पड़ा है।

Bearded man in a blue vest being interviewed by a female police officer in khaki uniform on a street, with other officers in the background.

आप ऊपर जो फोटो देख रहे हैं वो दिल्ली के जाने माने पत्रकार Mahendra Mishra जी के साथ हुई घटना का है। यह फोटो उर्मिलेश जी की वाल से लिया है। Urmilesh जी लिखते हैं “जाने-माने पत्रकार और ‘जनचौक’ जैसी प्रोफेशनल और लोकप्रिय वेबसाइट के संपादक महेंद्र मिश्रा और उनके फोटो-पत्रकार संजय को भी शनिवार को हिरासत में लेने के लिए पुलिस वालों का एक समूह जिद ठाने हुए था. महेंद्र मिश्र अपनी वेबसाइट शुरू करने से पहले कई प्रमुख अखबारों में काम कर चुके हैं. दोनों ने पुलिस वालों को अपने-अपने प्रेसकार्ड दिखाये. इसके बावजूद वे कैमरा लटकाये संजय को हिरासत में लेने पर आमादा था. वहां मौजूद एक आईपीएस अधिकारी की मौजूदगी में यह सब हो रहा था. घटनास्थल पर कई पत्रकार और अध्यापक भी जुट गये. दोनों पत्रकारों ने पुलिस अफसर से सवाल करना शुरू किया: ‘आप लोग हमें कैसे हिरासत में ले सकते हैं? कानून की किस धारा के तहत? हमने क्या किया है? समाज या देश-प्रदेश में कोई घटना हो रही हो तो उसे ‘कवर’ करना पत्रकार का प्रोफेशनल दायित्व है, आप हमें अपना दायित्व निभाने से कैसे रोक सकते हैं?’ काफी हुज्जत के बाद पुलिस वालों ने उन्हें छोड़ा।

उर्मिलेश आगे लिखते है ….ऐसी बहुत सारी घटनाएं प्रकाश में आई हैं.पत्रकार-छायाकारों को डराने-धमकाने और घटनास्थल पर आने से रोकने के पीछे प्रशासनिक कम, राजनीतिक मकसद ज्यादा है.सत्ताधीशों को मालूम है कि उनका ‘टीवीपुरम’ तो इस घटनाक्रम को दिखायेगा नहीं, सिर्फ कुछ अखबार बच-बचाकर ‘कवर’ करेंगे! लेकिन सोशल मीडिया के प्लेटफॉर्म: यूट्यूब और वेबसाइट वाले पत्रकार इसे जमकर दिखायेंगे भी और लिखेंगे भी! इससे “चुनावी धांधली” के खिलाफ हो रहे प्रदर्शनों, प्रदर्शनकारियों के विचारों और उनमें शरीक होने वाले लोगों पर ढाये जा रहे दमन की असलियत भी देशवासियों के सामने जायेगी!

इसी वजह से जंतर-मंतर और उसके आसपास के इलाकों में तैनात पुलिस वालों को इस बार पत्रकारों-फोटोग्राफरों पर खास नजर है! वैसे भी अपने मुल्क में आज भी पुलिस तंत्र कानून के हिसाब से कम, सत्तातंत्र के इशारों पर ज्यादा काम करता है.

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