गौहर रजा-
मैं और शबनम आज ढाई घंटे तक रेंगती सड़क पर चलकर, बैरिकेड्स पार करते हुए कनॉट प्लेस पहुँचे। पूरी दिल्ली छावनी बनी हुई है। वहाँ सैकड़ों आंदोलनकारी और हज़ारों सुरक्षा बल मौजूद थे; पुलिस उन्हें पकड़ रही थी।
अचानक एक महिला पत्रकार भागती हुई आई; वह कह रही थी कि गुंडों ने उसके साथ मारपीट और दुर्व्यवहार किया है। वह पत्रकार कंपकंपी से काँप रही थी, और तभी पुलिस वाले उस पर टूट पड़े। उसे उठाकर बस में ठूँस दिया गया।
वहाँ बहुत सारे बिकाऊ/ग़ैर-निष्पक्ष पत्रकार भी घूम रहे थे, जो SIR का विरोध करने वालों से सवाल पूछने के बहाने बदतमीज़ी कर रहे थे। हम लगभग दो घंटे वहाँ रहे। वहाँ से निकलने से ठीक पहले एक और महिला पत्रकार पुलिस वालों के पास दौड़ती हुई आई, उसके साथ भी वही हुआ था—गुंडों ने उसे भी मारा था।
कनॉट प्लेस (सीपी) के उस कोने में 100 से ज़्यादा गुंडे जमा थे। उन्हें बसों में भरकर लाया गया था और सीपी का वह हिस्सा आंदोलनकारियों पर हमला करने के लिए उन्हें सौंप दिया गया था। पुलिस ने उन्हें खुली छूट दे रखी थी।
रवीश कुमार-
दस अक्तूबर.. कल गुंडों का दिन था। हज़ारों हज़ार जवानों की तैनाती के बीच गुंडे कहाँ से आ गए? जब ये हिंसा कर रहे थे तब उन्हें तुरंत काबू में क्यों नहीं किया? दरअसल यह सब कुछ एक जगह नहीं हो रहा था। किसी एक के पास इनकी रिकार्डिंग नहीं है। स्वतंत्र पत्रकारों की टोली अलग-अलग जगहों पर थी। सबके कैमरे में पुलिस की हिंसा
और गुंडों की हिंसा के बहुत सारे प्रसंग रिकॉर्ड किए गए हैं। अगर आप इन वीडियो को एक्स और इंस्टा पर स्क्रोल करते हैं तब दस अक्तूबर के प्रदर्शन की समझ पूरी तरह बदल जाती है। देश की न्यायपालिका से क्या उम्मीद की जाए, उनका डर ही होता तो पुलिस यह सब नहीं होने देती। देश भर से सुरक्षा बलों को लाने के बाद भी सौ पचास गुंडे लड़के-लड़कियों को दौड़ा कर पीट रहे थे। उनके बाल खींच रहे थे। पत्रकारों को मारा जा रहा था। तो यह सरकार गुंडों की मदद लेनी लगी है। पहले उन गुंडों को स्वतंत्र रुप से पनपने दिया, धर्म की रक्षा के नाम पर और अब उन्हें राजनीतिक प्रदर्शनों के ख़िलाफ़ इस्तेमाल करने लगी है। पत्रकारों और ख़ासकर लड़कियों के ख़िलाफ करने लगी है।
पुलिस ने प्रेस को ख़ूब धक्का दिया है। सड़क किनारे इंटरव्यू चल रहा है और तभी पुलिस खींच कर ले जाती है।

इसके बाद भी अलग-अलग जगहों पर मौजूद स्वतंत्र पत्रकारों ने बहुत सारे सबूत जमा कर लिए हैं। ठीक है कि वो सारे वीडियो मेरे पास नहीं है या किसी ऐसे के पास जो इन सब वीडियो को समेट कर एक रिपोर्ट बनाता। कॉपीराइट की भी समस्या गंभीर है। इस हंगामे में आप किसे संपर्क करेंगे और कब तक जवाब आएगा। तभी कल का मेरा वीडियो अधूरा सा लगा और अब चुभ रहा है कि इस प्रदर्शन की मुख्य तस्वीर तो गुंडे थे। उनकी गुंडागर्दी थी। पुलिस की चुप्पी थी और पुलिस की हिंसा थी। दस अक्तूबर को एक महिला पत्रकार(नाम नहीं मालूम) हिम्मत के साथ खड़ी है। कैमरे से रिकॉर्ड कर रही है। तीन-चार गबरू नौजवान पहले एक लड़के को मारते हैं। बाल खींचते हैं। सड़क पर पटक देते हैं और लातों से मारते हैं। फिर एक लड़की को दबोच लेते हैं। उसके कपड़े फाड़ देते हैं। उस एक महिला पत्रकार के वहाँ टिके रहने से सब दर्ज हो गया है। पता है कोर्ट कुछ नहीं करेगा, पुलिस कुछ नहीं करेगी। इसी से पता चलता है कि इनकी सरकार जनता के समर्थन से नहीं, इन्हीं सबके दम पर चल रही है। पुलिस और कोर्ट की तरफ से अनदेखी नहीं की जाती तो ज़बरदस्ती वोट चोरी को पवित्र बनाने वाले समर्थकों को भी मुश्किल होता। वो भी इन सबका विरोध करने लग जाते कि जो हुआ है, ग़लत हुआ है। वह नहीं कर पा रहे हैं इसलिए सत्तर के दशक के किस्सों की चादर ओढ़ कर घूम रहे हैं। पुराना बता रहे हैं। नया नहीं बता पा रहे हैं।
इन स्वतंत्र पत्रकारों के रहने से किसी भी आंदोलन का कवरेज बदल जाता है। इंस्टा पर जाकर देखते हैं तो कई घटनाओं के वीडियो चल रहे हैं। इनमें किसी कोण से पुलिस की ज़्यादती दर्ज हो रही है तो किसी कोण से गुंडो की हिंसा। इन वीडियो के बिना कोई भी रिपोर्ट मुकम्मल नहीं हो सकती और न किसी एक रिपोर्ट में इन सबकी दास्तां समेटी जा सकती थी स्केल इतना व्यापक था। न वीडियो में हिंसा के अलग-अलग रुप ही नहीं, साहस के भी अनेक रुप इनकी रिपोर्टिंग में मिल जाएंगे। ये पत्रकार जितना जोखिम उठाते हैं, उतना कोई नहीं। लड़कियाँ, युवा महिला पत्रकार पुलिस की हिंसा का भी सामना कर रही हैं मगर उसका प्रतिकार भी कर रही हैं। तन कर खड़ी हो जाती हैं। इन युवा महिला पत्रकारों और प्रदर्शनकारियों की हिम्मत अलग ही लेवल की है। इनकी ही हिम्मत थी कि सरकार इस बार हज़ारों हज़ार पुलिस लेकर आई, दिल्ली के बड़े हिस्से में इंटरनेट बंद कर दिया, लोगों को घर से उठाया, घर पर नज़रबंद किया तब भी उसे गुंडों की मदद लेनी पड़ी या गुड़ों को छूट देनी पड़ी ताकि उसकी मदद हो जाए।
इसके बाद भी लोग निकले हैं। योगेंद्र यादव तो देर रात तक थाने-थाने के चक्कर लगाते रहते हैं। कितने सारे युवा वकील प्रदर्शनकारियों की मदद के लिए आगे गए। उनके साथ भी मारपीट हुई। सुप्रीम कोर्ट के वकील शादान फ़रासात को टांग कर ले जाने का दृश्य वीडियो में दर्ज है। वकीलों के भी कपड़े फाड़े गए और उनके साथ भी पुलिस ने हिंसा की है। उन्हें भी हिरासत में लिया गया। सबने किसी अज्ञात भविष्य और नष्ट कर दिए गए लोकतंत्र को बचाने के लिए चोट सहे हैं। दस अक्तूबर का एक और ख़तरनाक पहलू है। सरकार जेन ज़ी के पीछे उनके घरों तक पहुंच गई है। हर राज्य में इस उम्र के बच्चे अब निगाह में आ गए हैं। उनकी प्रोफाइलिंग हो रही है।सरकार ने जेन ज़ी को अपना दुश्मन मान लिया है।



